Raag-Anurag
(0)
Author:
RavishankarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
399
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<span lang="HI">रज़ा फ़ाउण्डेशन ने हिन्दी लेखकों और कलाकारों की सुशोधित विस्तृत जीवनियाँ लिखाने और प्रकाशित कराने का प्रोजेक्ट बनाया है और उस पर काम चल रहा है : कई जीवनियाँ इस क्रम में प्रकाशित हो गयी हैं। भारत के मूर्धन्य कलाकारों में से बहुत कम ने अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं। इनमें चित्रकार</span>, <span lang="HI">संगीतकार</span>, <span lang="HI">रंगकर्मी</span>, <span lang="HI">नर्तक आदि शामिल हैं। पुस्तकमाला में ऐसी आत्मकथाओं को हम हिन्दी अनुवाद में प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते रहे हैं। पण्डित रविशंकर की यह अधूरी आत्मकथा</span>, <span lang="HI">बाङ्ला से अनूदित</span>, <span lang="HI">प्रस्तुत करते हमें प्रसन्नता है। एक महान् संगीतकार होने के साथ-साथ उनका बहुत बड़ा योगदान भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व संगीत में मान्यता और उचित स्थान दिलाने का बेहद सर्जनात्मक प्रयत्न रहा है।</span></p> <p>—<span lang="HI">अशोक वाजपेयी</span>
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<span lang="HI">रज़ा फ़ाउण्डेशन ने हिन्दी लेखकों और कलाकारों की सुशोधित विस्तृत जीवनियाँ लिखाने और प्रकाशित कराने का प्रोजेक्ट बनाया है और उस पर काम चल रहा है : कई जीवनियाँ इस क्रम में प्रकाशित हो गयी हैं। भारत के मूर्धन्य कलाकारों में से बहुत कम ने अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं। इनमें चित्रकार</span>, <span lang="HI">संगीतकार</span>, <span lang="HI">रंगकर्मी</span>, <span lang="HI">नर्तक आदि शामिल हैं। पुस्तकमाला में ऐसी आत्मकथाओं को हम हिन्दी अनुवाद में प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते रहे हैं। पण्डित रविशंकर की यह अधूरी आत्मकथा</span>, <span lang="HI">बाङ्ला से अनूदित</span>, <span lang="HI">प्रस्तुत करते हमें प्रसन्नता है। एक महान् संगीतकार होने के साथ-साथ उनका बहुत बड़ा योगदान भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व संगीत में मान्यता और उचित स्थान दिलाने का बेहद सर्जनात्मक प्रयत्न रहा है।</span></p>
<p>—<span lang="HI">अशोक वाजपेयी</span>
Book Details
-
ISBN9789390971640
-
Pages308
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह आश्चर्यजनक है कि ‘लौट आ जो धार’ में दूधनाथ सिंह ने ज्ञानरंजन के शिल्प की तुलना सुमित्रानन्दन पन्त से की है और बताना चाहा है कि कुछ दूर तक चलने के बाद ज्ञानरंजन अमूर्त दार्शनिकता में फँस जाते हैं। ज्ञानरंजन की कहानियाँ पढ़ने में तो ऐसा कुछ नहीं लगता। उत्सुकतावश उनकी गद्य रचनाओं के संकलन ‘कबाड़खाना’ को पढ़ा कि शायद यहाँ ऐसा कुछ दिख जाए, लेकिन यहाँ भी ज्ञानरंजन वही हैं–वही सीधी बात करने की जवाँमर्दी, वही सच्चाई का गुरूर। विचारधारा का आग्रह है, मार्क्सवाद का आग्रह है, पर फटी लंगोट बचाने जैसा आग्रह नहीं है, यह लड़ाई को दुश्मन के घर में घुसकर लड़ने का आग्रह है। संग्रह के हिसाब से यह एक बेतरतीब-सा संग्रह है। इसमें संस्मरण हैं, व्याख्यान हैं, सम्पादकीय हैं, रचनात्मक निबन्ध हैं, साक्षात्कार हैं, अखबारी टिप्पणियाँ हैं, और तो और, एक उपन्यास- अंश और काशीनाथ सिंह के नाम लिखा एक पत्र भी है, लेकिन ये सारी की सारी गद्य रचनाएँ मिलकर इस प्रदर्शनप्रिय समय में एक जीवन्त प्रतिवाद का निर्माण करती हैं। ये उसी ‘जेनुइन’ बेचैनी और छटपटाहट का मूर्त रूप बनती हैं, जो साठोत्तरी पीढ़ी की पहचान थी और उससे भी ज्यादा बेचैनी और छटपटाहट आज सर्वत्र मौजूद होने के बावजूद आज की साहित्यिक पीढ़ी की पहचान नहीं है।
‘कबाड़खाना’ पढ़ना दिलचस्प है और इसका हर शब्द झकझोरने वाला है। काफी हद तक यह ज्ञानरंजन के द्वारा कहानी न लिखने या न के बराबर लिखने की भरपाई करता है। यहाँ, ‘राजा हो, तुमने बुढ़ौती में चंचल प्यार कर मारा’ जैसे स्वतःस्फूर्त वाक्य है जो लाख गढ़न के बावजूद कहानियों में भी मुश्किल से ही मिलते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात है कि इसमें वह बेचैनी है जो सांस्कृतिक हमले और सतहीपन के इस दौर में हमारी भाषा और समाज को बेबस मौत से बचाएगी। सफाई देना ज्ञानजी की फितरत वैसे भी नहीं है लेकिन हिन्दी पाठकों की सन्तुष्टि तब होगी, जब वे ‘कबाड़खाना’ के ही मानदण्डों पर अपनी खास विधा में कुछ लेकर आएँ।
–चन्द्रभूषण
Loknayak Samarthguru Ramdass
- Author Name:
Sachchidanand Parlikar
- Book Type:

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डॉ. सच्चिदानंद परळीकर ने अत्यन्त तटस्थता से और बिना किसी पूर्वग्रह के समर्थगुरु रामदास का चरित्र प्रस्तुत किया है। इसके पहले लिखी गई समर्थ रामदास की जीवनियों में उनके राजनीतिक सम्बन्धी विचारों एवं कार्य की इतने विस्तार से चर्चा नहीं की गई है। इस ग्रन्थ के सातवें अध्याय में समर्थ रामदास के समग्र काव्य का जो सरसरी निगाह से परिचय करा दिया है, वह इस ग्रन्थ की एक अनोखी विशेषता मानी जा सकती है। इसके दसवें अध्याय में समर्थ रामदास के समन्वयात्मक दृष्टिकोण की जो सोदाहरण चर्चा की गई है, उस प्रकार की चर्चा समर्थ रामदास पर लिखे गए मराठी, अंग्रेज़ी या हिन्दी के चरित्रग्रन्थों में कहीं भी नहीं की गई है। इस चर्चा को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए लेखक ने बहुत ही समीचीन सन्दर्भ प्रस्तुत किए हैं। आठवें तथा नौवें अध्याय में समर्थ रामदास के भक्तिमार्ग एवं दार्शनिक विचारों का विवेचन करते समय लेखक ने बड़ी ख़ूबी से दिखाया है कि महाराष्ट्र के अन्य सन्तों के इस विषय में सम्बन्धित विचारों में बहुतांश में मतैक्य पाया जाता है।
एक महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति।
The Life and Times of Leonardo Da Vinci
- Author Name:
Vinod Kumar Mishra
- Book Type:

- Description: Leonardo da Vinci was a prominent artist and a scholar of the Italian Renaissance, famous for his immortal works: ‘The Last Supper’ and ‘Mona Lisa’. Leonardo was a genius. He was diversely talented as a painter, sculptor, architect, scientist, musician, mathematician, engineer, inventor, anatomist, geologist, astronomer, cartographer, botanist, historian and writer. Leonardo was very talented. He attained such proficiency as an artist that his teacher left painting after seeing one of his finished works. This book illuminates the artistry of Leonardo da Vinci, who remains an inspiration to aspiring artists.
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