The King of Rimes
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After being born as dawn unto his own self, the Lebanese Nightingale sings again, this time with a more vibrant and echoing voice. “The King of Rimes” is merely a mixture of the poet’s self-worth and his experimental literary perspectives speaking to the core of life and death. Including the first thirty sonnets following the Shakespearean model, and many more selected poems and quotes, this book is both an expression and a work of art.
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After being born as dawn unto his own self, the Lebanese Nightingale sings again, this time with a more vibrant and echoing voice.
“The King of Rimes” is merely a mixture of the poet’s self-worth and his experimental literary perspectives speaking to the core of life and death.
Including the first thirty sonnets following the Shakespearean model, and many more selected poems and quotes, this book is both an expression and a work of art.
Book Details
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ISBN978-93-90882-74-8
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Pages78
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Avg Reading Time3 hrs
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Age0-11 yrs
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Country of OriginLebanon
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सुन्दर चन्द ठाकुर का पहला कविता-संग्रह ‘किसी रंग की छाया’ अनुभव-सघनता और भाषाई-सजगता दोनों स्तरों पर एक कवि की बुनियादी बेचैनी को दर्ज करता है। सुन्दर की ये कविताएँ संख्या में अट्ठावन हैं लेकिन उनके सरोकारों को गिनना कठिन है। वे स्वाभाविक तौर पर प्रेम, अच्छाई, मनुष्यता और एक बेहतर संसार को तरह-तरह से प्रकट करती हैं या उनके कम होते जाने या न होने का शोक मनाती हैं, जहाँ उनके होने की जरा भी सम्भावना बची हो। यह अकारण नहीं है कि सुन्दर अपनी कविता में बचपन, नींद, घर-परिवार, नदी, जंगल, अभयारण्य आदि परिचित चीजों से होते हुए इतिहास, भूगोल, गणित, भौतिकी और गृह विज्ञान जैसे अपरिचित विषयों तक चले जाते हैं और उनके माध्यम से आज की किसी न किसी मानवीय परिस्थिति पर टिप्पणी करते हैं जो हमारे अन्तस को झकझोरते हुए एक नयी सम्वेदना से भी हमारा परिचय कराती हैं। अपनी गहरी सम्वेदना, सजग दृष्टि और तीक्ष्ण अनुभूतियों के कारण सुन्दर चन्द ठाकुर नदी के भीतर ‘बहती हुई एक और नदी’ को पहचानते हैं और इतिहास के स्नानागारों में 'सदियों के सूखे हुए पानी' को भी तैरता देख लेते हैं। इस संग्रह की ज़्यादातर कविताओं में पहाड़ के आवेग और मैदान की थिरन को हम एक साथ महसूस कर सकते हैं जो शिल्प के स्तर पर कहीं न कहीं सोच की उड़ान और भाषा के संयम में रूपान्तरित हो जाती है। ‘किसी रंग की छाया’ में आशा और निराशा के बीच अनुभवों का एक पूरा वर्ण क्रम है और यह पहचानने की शिद्दत भरी कोशिश है कि वह रंग कौन-सा है और उसकी कैसी छाया है या यह कैसी छाया है और उसका कौन-सा रंग है। यही कोशिश एक सच्चे कवि की पहचान होती है।
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- Author Name:
Devisharan
- Book Type:

- Description:
देवीशरण ठेठ आदमी हैं। वे अपने उपनाम ‘ग्रामीण’ को सार्थक करते हैं। गाँव का आदमी रूप, रंग और शृंगार की परवाह किये बिना अपनी मूल वस्तु के भरोसे जीवन जीता है। उसमें कुंठायें नहीं होतीं। आइने के सामने होकर वह फूलता नहीं। वह आदमी अपनी रचना के लिये जो भी चुनता है, वह उपयोग की प्रेरणा से बनती है। देवीशरण ‘ग्रामीण’ इसी प्रकृति की छाया में कविता, कहानी या गाँवनामा लिखते हैं। धूल, लाटा, चना, मजदूर, नदी-नाले, घर-छप्पर उनकी कविताओं के शीर्षक हैं। इन वस्तुओं के विश्लेषण के बजाय ‘ग्रामीण’ जी अपनी रचनाओं के द्वारा उनकी वस्तुओं से अपने अभिप्राय व्यक्त करते हैं। उनसे अपने मन की बात कहलवाते हैं। मानवीकरण करते हैं। इन वस्तुओं के प्रति अपना राग व्यक्त करते हैं। वे वस्तुओं को बुद्धि के आकाश में नहीं उड़ाते। वे आम आदमी को सम्बोधित करते रहते हैं। वे सिखाने-समझाने की प्रतिज्ञा से आगे बढ़ते हैं। देवीशरण जी की अपनी आस्था है। आस्था ऐसी जो मनुष्य की समानता के लिये प्रतिबद्ध है। और आगे कहें तो यह कि वे मार्क्सवाद पर भरोसा करते हैं। मार्क्सवाद की बुनियादी निष्पत्तियाँ उनके भावबोध का अंग बन गई हैं। वे स्वाभाविक सी हो गई हैं, उनके लिये। अतः रचनाओं का स्फुरण इसी आस्थाजन्य स्वाभाविक प्रक्रिया से होता है। ग्रामीण जी मानते हैं कि श्रमिकों की संगठित शक्ति अपराजेय होती है। वे अपनी अनेक कविताओं में इसे व्यक्त करते हैं। उनका कविता संसार जीवन का वास्तविक क्षेत्र है। वह ज्यादातर अभिधा में हैं। उसमें गहरा आशावाद है। इस तरह की निरलंकृत कविता जनता की प्राथमिक दीक्षा के काम आती है। जनता के भावों का सीधा-साझापन इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इन कविताओं की प्रासंगिकता लम्बे समय तक रहेगी। — कमला प्रसाद
Dhoomil Ki Shreshth Kavitayan
- Author Name:
Brahma Dev Mishra +1
- Book Type:

- Description:
‘धूमिल की श्रेष्ठ कविताएँ’ अत्यन्त प्रखर और हिन्दी काव्य-जगत में नई हलचल पैदा करनेवाले सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की कविताओं का प्रथम सम्पादन है। एक लम्बी भूमिका के साथ सम्पादकों ने उनकी श्रेष्ठ कविताओं का चयन किया है, साथ ही भाषा के माध्यम से गाँव को शहर की होड़ में लानेवाले कवि की कविताओं पर संक्षिप्त टिप्पणी भी प्रस्तुत की है। लक्ष्य, धूमिल की अनगढ़ भाषा और नए मुहावरे को पाठकों तक सहजता से पहुँचाना है। सम्पादकों की दृष्टि में धूमिल का सर्जनात्मक व्यक्तित्व उनकी कविता में सक्रियता से मुखर है। ‘धूमिल को उनके कथ्य और भाषा के स्वीकृत स्वरूप के लिए जानना चाहिए, न कि प्रयोगात्मक शैलीकार के रूप में।’
Verses in Bloom
- Author Name:
Swati Sani
- Book Type:

- Description:
“Verses in Bloom” is a rare collection of 150+ timeless couplets from the most prominent poets of Urdu. The book contains these couplets in Urdu, Devanagari and Roman scripts, accompanied by an English translation, capturing their true essence. Through these couplets, the book also provides an insight about different stages of life and love.
Thank You for Leaving
- Author Name:
Rithvik Singh Rathore
- Book Type:

- Description:
Dear reader, I wrote this book for the ones who feel everything too deeply. The rare souls who still listen to their hearts and believe in love. The ones who don’t hurt others just because they’re in pain. The ones who wear their hearts on their sleeves and carry kindness within. The ones who overthink, over-invest in people and over-love, always. This book is an ocean full of feelings, so if at any point, you feel like you’re drowning, take a moment to remind yourself that it’s a privilege to feel emotions as intensely as you do. Some people are so disconnected from their hearts that they don’t allow themselves to feel anything at all. That being said, I wish you a happy reading. This book will make you cry. Love, Rithvik
Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya
- Author Name:
Piyush Mishra
- Book Type:

- Description:
सिनेमा और थिएटर के अन्तरिक्ष में विधाओं के आर-पार उड़नेवाले धूमकेतु कलाकार पीयूष मिश्रा यहाँ, इस जिल्द के भीतर सिर्फ़ एक बेचैन शब्दकार के रूप में मौजूद हैं। ये कविताएँ उनके जज़्बे की पैदावार हैं जिन्हें उन्होंने अपनी कामयाबियों से भी कमाया है, नाकामियों से भी। हर अच्छी कविता की तरह ये कविताएँ भी अपनी बात ख़ुद कहने की क़ायल हैं, फिर भी जो ख़ास तौर पर सुनने लायक़ है वह है इनकी बेचैनी जो इनके कंटेंट से लेकर फ़ार्म तक एक ही रचाव के साथ बिंधी है। दूसरी ध्यान रखने लायक़ बात ये कि इनमें से कोई कविता अब तक न मंच पर उतरी है, न परदे पर। यानी यह सिर्फ़ और सिर्फ़ कवि-शायर पीयूष मिश्रा की किताब है।
Customer Reviews
5 out of 5
Book
03/04/2023
Sweta K
The King of Rimes" by Ziad Dib Jreige is a collection of sonnets and poems The book is a beautiful exploration of love, nature, and the human experience. The author has an incredible command of language and a unique ability to express complex emotions and ideas through his poetry. The author's attention to detail and his willingness to experiment with different poetic forms make each poem a joy to read. Overall, "The King of Rimes" is a wonderful collection of poetry that showcases Ziad Dib Jreige's considerable talent as a poet. It's a great read for anyone who loves poetry, particularly those who appreciate the sonnet form.
The King of Rimes announces itself as the work of a poet who inhabits two traditions at once — the Shakespearean sonnet's rigorous fourteen-line architecture and the experimental impulse of a Lebanese voice writing in English for Indian readers. The collection opens with thirty sonnets that follow the English model precisely: three quatrains and a closing couplet, meter as scaffold, rhyme as pulse. Yet the subjects these forms hold — self-worth, the oscillation between life and death, the poet's simultaneous birth and witnessing — press against that classical containment. Beyond the sonnets, the book gathers shorter poems and aphoristic lines, each a fragment of what the poet calls "experimental literary perspectives." This is not verse that seeks to comfort or charm; it seeks to speak to the core, to make the reader feel the weight of each chosen word. For readers drawn to formal poetry that does not retreat into nostalgia, this collection offers a singular fusion of discipline and daring.
What kind of reading experience will The King of Rimes give me?
This collection demands concentration and rewards patience. The thirty Shakespearean sonnets move with deliberate rhythm, their meter creating a hypnotic pulse that slows the reader into contemplation. The tone is introspective and occasionally solemn, circling themes of mortality and self-discovery without offering easy resolution. Beyond the sonnets, the shorter poems and quotes shift into sharper, more experimental fragments — voice becomes aphorism, thought becomes image. The experience is not immersive in a narrative sense; it is meditative, asking you to sit with each poem as a discrete meditation rather than rush toward conclusion. Readers who value formal discipline married to philosophical ambition will find this collection lingers in the mind long after the page is turned.
Who is this book best suited for and what does it expect of its reader?
- Readers who already appreciate Shakespearean sonnets and want to see the form inhabited by a contemporary, non-English cultural voice.
- Poetry students exploring how classical English forms translate across geographies and identities.
- Readers drawn to philosophical verse that prioritizes depth and abstraction over narrative or lyric prettiness.
- Those comfortable with experimental structures in the shorter poems — fragmented syntax, aphoristic compression — that follow the more structured sonnets.
- Anyone seeking poetry that treats life and death not as metaphors but as lived inquiries, questions the poet revisits without pretending to answer.
What is the cultural significance of a Lebanese poet writing Shakespearean sonnets in English for Indian readers?
The collection embodies a postcolonial literary reality: English as a medium shared across former colonies and diasporic communities, no longer tethered to England itself. A Lebanese poet adopting the Shakespearean sonnet in India speaks to how classical forms have become global tools, reinterpreted by voices Shakespeare never imagined. For Indian readers, this resonates with their own complex relationship to English — a language of education, power, and creative possibility. The book also affirms that experimentation need not mean abandoning tradition; one can honour the sonnet's architecture while filling it with perspectives born from entirely different histories. In contemporary India, where multilingual poets constantly negotiate form and identity, The King of Rimes models how to claim a tradition without submitting to its origins.
What makes this poet's approach to the Shakespearean sonnet distinctive?
While many contemporary poets treat the Shakespearean sonnet as a nostalgic exercise or a constraint to subvert, this poet uses it as a philosophical container — a space where abstract questions about selfhood and mortality can be held under formal pressure. The voice is not confessional in the contemporary lyric sense; it is oracular, distanced, addressing "the core of life and death" as a subject rather than a personal crisis. The diction avoids the archaic flourishes some sonnet-writers indulge in, yet it also resists the flat conversational tone of much modern verse. The result is a middle register — elevated but not ornate, serious without self-importance. The inclusion of aphoristic quotes alongside the sonnets suggests the poet sees form not as an end but as one mode among many for arriving at truth.
What does this book leave the reader with after finishing it?
- A renewed respect for the discipline of form — how meter and rhyme can slow thought, deepen it, make it resonant rather than merely clever.
- A sense of poetry as philosophical inquiry rather than emotional catharsis; these poems think aloud, they do not confess or perform feeling.
- Awareness that classical English forms are no longer owned by any single culture — they are sites of ongoing negotiation, reinterpretation, and sometimes defiance.
- Curiosity about the poet's identity as the "Lebanese Nightingale" — a figure who claims both tradition and experiment, both voice and silence.
- A quiet unease, perhaps, at how little the poems resolve; they leave questions suspended, inviting the reader to continue the inquiry long after the book closes.