Khulti Girhein
(0)
Author:
Chanchal Sharma, Dilip PandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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खुलती गिरहें' उपन्यास में पाँच अलग-अलग स्त्री किरदार हैं जो अपनी धुन में दुनिया के सामने अपने होने के अहसास को मज़बूत कराती हुई दिखाई देती हैं। उनकी ज़िन्दगी की उधेड़बुन, उनकी जद्दोजहद, उनके अस्तित्व का संकरे पिंजरों की कैद से छूटकर बाहर निकलना और अपना आसमान तथा अपनी दिशा तय करना—सब कुछ उपन्यास में बहुत बारीकी से अभरता है। हर जीवन-प्रसंग एक औरत में बहुत कुछ तोड़ता भी है, जोड़ता भी है। मुश्किलों से भरे जीवन में जब भी लगता है कि हिम्मत जवाब दे रही है तो कभी अवनि, कभी धरा, कभी गोमती, कभी वसुधा, कभी देवयानी का किरदार हमारे सामने आ जाता है और जीने की इच्छा फिर से जाग जाती है। दरअसल, यह किताब एक उम्मीद है, दोस्ती से भरा एक हाथ है और हज़ारों अनकही कहानियों का सामने आना है।
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खुलती गिरहें' उपन्यास में पाँच अलग-अलग स्त्री किरदार हैं जो अपनी धुन में दुनिया के सामने अपने होने के अहसास को मज़बूत कराती हुई दिखाई देती हैं। उनकी ज़िन्दगी की उधेड़बुन, उनकी जद्दोजहद, उनके अस्तित्व का संकरे पिंजरों की कैद से छूटकर बाहर निकलना और अपना आसमान तथा अपनी दिशा तय करना—सब कुछ उपन्यास में बहुत बारीकी से अभरता है। हर जीवन-प्रसंग एक औरत में बहुत कुछ तोड़ता भी है, जोड़ता भी है।
मुश्किलों से भरे जीवन में जब भी लगता है कि हिम्मत जवाब दे रही है तो कभी अवनि, कभी धरा, कभी गोमती, कभी वसुधा, कभी देवयानी का किरदार हमारे सामने आ जाता है और जीने की इच्छा फिर से जाग जाती है।
दरअसल, यह किताब एक उम्मीद है, दोस्ती से भरा एक हाथ है और हज़ारों अनकही कहानियों का सामने आना है।
Book Details
-
ISBN9788126728480
-
Pages240
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description:
एक लड़की है जिसे उसके दीवानों ने और मुहल्ले-भर की भूखी नज़रों ने जवान और चतुर बना दिया; फिर एक चूहा है जो रोज़ रात में गृह-निवासी के सिरहाने तब तक सत्याग्रह करता रहा जब तक कि उसे नियमित खाना नहीं दिया जाने लगा; अकाल का उत्सव है जिसके लिए जमाखोर, मुनाफ़ाखोर और नौकरशाही सालभर अनुष्ठान कराते हैं कि कब अकाल पड़े, कब दिन फिरें...और फिर नाक है, एक नहीं कई-कई तरह की। कुछ कट जाती हैं, फिर बढ़ जाती हैं, कुछ ऐसी कि चाहे जो जतन करो, कटती ही नहीं; फिर एक आदमी है जिसके भीतर दो आदमी हैं; कभी एक ऊपर आ जाता है, कभी दूसरा हावी हो जाता है।
आगे सड़े हुए आलू प्रवेश करते हैं। वे सुबह से टोकरे में पड़े हैं, पर बिक नहीं पाए। उनसे पूछा गया कि अब तुम क्या करोगे तो बोले कि हम विद्रोह करेंगे। चाहे आधी रात तक टोकरे में पड़े रहें, बिकेंगे नहीं। हम भी आत्मसम्मान रखते हैं। देखने में वे कुछ बुद्धिजीवी मालूम पड़ रहे थे लेकिन एक सस्ते होटल वाला आया और उन्हें ख़रीद ले गया।
इनके अलावा भी इस किताब में कई पात्र और परिस्थितियाँ हैं जिन्हें परसाई जी की निर्मम लेखनी ने यहाँ संग्रहीत व्यंग्य-कथाओं में उनकी तमाम विडम्बनाओं और विकृतियों के साथ अंकित किया है।
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