Our Constitution Our Pride
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Author:
Ram MadhavPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
EnglishCategory:
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The year 2025 marks 75 years of the adoption of India's Constitution. An occasion that is being celebrated by the Government of India with much enthusiasm and rigour under the motto of 'Hamara Samvidhan, Hamara Swabhiman'. The making of India's Constitution has been an inspiring saga of which every Indian should be proud. It was one of the longest processes in the world lasting for two years, eleven months and eighteen days. There were 299 members in the Assembly, that included stalwarts like Rajendra Prasad, Jawaharlal Nehru, Sardar Patel and B.R. Ambedkar. The book 'Our Constitution, Our Pride' documents four aspects of our Constitution that should invoke pride in us-one, the struggle that preceded its making, two, the making itself, three, the relevant content, and finally, the journey in the last seven decades.
Read moreAbout the Book
The year 2025 marks 75 years of the adoption of India's Constitution. An occasion that is being celebrated by the Government of India with much enthusiasm and rigour under the motto of 'Hamara Samvidhan, Hamara Swabhiman'.
The making of India's Constitution has been an inspiring saga of which every Indian should be proud. It was one of the longest processes in the world lasting for two years, eleven months and eighteen days. There were 299 members in the Assembly, that included stalwarts like Rajendra Prasad, Jawaharlal Nehru, Sardar Patel and B.R. Ambedkar.
The book 'Our Constitution, Our Pride' documents four aspects of our Constitution that should invoke pride in us-one, the struggle that preceded its making, two, the making itself, three, the relevant content, and finally, the journey in the last seven decades.
Book Details
-
ISBN9789355628367
-
Pages192
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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व्रत दो प्रकार के होते हैं, ‘काम्य’ और ‘नित्य’। काम्य उन्हें कहते हैं जो किसी विशेष कामना को लेकर किये जाते हैं और नित्य वे हैं, जिनमें किसी कामना का समावेश नहीं होता, वरन् जो भक्ति और प्रेम के कारण आध्यात्मिक प्रेरणा से किये जाते हैं। निष्काम अथवा नि:स्वार्थ व्रत का ही स्थान ऊँचा होता है।
व्रत का सामान्य अर्थ आज ‘उपवास’ हो गया है। उपवास शब्द का अर्थ है दुर्गुणों एवं दोषों से बचकर आत्मा अथवा गुणों के साथ वास अर्थात् निवास। इन व्रतों अथवा पर्वों में हमारे देश के भिन्न-भिन्न मतावलम्बी लोगों के लिए अपनी-अपनी कुल-परम्परागत मान्यता के अनुसार चलने की पूरी सुविधाएँ प्रदान की गयी हैं। एक धर्म अथवा सम्प्रदाय के देवता का अन्य धर्म अथवा सम्प्रदाय में बड़ी उदारता एवं सहानुभूति के साथ चित्रण किया गया है। सनातन हिन्दू धर्म में तो इस व्यापक दृष्टिकोण का पदे-पदे परिचय मिलता है। भगवान् विष्णु के चौबीसों अवतारों में जैन धर्म के आदि प्रवर्तक भगवान् ऋषभदेव तथा बुद्ध धर्म के प्रतिष्ठापक भगवान् गौतम बुद्ध का भी गिनाया गया है और इनकी जयन्तियों तथा पुण्यकथाओं को सुनने-सुनाने का बड़ा माहात्म्य वर्णित है।
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