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Lakshagrah

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चित्रा मुद्गल समकालीन कहानी साहित्य की ऐसी विरल प्रतिभा हैं जिन्होंने विगत चालीस वर्षों में निरन्तर श्रेष्ठ कथा-लेखन किया है। इसीलिए उनके खाते में इतनी यादगार उम्दा कहानियाँ हैं जो सामान्यत: कथाकारों के पास नहीं होतीं। जिन लेखिकाओं ने इस मिथ को भंजित किया है कि उनका लेखन सीमित अनुभव-वृत्त से अलग गहरी सामाजिक संपृक्ति और सरोकारों का है, उनमें चित्रा मुद्गल का स्थान अप्रतिम है। अपने कथ्य की गहराई, बनावट-बुनता (टैक्सचर) की बारीकी और इन सबके ऊपर कथा-रस का ऋजु प्रवाह इनकी कहानियों को न केवल अनुपम बनाता है अपितु पाठक को अपना सहयात्री बनाकर उसकी सोच पर दस्तक देने का कार्य करता हुआ उसे संस्कारित करने का कार्य बहुत चुपचाप और अनजाने-से रूप में करता है, विचार को अनुभूति का अंग बनाते हुए, बिना किसी आरोपण के। इन कहानियों का फलक बहुत व्यापक है। ‘जगदम्बा बाबू गाँव आ रहे हैं’ में पूरी तरह रेणु की तरह लोक में बसकर वे गाँव में फैले राजनीतिक कदाचार की बखिया उधेड़ती हैं तो ‘भूख’, ‘चेहरे’ जैसी कहानियों में समाज के निम्नतम वर्ग की ‘त्रासद जिन्दगी’ को संवेदनात्मक रूप में उकेरती हैं। इससे आगे बढ़कर ‘वाइफ़ स्वैपी’ जैसी कहानी में वैश्विक गाँव की अपसंस्कृति में डूबे उच्चतम स्तर के उस समाज को अपनी पैनी दृष्टि से चित्रित करती हैं जहाँ हमारी संस्कृति के श्रेष्ठ का क्षरण पूरी तीव्रता में हुआ है। उनकी कहानियों में अपनी तरह का स्त्री-विमर्श है जो स्त्रीवाद के प्रचलित नारों के मुहावरों से अपने को अलग खड़ा करता है, वे पुरुष वर्चस्ववादी सामाजिक स्थितियों पर करारी चोट करती हैं किन्तु फिर भी उनके पात्र स्त्री-अस्मिता की रक्षा करते हुए जीवन में सामरस्य के पक्षधर हैं—रिश्तों की तोड़-फोड़ के नहीं। जीवन को पूर्ण वैविध्य में चित्रित करती उनकी कहानियाँ कहीं भी एकरेखीय और सपाट नहीं हैं, संश्लिष्ट रूप में वे बहुआयामी हैं, इसी कारण वे स्मृति में बस जाती हैं। स्मृति में बने रहना कहानी की बहुत बड़ी शक्ति है। वस्तुत: चित्रा की कहानियाँ हमारे समकालीन लेखन की गौरव हैं जिनका पाठ आश्वस्ति के साथ किया जा सकता है। —पुष्पपाल सिंह

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चित्रा मुद्गल समकालीन कहानी साहित्य की ऐसी विरल प्रतिभा हैं जिन्होंने विगत चालीस वर्षों में निरन्तर श्रेष्ठ कथा-लेखन किया है। इसीलिए उनके खाते में इतनी यादगार उम्दा कहानियाँ हैं जो सामान्यत: कथाकारों के पास नहीं होतीं। जिन लेखिकाओं ने इस मिथ को भंजित किया है कि उनका लेखन सीमित अनुभव-वृत्त से अलग गहरी सामाजिक संपृक्ति और सरोकारों का है, उनमें चित्रा मुद्गल का स्थान अप्रतिम है। अपने कथ्य की गहराई, बनावट-बुनता (टैक्सचर) की बारीकी और इन सबके ऊपर कथा-रस का ऋजु प्रवाह इनकी कहानियों को न केवल अनुपम बनाता है अपितु पाठक को अपना सहयात्री बनाकर उसकी सोच पर दस्तक देने का कार्य करता हुआ उसे संस्कारित करने का कार्य बहुत चुपचाप और अनजाने-से रूप में करता है, विचार को अनुभूति का अंग बनाते हुए, बिना किसी आरोपण के। इन कहानियों का फलक बहुत व्यापक है। ‘जगदम्बा बाबू गाँव आ रहे हैं’ में पूरी तरह रेणु की तरह लोक में बसकर वे गाँव में फैले राजनीतिक कदाचार की बखिया उधेड़ती हैं तो ‘भूख’, ‘चेहरे’ जैसी कहानियों में समाज के निम्नतम वर्ग की ‘त्रासद जिन्दगी’ को संवेदनात्मक रूप में उकेरती हैं। इससे आगे बढ़कर ‘वाइफ़ स्वैपी’ जैसी कहानी में वैश्विक गाँव की अपसंस्कृति में डूबे उच्चतम स्तर के उस समाज को अपनी पैनी दृष्टि से चित्रित करती हैं जहाँ हमारी संस्कृति के श्रेष्ठ का क्षरण पूरी तीव्रता में हुआ है। उनकी कहानियों में अपनी तरह का स्त्री-विमर्श है जो स्त्रीवाद के प्रचलित नारों के मुहावरों से अपने को अलग खड़ा करता है, वे पुरुष वर्चस्ववादी सामाजिक स्थितियों पर करारी चोट करती हैं किन्तु फिर भी उनके पात्र स्त्री-अस्मिता की रक्षा करते हुए जीवन में सामरस्य के पक्षधर हैं—रिश्तों की तोड़-फोड़ के नहीं। जीवन को पूर्ण वैविध्य में चित्रित करती उनकी कहानियाँ कहीं भी एकरेखीय और सपाट नहीं हैं, संश्लिष्ट रूप में वे बहुआयामी हैं, इसी कारण वे स्मृति में बस जाती हैं। स्मृति में बने रहना कहानी की बहुत बड़ी शक्ति है। वस्तुत: चित्रा की कहानियाँ हमारे समकालीन लेखन की गौरव हैं जिनका पाठ आश्वस्ति के साथ किया जा सकता है।

—पुष्पपाल सिंह

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2023
Weight
146 grams
ISBN-13
9789395328043
Pages
168
Reading time
~6 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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