Shabdeshwari
(0)
Author:
Arvind Kumar, Kusum KumarPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Academics-and-references₹
795
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Available
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दर्शन और चिंतन के क्षेत्र में भारत ने, विशेषकर सनातन धर्म ने, विश्व को एक विशद शब्दावली दी है। अमूर्त धारणाओं के मनन के लिए मूर्त प्रतीक और शब्द दिए है। उस दार्शनिक शब्दावली और बिंब विधान की बराबरी संसार की कोई अन्य संस्कृति शायद ही कर पाए...देवीदेवताओं के अनेक नाम अमूर्त धारणाओं के प्रतीक हैं। कई बार इन नामों में छिपा होता है एक पूरा दार्शनिक, सांस्कृतिक और सामाजिक, राजनीतिक इतिहास। कई बार इन में आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित, व्याकरण और पिंगल शास्त्रों के प्रतिबिंब मिलते हैं। इन में होती हैं जन साधारण की आकांक्षाएँ, भावनाएँ, मान्यताएँ, विश्वज्ञान की उन की समझ...सूर्य, कुंती, कर्ण और व्यास के नामों में कोई ज्यामितीय संदर्भ है या धूपघड़ी का प्रतीक? अनजुती भूमि की प्रतीक अहल्या का उद्धार और जुती भूमि की प्रतीक सीता का स्वयंवर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं क्या?<br />पौराणिक नामों के आग्रहहीन भाषाशास्त्रीय अध्ययन से हम बहुत कुछ जान सकते हैं।<br />हमारे सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन में नामों के भाषाशास्त्रीय अध्ययन को नणण्य स्थान मिलता रहा है। इस का एक कारण है ऐसे नामों के आधुनिक संकलनों का अभाव। शब्देश्वरी के द्वारा अरविंद कुमार दंपती ने इस कमी को दूर करने का प्रयास किया है।<br />एक ओर यह संकलन साधारण विश्वासी जन, पंडितों और पुजारियों के लिए रोचक होगा, तो दूसरी ओर सांस्कृतिक शोध में लगे विद्वान भी इसे उपयोगी पाएँगे...
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दर्शन और चिंतन के क्षेत्र में भारत ने, विशेषकर सनातन धर्म ने, विश्व को एक विशद शब्दावली दी है। अमूर्त धारणाओं के मनन के लिए मूर्त प्रतीक और शब्द दिए है। उस दार्शनिक शब्दावली और बिंब विधान की बराबरी संसार की कोई अन्य संस्कृति शायद ही कर पाए...देवीदेवताओं के अनेक नाम अमूर्त धारणाओं के प्रतीक हैं। कई बार इन नामों में छिपा होता है एक पूरा दार्शनिक, सांस्कृतिक और सामाजिक, राजनीतिक इतिहास। कई बार इन में आयुर्वेद, ज्योतिष, गणित, व्याकरण और पिंगल शास्त्रों के प्रतिबिंब मिलते हैं। इन में होती हैं जन साधारण की आकांक्षाएँ, भावनाएँ, मान्यताएँ, विश्वज्ञान की उन की समझ...सूर्य, कुंती, कर्ण और व्यास के नामों में कोई ज्यामितीय संदर्भ है या धूपघड़ी का प्रतीक? अनजुती भूमि की प्रतीक अहल्या का उद्धार और जुती भूमि की प्रतीक सीता का स्वयंवर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं क्या?<br />पौराणिक नामों के आग्रहहीन भाषाशास्त्रीय अध्ययन से हम बहुत कुछ जान सकते हैं।<br />हमारे सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन में नामों के भाषाशास्त्रीय अध्ययन को नणण्य स्थान मिलता रहा है। इस का एक कारण है ऐसे नामों के आधुनिक संकलनों का अभाव। शब्देश्वरी के द्वारा अरविंद कुमार दंपती ने इस कमी को दूर करने का प्रयास किया है।<br />एक ओर यह संकलन साधारण विश्वासी जन, पंडितों और पुजारियों के लिए रोचक होगा, तो दूसरी ओर सांस्कृतिक शोध में लगे विद्वान भी इसे उपयोगी पाएँगे...
Book Details
-
ISBN9788171788477
-
Pages260
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारतरत्न बाबू पुरुषोत्तमदास जी टण्डन की पुण्य स्मृति में समर्पित इस पुस्तक में हिन्दुओं के सम्पूर्ण व्रतों, त्योहारों और पर्वों से सम्बन्धित पौराणिक, लौकिक तथा शास्त्रीrय विद्याओं की परम्परागत प्राचीन विधियों का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
व्रत, पर्व और त्योहार यद्यपि ये तीनों उत्सव के भिन्न-भिन्न रूप हैं तथापि किसी-न-किसी रूप में इनमें परस्पर विचित्र समानता पायी जाती है। व्रत का विधान बहुधा आध्यात्मिक अथवा मानसिक शक्ति की प्राप्ति के लिए, चित्त अथवा आत्मा की शुद्धि के लिए, संकल्प-शक्ति की दृढ़ता के लिए, ईश्वर की भक्ति और श्रद्धा के विकास के लिए, वातावरण की पवित्रता के लिए, दूसरों पर अपने प्रभाव जमाने के लिए, अपने विचारों को उच्च एवं परिष्कृत करने के लिए तथा प्रकारान्तर से स्वास्थ्य की प्रगति के लिए किया जाता है। यद्यपि भारतीय विचारधारा में व्रत का सामान्य अर्थ व्रत अथवा उपवास ही है, तथापि कुछ ऐसे व्रत हैं जिनमें उपवास का स्थान गौण है और चित्त-शुद्धि अथवा आत्म-परिष्कृत का स्थान मुख्य है। पर्व किसी मुख्य तिथि अथवा ज्योतिष के अनुसार ग्रहों आदि के संयोग का ही दूसरा नाम है, जो किसी निर्दिष्ट समय पर आता है। पर्व का बीच-बीच में निर्दिष्ट अवधि पर आते रहते हैं जैसे कुम्भ पर्व आदि। आकाश के नक्षत्रों और ग्रहों की स्थिति के अनुसार इन पर्वों का धरती के जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। त्योहार एक सामान्य शब्द है। आजकल इसका प्रयोग व्रत और पर्व के लिए भी होने लगा है, किन्तु इसका तात्पर्य वस्तुत: लौकिक उत्सवों एवं समारोहों की तिथि से ही अधिक समीप है जैसे दशहरा, होली आदि।
व्रत दो प्रकार के होते हैं, ‘काम्य’ और ‘नित्य’। काम्य उन्हें कहते हैं जो किसी विशेष कामना को लेकर किये जाते हैं और नित्य वे हैं, जिनमें किसी कामना का समावेश नहीं होता, वरन् जो भक्ति और प्रेम के कारण आध्यात्मिक प्रेरणा से किये जाते हैं। निष्काम अथवा नि:स्वार्थ व्रत का ही स्थान ऊँचा होता है।
व्रत का सामान्य अर्थ आज ‘उपवास’ हो गया है। उपवास शब्द का अर्थ है दुर्गुणों एवं दोषों से बचकर आत्मा अथवा गुणों के साथ वास अर्थात् निवास। इन व्रतों अथवा पर्वों में हमारे देश के भिन्न-भिन्न मतावलम्बी लोगों के लिए अपनी-अपनी कुल-परम्परागत मान्यता के अनुसार चलने की पूरी सुविधाएँ प्रदान की गयी हैं। एक धर्म अथवा सम्प्रदाय के देवता का अन्य धर्म अथवा सम्प्रदाय में बड़ी उदारता एवं सहानुभूति के साथ चित्रण किया गया है। सनातन हिन्दू धर्म में तो इस व्यापक दृष्टिकोण का पदे-पदे परिचय मिलता है। भगवान् विष्णु के चौबीसों अवतारों में जैन धर्म के आदि प्रवर्तक भगवान् ऋषभदेव तथा बुद्ध धर्म के प्रतिष्ठापक भगवान् गौतम बुद्ध का भी गिनाया गया है और इनकी जयन्तियों तथा पुण्यकथाओं को सुनने-सुनाने का बड़ा माहात्म्य वर्णित है।
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