Asahmati Mein Utha Ek Hath : Raghuvir Sahay Ki Jeewani
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Author:
Vishnu NagarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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रघुवीर सहाय का जीवन-भर का काम प्रभूत और बहुमुखी है, जैसा कि इस जीवनी से एक बार और स्पष्ट होगा। इतना बहुमुखी और इतना मौलिक है कि सब कुछ पर यहाँ लिखा भी नहीं जा सका लेकिन उनके सोच के दायरे में आनेवाली कुछ चीज़ों का संकेत और सार यहाँ है, जिन पर अभी तक दुर्भाग्य से हमारा ध्यान नहीं गया है। मेरे ख़याल से उन बातों को भी जीवनी का अंग बनाना चाहिए, जो किसी लेखक के यहाँ अलग से दिखाई देती हैं और साहसिक ढंग से दिखाई देती हैं। उनकी कविताओं-कहानियों का कोई मूल्यांकन यहाँ करने से यथासम्भव बचा गया है, क्योंकि मेरे मत में यह जीवनी का काम नहीं है और रघुवीर जी के मूल्यांकन की बहुत-सी अच्छी कोशिशें हुई भी हैं। यहाँ प्रयत्न यह है कि उन्होंने ख़ुद अपने काम के बारे में क्या कहा है, क्या बताया है, यह अधिकाधिक सामने लाया जाए। एक आपत्ति यह हो सकती है कि किताब रघुवीर जी के बारे में कुछ अधिक प्रशंसात्मक हो गई है। अगर यह सही है तो इसका 'दोष' कुछ हद तक रघुवीर जी के व्यक्तित्व में है, कुछ उनके बारे में अच्छी-अच्छी बातें करनेवालों में और अन्त में सबसे अधिक मेरा है। —विष्णु नागर (प्रस्तावना से)
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रघुवीर सहाय का जीवन-भर का काम प्रभूत और बहुमुखी है, जैसा कि इस जीवनी से एक बार और स्पष्ट होगा। इतना बहुमुखी और इतना मौलिक है कि सब कुछ पर यहाँ लिखा भी नहीं जा सका लेकिन उनके सोच के दायरे में आनेवाली कुछ चीज़ों का संकेत और सार यहाँ है, जिन पर अभी तक दुर्भाग्य से हमारा ध्यान नहीं गया है। मेरे ख़याल से उन बातों को भी जीवनी का अंग बनाना चाहिए, जो किसी लेखक के यहाँ अलग से दिखाई देती हैं और साहसिक ढंग से दिखाई देती हैं। उनकी कविताओं-कहानियों का कोई मूल्यांकन यहाँ करने से यथासम्भव बचा गया है, क्योंकि मेरे मत में यह जीवनी का काम नहीं है और रघुवीर जी के मूल्यांकन की बहुत-सी अच्छी कोशिशें हुई भी हैं। यहाँ प्रयत्न यह है कि उन्होंने ख़ुद अपने काम के बारे में क्या कहा है, क्या बताया है, यह अधिकाधिक सामने लाया जाए।
एक आपत्ति यह हो सकती है कि किताब रघुवीर जी के बारे में कुछ अधिक प्रशंसात्मक हो गई है। अगर यह सही है तो इसका 'दोष' कुछ हद तक रघुवीर जी के व्यक्तित्व में है, कुछ उनके बारे में अच्छी-अच्छी बातें करनेवालों में और अन्त में सबसे अधिक मेरा है।
—विष्णु नागर (प्रस्तावना से)
Book Details
-
ISBN9789388753739
-
Pages398
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद स्वतंत्रता सेनानी, इस्लामी विद्वान, स्वतंत्र विचारक, अख़बारनवीस और आज़ाद भारत के पहले शिक्षामंत्री थे। उन्हें कोई औपचारिक तालीम तो नहीं मिली, लेकिन संस्कृति, दर्शन, भाषा और साहित्य के व्यापक स्वाध्याय से उन्होंने स्वयं कई विषयों में महारत हासिल की। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने कई पत्रिकाएँ और अख़बार निकाले। गांधी जी के अहिंसक सविनय अवज्ञा आन्दोलन से वह बहुत प्रभावित थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होने के बाद वह इसके सबसे युवा अध्यक्ष चुने गए। कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से, आज़ाद ने मुस्लिम लीग की विभाजनकारी राजनीति के साथ-साथ दमनकारी ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ भी लड़ाई लड़ी। आज़ाद की इस गहन और विस्तृत जीवनी में, इतिहासकार एस. इरफ़ान हबीब पाठकों को आज़ाद की ज़िन्दगी के सबसे निर्णायक क्षणों से रू-ब-रू कराते हैं। एक अध्याय में हम आज़ाद की ग़ैर-मामूली परवरिश, उनके रसूख़दार ख़ानदान, इस्लामी दुनिया में उथल-पुथल और ज़िन्दगी के प्रति आज़ाद के स्वतंत्र विचारों के शुरुआती संकेत देखते हैं। इसके बाद यह किताब मौलाना आज़ाद के आलोचनात्मक इस्लामी चिन्तन, अख़्लाक़ी सवालों और पैन-इस्लामी बहसों की पड़ताल करती है। यह वह दौर था जिसने आज़ाद के मज़हबी नज़रिये और राष्ट्रवाद के प्रति उनके दृष्टिकोण को स्वरूप दिया। ‘आज़ाद, इस्लाम और राष्ट्रवाद’ शीर्षक अध्याय आज़ाद की सियासी ज़िन्दगी और समग्र राष्ट्रवाद में उनके अटूट भरोसे और मुस्लिम लीग की फ़िरक़ा-परस्त सियासत के प्रति उनके कट्टर विरोध के ब्योरे पेश करता है। ‘ग़ुबार-ए-ख़ातिर : धर्म और राजनीति से आगे’ शीर्षक अध्याय 1940 की दहाई में अहमदनगर फ़ोर्ट जेल में उनकी क़ैद के दौरान ख़तों की शक़्ल में लिखे गए निबन्धों संग्रह के ज़रिये आज़ाद के दार्शनिक विचारों और निजी पसन्द-नापसन्द को उजागर करता है। और आख़िर में, ‘एक नए भारत का निर्माण : शिक्षा, संस्कृति, विज्ञान और बहुलवादी लोकाचार’ में प्राथमिक और प्रौढ़ शिक्षा की पहल के मार्फ़त देश की कमज़ोर शिक्षा प्रणाली को मज़बूत करने की आज़ाद की कोशिशों, देश की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक तरक़्क़ी को लेकर उनकी दूरअन्देशी और अभी अभी आज़ाद हुए देश की कला और संस्कृति को सँजोने में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। ‘मौलाना आज़ाद : एक जीवनी’ भारत के महान विचारकों और राष्ट्र-निर्माताओं में से एक की निर्णायक जीवनी है।
Film Udyogi Dadasaheb Phalke
- Author Name:
Gangadhar Mahambre
- Book Type:

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Description:
भारतीय सिने-जगत के जनक धुंडीराज गोविन्द फाल्के उर्फ़ दादासाहेब फाल्के के जीवन व योगदान को यथोचित रेखांकित करनेवाला ‘फ़िल्म उद्योगी दादासाहेब फाल्के’ एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
अनेक प्रक्रम, विक्रम और अपार चुनौतियों को पार करते हुए दादा साहब ने अपने जीवन के अन्त तक भारतीय सिनेमा की बुनियाद और उसके सर्वांगीण विकास के लिए अपना सर्वस्व झोंक दिया।
इस यात्रा में उन्हें कई अपमानों, मतभेदों, स्थालान्तरों, बीमारियों का सामना करना पड़ा। अन्ततः इस क्षेत्र के सर्वोच्च मान-सम्मान सहित कई अनुभव उन्होंने हासिल किए और भारत को अत्यन्त गौरवशाली स्थान दिलाया। यह पुस्तक इसी का लेखा-जोखा है।
Hashimpura 22 May
- Author Name:
Vibhuti Narayan Rai
- Book Type:

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Description:
साल 1987; दिन 22 मई; समय तक़रीबन आधी रात। ग़ाज़ियाबाद से सिर्फ़ पन्द्रह-बीस किलोमीटर दूर मकनपुर गाँव की नहर के किनारे आज़ाद भारत का सबसे भयावह हिरासती हत्याकांड हुआ था। पी.ए.सी. ने मेरठ के हाशिमपुरा मुहल्ले से उठाकर कई दर्जन मुसलमानों को यहाँ नहर की पटरी पर लाकर मार दिया था। विभूति नारायण राय उस समय गाजियाबाद के पुलिस कप्तान थे।
यह पुस्तक लेखक द्वारा उसी समय लिए गए एक संकल्प का नतीजा है, जब वे धर्मनिरपेक्ष भारत की विकास-भूमि पर अपने लेखकीय और प्रशासनिक जीवन के सबसे जघन्य दृश्य के सम्मुख थे। साम्प्रदायिक दंगों की धार्मिक-प्रशासनिक संरचना पर गहरी निगाह रखनेवाले, और ‘शहर में कर्फ़्यू’ जैसे अत्यन्त संवेदनशील उपन्यास के लेखक विभूति जी ने इस घटना को भारतीय सत्ता-तंत्र और भारतवासियों के परस्पर सम्बन्धों के लिहाज़ से एक निर्णायक और उद्घाटनकारी घटना माना और इस पर प्रामाणिक तथ्यों के साथ लिखने का फ़ैसला लिया जिसका नतीजा यह पुस्तक है।
यह सिर्फ़ उस घटना का विवरण भर नहीं है, उसके कारणों और उसके बाद चले मुक़दमे और उसके फ़ैसले के नतीजों को जानने की कोशिश भी है। इसमें दु:ख है, चिन्ता है, आशंका है, और उस ख़तरे को पहचानने की इच्छा भी है जो इस तरह की घटनाओं के चलते हमारे समाज और देश की सामूहिकता के सामने आ सकता है—घृणा, अविश्वास और हिंसा का चहुँमुखी प्रसार।
उम्मीद करते हैं कि इस किताब को पढ़ने के बाद हम एक सभ्य नागरिक समाज के रूप में अपने आस-पास पसरते इस ख़तरे के प्रति सतर्क होंगे और इसे रोकने का संकल्प लेंगे, जिसके कारण हाशिमपुरा जैसे कांड वैधता पाते हैं।
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