Aadim Ratri Ki Mehak
(0)
Author:
Phanishwarnath RenuPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
199
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फणीश्वरनाथ रेणु के कथा साहित्य को आंचलिक कहा गया है किन्तु उनकी कहानियाँ (तथा उपन्यास भी) जहाँ एक ओर ग्राम्य-जीवन की आंचलिकता को ही नहीं उसकी सम्पूर्ण आन्तरिकता को व्यक्त करती हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण तथा शहरी जीवन के अन्त:सम्बन्धों की वास्तविकता का भी उद्घाटन करती हैं। रेणु की कहानियों में अत्यन्त ‘निजी’ को व्यापक सामाजिक यथार्थ से जोड़ पाने की अद्भुत क्षमता है और ऐसा वे अपूर्व काव्यात्मक रचाव के साथ कर पाते हैं। इस प्रक्रिया में उनकी कहानियाँ संगीत की सरहदों को छूने लगती हैं। उनके सहज प्रतीत होनेवाले कथा-शिल्प से अनायास ‘ऑडियो-विजुअल’ प्रभाव उत्पन्न होने लगता है। उनकी टेकनीक एक सर्ररियलिस्टिक पैटर्न निर्मित करती है जिसमें एक ‘प्रिज़्म’ की तरह छनकर रंगारंग विचारों तथा भावनाओं की घुलनशीलता शामिल हो जाती है। उनकी कहानियाँ हमारी सम्पूर्ण संवेदनाओं को एक साथ तृप्त करती हैं। अगर उनमें गहरी लयबद्ध ऐन्द्रिकता है तो बिना बौद्धिकता का छद्म धारण किए ही ‘वस्तु सत्य’ के मर्म तक पहुँच जानेवाली विश्लेषणपरकता भी है। आज़ादी के बाद के राजनैतिक परिवर्तनों का दस्तावेज़ी बयान प्रस्तुत करनेवाली कहानियों में यह तथ्य ख़ूब उभरकर आता है—‘जलवा’ तथा ‘आत्म-साक्षी’ जैसी कहानियों में तटस्थ राजनैतिक बोध की निर्ममता के साथ उस क्रूर ‘ट्रेजडी’ का एहसास भी है जिसमें कोमल मानवीय सच्चाइयों के निर्दयता से कुचले जाने का इतिहास अंकित है। ‘आदिम रात्रि की महक’ की कहानियों में एक नैसर्गिक विनोद वृत्ति है जो एक साथ भाषा, स्थितियों तथा चरित्रों से छेड़छाड़ करती चलती है—चुलबुलेपन की हद तक जाकर। लेकिन उनमें कब अचानक एक करुण मानवीय बोध उतर आता है, इसका पता पाठक को तब चलता है जब उसकी ‘हँसी’ में सहसा एक ‘हूक’ शामिल हो जाती है। ऐसे विरल संयोगों के हिन्दी में रेणु एकमात्र कथाकार हैं। </p> <p>—विजय मोहन सिंह
Read moreAbout the Book
फणीश्वरनाथ रेणु के कथा साहित्य को आंचलिक कहा गया है किन्तु उनकी कहानियाँ (तथा उपन्यास भी) जहाँ एक ओर ग्राम्य-जीवन की आंचलिकता को ही नहीं उसकी सम्पूर्ण आन्तरिकता को व्यक्त करती हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण तथा शहरी जीवन के अन्त:सम्बन्धों की वास्तविकता का भी उद्घाटन करती हैं। रेणु की कहानियों में अत्यन्त ‘निजी’ को व्यापक सामाजिक यथार्थ से जोड़ पाने की अद्भुत क्षमता है और ऐसा वे अपूर्व काव्यात्मक रचाव के साथ कर पाते हैं। इस प्रक्रिया में उनकी कहानियाँ संगीत की सरहदों को छूने लगती हैं। उनके सहज प्रतीत होनेवाले कथा-शिल्प से अनायास ‘ऑडियो-विजुअल’ प्रभाव उत्पन्न होने लगता है। उनकी टेकनीक एक सर्ररियलिस्टिक पैटर्न निर्मित करती है जिसमें एक ‘प्रिज़्म’ की तरह छनकर रंगारंग विचारों तथा भावनाओं की घुलनशीलता शामिल हो जाती है। उनकी कहानियाँ हमारी सम्पूर्ण संवेदनाओं को एक साथ तृप्त करती हैं। अगर उनमें गहरी लयबद्ध ऐन्द्रिकता है तो बिना बौद्धिकता का छद्म धारण किए ही ‘वस्तु सत्य’ के मर्म तक पहुँच जानेवाली विश्लेषणपरकता भी है। आज़ादी के बाद के राजनैतिक परिवर्तनों का दस्तावेज़ी बयान प्रस्तुत करनेवाली कहानियों में यह तथ्य ख़ूब उभरकर आता है—‘जलवा’ तथा ‘आत्म-साक्षी’ जैसी कहानियों में तटस्थ राजनैतिक बोध की निर्ममता के साथ उस क्रूर ‘ट्रेजडी’ का एहसास भी है जिसमें कोमल मानवीय सच्चाइयों के निर्दयता से कुचले जाने का इतिहास अंकित है। ‘आदिम रात्रि की महक’ की कहानियों में एक नैसर्गिक विनोद वृत्ति है जो एक साथ भाषा, स्थितियों तथा चरित्रों से छेड़छाड़ करती चलती है—चुलबुलेपन की हद तक जाकर। लेकिन उनमें कब अचानक एक करुण मानवीय बोध उतर आता है, इसका पता पाठक को तब चलता है जब उसकी ‘हँसी’ में सहसा एक ‘हूक’ शामिल हो जाती है। ऐसे विरल संयोगों के हिन्दी में रेणु एकमात्र कथाकार हैं। </p>
<p>—विजय मोहन सिंह
Book Details
-
ISBN9789394902114
-
Pages143
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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R. Lakshminarayana +1
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- Description: 1886ರಿಂದ 1937 ರವರೆಗೂ ಬ್ರಿಟಿಷ್ ವಸಾಹತುಶಾಹಿಯ ಭಾಗವೇ ಆಗಿ ಭಾರತದೊಂದಿಗೆ ಸೇರ್ಪಡೆಯಾಗಿದ್ದ ಬರ್ಮಾ ಆ ನಂತರ ಬೇರ್ಪಟ್ಟು 1948ರಲ್ಲಿ ಸ್ವತಂತ್ರ ದೇಶವಾಯಿತೆಂಬುದು ಈಗ ಇತಿಹಾಸ. ಇದು ರಾಜಕೀಯ ಇತಿಹಾಸವಾದರೆ ಸಾಂಸ್ಕೃತಿಕವಾಗಿ ಮತ್ತು ಸಾಮಾಜಿಕವಾಗಿ ಬರ್ಮಾಕ್ಕೂ ಭಾರತಕ್ಕೂ ಅತಿನಿಕಟ ಸಂಬಂಧವಿದೆ. ಬರ್ಮಾದ ಬಹುಸಂಖ್ಯಾತ ಜನ ನಿಷ್ಠೆಯಿಂದ ಅನುಸರಿಸಿ ಆಚರಿಸುತ್ತಿರುವ ಧರ್ಮವೆಂದರೆ ಭಾರತದಲ್ಲಿಯೇ ಹುಟ್ಟಿ ಬೆಳೆದ ಬೌದ್ಧ ಧರ್ಮವೇ. ಬುದ್ಧನ ನಾಡಾದ ಭಾರತಕ್ಕೆ ಲಾಗಾಯ್ತಿನಿಂದಲೂ ಬರ್ಮೀಯರು ಯಾತ್ರೆ ಬರುವುದು ನಡೆದೇ ಇದೆ. ಇನ್ನು ಭಾರತದಂತೆಯೇ ಬರ್ಮಾ ಕೂಡ ವ್ಯವಸಾಯ ಪ್ರಧಾನವಾದ ದೇಶವಾಗಿದ್ದು ರೈತಾಪಿ ಜನರ ನಾಡಾಗಿದೆ. ಭಾರತದಂತೆಯೇ ಮಧ್ಯಮ ಮತ್ತು ಕೆಳಮಧ್ಯಮ ವರ್ಗದ ಜನರೇ ಹೆಚ್ಚಾಗಿರುವ ಬರ್ಮಾದ ಶ್ರೀ ಸಾಮಾನ್ಯರ ಬದುಕು ಭಾರತದ ಬಡ ಜನತೆಯ ಬದುಕನ್ನು ಅತ್ಯಂತ ನಿಕಟವಾಗಿ ಹೋಲುತ್ತದೆ. ಪ್ರಭುತ್ವದ ಮೌಲ್ಯಗಳ ಅಡಿಯಲ್ಲಿ ಬದುಕು ಸಾಗಿಸುತ್ತಿರುವವರ ಅಸಹಾಯಕತೆ, ಎರಡನೇ ಮಹಾಯುದ್ಧ ಜನರ ಬದುಕನ್ನು ಅತಂತ್ರಗೊಳಿಸಿದ್ದರ ಬಡ ಬರ್ಮೀಯರ ಚಿತ್ರ ನಮ್ಮ ದೇಶದ ಜನರ ಬದುಕಿಗಿಂತ ಬೇರೆಯೇನಲ್ಲ ಎಂದು ಅನಿಸುತ್ತದೆ. ಮೂಲ ಅನುವಾದಕರಾದ ಚಂದ್ರಪ್ರಕಾಶ್ ಪ್ರಭಾಕರ್ 'ಮೌತೀರಿ' ಅವರು ಮೂಲತಃ ಬರ್ಮೀಯರಾಗಿದ್ದು ಬರ್ಮೀ ಹಿಂದೀ ಭಾಷೆಗಳಲ್ಲಿ ಅತ್ಯಂತ ನಿಷ್ಣಾತರಾಗಿದ್ದು ಅಲ್ಲಿಯ ಸಾಹಿತ್ಯ ಮತ್ತು ಸಾಹಿತಿಗಳ ನಿಕಟ ಪರಿಚಯವಿದ್ದವರಾದ ಕಾರಣ ಈ ಕಥೆಗಳ ಹಿಂದೀ ಅವತರಣಿಕೆ ಮೂಲವನ್ನು ಯಥಾವತ್ತಾಗಿ ಹೋಲುತ್ತವೆ. ಹಾಗಾಗಿ ಕನ್ನಡದಲ್ಲಿ ರೂಪು ತಾಳಿರುವ ಈ ಕಥೆಗಳು ಮೂಲಕ್ಕೆ ತೀರ ಹತ್ತಿರವಾಗಿವೆ. ಮೂಲತಃ ತುಮಕೂರಿನವರಾದ ಡಾ. ಆರ್. ಲಕ್ಷ್ಮೀನಾರಾಯಣ(1949) ಅವರು ಕಾಲೇಜು ಶಿಕ್ಷಣ ಇಲಾಖೆಯ ವಿವಿಧ ಸರ್ಕಾರಿ ಕಾಲೇಜುಗಳಲ್ಲಿ ಅಧ್ಯಾಪಕ, ಪ್ರಾಧ್ಯಾಪಕ ಮತ್ತು ಪ್ರಿನ್ಸಿಪಾಲ್ ಆಗಿ ಕೊನೆಯಲ್ಲಿ ಜಂಟಿ ನಿರ್ದೇಶಕರಾಗಿ 37 ವರ್ಷಗಳ ಸೇವೆ ಸಲ್ಲಿಸಿ ನಿವೃತ್ತರಾಗಿದ್ದು ಸದ್ಯ ಪ್ರತಿಷ್ಠಿತ ಬಿ.ಎಂ.ಶ್ರೀ. ಪ್ರತಿಷ್ಠಾನದ ಅಧ್ಯಕ್ಷರಾಗಿದ್ದಾರೆ. ಮೂರು ದಶಕಗಳಿಂದ ಅನುವಾದ ಕ್ಷೇತ್ರದಲ್ಲಿ ಸಕ್ರಿಯರಾಗಿರುವ ಇವರು ಇಂಗ್ಲಿಷ್ ಮತ್ತು ಹಿಂದಿಯಿಂದ ಅನೇಕ ಕೃತಿಗಳನ್ನು ಅನುವಾದಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಸಂಸ್ಕೃತದಿಂದ ಅನುವಾದಿಸಿದ 'ಕನ್ನಡ ವಕ್ರೋಕ್ತಿ ಜೀವಿತ' ಎಂಬ ಇವರ ಕೃತಿಗೆ 2004ರಲ್ಲಿ ಕರ್ನಾಟಕ ಸಾಹಿತ್ಯ ಅಕಾಡೆಮಿಯ ಪುಸ್ತಕ ಬಹುಮಾನ ಹಾಗೂ 2007ರಲ್ಲಿ ಕೇಂದ್ರ ಸಾಹಿತ್ಯ ಅಕಾಡೆಮಿಯ ಅನುವಾದ ಪುರಸ್ಕಾರ ದೊರೆತಿವೆ. ಕಿರಣ್ ನಗರ್ಕರ್ ಅವರ ಸಾಹಿತ್ಯ ಅಕಾಡೆಮಿ ಪ್ರಶಸ್ತಿ ಪುರಸ್ಕೃತ ಇಂಗ್ಲಿಷ್ ಕಾದಂಬರಿ 'ಕಕೋಲ್ಡ್' ನ ಕನ್ನಡ ರೂಪ 'ಬೇಗುದಿ'ಯನ್ನು ಕೇಂದ್ರ ಸಾಹಿತ್ಯ ಅಕಾಡೆಮಿ ಪ್ರಕಟಿಸಿದ್ದು ಅದಕ್ಕೆ 2013ರ ಕರ್ನಾಟಕ ಸಾಹಿತ್ಯ ಅಕಾಡೆಮಿಯ ಪುಸ್ತಕ ಬಹುಮಾನ ಬಂದಿದೆ.
Cheelen
- Author Name:
Bhisham Sahni
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Description:
भीष्म साहनी ने बहैसियत कथाकार पठनीयता और क़िस्सागोई की कला को इस तरह साधा था कि आलोचक जहाँ उनकी दृष्टि के वैशिष्ट्य से प्रभावित होते थे, वहीं साधारण पाठक कहानी के कहानीपन से। शहरी और क़स्बाई मध्यवर्गीय जीवन में ज़्यादा सहूलियत महसूस करनेवाली उनकी लेखनी ने ज़रूरत पड़ने पर समाज के बीभत्स और भयावह चित्रों को भी अंकित किया। यह वैविध्य इन कहानियों में भी मिलता है। अभी तक असंकलित रही इन कहानियों में ‘सफ़ाई अभियान’ जैसी कहानियाँ भी हैं जो सफ़ेदपोश मध्यवर्ग की वैचारिक दिशाहीनता और सामाजिक निष्क्रियता के दो पहलुओं को एक साथ रेखांकित करती हैं, और 'दुलारी का प्रेमी' जैसी समाज के पिछवाड़े बसी ज़िन्दगी के काले कोनों को उजागर करती कहानियाँ भी। साम्प्रदायिक सद्भाव भीष्म जी के कथाकार की स्थायी
चिन्ताओं में हमेशा रहा। इस संग्रह में शामिल कहानी ‘मैं भी दिया जलाऊँगा, माँ।' गहरे मानवीय बोध के साथ इसी विषय को सम्बोधित कहानी है जिसमे एक मुस्लिम बच्चे के मन
को अत्यन्त करुणा और भावप्रवणता के साथ उकेरा गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि भीष्म साहनी के पाठकों के लिए यहाँ-वहाँ प्रकाशित होती रही इन कहानियों की एकत्र प्रस्तुति पाठकों के लिए एक उपहार साबित होगी।
Muhavare Ki Maut
- Author Name:
Anurag Anant
- Book Type:

- Description: अनुराग अनन्त की कहानियों की विशिष्टता यह है कि वह कथा के लिए किसी ‘बाहरी अन्य’ पर निर्भर नहीं हैं। अपनी निर्मिति, अपनी गति, विवरण, अपनी आख्यानात्मकता के स्थापत्य और उसके ‘इंटीरियर’ (आन्तरिकता) को बनाने के लिए सारे जरूरी पदार्थ या सामग्री वह अपने ही भीतर से जुटाती और गढ़ती हैं। ‘मुहावरे की मौत’ की कई कहानियाँ ऐसी हैं, जो कहानी के कहानी होने का ही विध्वंस करती हैं और अपनी मौलिकता के जादुई सम्मोहन से वास्तविक जीवन का सच अर्जित करने का विरल और दुष्कर प्रयत्न एक सतत विरोधाभासी सहजता के साथ करती हैं। ये कहानियाँ आज की और सम्भवतः भविष्य की कहानी को, कहानी से मुक्ति की कहानियाँ होने का आसन्न संकेत देती हैं। इस संग्रह की कोई भी एक कहानी उठाइए, मसलन पहली ही कहानी, जिसका शीर्षक है ‘त्रासदी का सिद्धान्त’ और इसके पाठ (टेक्स्ट) के किसी भी वाक्य या पैराग्राफ के किसी भी एक बिन्दु पर कलम या कर्सर रख दीजिए, फिर देखिए। एक साथ कई-कई संस्तरों, कई परतों में एक अकेले व्यक्ति के जीवन के कई प्रारूप जन्म लेने लगते हैं। स्मृति, अनुभव, सिनेमा, विभ्रम, अवसन्नता, जागृति, मूर्च्छा, नींद, कविता, कैनवास, सैरा, परिवार, समय, समाज, वर्चुअल, रियल, सत्य, असत्य, सूचना, अफवाह आदि आदि...। सब के सब एक दूसरे में घुलते-पिघलते हुए। एक अजब काइनेटिक फर्मेंटेशन। कोई हतप्रभ करता, आँखें खोलता, पीड़ित और सुखद एक साथ करता हुआ निरन्तर बदलता गतिशील विन्यास। किसी भी शहर का नाम लो, हर शहर के एक अकेले जीवन की ऐसी कहानियाँ, जिनके दिल में एक सुराख है, एक गहरा कुआँ, ऐसी कहानियाँ जिन्हें नींद नहीं आती, जो सपनों को खाती हैं और आँसुओं को पीती हैं, जो अचानक अपने गद्य को त्याग कर कविता बन जाती हैं, फिर उसे भी तजते हुए किसी चित्र या फिल्म के गतिमय दृश्य रचने लगती हैं। और यह सारा कुछ किसी ऐसे ‘ग्रांड इवेंट’ की तरह है, जिसे म्युनिसिपेलिटी के सुनसान पार्क का एक गार्ड अचानक अपना डंडा घुमाकर डाँटते हुए, पलक झपकते गायब कर देता है। —उदय प्रकाश
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