Udar Islam Ka Soophi Chehara
(0)
Author:
Kanhaiya SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
450
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Available
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सूफ़ियों का प्रेम-दर्शन मानवीय प्रेम से लेकर ईश्वरीय प्रेम तक प्रसार पाता है। जायसी के अनुसार ‘मानुस प्रेम भएउ बैकुंठी। नाहिंत काह छार एक मूठी।’ इस उदात्त प्रेम और उसकी आभा से आलोकित इन कवियों की प्रेम-गाथाओं का मर्म समझने के लिए उनके सिद्दान्तों के क्रमिक विकास और उनकी सैद्धान्तिक प्रेम-दृष्टि को समझना आवश्यक होता है। इस पुस्तक में सूफ़ी दर्शन का क्रमिक विकास दिखाया गया है। इस क्रम में देखा गया है कि सूफ़ी दर्शन (तसव्वुफ़) पर भारतीय वेदान्त दर्शन का प्रभाव है। मुसूर-अल-इलाज, इब्बुल अरबी, अब्दुल करीम-अल-जिली के विचार तो पुर्णतः वेदान्त सम्मन थे। इसे उनके कथनों के उद्धरण द्वारा प्रतिपादित किया गया है। अहं ब्रह्मास्मि के वेदान्तिक सूत्र का अनुवाद ही अनलहक है। ईश्वर-जीव की एकता के सिद्दान्त की सूफ़ियों ने ‘वहदतुल वजूद’ कहा था। इसका विरोध कर परवर्ती सूफ़ियों ने ‘वहदतुल शहूद’ का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। यह एक रोचक अध्ययन इस पुस्तक में सर्वप्रथम मूल स्रोतों के आधार पर प्रस्तुत हुआ है। साथ ही ‘सूफ़ीमत’ के सिद्धान्तों, सम्प्रदायों तथा विशेषताओं को हिन्दी के सूफ़ी कवियों के उद्धरणों के साथ प्रस्तुत किया गया है। ‘सूफ़ीमत’ को समझने के लिए यह पुस्तक विद्वानों और विद्यार्थियों दोनों के लिए उपयोगी है।
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सूफ़ियों का प्रेम-दर्शन मानवीय प्रेम से लेकर ईश्वरीय प्रेम तक प्रसार पाता है। जायसी के अनुसार ‘मानुस प्रेम भएउ बैकुंठी। नाहिंत काह छार एक मूठी।’ इस उदात्त प्रेम और उसकी आभा से आलोकित इन कवियों की प्रेम-गाथाओं का मर्म समझने के लिए उनके सिद्दान्तों के क्रमिक विकास और उनकी सैद्धान्तिक प्रेम-दृष्टि को समझना आवश्यक होता है।
इस पुस्तक में सूफ़ी दर्शन का क्रमिक विकास दिखाया गया है। इस क्रम में देखा गया है कि सूफ़ी दर्शन (तसव्वुफ़) पर भारतीय वेदान्त दर्शन का प्रभाव है। मुसूर-अल-इलाज, इब्बुल अरबी, अब्दुल करीम-अल-जिली के विचार तो पुर्णतः वेदान्त सम्मन थे। इसे उनके कथनों के उद्धरण द्वारा प्रतिपादित किया गया है। अहं ब्रह्मास्मि के वेदान्तिक सूत्र का अनुवाद ही अनलहक है। ईश्वर-जीव की एकता के सिद्दान्त की सूफ़ियों ने ‘वहदतुल वजूद’ कहा था। इसका विरोध कर परवर्ती सूफ़ियों ने ‘वहदतुल शहूद’ का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। यह एक रोचक अध्ययन इस पुस्तक में सर्वप्रथम मूल स्रोतों के आधार पर प्रस्तुत हुआ है।
साथ ही ‘सूफ़ीमत’ के सिद्धान्तों, सम्प्रदायों तथा विशेषताओं को हिन्दी के सूफ़ी कवियों के उद्धरणों के साथ प्रस्तुत किया गया है। ‘सूफ़ीमत’ को समझने के लिए यह पुस्तक विद्वानों और विद्यार्थियों दोनों के लिए उपयोगी है।
Book Details
-
ISBN9789352210824
-
Pages108
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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वाल्मीकि रामायण के अनुशीलन से श्रीराम तथा हनुमान की आध्यात्मिक शक्तियों के दिग्दर्शन होते हैं ।सामान्यतया इतिहास लेखन में आध्यात्मिक शक्तियों पर विचार नहीं किया जाता है, परंतु प्राचीनकाल से ही विश्व के बहुत से समुदायों में कुछ विशिष्ट मानवों में आध्यात्मिक शक्तियों की उपस्थिति के उल्लेख मिलते रहे हैं। अत: आध्यात्मिक तथा अतींद्रिय शक्तियों की अवहेलना उचित नहीं है। इस कृति में श्रीराम तथा हनुमान आदि को ऐतिहासिक समझते हुए उनकी इन शक्तियों का भी कुछ अंश तक परिज्ञान लिया गया है प्रस्तुत उपन्यास मुख्य रूप से वाल्मीकि रामायण तथा सद्गुरुओं के विचारों के आधार पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लिखा गया है| अस्तु, यदि प्रस्तुत कृति में कुछ अच्छा है, तो वह महान् कवि वाल्मीकि का प्रसाद है और निर्विवाद प्रतीति यह है कि बिना केसरीनंदन हनुमान की कृपा के तो रामकथा अथवा उसका कोई अंश लिखा ही नहीं जासकता। श्री हनुमान के समर्पण, भक्ति, पराक्रम, पौरुष और त्याग का दिग्दर्शन करवाता अत्यंत पठनीय उपन्यास ।
Svaraj
- Author Name:
Ramchandra Gandhi
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रामचन्द्र गाँधी एक ऐसे भारतीय दार्शनिक थे जिनकी साहित्य और कलाओं में गहरी दिलचस्पी थी : उनका चिन्तन अक्सर अध्यात्म, कला और साहित्य को अपनी समझ के भूगोल में समाविष्ट करता था। अपने जीवन में उनका अपने समय के कई बड़े लेखकों और कलाकारों से सम्पर्क और दोस्ताना था। चित्रकार तैयब मेहता के एक त्रिफलक से प्रेरित होकर रामचन्द्र गाँधी ने यह अद्भुत पुस्तक लिखी है। सम्भवत: किसी कलाकृति पर ऐसी विचार-सघन पुस्तक कम से कम भारत में दूसरी नहीं है। उसमें जितने दार्शनिक आशय कला के खुलते हैं, उतने ही अभिप्राय स्वयं रामचन्द्र गाँधी के चिन्तन के भी। यह सीमित अर्थों में कलालोचना नहीं है पर यह दिखाती है कि गहरा कलास्वादन उतने ही गहरे मुक्त चिन्तन को उद्वेलित कर सकता है। तैयब मेहता रज़ा साहब के घनिष्ठ मित्र थे। इस पुस्तक का आलोचक मदन सोनी द्वारा बड़े अध्यवसाय से किया गया हिन्दी अनुवाद उस कला-मैत्री को एक प्रणति भी है। —अशोक वाजपेयी
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