Guru Ghasidas
(0)
Author:
Ramsharan Tandan, Dr. Baldev, Jaiprakash ManasPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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जिस समय छत्तीसगढ़ की जनता भोंसलों के अत्याचार और अंग्रेज़ों की कुटिलता से जूझ रही थी, उसी समय गुरु घासीदास का जन्म एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था। वे भूख से मरने और बेगार करने के लिए अभिशापित थे, परन्तु उनमें सा हस, सद्बुद्धि और संघर्ष के लिए जन्मजात ज्ञान था। इसलिए बचपन में वे अपने साथियों को सत्य और अहिंसा की पहचान करा सके। गुरु घासीरास ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति को स्वयं या परिवार के किसी सदस्य के भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए न लगाकर मानवता के कल्याण के लिए युग-युग से पीड़ित-शोषित जन के लिए लगाया। उन्हें रूढ़ियों से मुक्त किया। चोरी, हिंसा, मद्यपान, जिसमें यह समाज डूब चुका था, जैसी कुरीतियों को पाप बतलाकर जीवनमात्र के लिए दया और प्रेम की शिक्षा दी। सत्य, अहिंसा, समानता का पाठ पढ़ाकर उन्हें कृषि तथा गो-पालन के लिए उत्प्रेरित किया। इस प्रकार देखते हैं कि पं. सुन्दर लाल शर्मा, महात्मा गांधी और बाबा साहेब अम्बेडकर के पूर्व ही उन्होंने सतनाम पंथ की स्थापना कर अपने शिष्यों को स्वावलम्बन और स्वतंत्रता का पाठ सिखला दिया था। सतनाम पंथ एक विचारधारा है जिसका सीधा सम्बन्ध उपनिषदों के एकेश्वरवाद और भगवान् बुद्ध की करुणा से है। छत्तीसगढ़ में शोषित-पीड़ित मानवता के उद्धार के लिए गुरु घासीदास ने कठिन तपस्या की, सत् पुरुष का दर्शन किया और उन्हीं के आदेश पर अपने अनुयायियों को उनका दिव्य सन्देश दिया, जो प्राणिमात्र के लिए अत्यन्त कल्याणकारी है। यह पुस्तक गुरु घासीदास के जीवन और दर्शन का विस्तृत और प्रामाणिक परिचय देती है।
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जिस समय छत्तीसगढ़ की जनता भोंसलों के अत्याचार और अंग्रेज़ों की कुटिलता से जूझ रही थी, उसी समय गुरु घासीदास का जन्म एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था। वे भूख से मरने और बेगार करने के लिए अभिशापित थे, परन्तु उनमें सा हस, सद्बुद्धि और संघर्ष के लिए जन्मजात ज्ञान था। इसलिए बचपन में वे अपने साथियों को सत्य और अहिंसा की पहचान करा सके। गुरु घासीरास ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति को स्वयं या परिवार के किसी सदस्य के भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए न लगाकर मानवता के कल्याण के लिए युग-युग से पीड़ित-शोषित जन के लिए लगाया। उन्हें रूढ़ियों से मुक्त किया। चोरी, हिंसा, मद्यपान, जिसमें यह समाज डूब चुका था, जैसी कुरीतियों को पाप बतलाकर जीवनमात्र के लिए दया और प्रेम की शिक्षा दी। सत्य, अहिंसा, समानता का पाठ पढ़ाकर उन्हें कृषि तथा गो-पालन के लिए उत्प्रेरित किया। इस प्रकार देखते हैं कि पं. सुन्दर लाल शर्मा, महात्मा गांधी और बाबा साहेब अम्बेडकर के पूर्व ही उन्होंने सतनाम पंथ की स्थापना कर अपने शिष्यों को स्वावलम्बन और स्वतंत्रता का पाठ सिखला दिया था। सतनाम पंथ एक विचारधारा है जिसका सीधा सम्बन्ध उपनिषदों के एकेश्वरवाद और भगवान् बुद्ध की करुणा से है। छत्तीसगढ़ में शोषित-पीड़ित मानवता के उद्धार के लिए गुरु घासीदास ने कठिन तपस्या की, सत् पुरुष का दर्शन किया और उन्हीं के आदेश पर अपने अनुयायियों को उनका दिव्य सन्देश दिया, जो प्राणिमात्र के लिए अत्यन्त कल्याणकारी है। यह पुस्तक गुरु घासीदास के जीवन और दर्शन का विस्तृत और प्रामाणिक परिचय देती है।
Book Details
-
ISBN9788183617789
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आत्मकथा सिर्फ़ ज़िन्दगी के क़िस्सों का बयान ही नहीं, वह अपने आपसे मिलने की एक ईमानदार कोशिश भी होती है। इस कोशिश में राजेश माहेश्वरी की यह कृति ‘पथ’ सचमुच पथ-प्रदर्शक का काम करती है।
जीवन मनुष्य के ख़ुद बनाए से बनता है, पैतृक सम्पदा कुछ दूर और देर तक ही साथ दे सकती है। राजेश जी इस कड़वे सच के स्वीकार के साथ अपने जीवन में वंचनाओं और प्रपंचों से जूझते हुए विवेक एवं परिश्रम के बलबूते ऐसी बुलन्दी अर्जित करते हैं जो असम्भव हरगिज़ नहीं लगती, बल्कि यह भरोसा जगाती है कि विपरीत परिस्थितियाँ हों तो अपने विवेक की पतवार को सकारात्मक सोच के साथ हर पल थामे रहने से सब सँभल जाता है।
ज़िन्दगी में अकसर ऐसे पल आते हैं, जब हम दोराहे पर खड़े होते हैं। ऐसे में ‘पथ’ के ये शब्द—‘जीवन में कठिनाइयों के आने पर चिन्ता नहीं करनी चाहिए। दुनिया में ऐसी कोई कठिनाई या समस्या नहीं है जिसका निदान सम्भव न हो’—एक दोस्त की तरह सम्बल देनेवाले हैं।
संघर्ष के पथ पर चलते हुए विश्वास की लौ को जगाए रखने की प्रेरणा से भरपूर है यह ‘पथ’।
Swatantrata Senani Krantikari Baikunth Sukul Ka Mukadama
- Author Name:
Nandkishore Sukla
- Book Type:

- Description: बिहार के ग्राम जलालपुर, जिला मुजफ्फरपुर (वर्तमान वैशाली) में जन्मे बैकुंठ सुकुल उन स्वतंत्रता सेनानियों में थे, जो गुमनामी के अंधेरों में रहे हैं। उन्हें मुजफ्फरपुर के सत्र न्यायाधीश ने भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के प्रसिद्ध मुकदमे के इकबालिया गवाह फणीन्द्रनाथ घोष की हत्या के आरोप में फाँसी की सजा सुनाई थी। बंगाल और लाहौर सहित विभिन्न जगहों के 91 सरकारी गवाहों की सुनवाई में सुकुल जी के द्वारा 50 बचाव पक्ष के गवाहों को पेश करने के आग्रह को अस्वीकार कर दिया गया। बैकुंठ सुकुल को सजा सुनाते समय सत्र न्यायाधीश उन तीन निर्णायकों से असहमत रहा जिन्होंने बैकुंठ सुकुल को दोषी नहीं पाया बल्कि बहुमत छोड़कर एक निर्णायक से सहमत रहते हुए फैसला सुनाया गया और 14 मई,1934 को बैकुंठ नाथ सुकुल को फाँसी दे दी गई। यह पुस्तक तत्कालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में शहीद बैकुंठ सुकुल के मुकदमे की कार्यवाहियों को प्रामाणिकता से प्रस्तुत करती है। 24 फरवरी, 1934 का वह पत्र भी इस पुस्तक में शामिल में किया गया है, जो मुजफ्फरपुर के सत्र न्यायाधीश ने पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को लिखा था। उस पत्र में स्पष्ट किया गया था कि ‘बैकुंठ सुकुल द्वारा माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष बचाव वकील खड़ा करने का कोई अर्थ नहीं है।’ साथ ही यहाँ ‘लाहौर षड्यंत्र’ के मुकदमे के फैसले से जुड़े दस्तावेज भी हैं जो सुखदेव और उनके साथियों द्वारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध किया गया था। इन दस्तावेजों के अतिरिक्त इस पुस्तक में जहाँ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन गतिविधियों का खुलासा किया गया है, वहीं बिहार की राष्ट्रीय राजनीति में भूमि,जातियों, समुदाय और शिक्षा की सापेक्ष भूमिका पर प्रकाश भी डाला गया है।
Main Pakistan Mein Bharat Ka Jasoos Tha
- Author Name:
Mohanlal Bhaskar
- Book Type:

- Description: जासूसी को लेकर विश्व की विभिन्न भाषाओं में अनेक सत्यकथाएँ लिखी गई हैं, जिनमें मोहनलाल भास्कर नामक भारतीय जासूस द्वारा लिखित अपनी इस आपबीती का एक अलग स्थान है। इसमें 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान उसके पाकिस्तान-प्रवेश, मित्रघात के कारण उसकी गिरफ़्तारी और लम्बी जेल-यातना का यथातथ्य चित्रण हुआ है। लेकिन इस कृति के बारे में इतना ही कहना नाकाफ़ी है क्योंकि यह कुछ साहसी और सूझबूझ-भरी घटनाओं का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि पाकिस्तान के तत्कालीन हालात का भी ऐतिहासिक विश्लेषण करती है। इसमें पाकिस्तान के तथाकथित भुट्टोवादी लोकतंत्र, निरन्तर मज़बूत होते जा रहे तानाशाही निज़ाम तथा धार्मिक कठमुल्लावाद और उसके सामाजिक-आर्थिक अन्तर्विरोधों को उघाड़ने के साथ-साथ भारत-विरोधी षड्यंत्रों के उन अन्तरराष्ट्रीय सूत्रों की भी पड़ताल की गई है, जिसके एक असाध्य परिणाम को हम ‘ख़ालिस्तानी’ नासूर की शक्ल में झेल रहे हैं। उसमें जहाँ एक ओर भास्कर ने पाकिस्तानी जेलों की नारकीय स्थिति, जेल-अधिकारियों के अमानवीय व्यवहार के बारे में बताया है, वहीं पाकिस्तानी अवाम और मेजर अय्याज अहमद सिपरा जैसे व्यक्ति के इंसानी बर्ताव को भी रेखांकित किया है।
Maqbool Fida Husain
- Author Name:
Akhilesh 'Bhopal'
- Book Type:

- Description: मक़बूल फ़िदा हुसेन समकालीन भारतीय चित्रकला के अकेले ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने समकालीनता को अन्तरराष्ट्रीय पहचान दिलवाई और जीवन-भर इस दिशा में काम किया। प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत लेख उनकी इसी जीवटता, समर्पण, दूरदृष्टि और अथक परिश्रम को रेखांकित करते हैं। वे न सिर्फ़ सक्रिय रहे, बल्कि उन्होंने अनेक चित्रकारों को प्रेरित भी किया। युवा चित्रकारों के लिए आज भी वे प्रेरणा-स्रोत बने हुए हैं। उनकी चुम्बकीय उपस्थिति, उनका बेफ़िक्राना अन्दाज़, उनके सरोकार आदि सभी इतने व्यापक और पारम्परिक रहे कि उनमें आधुनिकता अपने उच्चतम रूप में प्रकट होती है। हुसेन के चित्रों को यदि एक वाक्य में परिभाषित किया जाए तो वह कुछ इस तरह का हो सकता है— “परम्परा अपनी आधुनिकता को हुसेन के चित्रों में सहजता से प्रकट करती है।” हुसेन पर लिखे गए इन लेखों को एक जगह एकत्र करने के पीछे मेरी मंशा यह भी रही है कि अलग-अलग समय पर अन्यान्य कारणों से लिखे गए इन निबन्धों में हुसेन की बहुमुखी प्रतिभा का स्वाद पाठकगण ले सकें। हुसेन निश्चित ही देश-काल, धर्म-विधर्म से परे अपनी रचनात्मकता में डूबे एक सच्चे कलाकार थे जिन्होंने जीवन-भर अपने को कसौटी पर कसे रखा। वे सक्रियता के पर्याय थे। —भूमिका से
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