Raag-Anurag
(0)
Author:
Ramshankar Dwivedi, RavishankarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
399
₹ 319.2 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
<span lang="HI">रज़ा फ़ाउण्डेशन ने हिन्दी लेखकों और कलाकारों की सुशोधित विस्तृत जीवनियाँ लिखाने और प्रकाशित कराने का प्रोजेक्ट बनाया है और उस पर काम चल रहा है : कई जीवनियाँ इस क्रम में प्रकाशित हो गयी हैं। भारत के मूर्धन्य कलाकारों में से बहुत कम ने अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं। इनमें चित्रकार</span>, <span lang="HI">संगीतकार</span>, <span lang="HI">रंगकर्मी</span>, <span lang="HI">नर्तक आदि शामिल हैं। पुस्तकमाला में ऐसी आत्मकथाओं को हम हिन्दी अनुवाद में प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते रहे हैं। पण्डित रविशंकर की यह अधूरी आत्मकथा</span>, <span lang="HI">बाङ्ला से अनूदित</span>, <span lang="HI">प्रस्तुत करते हमें प्रसन्नता है। एक महान् संगीतकार होने के साथ-साथ उनका बहुत बड़ा योगदान भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व संगीत में मान्यता और उचित स्थान दिलाने का बेहद सर्जनात्मक प्रयत्न रहा है।</span></p> <p>—<span lang="HI">अशोक वाजपेयी</span>
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
<span lang="HI">रज़ा फ़ाउण्डेशन ने हिन्दी लेखकों और कलाकारों की सुशोधित विस्तृत जीवनियाँ लिखाने और प्रकाशित कराने का प्रोजेक्ट बनाया है और उस पर काम चल रहा है : कई जीवनियाँ इस क्रम में प्रकाशित हो गयी हैं। भारत के मूर्धन्य कलाकारों में से बहुत कम ने अपनी आत्मकथाएँ लिखी हैं। इनमें चित्रकार</span>, <span lang="HI">संगीतकार</span>, <span lang="HI">रंगकर्मी</span>, <span lang="HI">नर्तक आदि शामिल हैं। पुस्तकमाला में ऐसी आत्मकथाओं को हम हिन्दी अनुवाद में प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते रहे हैं। पण्डित रविशंकर की यह अधूरी आत्मकथा</span>, <span lang="HI">बाङ्ला से अनूदित</span>, <span lang="HI">प्रस्तुत करते हमें प्रसन्नता है। एक महान् संगीतकार होने के साथ-साथ उनका बहुत बड़ा योगदान भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व संगीत में मान्यता और उचित स्थान दिलाने का बेहद सर्जनात्मक प्रयत्न रहा है।</span></p>
<p>—<span lang="HI">अशोक वाजपेयी</span>
Book Details
-
ISBN9789390971640
-
Pages308
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Ranger Kavi Asit Kumar Haldar
- Author Name:
Gautam Haldar +1
- Book Type:

- Description:
गौतम हालदार महाशय ने इसे असितकुमार हालदार का जीवनालेख्य कहा है। पर यह सिर्फ़ असितकुमार के जीवन प्रसंगों को ही हमारे सामने नहीं लाती है। इसमें अवनीन्द्रनाथ द्वारा प्रवर्तित बंगाल के नवजागरण से उद्भूत कला आन्दोलन के विभिन्न पर्व, अजन्ता और बाघगुहा से चित्रों की प्रतिकृतियों के अभियान में नन्दलाल और असितकुमार का योगदान, अजन्ता की प्रतिकृतियाँ बनायी जायें इसके पीछे भगिनी निवेदिता की प्रेरणा, चित्रशिल्पी रोथेंस्टाइन, हेवेल और रूसी चित्रकार रोरिक की भारतीय कला के प्रति रुचि, रवीन्द्रनाथ, गगनेन्द्रनाथ, द्विजेन्द्रनाथ और कलागुरु अवनीन्द्रनाथ की कला, असितकुमार द्वारा लखनऊ राजकीय कला महाविद्यालय के द्वारा शिल्प और हस्तशिल्प में किया गया योगदान, कला के प्रति उनके विचार-बिन्दु, बचपन से ही चित्रकला के प्रति उनकी रुचि, जयपुर महाराजा कला और हस्तशिल्प विद्यालय की प्रगति में उनका योगदान इस 'रंगेर कवि असितकुमार हालदार' जैसी जीवनी में एक कलारसिक पाठक को सब कुछ मिलेगा। कुछ व्यक्ति केवल चित्रकार होते हैं, शिल्पी अथवा मूर्तिकार या स्थपति, असितकुमार एक संगीतकार, नाटककार, अभिनेता, मूर्तिकार, हस्तशिल्पी, गायक, गीत रचयिताऔर साहित्यकार सभी कुछ थे।
इसमें कोई सन्देह नहीं इस ग्रन्थ के लेखक गौतम हालदार ने काफ़ी परिश्रम के साथ इस ग्रन्थ की रचना की है। चित्रकला और एक व्यक्ति की जीवनी लिखने में उन्होंने पूरे ऐतिहासिक परिवेश का चित्रण कर इसे कला-इतिहास का एक ग्रन्थ भी बना दिया है।
Shankho Chaudhury
- Author Name:
Madan Lal +1
- Book Type:

- Description:
– शंखो चौधुरी आधुनिक भारतीय कला के एक मूर्धन्य हैं : मूर्तिकार होने के अलावा आधुनिक कलाबोध को सक्रिय-व्यापक करने में उनकी निजी और संस्थापरक भूमिका भी रही है। वे शान्तिनिकेतन, बड़ौदा, ललित कला अकादेमी आदि से जुड़े रहे और उनकी जीवन-कथा भारत में आधुनिक कला के वितान और विस्तार की, उसकी अन्तर्भूत बहुलता, निजी और सार्वजनिक प्रसंगों की रोचक गाथा भी है। जिन कई लोगों ने शंखो दा से प्रेरणा और शिक्षा पाई, उनमें से वरिष्ठ शिल्पकार मदन लाल हैं जिन्होंने बहुत जतन से, अध्यवसाय और कल्पनाशीलता से, एक तरह से गुरु ऋण चुकाने के भाव से, यह पुस्तक तैयार की है। इसमें जो सामग्री एकत्र है वह शंखो दा के अनेक पक्षों का मार्मिक, समझदार और कलात्मक बखान और विश्लेषण करती है। मेरे जानने में हमारे अनेक मूर्धन्य कलाकारों पर ऐसी पुस्तकें कम ही हैं और हिन्दी में शायद यह पहली है। इस पुस्तक में जीवनी, कला-विश्लेषण, संस्मरण और स्मृतियों का बहुत मानवीय और रोचक गड्डमड्ड है—उसमें कई दृष्टिकोण भी उभरते हैं जो हमें शंखो दा को समझने में कई तरह से मददगार हैं। इस समय व्यापक विस्मृति और दुर्व्याख्या का जो दौर चल रहा है, उसमें एक बड़े कलाकार को इस तरह से याद करना उस विस्मृति को प्रतिरोध देना भी है। कला हमेशा जीवन के प्रति कृतज्ञ होती है और कलाकार अपने दिशा दिखानेवाले पुरखों के प्रति। शंखो चौधुरी के प्रति यह पुस्तक कृतज्ञता-ज्ञापन है और वह उसकी प्रासंगिकता को और प्रखर करता है। रज़ा पुस्तक माला में इसे प्रस्तुत करते हुए हमें प्रसन्नता है। —अशोक वाजपेयी
Komal Gandhar
- Author Name:
Vilayat Khan +1
- Book Type:

- Description:
उस्ताद विलायत ख़ाँ अप्रतिम सितार वादक थे। उनके बजाने-गाने की कई कथाएँ भी किंवदन्तियों की तरह प्रचलित हैं। वह ओज, सरसता, सूक्ष्मतम ध्वनि तरंगों और माधुर्य के धनी थे। जिन्होंने उनको सुना है—आमने-सामने बैठकर—वे तो उनके ‘बजाने की छवि’ को भी याद करते हैं, सिर्फ़ उनके सुरों को ही नहीं। यहाँ हम लेखक और संगीतविद् शंकरलाल भट्टाचार्य द्वारा मूल रूप से बांग्ला भाषा में उस्ताद विलायत ख़ाँ की आत्मकथा के तैयार किए गए वार्तालेख के साथ उन पर एकाग्र तीन आलेखों को सुपरिचित आलोचक और अनुवादक रामशंकर द्विवेदी के अनुवाद में प्रस्तुत कर रहे हैं। पहले दो आलेख, क्रमश: दो संगीत-पारखियों नीलाक्ष दत्त और आशीष चट्टोपाध्याय के हैं, तीसरा बांग्ला के विख्यात कवि जय गोस्वामी का है। तीनों आलेख अपने-अपने ढंग से विलायत ख़ाँ के सितार के गुणों को तो उभारते ही हैं, उनके व्यक्तित्व की भी एक झलक प्रस्तुत करते हैं। नीलाक्ष दत्त के आलेख में तो स्वयं विलायत ख़ाँ के सितार की बनावट-बुनावट, और उसे बजाने की तकनीक की भी चर्चा है। इन आलेखों में उन कई सामान्य श्रोताओं की भी एक मर्मभरी उपस्थिति है, जो मानो उनके सितार के पीछे 'पागल' ही तो थे।
सामान्य श्रोताओं से लेकर गुणी संगीत पारखियों, समीक्षकों, लेखकों-कवियों-कलाकारों, बुद्धिजीवियों तक में संगीत के प्रति यह जो अनुराग रहा है, वह इस आत्मकथा को पढ़कर भी जाना जा सकता है। कहना न होगा कि ‘कोमल गांधार' पठनीय ही नहीं, बल्कि संग्रहणीय पुस्तक भी है।
“उस्ताद विलायत ख़ाँ भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक विभूति थे। उनकी दो सौ अट्ठाइस पृष्ठों में फैली आत्मकथा के साथ-साथ इस पुस्तक में परिशिष्ट के रूप में नीलाभ दत्त, आशीष भट्टाचार्य और प्रसिद्ध बांग्ला कवि जय गोस्वामी द्वारा उन पर लिखे निबन्ध भी शामिल किए गए हैं। यह मूल्यवान उपक्रम प्रयत्नपूर्वक किया है संगीतविद् शंकरलाल भट्टाचार्य ने। हिन्दी में एक महान संगीतकार से सम्बन्धित ऐसी दुर्लभ सामग्री को लाने की ज़िम्मेदारी पूरी की है वरिष्ठ विद्वान, रसिक और अनुवादक डॉ. रामशंकर द्विवेदी ने। आत्मकथा, निबन्ध, लेखन और अनुवाद सभी सृजन और संगीत के गहरे और निश्छल प्रेमवश किए गए हैं। रज़ा पुस्तक माला 'कोमल गांधार' को बहुत प्रसन्नता और कृतज्ञता के साथ प्रस्तुत कर रही है।"
—अशोक वाजपेयी
Udayer Pathe-Pathe
- Author Name:
Shankarlal Bhattacharya +1
- Book Type:

- Description:
उदय शंकर, जिन्हें नृत्य का देवता माना गया, यह पुस्तक उनके विषय में है। उनके जीवन, स्वभाव, नृत्यकला, उनकी उपलब्धियों और ख्याति को रेखांकित करने के लिए यहाँ विभिन्न स्रोतों से जुटाई गई सामग्री को संकलित किया गया है। पुस्तक का आरम्भ बिमल मुखोपाध्याय द्वारा खींचे गए चित्रों के, उनकी नृत्य-यात्रा के, प्रस्तुतीकरण से होता है। इस ऐतिहासिक और सुविस्तृत आलेख को शोधकर्ता लेखक शंकरलाल भट्टाचार्य ने लिखा है। बिमल मुखोपाध्याय एक असाधारण फ़ोटोग्राफ़र थे जो साइकिल लेकर विश्व-पर्यटन पर निकल गए थे, और अपने चित्रों के माध्यम से ही अपनी आजीविका अर्जित करते थे। उदय शंकर से भेंट होने के पश्चात् उनका क़ैमरा जैसे उनकी देह-गति पर ही केन्द्रित हो गया। यूरोप में हुए उनकी विभिन्न प्रस्तुतियों में लिए गए ये चित्र ही शंकरलाल जी के विवेचन के केन्द्र में हैं। यह निश्चय ही एक दुर्लभ प्रस्तुति है। दूसरा आलेख पं. रविशंकर द्वारा लिखित एक संस्मरण है जिसमें उन्होंने उदय शंकर के व्यक्तित्व को निज अनुभवों के प्रकाश में आलोकित किया है। यही बात अमला शंकर के संस्मरणात्मक आलेख के बारे में कही जा सकती है, जिसे उन्होंने उनकी जीवन-संगिनी और सहचरी नर्तकी के रूप में लिखा है। सत्यजित चौधुरी का विवेचन उदय शंकर द्वारा रचित फ़िल्म 'कल्पना' के विषय में है जिसका निर्माण 1998 में हुआ था। ढाई घंटे की इस नृत्य-केन्द्रित फ़िल्म को पहली भारतीय आधुनिक फ़िल्म कहा जाता है। “भारतीय प्रदर्शनकारी कलाओं के आधुनिक इतिहास में उदय शंकर का ऐतिहासिक और स्मरणीय अवदान रहा है। वे अपने समय की एक किंवदन्ती बन गए थे। उन पर सुलिखित और पर्याप्त सामग्री, दुर्भाग्य से, कम है। परम्परा की समझ और उसका पुनराविष्कार उनके नवाचार का अनिवार्य अंग था। इस नृत्यशिल्पी का जीवनालेख्य शंकरलाल भट्टाचार्य ने बहुत जतन से तैयार किया है और हमारे आग्रह पर उसका मूल बाङ्ला से हिन्दी में अनुवाद वरिष्ठ विद्वान्, साहित्यकलाप्रेमी और अनुवादक डॉ. रामशंकर द्विवेदी ने किया है। एक गौरवस्थानीय नृत्यशिल्पी पर यह दुर्लभ सामग्री रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत प्रस्तुत करते हुए हमें प्रसन्नता है।” —अशोक वाजपेयी
Vishya Chalchitra
- Author Name:
Satyajit Ray +1
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Jali Thee Agnishikha
- Author Name:
Mahashweta Devi +1
- Book Type:

- Description:
ऐतिहासिक उपन्यास लेखन पर कोई स्पष्ट राय अब तक नहीं बन सकी है। रोमांस और त्रासदी का अंकन कर उपन्यासकार अपने दायित्व से मुक्त हो जाता है। लेकिन प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी ‘इतिहास-सृजन’ को अतिरिक्त ज़िम्मेदारी से निभाती हैं। ऐसे लेखन के लिए एक ख़ास प्रवणता, कथा के बजाय देश, काल, पात्र और आचार-व्यवहार की प्रामाणिक जानकारी का होना बेहद ज़रूरी है। इसके अलावा मौजूदा समय की पकड़ भी। महाश्वेता जी में ये सभी विशेषताएँ मौजूद हैं।
पहले उपन्यास ‘झाँसी की रानी’ के बाद ‘जली थी अग्निशिखा’ में पुनः रानी लक्ष्मीबाई केन्द्र में है। महाश्वेता जी का लेखन अपने मिज़ाज और तेवर में नितान्त भिन्न है। बिलकुल नई सूचनाएँ, नया अनुभव और नई भाषा। लोक मुहावरे और ठेठ देशज शब्दों के इस्तेमाल से उन्हें परहेज़ नहीं है, दरअसल उनका आग्रह सामाजिकता के प्रति अधिक रहता है। प्रस्तुत उपन्यास में अंग्रेज़ों और उनके सेनापति ह्यूरोज़ के लिए झाँसी और रानी दोनों पहेली हैं। रानी की ताक़त के सम्मुख अंग्रेज़ सैनिक हताश हैं। ह्यूरोज़ जानना चाहता है कि झाँसी की रानी आख़िर क्या बला है? ग्वालियर शहर (जहाँ उनका डेरा है) से पूरब की तरफ़ धू-धू जल रही अग्नि किन लोगों ने जलाई होगी? सारे द्वन्द्व उसके अन्दर चलते रहते हैं। जब उसे पता चलता है कि रानी अदम्य इच्छाशक्ति, साहस और संघर्ष से लैस शान्त, सभ्य और बुद्धिमान महिला है तो वह अवाक् रह जाता है। उसकी यह धारणा ख़त्म हो जाती है कि भारतीय महिलाएँ अनपढ़, गँवार और फूहड़ होती हैं।
रानी के संघर्ष के बहाने उपन्यास उस समय की जीवन स्थितियों, विडम्बनाओं, विद्रूपताओं तथा अंग्रेज़ों की क्रूरताओं को भी सामने लाता है। इतिहास में रुचि रखनेवालों के लिए एक ज़रूरी किताब।
Swami Vivekanand Sanchayita
- Author Name:
Ramshankar Diwedi +2
- Book Type:

- Description:
“धर्म को ग्रहणशील होना चाहिए और ईश्वर सम्बन्धी अपने विश्वासों में भिन्नता के कारण एक-दूसरे का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। ईश्वर सम्बन्धी सभी सिद्धान्त मानव-सिद्धान्त के तहत आने चाहिए। और जब धर्म इतने उदार हो जाएँगे तो उनकी कल्याणकारी शक्ति सौ गुना हो जाएगी। धर्मों में अद्भुत शक्ति है लेकिन उनकी संकीर्णताओं के कारण उनसे लाभ की जगह हानि ज़्यादा हुई है।" ये शब्द स्वामी विवेकानन्द के हैं जो अपने एक अन्य लेख में यह भी कहते हैं कि, “लोग भारत के पुनरुद्धार के विषय में जो जी में आए कहें, मैं अपने अनुभव के बल पर कह सकता हूँ कि जब तक तुम सच्चे अर्थों में धार्मिक नहीं होते, भारत का उद्धार होना असम्भव है।” स्वामी विवेकानन्द भारत के ऐसे चिन्तक थे जिनके विषय में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने रोम्यां रोलां को लिखा था कि अगर आप भारत को जानना चाहते हैं तो सबसे पहले विवेकानन्द का अध्ययन कीजिए। धर्म और धार्मिक होने के सन्दर्भ में उन्हीं स्वामी विवेकानन्द के उपरोक्त दो कथन स्वयं घोषित करते हैं कि आज इक्कीसवीं सदी में वे हमारे लिए कितने उपयोगी और प्रासंगिक हैं। आज जब विचार को लेकर नहीं धर्मों के झंडों को लेकर दुनिया एक नए ध्रुवीकरण की दिशा में बढ़ रही है, हमें धार्मिक होने के सही मायने समझने की ज़रूरत है। सभी धर्म अलग-अलग समय और अलग-अलग जगहों पर उस स्थान और काल की समस्याओं से निजात पाने के प्रयासों के रूप में सामने आए, और अगर कालान्तर में चलकर वे व्यक्ति की इयत्ता का, उसकी पहचान का, उसके सामूहिक बोध और यहाँ तक कि राष्ट्रों तक का आधार बन गए तो इससे सिर्फ़ यह पता चलता है कि न तो कोई धर्म अपने आप में पूर्ण है और न ही व्यक्ति अभी इतना विकसित हुआ है कि वह धर्म के बिना अपना काम चला सके। कह सकते हैं कि हमें अभी सच्चे अर्थों में धार्मिक होना नहीं आया। धर्मों के सांसारिक-राजनीतिक दुरुपयोग की वजह भी यही है। ऐसे समय स्वामी विवेकानन्द के लेखों, भाषणों, कक्षालापों के इस प्रतिनिधि संचयन का प्रकाशन विशेष महत्त्व रखता है। आशा है कि इसके अध्ययन से हमें धर्म, नैतिकता, भक्ति, ईश्वर और हिन्दुत्व के सच्चे अर्थों तक पहुँचने में मदद मिलेगी।
Jhansi Ki Rani
- Author Name:
Mahashweta Devi +1
- Book Type:

- Description:
‘झाँसी की रानी’ महाश्वेता देवी की प्रथम रचना है। स्वयं उन्हीं के शब्दों में, ‘इसी को लिखने के बाद मैं समझ पाई कि मैं एक कथाकार बनूँगी।’ इस उपन्यास को लिखने के लिए महाश्वेता जी ने अथक अध्ययन किया और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के विषय में व्याप्त तरह-तरह की किंवदन्तियों के घटाटोप को पार कर तथ्यों और प्रामाणिक सूचनाओं पर आधारित एक जीवनीपरक उपन्यास की तलाश की।
इस पुस्तक को महाश्वेता जी ने कलकत्ता में बैठकर नहीं, बल्कि सागर, जबलपुर, पुणे, इन्दौर, ललितपुर के जंगलों, झाँसी, ग्वालियर, कालपी में घटित तमाम घटनाओं यानी 1857-58 में इतिहास के मंच पर जो हुआ, उस सबके साथ-साथ चलते हुए लिखा। अपनी नायिका के अलावा लेखिका ने क्रान्ति के बाक़ी तमाम अग्रदूतों, और यहाँ तक कि अंग्रेज़ अफ़सरों तक के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। इस कृति में तमाम ऐसी सामग्री का पहली बार उद्घाटन किया गया है जिससे हिन्दी के पाठक सामान्यतः परिचित नहीं हैं।
झाँसी की रानी पर अब तक लिखी गईं अन्य औपन्यासिक रचनाओं से यह उपन्यास इस अर्थ में भी अलग है कि इसमें कथा का प्रवाह कल्पना के सहारे नहीं बल्कि तथ्यों और दस्तावेज़ों के सहारे निर्मित किया गया है, जिसके कारण यह उपन्यास जीवनी के साथ-साथ इतिहास का आनन्द भी प्रदान करता है।
Raja Bhoj Ki Basai Nagari Bhojpur
- Author Name:
Ravishankar
- Book Type:

- Description:
Bhojpur
Chitrakala Kavita Ke Deshe
- Author Name:
Sunil Gangopadhyay +1
- Book Type:

- Description:
चित्रकला कविता के देशे पुस्तक का ढाँचा भ्रमण-वृत्तान्त का है किन्तु, विधागत रूढ़ अर्थों में यह यात्रा वृत्तान्त नहीं है। दरअसल सुनील गंगोपाध्याय को असल में अपनी युवावस्था में आयोवा विश्वविद्यालय में आयोजित कविता कार्यशाला में नौ मास रहने की वृत्ति मिली थी। यह आमंत्रण प्रसिद्ध कवि पॉल ऐजेल की ओर से मिला था। उस दौरान वहाँ के कवियों, चित्रकारों, संगीतज्ञों, नाटककारों, नर्तकियों से उनकी जो भेंट हुई, इस पुस्तक में उन्हीं का वर्णन है।
किसी ने कहा है, हर शिल्पी की दो मातृभूमियाँ होती हैं, एक उसका अपना देश और दूसरा फ़्रांस। शिल्पी सिर्फ़ चित्रकार श्रेणी का नहीं है, कवि भी उसी में आते हैं। फ़्रांस में जैसे देगा, माने, मोने, रेनोया, गोगा, मोतिस रूयो अथवा पिकासो जैसे महान चित्रकार थे, वैसे ही यहाँ रिम्बो, वेर्लेन, बोदलेयर, मालार्मे, वेलरी, अपोलिनियर और ऑरि मिसोर जैसे कवि भी हुए हैं। इसलिए फ़्रांस ही ऐसा देश है जिसकी आत्मा का अगर वर्णन किया जाए तो उसमें चित्रकला और कविता का संसार आना अनिवार्य है।
Chaitanya Mahaprabhu
- Author Name:
Amritlal Nagar
- Book Type:

- Description:
चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव वैष्णव धर्म के विकास में एक चमत्कारी घटना है। एक गहरे आवेश और भावनात्मकता के साथ सारे जनसामान्य तक वैष्णव धर्म को पहुँचाने का काम पहले बंगाल में और बाद में सम्पूर्ण देश में, चैतन्य महाप्रभु ने किया। मधुर भाव की नाम–संकीर्तन पद्धति चैतन्य की देन है। इसी के साथ वैष्णव धर्म ने एक नए युग में प्रवेश किया। प्रस्तुत पुस्तक में पहली बार चैतन्य के व्यक्तित्व के इस योगदान को सम्पूर्णता के साथ उजागर किया गया है।
लेकिन इस पुस्तक का उद्देश्य मात्र इतना ही नहीं है। विद्वान लेखक ने चैतन्य के व्यक्तित्व को तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों में भी रखकर देखा है। अपने समय के इतिहास में चैतन्य का व्यक्तित्व एक चुनौती की तरह उभरा और पराजित हिन्दू जाति को एक नई आस्था और नए आलोक से संयुक्त करने का काम भी चैतन्य ने किया।
उपन्यासकार नागर जी की लेखनी से प्रस्तुत चैतन्य की यह जीवनी पढ़ने पर एक उपन्यास का मज़ा तो देती है, साथ ही वैष्णव धर्म के उदार पथ के विकास में उनका महत्त्वपूर्ण और अद्वितीय योगदान भी सामने लाती है।
Mera Pariwar
- Author Name:
Mahadevi Verma
- Book Type:

- Description:
प्रस्तुत पुस्तक में महादेवी वर्मा जी ने कुछ विशिष्ट मानवेतर प्राणियों के प्रति अपनी जिस सहज, सौहाद्र और एकांत आत्मीयता की अभिव्यंजना का जो अपूर्व कला-कौशल अपने इन चित्रों में व्यक्त किया है, वह केवल उनकी अपनी ही कला की विशिष्टता की दृष्टि से नहीं वरन् संसार-साहित्य की इस कोटि की कला के समग्र क्षेत्र में भी बेमिसाल और बेजोड़ हैं। ये कृतियाँ मानवीय भावज्ञता, संवेदना और कलात्मक प्रतिभा के अपूर्व निदर्शन की दृष्टि से शाब्दिक अर्थ में अपूर्व ओर अद्भुत कलात्मक चमत्कार के नमूने हैं।
Boskiyana
- Author Name:
Gulzar +1
- Book Type:

- Description:
गुलज़ार से बातें...'माचिस' के, 'हू-तू' के, 'ख़ुशबू', 'मीरा' और 'आँधी' के बहुरंगी लेकिन सादा गुलज़ार से बातें...फ़िल्मों में अहसास को एक किरदार की तरह उतारनेवाले और गीतों-नज़्मों में ज़िंदगी के जटिल सीधेपन को अपनी विलक्षण उपमाओं और बिम्बों में खोलनेवाले गुलज़ार से उनकी फ़िल्मों, उनकी शायरी, उनकी कहानियों और उस मुअम्मे के बारे में बातें जिसे गुलज़ार कहा जाता है। उनके रहन-सहन, उनके घर, उनकी पसंद-नापसंद और वे इस दुनिया को कैसे देखते हैं और कैसे देखना चाहते हैं, इस पर बातें...यह बातों का एक लम्बा सिलसिला है जो एक मुलायम आबोहवा में हमें समूचे गुलज़ार से रू-ब-रू कराता है। यशवंत व्यास गुलज़ार-तत्त्व के अन्वेषी रहे हैं। वे उस लय को पकड़ पाते हैं जिसमें गुलज़ार रहते और रचते हैं। इस लम्बी बातचीत से आप उनके ही शब्दों में कहें तो 'गुलज़ार से नहाकर' निकलते हैं।
Aamne-Saamne
- Author Name:
Namvar Singh +2
- Book Type:

- Description:
नामवर सिंह अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका बोला-बताया अब भी ऐसा बहुत कुछ है जो सामने आना बाकी है। लम्बे समय तक उन्होंने व्यवस्थित ढंग से कुछ नहीं लिखा था; व्याख्यानों और वक्तव्यों के रूप में ही उन्होंने आलोचना के नए-नए पैमाने तोड़े और बनाए। युवाओं, वरिष्ठों, छात्रों-पत्रकारों और समकालीन रचनाकारों को दिए साक्षात्कारों में भी उन्होंने सदैव एक उत्तरदायी आलेचकीय चेतना को अभिव्यक्ति दी। उनकी आश्चर्यजनक स्मृति, वैचारिक स्पष्टता और आस्वादपरक समीक्षा के चलते व्याख्यानों की तरह उनके साक्षात्कार भी सदैव चर्चित रहे। इस पुस्तक में उनके ऐसे साक्षात्कारों को संकलित किया गया है जो अब तक किसी और पुस्तक में नहीं आए थे। कई वरिष्ठ और कनिष्ठ रचनाकारों और सम्पादकों के साथ हुए ये वार्तालाप उनकी आलोचना-दृष्टि, समकालीन रचनात्मकता पर उनके विचारों और सरोकारों को रेखांकित करते हैं। इनमें से कुछ साक्षात्कार इसलिए और भी दिलचस्प है कि इनमें उन्होंने किसी एक ही रचनाकार या कृति पर केन्द्रित प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। मसलन स्वयं प्रकाश, त्रिलोचन, काशीनाथ सिंह का ‘काशी का अस्सी’ आदि पर केन्द्रित बातचीत। साक्षात्कारकर्ताओं में भी अलग-अलग पीढ़ियों के लोग हैं; जिन्होंने अपने-अपने ढंग से उनसे अपनी जिज्ञासाओं पर विचार-विनिमय किया है।
Shri Rambhakt : Shaktipunj Hanuman
- Author Name:
Jairam Mishra +1
- Book Type:

- Description:
‘मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम’ ने कहा है—लोक पर जब कोई विपत्ति आती है तब वह त्राण पाने के लिए मेरी अभ्यर्थना करता है परन्तु जब मुझ पर कोई संकट आता है तब मैं उसके निवारणार्थ पवनपुत्र का स्मरण करता हूँ। अवतार श्रीराम का यह कथन हनुमानजी के महान व्यक्तित्व का बहुत सुन्दर प्रकाशन कर देता है। श्रीराम का कितना अनुग्रह है उन पर कि वे अपने लौकिक जीवन के संकटमोचन के श्रेय का सौभाग्य सदैव उन्हीं को प्रदान करते हैं और कैसे शक्तिपुंज हैं हनुमान कि जो श्रीराम तक के कष्ट का तत्काल निवारण कर सकते हैं। भगवान श्रीराम के प्रति अपनी अपूर्व, अद्भुत, अप्रतिम, एकान्त भक्ति के कारण अन्य की इसी प्रकार की भक्ति का आलम्बन बन जानेवाला हनुमान जैसा कोई अन्य उदाहरण विश्व में नहीं। यही कारण है कि संस्कृत से लेकर समस्त मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय भाषाओं में श्री हनुमान में परम पावन चरित्र का गान किया गया है और उनके मन्दिर भारतवर्ष के प्रत्येक कोने में पाए जाते हैं। इस पुस्तक की रचना में ‘वाल्मीकीय रामायण’, ‘अध्यात्म रामायण’ तथा ‘आनन्द रामायण’ से विशेष सहायता ली गई है। ‘स्कंदपुराण’, ‘पद्मपुराण’ आदि एवं ‘महाभारत’ (वनपर्व) भी रचना में सहायक सिद्ध हुए हैं। गोस्वामी तुलसीदास की कृतियों—‘रामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’, ‘गीतावली’, ‘कवितावली’ एवं ‘कम्बन’ रचित ‘कम्ब रामायण’ (तमिल रचना) से भी यत्र-तत्र सहायता ग्रहण की गई है। इनके अतिरिक्त श्री सुदर्शन सिंह ‘चक्र’ रचित ‘आंजनेय' कल्याण पत्रिका के ‘हनुमानांक’ (1975 ई.) तथा डॉ. गोविन्दचन्द्र राय की पुस्तक ‘हनुमान के देवत्व और मूर्ति का विकास’ आदि से भी यथावसर सामग्री प्राप्त की गई है।
Khamosh Logon Ki Or Se By Dalai Lama
- Author Name:
Dalai Lama
- Book Type:

- Description:
परम पूज्य दलाई लामा – खामोश लोगों की ओर से यह पुस्तक परम पूज्य दलाई लामा की आत्मकथात्मक कृति Voice for the Voiceless का हिंदी अनुवाद है। इसमें उन्होंने तिब्बत और तिब्बती लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए चीन के विरुद्ध अपने सात दशकों के शांतिपूर्ण संघर्ष को आत्मीयता से वर्णित किया है। पुस्तक में उन प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं जो चीन द्वारा तिब्बत और तिब्बतीयों को लेकर खड़े किए जाते हैं- और जो पाठकों के मन में भी स्वाभाविक रूप से उठते हैं। इसके साथ ही, अगली दलाई लामा की घोषणा और उससे जुड़ी जटिलताओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई है, जो वर्तमान में चीन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गंभीर बहस का विषय बना हुआ है। इसकी भाषा और शैली प पू दलाई लामा के व्यक्तित्व की तरह ही सहज और सरल है।
Jeete Jee Allahabad
- Author Name:
Mamta Kaliya +1
- Book Type:

- Description:
जीते जी इलाहाबाद सिर्फ संस्मरणात्मक कृति नहीं है, एक यात्रा है जिसमें हमें अनेक उन लोगों के शब्दचित्र मिलते हैं जिनके बिना आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास नहीं लिखा जा सकता और जो उस समय के इलाहाबाद के मन-प्राण होते थे।
Joothan-2
- Author Name:
Omprakash Valmiki
- Book Type:

- Description:
जूठन’ ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा है। इसका पहला भाग बरसों पहले प्रकाशित होकर, आज हिन्दी दलित साहित्य और खासकर आत्मकथाओं की शृंखला में एक विशेष स्थान प्राप्त कर चुका है। वाल्मीकि जी अब हमारे बीच नहीं हैं, अपने जीवन-काल में उन्होंने 'जूठन’ के बाद साहित्य, समाज और संवेदना के दायरों में एक लम्बी यात्रा पूरी की। कई कथात्मक और आलोचनात्मक कृतियों के साथ उनके काव्य-संग्रह भी आए। 'जूठन’ का यह दूसरा भाग उनके उसी दौर का आख्यान है। आत्मकथा के इस दूसरे भाग की शुरुआत उन्होंने देहरादून की आर्डिनेंस फैक्ट्री में अपनी नियुक्ति से की है। नई जगह पर अपनी पहचान को लेकर आई समस्याओं के साथ-साथ यहाँ मजदूरों के साथ जुड़ी अपनी गतिविधियों का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी साहित्यिक सक्रियता का भी विस्तार से उल्लेख किया है। सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय भाषा में लिखी गई यह पुस्तक देहरादून से जबलपुर और वहाँ से पुन: देहरादून की यात्रा करती हुई शिमला उच्च अध्ययन संस्थान और फिर उनके अस्वस्थ होने तक जाती है। दलित साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में 'जूठन’ के इस दूसरे भाग को पढ़ना एक अलग अनुभव है।
Tumhare Naam : Jan Nisar Akhtar ko Safia Akhtar ke khat
- Author Name:
Safia Akhtar
- Book Type:

- Description:
जाँ निसार अख़्तर और उनकी शरीके-हयात सफ़िया अख़्तर को साथ रहने का मौक़ा बहुत कम मिला। उस ज़माने में जब औरतों के लिए घर से बाहर जाकर काम करना बहुत आम बात नहीं थी, वे स्कूल में अपनी नौकरी करती रहीं और न सिर्फ़ अपनी और अपने बच्चों, बल्कि मुम्बई की फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी ज़मीन तलाश रहे जाँ निसार साहब के लिए भी सम्बल जुटाती रहीं।
ये ख़त उन्होंने इसी संघर्ष के दौरान लिखे, लेकिन ये ख़त सिर्फ़ उनके हाल-अहवाल की सूचना-भर नहीं देते, बल्कि वे एक बड़े सृजक की क़लम से उतरे शाहकार की तरह हमारे सामने आते हैं। ज़िन्दगी उन्हें कुछ और वक़्त देती तो निश्चय ही वे साहित्य की दुनिया को कुछ बड़ा देकर जातीं। इन ख़तों में उनकी मुहब्बत और हिम्मत के साथ-साथ उनकी और बेशक जाँ निसार अख़्तर की ज़िन्दगी खुलती जाती है, साथ ही उनका अपना दौर भी अपने तमाम स्याह-सफ़ेद के साथ रौशन होता जाता है। ये ख़त प्यार और हौसले से भरे एक दिल की अक़्क़ासी करते हैं। ये जादू की तरह असर करते हैं; इनका बेहद ताक़तवर और सधा हुआ ‘प्रोज़’ कहीं आपको रुकने नहीं देता, और इनकी तुर्श मिठास में डूबे-डूबे बारहा आपकी आँखें भर आती हैं।
उनके निधन के बाद जाँ निसार साहब ने उनके इन ख़तों को दो जिल्दों में प्रकाशित कराया—’हर्फ़े-आश्ना’ और ‘ज़ेरे-लब’। इस किताब में इन दोनों जिल्दों में संकलित ख़तों को दे दिया गया है।
Tumhare Naam : Jan Nisar Akhtar ko Safia Akhtar ke khat
Safia Akhtar
20% off₹ 199
₹ 159.2
Available
Yugon Ka Yatri : Nagarjun Ki Jeewani
- Author Name:
Taranand Viyogi
- Book Type:

- Description:
मिथिला के बन्द समाज से बाहर निकलकर नागार्जुन ने अपनी तमाम रचनाओं और सहज सुलभ व्यक्तित्व से एक ऐसा जागरण किया जिसकी आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। वे सच्चे अर्थों में क्लैसिकल मॉडर्न थे। तारानन्द वियोगी की यह जीवनी पाठक को नागार्जुन के अन्त:करण में प्रवेश कराने में सक्षम है। उनके घने साहचर्य में जो रहे हैं, वे इसे पढ़कर बाबा की उपस्थिति फिर से अपने भीतर महसूस करेंगे। अपनी सशक्त लेखनी से तारानन्द ने बाबा नागार्जुन को पुनर्जीवित कर दिया है। यहाँ तथ्य और सत्य का सन्तुलित समन्वय है। बाबा से जुड़े शताधिक जनों के अनुभव उन्होंने बड़ी सहृदयता से अन्तर्ग्रथित किए हैं। बाबा नागार्जुन को संसार से विदा हुए बीस वर्ष से ज़्यादा हुए। इस बीच हिन्दी-मैथिली की जो तरुण पीढ़ी आई है, वह भी इस कृति से बाबा नागार्जुन का सम्पूर्ण साक्षात्कार कर सकेगी। बाबा के बारे में एक जगह लेखक ने लिखा है, 'स्मृति, दृष्टान्त और अनुभव का ज़खीरा था उनके पास।' तारानन्द की इस जीवनी में भी ये तीनों बातें आद्यन्त मौजूद हैं। बाबा के जीवन-सृजन पर यह बहुत रचनात्मक, ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य सम्पन्न हो सका है। मैं इतना ही कहूँगा कि बाबा की ऐसी प्रामाणिक जीवनी मैं भी नहीं लिख पाता। ‘युगों का यात्री' हिन्दी की कुछ सुप्रसिद्ध जीवनियों की शृंखला की अद्यतन सशक्त कड़ी है। —वाचस्पति, वाराणसी (दशकों तक नागार्जुन के क़रीब रहे अध्येता समीक्षक)
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book