Solitude's Embrace
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Solitude’s Embrace is born of independent musings, provocative suggestions and novel observations, all pieced together to offer readers a chance to explore their own world with a new perspective. Maybe even spark a script of their own. With everything being outward and flashy, it can be a pleasant change of pace to switch the lens. To look closer to home, turn inward; not with judgment but with curiosity and awe. With over 150 possible branches in these pages to explore, get started to find which ones take root and speak to your individuality – grow a tree of thoughts all your own.
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Solitude’s Embrace is born of independent musings, provocative suggestions and novel observations, all pieced together to offer readers a chance to explore their own world with a new perspective. Maybe even spark a script of their own.
With everything being outward and flashy, it can be a pleasant change of pace to switch the lens. To look closer to home, turn inward; not with judgment but with curiosity and awe. With over 150 possible branches in these pages to explore, get started to find which ones take root and speak to your individuality – grow a tree of thoughts all your own.
Book Details
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ISBN9789390882632
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Pages218
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Avg Reading Time7 hrs
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Age11-18 yrs
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Country of OriginIreland
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निलय उपाध्याय का कविता–संग्रह ‘कटौती’ आज लिखी जा रही कविता के समूचे परिदृश्य में एक नई काव्य–सम्भावना से भरपूर किसी महत्त्वपूर्ण दिशासूचक, सृजनात्मक परिघटना की तरह उपस्थित है। पिछले कुछ वर्षों से महत्त्वपूर्ण हो उठे महानगर के काव्य–वर्चस्व को एक नितान्त वरिष्ठ काव्य–सामर्थ्य और भिन्न काव्य–संरचना के माध्यम से चुनौती देती ये कविताएँ हमें अनुभवों के उस दैनिक संसार में सीधे ले जाकर खड़ा करती हैं, जहाँ ध्वंस और निर्माण, विनाश और संरक्षण, हिंसा और करुणा के अब तक कविता में अनुपस्थित अनेक रूप अपनी समूची गतिमयता, टकराहटों, विकट अन्तर्द्वन्द्वों और अलक्षित आयामों के साथ उपस्थित हैं।
‘कटौती’ की ये कविताएँ हम तक हमारे अपने समय के उस वर्तमान की दुर्लभ और अलभ्य सूचनाओं को पहुँचाकर एक साथ स्तब्ध और सचेत करने का कठिन प्रयत्न करती हैं, जिस वर्तमान को इसी दौर की अन्य कविताएँ या तो अतीत की तरह देखने की आदी हो चुकी हैं, या फिर उसे ‘लोक अनुभव’ मानकर स्वयं उस महानगरी ‘फोक’ ग्रन्थि का उदाहरण बन जाती हैं, जो एक तरफ़ सरलतावादी प्रगीतात्मकता और दूसरी तरफ़ ‘प्रकृतिवादी’ नॉस्टेल्जिया के प्रचलित विन्यासों और सर्व–स्वीकृत काव्योक्तियों में पिछले लम्बे अरसे से अपरिचित होकर भी सम्मानित बनी हुई है। निलय उपाध्याय की ये कविताएँ एक अद्भुत निस्संगता, निस्पृहता, रचनात्मक कौशल और विरल तल्लीनता के साथ, एक नई और सहजात काव्याभिव्यक्ति के द्वारा इस ‘सम्मानित’ को चुपचाप अपदस्थ करती हैं।
In Dino
- Author Name:
Kunwar Narain
- Book Type:

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‘इन दिनों’ संग्रह कुँवर नारायण के विशद काव्य-संसार में ले जाता है। भाषा और विषय की विविधता अब तक उनकी कविताओं के विशेष गुण माने जा चुके हैं। स्थानों और समयों को लेकर ये कविताएँ अपनी एक उन्मुक्त दुनिया रचती हैं जिनमें अनवरत जीवन की खुली आवाजाही है। इनमें टूटने का दर्द भी है, और उसे बनाने का उत्साह भी। इनमें यथार्थ की पक्की पकड़ है, उसका खुरदुरा स्पर्श, साथ ही उसका सहज सौन्दर्य भी। जीवन और विचारों से जूझती ये कविताएँ उस सन्धिरेखा पर अपने को सम्भव बनाती हैं जो एक दूसरे का निषेध नहीं, गहरी मानवीय संवेदनाओं का आधार है। राजनीतिक और सामाजिक विकृतियों और अराजकता के समय ये कविताएँ समस्याओं से वाबस्तगी को पूरी ज़िम्मेदारी से प्रतिबिम्बित करती हैं। कभी आयरनी, कभी हमदर्दी के स्वर में वे मनुष्य की सबसे संवेदनशील प्रतिक्रियाओं को जगाती हैं।
कुँवर नारायण की कविताओं में सीधी घोषणाएँ और फ़ैसले नहीं हैं, जीवन की बहुतरफ़ा समझ का वह धीरज है जो एक प्रौढ़ जीवन-विवेक और दृढ़ नैतिक चेतना से बनता है। समाज, राजनीति, व्यवसायीकरण आदि को लेकर उनकी कविताओं में दूरन्देशी फ़िक्र है जो लोक-जीवन के व्यापक हितों को केन्द्र में रखकर सोचती है—आज के मनुष्य की पीड़ा और जिजीविषा के साथ सार्थक संवाद स्थापित करने की कोशिश करती है। क्लासिकल अनुशासन में रहते हुए भी ये कविताएँ आदमी के बुनियादी आवेगों को भी इस तरह व्यक्त करती हैं कि एक सतर्क पाठक उनके साथ आसानी से एकात्म हो सकता है। कई जगह मिथकीय और ऐतिहासिक सन्दर्भों द्वारा कवि वर्तमान में हमारे यथार्थ-बोध को अधिक विस्तृत, गहरा और विवेकी बनाता है। ये कविताएँ आपका परिचय हिन्दी के उस अप्रतिम कवि से कराएँगी जिसकी ‘चक्रव्यूह’, ‘आत्मजयी’, ’अपने सामने’, ‘कोई दूसरा नहीं’ जैसी कृतियाँ हिन्दी साहित्य की मूल्यवान धरोहर बन चुकी हैं।
Daste-Tahe-Sang
- Author Name:
Faiz Ahmed 'Faiz'
- Book Type:

- Description: नज़्मों, ग़ज़लों, क़तआत और कुछ अन्य रचनाओं के इस संकलन में फ़ैज़ की बेहद मशहूर नज़्मों में से एक ‘आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो’ भी शामिल है। इस नज़्म को उन्होंने 1959 में लिखा था। लाहौर की गलियों से उन्हें मय ज़ंजीरों के घोड़ागाड़ी से क़िला लाहौर की टॉर्चर सेल ले जाया गया था। इस नज़्म के पीछे उनका वही अनुभव है। हर हाल में आज़ादी के शैदाई फ़ैज़ की यह नज़्म उनकी शख़्सियत और शायरी दोनों की ऊँचाई को बयान करती है। 1960 के दशक के शुरुआती सालों में प्रकाशित ‘दस्ते-तहे-संग’ में उस दौर में लिखी हुई अन्य नज़्में, ग़ज़लें और क़तआत भी संकलित हैं जिनमें से कुछ मास्को, बम्बई और लन्दन में भी लिखी गईं। कविताओं के अलावा इस संकलन का ख़ास आकर्षण फ़ैज़ की एक तक़रीर है जो उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय लेनिन शांति पुरस्कार ग्रहण करते हुए उर्दू में दी थी। ‘फ़ैज़... अज़ फ़ैज़’ शीर्षक से उन्हीं का लिखा हुआ एक और आलेख भी यहाँ आप पाएँगे जिसमें वे अपने शुरुआती दिनों के बारे में बताते हैं और उस दौरान लिखी गई कविताओं की पृष्ठभूमि से भी हमें अवगत कराते हैं।
Apne Aakash Mein
- Author Name:
Savita Bhargav
- Book Type:

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सविता भार्गव के पहले काव्य-संकलन का नाम था—'किसका है आसमान’। पाँच-छह साल बाद 'किसका' जैसे प्रश्न से मुक्त होकर कवयित्री ने स्वयं के आकाश की रचना कर ली है।
'अपने आकाश में' की कविताएँ जीवन-विवेक और काव्य-विवेक में बड़े परिवर्तन का संकेत देती हैं। पहले संकलन में यथार्थ और उसकी जो रचना-कला है, उससे सम्बन्ध बनाए रखते हुए नई 'सामर्थ्य'—जिसमें यथार्थबोध और आत्मबोध का गहरा मुठभेड़ दिखाई पड़ता है—का परिचय दिया गया है। इसे यथार्थ पर रोमांटिक वेग के दबाव के रूप में भी देख सकते हैं। सविता कविता में बार-बार अपनी छवि गढ़ने की कोशिश करती हैं। तरह-तरह की छवियाँ निश्चित बेजान होतीं, अगर स्वयं तक सीमित होतीं। उनकी शक्ति यह है कि वे एक ओर स्त्री के निगूढ़ संसार को प्रतिबिम्बित करती हैं, दूसरी ओर उस समाज को जिसमें स्त्री साँस लेती है। स्त्री-छवि को जिस तरह से वे गढ़ती हैं, उसमें पुरुष की अलग से छवि रचने की आवश्यकता बहुत कम रह जाती है। नारीवादी कवयित्रियों से सविता इस मायने में भिन्न हैं कि वे पुरुष समाज के प्रति आलोचना का भाव रखती अवश्य हैं, किन्तु पुरुष के प्रति समूचे मन से निष्ठा का परिचय देती हैं। वे इस विश्वास का परिचय देती हैं कि स्त्री स्वतंत्र तारिका है, लेकिन उसकी आत्मा ईमानदार और सम्पूर्ण पुरुष के प्रति समर्पित है।
सविता पुरुष-सत्ता का विरोध भी मज़े-मज़े में करती हैं। एक कविता है—'पुरुष होना चाहती
हूँ'। उसमें अपनी देह से पुरुष के 'गुनाह' का आनन्द पुरुष बनकर लिया गया है।सविता में अन्तर्बाधा नहीं है। साहसी कवयित्री हैं—स्त्री के आत्मविश्वास की कवयित्री। अच्छी बात यह है कि स्त्री की 'सच्ची प्रतिमा' गढ़ने की ललक उनकी मुख्य प्रवृत्ति है।
सविता में पर्याप्त आत्ममुग्धता है। आत्मरति है। लेकिन वह खटकती नहीं है। उसमें स्त्री के स्वत्व और सत्त्व, दोनों की प्रतिष्ठा का प्रयास दिखाई पड़ता है। दूसरी बात, सविता में 'स्त्री' और 'कवयित्री' का प्रकृति से तादात्म्य विशेष महत्त्व रखता है। प्रकृति उनके लिए जीने और सीखने की सही जगह है; उसी के ज़रिए सामाजिक अनुभव की कटुता की क्षतिपूर्ति करती हैं। 'अपने आकाश में' संकलन में काव्य-ऊर्जा का नया क्षेत्र तैयार होता दिखाई पड़ता है।
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