Solitude's Embrace
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Solitude’s Embrace is born of independent musings, provocative suggestions and novel observations, all pieced together to offer readers a chance to explore their own world with a new perspective. Maybe even spark a script of their own. With everything being outward and flashy, it can be a pleasant change of pace to switch the lens. To look closer to home, turn inward; not with judgment but with curiosity and awe. With over 150 possible branches in these pages to explore, get started to find which ones take root and speak to your individuality – grow a tree of thoughts all your own.
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Solitude’s Embrace is born of independent musings, provocative suggestions and novel observations, all pieced together to offer readers a chance to explore their own world with a new perspective. Maybe even spark a script of their own.
With everything being outward and flashy, it can be a pleasant change of pace to switch the lens. To look closer to home, turn inward; not with judgment but with curiosity and awe. With over 150 possible branches in these pages to explore, get started to find which ones take root and speak to your individuality – grow a tree of thoughts all your own.
Book Details
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ISBN9789390882632
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Pages218
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Avg Reading Time7 hrs
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Age11-18 yrs
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Country of OriginIreland
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ऋषियों की नैतिक दृढ़ता, कालिदास, भारवि और माघ की ऐन्द्रिकता और लालित्य, और भक्त कवियों की तन्मयता, और इन सबके साथ ही मानवीय अन्तर्विरोधों की गहरी पकड़—इतना कुछ एक कवि में और वह भी एकश्लोकीय कविता के द्वारा, यह अचम्भित करनेवाली बात है। भर्तृहरि क्लासिकी संस्कृत कविता की परम्परा के साथ भी हैं और उससे हटकर भी। इसलिए उनका अस्तित्व किसी एक व्यक्ति के रूप में भले न दिखाई पड़े और पहचान राजा और योगी जैसे कई व्यक्तियों के रूप में क्यों न होती रही हो, इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि हमारे यहाँ कविता की एक विशेष परम्परा रही थी जिसे भर्तृहरि नामक व्यक्ति से जोड़े बग़ैर ख़ुद कविता का व्यक्तित्व मुखर नहीं होता होगा।
भर्तृहरि सुभाषितों के कवि हैं—एकश्लोकीय कविता के कवि। जिन अनुभूतियों ने भर्तृहरि को सबसे अधिक संचालित किया है, उनमें आवेग का निर्णायक महत्त्व है।
कोसम्बी ने भर्तृहरि की दांते और गोएथे से तुलना करते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण किन्तु विवाद योग्य निष्कर्ष निकाले हैं। वह कहते हैं कि दांते का निर्वासन उनकी नागरिक मान्यताओं के प्रति अटल विश्वास के कारण था। इसी के वजन पर भर्तृहरि के लिए कहा जा सकता है कि उनका वैराग्य कोरा आत्मनिर्वासन नहीं है, उसके पीछे उनकी सामाजिक स्वतंत्रता की भावना और उस पर अटल विश्वास है। उसका अपने समय की राजनीतिक, आर्थिक बनावट से तीखा विरोध है।
पराजय का स्वीकार दूर-दूर तक नहीं है भर्तृहरि में। काल अथवा मृत्यु का स्वीकार अवश्य है।
भर्तृहरि की कविता का महत्त्व समूची मानवजाति के लिए तो है ही, सबसे बढ़कर उसका महत्त्व हमारे कवियों के लिए है। विषय से भटके हुए हम जैसे कवियों के लिए भर्तृहरि की कविताएँ विषय हैं; और इस उलझन-भरे समय में सुलझी हुई दृष्टि हैं।
Udaasi Ka Dhrupad
- Author Name:
Rajendra Kumar
- Book Type:

- Description: राजेन्द्र कुमार के इस संग्रह में उनके पिछले संग्रहों से कुछ अलग मनःस्थिति की कविताएँ हैं—ऐसी खिड़कियों की तरह, जो बाहर से ज्यादा, कवि के अपने भीतर की ओर खुलती हैं। कुछ-कुछ मीर की तरह की अपनी विकलता में 'ये धुआँ कहाँ से उठता है' की सुरागरसी-सी करती हुई। हमारा समय गुरूर में है कि उसने मनुष्य को क्या- क्या नहीं बख्शा है। 'मनुष्यता' उदास है कि वह किस क़दर अकेली होती जा रही है। जीवन में बहुत कुछ है— काम्य-अकाम्य। ये कविताएँ काम्य- अकाम्य के ऐसे संधिस्थल की कविताएँ हैं, जहाँ आशा-निराशा, अँधेरा- उजाला जैसे परस्पर विलोमार्थी से प्रतीत होने वाले शब्द भी आपस में संवाद करने को विकल हैं कि आज की चकाचौंध- भरी चहल-पहल में घिरे मनुष्य के संदर्भ में क्या अर्थ दें, अकेली पड़ती जाती 'मनुष्यता' के पक्ष में क्या अर्थ दें। अकारण नहीं है कि कवि को अंधेरा कभी रोशनी से अधिक अकुंठ लगने लगता है और उदासी अधिक संवेदनशील और उम्मीदभरी लगती है कि 'अकेला नहीं हूँ मैं'। यह उदासी का ध्रुपद है, जिसके आलाप में प्रिय के 'न होने में भी होने की अनुभूति की लय है।
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