Rat Baki Evam Anya Kahaniyan
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RanendraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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रणेन्द्र की कहानियाँ ‘मार्जिनालाइजेशन’ की प्रक्रिया का ‘मेटाफ़र’ रचती हैं। आदिवासी इनके यहाँ ‘कन्सर्न’ के रूप में मौजूद हैं। इस संग्रह की कहानियों से गुज़रते हुए इनके सरोकारों की शिनाख़्त की जा सकती है और कहा जा सकता है कि ये यथार्थ की आँच पर सीझती जीवन की कहानियाँ हैं। इन कहानियों के पात्रों की बेबसी और विफलता जिस त्रासदी को रचते हैं, वह व्यवस्थाजन्य है। व्यवस्था की उस क्रूरता और उदासीनता से उस अयाचित यातना (अनडिजर्ब्ड सफ़रिंग) का जन्म होता है जिसकी गहरी छाप कहानियों को पढ़ने के बाद भी दिलो-दिमाग़ पर क़ाबिज़ रहती है।</p> <p>ये कहानियाँ ऐसे इलाक़े से सिर उठाने की जुर्रत करती हैं जहाँ अशिक्षा, ग़रीबी और बदहाली के घने जंगलों में व्यवस्था के हिंसक नरभक्षी मनमाना शिकार किया करते हैं।</p> <p>रणेन्द्र का यथार्थबोध जीवन-जगत के प्रत्यक्ष अनुभवों से जन्मा और विकसित हुआ है। इस कारण यथार्थ की जटिलता और उसकी संश्लिष्टता को परत-दर-परत उघाड़ते हुए वे जब यथार्थ के प्रकृत रूप का प्रत्यक्षीकरण करते हैं तो कोई-कोई कहानी कहीं-कहीं औपन्यासिकता का भी आभास कराती है। इनकी कहानियों में प्रकृति, संस्कृति और मिथक जहाँ एक ओर मिलकर एक ‘देशज क़िस्म का जादुई यथार्थवाद’ रचते जान पड़ते हैं तो वहीं दूसरे स्तर पर प्रेम एवं अन्तरंगता के क्षणों में ऐन्द्रिकता के चित्रण में प्रयुक्त होनेवाली बिम्बात्मकता, काव्यात्मकता की प्रतीति कराती है।</p> <p>रणेन्द्र की कहानियाँ सम्भावनाओं और संसाधनों से परिपूर्ण उस प्रदेश की कहानियाँ हैं जहाँ बंजरता धीरे-धीरे अपने पाँव पसार रही है। अपने समय के लकवाग्रस्त होने और समाज के बंजर होने की प्रक्रिया को रणेन्द्र ने पूरी शिद्दत और ईमानदारी से इतिहास में दर्ज करने का काम किया है।
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रणेन्द्र की कहानियाँ ‘मार्जिनालाइजेशन’ की प्रक्रिया का ‘मेटाफ़र’ रचती हैं। आदिवासी इनके यहाँ ‘कन्सर्न’ के रूप में मौजूद हैं। इस संग्रह की कहानियों से गुज़रते हुए इनके सरोकारों की शिनाख़्त की जा सकती है और कहा जा सकता है कि ये यथार्थ की आँच पर सीझती जीवन की कहानियाँ हैं। इन कहानियों के पात्रों की बेबसी और विफलता जिस त्रासदी को रचते हैं, वह व्यवस्थाजन्य है। व्यवस्था की उस क्रूरता और उदासीनता से उस अयाचित यातना (अनडिजर्ब्ड सफ़रिंग) का जन्म होता है जिसकी गहरी छाप कहानियों को पढ़ने के बाद भी दिलो-दिमाग़ पर क़ाबिज़ रहती है।</p>
<p>ये कहानियाँ ऐसे इलाक़े से सिर उठाने की जुर्रत करती हैं जहाँ अशिक्षा, ग़रीबी और बदहाली के घने जंगलों में व्यवस्था के हिंसक नरभक्षी मनमाना शिकार किया करते हैं।</p>
<p>रणेन्द्र का यथार्थबोध जीवन-जगत के प्रत्यक्ष अनुभवों से जन्मा और विकसित हुआ है। इस कारण यथार्थ की जटिलता और उसकी संश्लिष्टता को परत-दर-परत उघाड़ते हुए वे जब यथार्थ के प्रकृत रूप का प्रत्यक्षीकरण करते हैं तो कोई-कोई कहानी कहीं-कहीं औपन्यासिकता का भी आभास कराती है। इनकी कहानियों में प्रकृति, संस्कृति और मिथक जहाँ एक ओर मिलकर एक ‘देशज क़िस्म का जादुई यथार्थवाद’ रचते जान पड़ते हैं तो वहीं दूसरे स्तर पर प्रेम एवं अन्तरंगता के क्षणों में ऐन्द्रिकता के चित्रण में प्रयुक्त होनेवाली बिम्बात्मकता, काव्यात्मकता की प्रतीति कराती है।</p>
<p>रणेन्द्र की कहानियाँ सम्भावनाओं और संसाधनों से परिपूर्ण उस प्रदेश की कहानियाँ हैं जहाँ बंजरता धीरे-धीरे अपने पाँव पसार रही है। अपने समय के लकवाग्रस्त होने और समाज के बंजर होने की प्रक्रिया को रणेन्द्र ने पूरी शिद्दत और ईमानदारी से इतिहास में दर्ज करने का काम किया है।
Book Details
-
ISBN9789395737432
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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स्पष्टता के मैदान में प्रेमचन्द बड़ी-से-बड़ी बात को बड़े उलझन के अवसर पर कुछ इस तरह सुलझा कर कह जाते हैं कि मुश्किल-से-मुश्किल बात हमारे रोजमर्रा के, घरेलू जीवन की जानी-पहचानी चीज हो जाती है। उनकी बातों में कुछ ऐसा अनुभव का मर्म भरा होता है कि आदमी उसे कंठस्थ कर लेना चाहता है। उनकी बात स्पष्ट, दो टूक निर्णय होती है। और उनकी कलम सब जगह पहुँचती है, अँधेरे में भी धोखा नहीं देती। —जैनेन्द्र कुमार
Mansarovar Vol. 2 : Lottery Aur Anya kahaniyan
- Author Name:
Premchand
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प्रेमचन्द की रचनाएँ आधुनिक भारत को समझने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं। उन्हीं के समय से भारतीय पुनर्जागरण का प्रारम्भ होता है, जिसके पैरों की आहट उनकी रचनाओं में महसूस होती है। राष्ट्रीय जीवन की परिवर्तनशीलता, क्रिया-प्रतिक्रिया, प्रगति एवं प्रतिक्रियावादिता, धर्म की, मानवता की परछाइयाँ प्रेमचन्द की रचनाओं में झलकती हैं। —डॉ. जाफ़र रज़ा
Katha Saptak - Mamta Kalia
- Author Name:
Mamta Kalia
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7 Short Stories
Mansarovar Vol. 7 : Jail Aur Anya Kahaniyan
- Author Name:
Premchand
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प्रेमचन्द जहाँ भी समाज में अन्याय था, उसका प्रतिकार अपने ढंग से कर रहे थे। ईश्वर द्वारा मनुष्य के प्रति किया गया अन्याय ही नहीं, वे ग्रीक ट्रेजेडी नहीं लिख रहे थे, मनुष्य द्वारा मनुष्य के प्रति किया गया अन्याय, इसी समाज द्वारा इसी समाज में रहने वाले लोगों के प्रति किया गया अन्याय, उसे भी सतह पर लाकर दिखा रहे थे। जहाँ दमन और अन्याय था, उस अन्याय की व्यथा, पीड़ा सामने रख रहे थे और साथ ही उस व्यथा-पीड़ा का ऐसा चित्रण कर रहे थे, जो हमें आपको इस हद तक झकझोर दे कि हम स्वयं उस व्यवस्था के खिलाफ खड़े हो सकें, जो अमानवीय है ग़ैरबराबरी पर खड़ी है, जिसको हम अनजाने संस्कारवश ढोए चले जा रहे हैं और कभी-कभी परम्परा के प्रति श्रद्धा के नाम पर हम जिसका पोषण-समर्थन करते हैं। —नामवर सिंह
Anugoonj
- Author Name:
Geetanjali Shree
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‘माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘वैराग्य’ एवं ‘ख़ाली जगह’ जैसी विविध व सशक्त कृतियों की मार्फ़त पिछले पन्द्रह सालों में एक विशिष्ट पहचान बनी है गीतांजलि श्री की हिन्दी कथा-जगत में। ‘अनुगूँज’ में संकलित इन दस कहानियों से ही शुरू हुआ था इस पहचान का सिलसिला। एक नई संवेदना जो विद्रोह और प्रतिरोध को उजागर करते वक़्त भी उनको कमज़ोर बनाती हताशा को अनदेखा नहीं करती, इशारों और बिम्बों के सहारे चित्रण करनेवाला शिल्प, और शिक्षित वर्ग की आधुनिक मानसिकता को दिखाती उनकी बोलचाल की भाषा, ऐसे तत्त्वों से बनती है गीतांजलि श्री की लेखकीय पहचान।
यूँ तो इन कहानियों का केन्द्र लगभग हर बार—एक ‘दरार’ को छोड़कर—बनता है शिक्षित मध्यवर्गीय नारियों से, पर इनमें वर्णित होते हैं हमारे आधुनिक नागरिक जीवन के विभिन्न पक्ष। जैसे वैवाहिक तथा विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, पारिवारिक परिस्थितियाँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, हिन्दू-मुस्लिम समस्या, स्त्रियों की पारस्परिक मैत्री इत्यादि। यहाँ सीधा, सपाट कुछ भी नहीं है। हर स्थिति, हर सम्बन्ध, हर संघर्ष में व्याप्त रहते हैं परस्पर विरोधी स्वर। यही विरोधी स्वर रचते हैं हरेक कहानी का एक अलग राग।
Prawas Men Aaspaas
- Author Name:
Hansa Deep
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Book
Ek Ladki, Paanch Deevane
- Author Name:
Harishankar Parsai
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एक लड़की है जिसे उसके दीवानों ने और मुहल्ले-भर की भूखी नज़रों ने जवान और चतुर बना दिया; फिर एक चूहा है जो रोज़ रात में गृह-निवासी के सिरहाने तब तक सत्याग्रह करता रहा जब तक कि उसे नियमित खाना नहीं दिया जाने लगा; अकाल का उत्सव है जिसके लिए जमाखोर, मुनाफ़ाखोर और नौकरशाही सालभर अनुष्ठान कराते हैं कि कब अकाल पड़े, कब दिन फिरें...और फिर नाक है, एक नहीं कई-कई तरह की। कुछ कट जाती हैं, फिर बढ़ जाती हैं, कुछ ऐसी कि चाहे जो जतन करो, कटती ही नहीं; फिर एक आदमी है जिसके भीतर दो आदमी हैं; कभी एक ऊपर आ जाता है, कभी दूसरा हावी हो जाता है।
आगे सड़े हुए आलू प्रवेश करते हैं। वे सुबह से टोकरे में पड़े हैं, पर बिक नहीं पाए। उनसे पूछा गया कि अब तुम क्या करोगे तो बोले कि हम विद्रोह करेंगे। चाहे आधी रात तक टोकरे में पड़े रहें, बिकेंगे नहीं। हम भी आत्मसम्मान रखते हैं। देखने में वे कुछ बुद्धिजीवी मालूम पड़ रहे थे लेकिन एक सस्ते होटल वाला आया और उन्हें ख़रीद ले गया।
इनके अलावा भी इस किताब में कई पात्र और परिस्थितियाँ हैं जिन्हें परसाई जी की निर्मम लेखनी ने यहाँ संग्रहीत व्यंग्य-कथाओं में उनकी तमाम विडम्बनाओं और विकृतियों के साथ अंकित किया है।
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