Rakta Ganga : Virangana Avantibai Ki Shaurya Gatha
Author:
Iqbal Bahadur DevsarePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 796
₹
995
Unavailable
वीरांगना अवन्तीबाई लोधी के जीवन-संघर्ष को आधार बनाकर 'रक्तगंगा' नामक इस ऐतिहासिक उपन्यास की रचना तथ्यों के आधार पर की गई है। इस उपन्यास के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन को प्रकाश में लाते हुए समाज को एक नई दिशा देने का कार्य किया गया है। रानी के त्याग, बलिदान, अटूट राष्ट्रभक्ति, शौर्य, अदम्य साहस, रणकौशल, प्रबल इच्छाशक्ति, अपराजेयता, संगठनशक्ति, आत्म-विश्वास, दृढ़ निश्चय, जनता के प्रति प्रेम एवं सद्भावना पर प्रकाश डालते हुए रानी के व्यक्तित्व को भली-भाँति उजागर किया गया है।
वीरांगना के जन्म से लेकर बलिदान होने तक की सम्पूर्ण शौर्यगाथा का वर्णन, सरल तथा ओजपूर्ण भाषा-शैली में लिखा गया है। यह उपन्यास सदैव देशवासियों के राष्ट्रप्रेम का संवर्द्धन करता रहेगा।
ISBN: 9789389742350
Pages: 359
Avg Reading Time: 12 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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जमशेत जी नुसीरवान जी टाटा का जन्म 1889 में हुआ था। उनके जीवनकाल में भारत अंग्रेज़ों के शिकंजे में कसा रहा। फिर भी उनके द्वारा परिकल्पित परियोजनाएँ देश के आज़ाद हो जाने पर उसके विकास का आधार बनीं। अपनी प्रकृति से असाधारण होते हुए भी ये संस्थान अपने-अपने क्षेत्रों में दूसरों के लिए आदर्श बने हुए हैं। उनकी ढेर सारी उपलब्धियों में देश के कुछ बेहतरीन वैज्ञानिकों को तैयार करनेवाला बेंगलूर का इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस; जमशेदपुर स्थित टाटा इस्पात संयंत्र, जो कि देश के व्यापार से विनिर्माण में संक्रमण करने का द्योतक है; उनकी पथ-प्रदर्शक पनबिजली परियोजना और दुनिया के लाजवाब होटलों में से एक मुम्बई का ताजमहल होटल शामिल है।
अपने हाथ में लिए अन्य कामों की भाँति जमशेत जी ने इन परियोजनाओं में एक ऐसे व्यक्ति की अमोघ नैसर्गिक वृत्ति को प्रकट किया जिसे पता था कि पराधीन राष्ट्र के गौरव की बहाली कैसे की जाए। उन्होंने देश की आज़ादी के बाद उसे दुनिया के अग्रणी राष्ट्रों में स्थान पाने में मदद की।
ये परियोजनाएँ जिस बड़े पैमाने की थीं, उसके लिए बहुत दम-गुर्दे की आवश्यकता थी। कुछ मामलों में तो बस लगे रहने की ज़िद थी जो कि रंग लाई—जैसे कि इस्पात परियोजना के लिए उपयुक्त जगह की तलाश करने का मामला असीम धैर्य के कारण हल हुआ। दूसरे मामलों में, जैसे—इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस में मान-मनुहार करने का उनका लाजवाब कौशल और धैर्य ही था जिसने आख़िरकार शंकालु वाइसराय लॉर्ड कर्जन से उन्हें मंजूरी दिलवाई।
‘भारत से प्यार’ में आर.एम. लाला ने जमशेत जी और उनके समय के जीवन्त चित्रण के लिए लन्दन की इंडिया ऑफ़िस लाइब्रेरी और दूसरे अभिलेखागारों की नवीन सामग्री के साथ-साथ उनके पत्रों का उपयोग किया। यह एक महत्त्वपूर्ण लेखा-जोखा है जो स्पष्ट कर देता है कि जशमेत जी की उपलब्धि वाक़ई मानीखेज़ थी और उनकी मृत्यु के सौ साल बाद भी ऐसा क्यों जान पड़ता है कि वे अपने समय से बहुत आगे थे।
From Hampi to Harappa
- Author Name:
Tirumala Ramachandra +1
- Rating:
- Book Type:

- Description: "From Hampi to Harappa" is considered among the top ten Telugu autobiographies of the twentieth century. Ramachandra's honesty, self-reflection, and the conflict between his traditional Vaishnava beliefs and modern education make this book remarkable. During the nationalist struggle, he was attracted to extremist ideas but found his own path again through personal struggles. It's astonishing that someone who was a great scholar in Sanskrit, Telugu, Kannada, and Prakrit, had to experience hunger and travel across India to find work to feed himself in the 1930s and 40s. The book is filled with unbelievable incidents, such as his mentor Veturi Prabhakara Sastry experiencing extreme hunger while the author survived on very little food. Similarly, he survived on Ganga water for almost a month while waiting in Kanpur for a conman who had promised a business partnership. He did a variety of jobs, including working as a cataloguer in manuscript libraries, a hotel worker, and a Havaldar clerk in the military, before finally settling in a newspaper. Through his experiences, Ramachandra provides us with glimpses of the civilizations around Hampi and Harappa and insights into modern India during the Independence Movement.
Vikal Vidrohini Pandita Ramabai
- Author Name:
Sujata
- Book Type:

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Description:
उन्नीसवीं सदी भारत में पुनर्जागरण की सदी मानी जाती है। ख़ासतौर पर महाराष्ट्र और बंगाल में इस दौर में समाज सुधारों के जो आन्दोलन चले उन्होंने भारतीय मानस और समाज को गहरे प्रभावित किया। ब्रिटिश उपनिवेश के मज़बूत होने के साथ मूलतः यह एक तरह की भारतीय प्रतिक्रिया थी जिसमें अपने अतीत को क्लेम करने तथा सेलिब्रेट करने की आकांक्षा अधिक और अतीत पर पुनर्विचार कर भविष्य की राह तलाशने की कोशिश कम नज़र आती है; कई बार तो ये आंदोलन पुनर्जागरण कम और पुनरुत्थान अधिक लगते हैं।
रमाबाई इस दौर में एक असुविधाजनक स्वर के रूप में आती हैं जो महाराष्ट्र के ब्राह्मण एवं पुरुषकेन्द्रित समाजसुधारों के बीच स्त्री दृष्टि से अतीत की तीख़ी आलोचना प्रस्तुत करते हुए अपने समय की यथास्थितिवादी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं से टकराती हैं। इस क्रम में स्वाभाविक था कि पुणे के उस समुदाय से उपेक्षा और अपमान ही हासिल होते जिसका नेतृत्व समाज सुधारों के प्रखर विरोधी तिलक कर रहे थे।
लेकिन प्राचीन शास्त्रों की अद्वितीय अध्येता पंडिता रमाबाई का महत्व इसी तथ्य में है कि इन उपेक्षाओं और अपमानों से लगभग अप्रभावित रहते हुए उन्होंने औरतों के हक़ में न केवल बौद्धिक हस्तक्षेप किया अपितु समाज सेवा का वह क्षेत्र चुना जो किसी अकेली स्त्री के लिये उस समय लगभग असंभव माना जाता था। विधवा महिलाओं के आश्रम की स्थापना, उनके पुनर्विवाह तथा स्वावलंबन के लिए नवोन्मेषकारी पहल और यूरोप तथा अमेरिका में जाकर भारतीय महिलाओं के लिये समर्थन जुटाने का उनका भगीरथ प्रयास अक्सर धर्म परिवर्तन के उनके निर्णय की आलोचना की आड़ में छिपा दिया गया।
सुजाता द्वारा लिखित उनकी यह जीवनी हिन्दी लोकवृत्त में दशकों से उपस्थित ख़ालीपन को ही नहीं भरती बल्कि गहन शोध से एकत्र विपुल सूचनाओं और सामग्रियों के सहारे भारतीय पुनर्जागरण के एक स्त्रीवादी पाठ की राह खोलते हुए वर्तमान के लिए रमाबाई की प्रासंगिकता को भी रेखांकित करती है। सामान्य पाठकों से लेकर शोधार्थियों तक के लिए समान रूप से उपयोगी यह किताब उस दौर की उन अनेक महिलाओं के बारे में भी ज़रूरी सूचनाएँ उपलब्ध कराती है जिन्हें आधुनिक इतिहास लेखन करते हुए अक्सर छोड़ दिया जाता है।
Che Guevara : Ek Jeevani
- Author Name:
V.K. Singh
- Book Type:

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Description:
चे को किसी ‘महामानव’ या ‘मसीहा’ के नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए। चे अपनी कमियों, अच्छाइयों, शक्तियों, कमज़ोरियों के साथ पूरी सम्पूर्णता में उस समाज के मनुष्य का, जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का न तो अस्तित्व हो और न ही सम्भावना, प्रतिनिधित्व करते हैं। इस महागाथा के सात सोपान हैं ‘बचपन के दिन’ में अर्जेन्टीना के उस ज़माने के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में एक ह्रासमान बुर्जुआ अभिजात परिवार में जन्म लेने से लेकर किशोरावस्था को पार करते हुए जवानी की दहलीज़ तक पहुँचने की दास्तान है। ‘उत्तर की खोज में दक्षिण की राह’ अपने से काफ़ी बड़ी उम्र के मित्र के साथ खटारा मोटरसाइकिल पर दुनिया-जहान को देखने-समझने निकल पड़ी जवानी की दहलीज़ चढ़ते एक किशोर की कहानी है। ‘एक बार फिर सडक़ पर’ मार्क्सवादी साहित्य के अध्येता नौजवान की डॉक्टरी पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद अपनी ख़ुद की तलाश में एक बार फिर निकल पड़ने की कहानी है। ‘क्यूबा क्रान्ति की दास्तान’ गुरिल्ला दस्ते के डॉक्टर से गुरिल्ला लड़ाका, गुरिल्ला सेना कमांडेंट, क्यूबा क्रान्ति के विजयी कमांडर और समाजवादी क्यूबाई समाज के नवनिर्माण की मुहिम के सबसे दक्ष नायक बनने की कहानी है। ‘क्रान्तिकारी अन्तरराष्ट्रीयता के कार्यभार’ एक बार फिर चे को सब कुछ छोडक़र अन्तरराष्ट्रीय मुक्ति-संघर्ष में लहू और बारूद की राह पकड़ने को मजबूर करते हैं। ‘शहादत की राह पर’ चे के बोलिवियाई अभियान के अद्भुत-अकल्पनीय शौर्य की दास्तान है। ‘उत्तरगाथा’ गिरफ़्तारी के बाद अमेरिकी-बोलिवियाई जल्लाद मंडली के हाथों चे की हत्या और उनके दुनिया के मुक्ति-संघर्ष के प्रतीक बन जाने की कहानी है।
चे के अनन्यतम साथी फिदेल ने बिलकुल सही कहा कि चे के बारे में जो कुछ कहा गया, लिखा गया और जो कुछ कहा जाएगा, लिखा जाएगा या जो कहा जा सकता है और लिखा जा सकता है, चे उससे कहीं बढ़कर है।
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