Pratinidhi Kavitayen : Raghuvir Sahay
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Author:
Raghuvir Sahay, Suresh SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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‘आज़ादी’ मिली। देश में 'लोकतंत्र’ आया। लेकिन इस लोकतंत्र के पिछले पाँच दशकों में उसका सर्जन करनेवाले मतदाता का जीवन लगभग असम्भव हो गया। रघुवीर सहाय भारतीय लोकतंत्र की विसंगतियों के बीच मरते हुए इसी बहुसंख्यक मतदाता के प्रतिनिधि कवि हैं, और इस मतदाता की जीवन-स्थितियों की ख़बर देनेवाली कविताएँ उनकी प्रतिनिधि कविताएँ हैं।</p> <p>रघुवीर सहाय का ऐतिहासिक योगदान यह भी है कि उन्होंने कविता के लिए सर्वथा नए विषय-क्षेत्रों की तलाश की और उसे नई भाषा में लिखा। इन कविताओं को पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि उन्होंने ऐसे ठिकानों पर काव्यवस्तु देखी है जो दूसरे कवियों के लिए सपाट और निरा गद्यमय हो सकती है। इस तरह उन्होंने जटिल होते हुए कवि-कर्म को सरल बनाया। परिणाम हुआ कि आज के नए कवियों ने उनके रास्ते पर सबसे अधिक चलने की कोशिश की।</p> <p>रघुवीर सहाय की कविताओं से गुजरना देश के उन दूरदराज़ इलाक़ों से गुज़रना है जहाँ आदमी से एक दर्जा नीचे का समाज असंगठित राजनीति का अभिशाप झेल रहा है।
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‘आज़ादी’ मिली। देश में 'लोकतंत्र’ आया। लेकिन इस लोकतंत्र के पिछले पाँच दशकों में उसका सर्जन करनेवाले मतदाता का जीवन लगभग असम्भव हो गया। रघुवीर सहाय भारतीय लोकतंत्र की विसंगतियों के बीच मरते हुए इसी बहुसंख्यक मतदाता के प्रतिनिधि कवि हैं, और इस मतदाता की जीवन-स्थितियों की ख़बर देनेवाली कविताएँ उनकी प्रतिनिधि कविताएँ हैं।</p>
<p>रघुवीर सहाय का ऐतिहासिक योगदान यह भी है कि उन्होंने कविता के लिए सर्वथा नए विषय-क्षेत्रों की तलाश की और उसे नई भाषा में लिखा। इन कविताओं को पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि उन्होंने ऐसे ठिकानों पर काव्यवस्तु देखी है जो दूसरे कवियों के लिए सपाट और निरा गद्यमय हो सकती है। इस तरह उन्होंने जटिल होते हुए कवि-कर्म को सरल बनाया। परिणाम हुआ कि आज के नए कवियों ने उनके रास्ते पर सबसे अधिक चलने की कोशिश की।</p>
<p>रघुवीर सहाय की कविताओं से गुजरना देश के उन दूरदराज़ इलाक़ों से गुज़रना है जहाँ आदमी से एक दर्जा नीचे का समाज असंगठित राजनीति का अभिशाप झेल रहा है।
Book Details
-
ISBN9788171789634
-
Pages162
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इस कवि में प्रखर ऐन्द्रिक संवेदन प्रखर राजनीतिक-सामाजिक चेतना का आनुषंगिक है। इसलिए इसके यहाँ यथार्थ न कोरा सतही यथार्थ रहने पाता है, न नकारात्मकता का पर्याय बनने पाता है। प्रस्तुत कविता-संग्रह इस बात की याद फिर से दिलाएगा कि रघुवीर सहाय ने आग्रहपूर्वक सच्चाइयों की चिकनी ‘काव्यात्मक’ सतह को अस्वीकार किया है और जहाँ औरों को कविता नहीं दिखती, वहाँ कविता को पहचाना है।
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—अशोक वाजपेयी।
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रघुवीर सहाय का यह बहुचर्चित कविता-संग्रह कवि के अपने व्यक्तित्व की खोज की एक बीहड़ यात्रा है। मनुष्य से नंगे बदन संस्पर्श करने के लिए ‘सीढ़ियों पर धूप में’ संग्रह में कवि ने अपने को लैस किया था : अब वही साक्षात्कार इस दौर की कविताओं में उसके लिए एक चुनौती बनकर आया है।
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भारतभूषण अग्रवाल के शब्दों में : ‘‘भीड़ से घिरा एक व्यक्ति—जो भीड़ बनने से इनकार करता है और उससे भाग जाने को ग़लत समझता है—रघुवीर सहाय का साहित्यिक व्यक्तित्व है।...
रघुवीर सहाय की अनेक रचनाएँ आधुनिक कविता की स्थायी विभूति बन चुकी हैं; उनके नागर मन की भावप्रवणता, सूक्ष्मदर्शिता और तटस्थ निर्ममता अब नए परिचय की मोहताज नहीं। पर अभी यह पहचाना जाना शेष है कि सहज सौन्दर्य और सूक्ष्म अनुभूति से निर्मित रघुवीर सहाय का काव्य-संसार जितना निजी है, उतना ही हम सबका है—एक गहरे और अराजनीतिक अर्थ में जनवादी। सचमुच, ऐसे ही कवि को जनता से घृणा करने का अधिकार दिया जा सकता है।’’
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प्रभाष जोशी ने ‘जीने के बहाने’ में अपने समय के चर्चित व्यक्तित्वों के चरित्र और विचार का दो टूक विश्लेषण किया है। जिन व्यक्तित्वों ने इतिहास की धारा को सही दिशा में ले जाने की कोशिश की है, प्रभाष जोशी ने ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के अवदान का रेखांकन किया है। कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने अपनी वैचारिक विसंगतियों से इतिहास के प्रवाह में गतिरोध पैदा करने का प्रयास किया है, प्रभाष जी ने उनकी ख़बर ली है।
प्रभाष जोशी लिखते हैं : “ये व्यक्तिचित्र नहीं हैं। जीवनियाँ भी नहीं हैं, और तो और, संस्मरण भी नहीं हैं। जैसे गांधी के साथ मेरे क्या संस्मरण हो सकते हैं। दिल्ली में जब नाथूराम गोडसे ने उनको गोली मारी तो मैं इन्दौर में दस बरस का था। माताराम कहती हैं कि उन्होंने मुझे गांधी जी को दिखाया था। तब वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता करने इन्दौर आए थे। लेकिन तब मैं साल-भर का था और कहना कि उन्हें मैंने देखा, गप्प लगाना होगा। लेकिन इस पुस्तक की शुरुआत ही गांधी पर लिखे लेख से होती है। और तीन निबन्ध हैं जिन पर लिखा है, वे सार्वजनिक जीवन के लोग हैं।...जिन-जिन रूपों और तरीक़ों से कोई हमारे जीवन में जा सकता है, उन्हीं रूपों और तरीक़ों, में मैंने उनको जिया और याद रखा है। ये बहाने हैं जिनके कारण मैं जीता हूँ।”
पुस्तक में जिन व्यक्तित्वों पर प्रभाष जी ने लिखा है, वे जीवन और समाज के विविध क्षेत्रों के लोग हैं। उनमें कुछ अन्य प्रमुख नाम हैं : विनोबा, जेपी, ज्ञानी जैलसिंह, के.आर. नारायणन, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, सोनिया गांधी, रामनाथ गोयनका, राहुल बारपुते, एस. मुलगावकर, रामविलास शर्मा, त्रिलोचन, गिरिजा कुमार माथुर, धर्मवीर भारती, हरिशंकर परसाई, वी.एस. नॉयपाल, अरुंधती राय, सत्यजित राय, लता मंगेशकर, जे.आर.डी. टाटा, राधाकृष्ण, सिद्धराज ढड्ढा, सी.के. नायडू, गावसकर, तेंदुलकर, नवरातिलोवा आदि।
Grameen Jeevan Evam Aajeevikaen
- Author Name:
Suresh Sharma
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ये कहानियाँ व्यक्तिगत स्तर पर थोड़ी-सी आय अर्जित करने या शिशु और परिवार के लिए बेहतर स्वास्थ्य या बेहतर शिक्षा प्राप्त करने के लिए, उनके अल्प संसाधनों के उपयोग में समझदारी को दर्शाती हैं। ग्रामीण व्यक्तियों के पास भौतिक संसाधनों की कमी है, लेकिन जीवन में आगे बढऩे की चाहत और कठिन प्रयास की इच्छा में कोई कमी नहीं है। जैसा कि कहानियों में पाएँगे, सामाजिक कार्यकर्ता और सामाजिक रूप से उन्मुख सरकारी अधिकारी, उन्हें मार्गदर्शन, सुविधा, सामग्री-सहायता और उचित सरकारी योजनाओं के साथ जोडऩे में मदद करते हैं। ग्रामीण भारत में जश्न मनाने के लिए बहुत कुछ है। मैं उन सभी लोगों के लिए इस पुस्तक की अनुशंसा करता हूँ, जो इस बारे में पढऩे में रुचि रखते हैं कि ग्रामीण भारत कैसे रहता है और कैसे अपनी समस्याओं को हल करता है। संजीव फंसालकर निदेशक, विकास अण्वेष फाउंडेशन
Aage Andhi Gali Hai
- Author Name:
Prabhash Joshi +1
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‘आगे अन्धी गली है’ में विख्यात पत्राकार प्रभाष जोशी द्वारा ‘प्रथम प्रवक्ता’ और ‘तहलका’ में छपे कॉलम संकलित हैं।
प्रभाष जोशी ने हिन्दी पत्रकारिता में कॉलम लेखन को एक नया रूप देने के साथ ही उसे विविधता भी प्रदान की। ‘जनसत्ता’ में लिखे उनके कॉलम ‘कागद कारे’ के समानान्तर ‘प्रथम प्रवक्ता’ का कॉलम ‘लाग लपेट’ तथा ‘तहलका’ का ‘शून्य काल’ भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ‘कागद कारे’ में प्रभाष जी ने अपनी संवेदना के आधार पर समय को परिभाषित किया है जबकि ‘लाग लपेट’ और ‘शून्य काल’ में अपने गांधीवादी विचार और तर्क से समकालीन परिदृश्य की पहचान निश्चित की है।
इस पुस्तक में प्रभाष जोशी के अन्तिम दो वर्षों का लेखन संकलित है। पुस्तक की भूमिका में प्रभाष जोशी की ज़िन्दगी के अन्तिम छह दिनों का संवेदनात्मक वृत्तान्त भी दिया गया है। जीवन के अन्तिम सप्ताह में प्रभाष जोशी अपने लेखन, सामाजिक सक्रियता और विसंगतियों के विरुद्ध व्याख्यान की घुमन्तू दिनचर्या में बेहद व्यस्त थे। पुस्तक के सम्पादकीय में उसका क्रमशः ब्यौरा दिया गया है। भागमभाग के बीच भी क्रिकेट से दीवानगी की हद तक उनका लगाव हमें आश्चर्य से भर देता है।
यह पुस्तक प्रभाष जी के अन्तिम दिनों के वैचारिक मानस को समझने की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
Jab Top Mukabil Ho
- Author Name:
Prabhash Joshi +1
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‘जब तोप मुकाबिल हो’ पुस्तक में प्रभाष जोशी के पत्रकारिता और मीडिया के दूसरे माध्यमों से सम्बन्धित लेखों के अलावा भाषा, अर्थ, जगत और महिलाओं से जुड़े लेख संकलित हैं। पुस्तक की भूमिका में प्रभाष जोशी लिखते हैं :
“ जब तोप मुकाबिल हो’ तो अख़बार निकालो’—ऐसा अकबर इलाहाबादी ने कहा है। आज लोग तोप का मुक़ाबला करने को अख़बार नहीं निकालते। वे पैसा और थोड़ा-बहुत पव्वा कमाने के लिए अख़बार निकालते हैं। इसलिए छापने के पैसे माँगने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं होती। अपन ऐसी पत्रकारिता करने नहीं आए थे। आज़ादी के बाद के दूसरे दशक में लगता था कि पत्रकारिता समाज बदलने और नया समतावादी और न्याय आधारित समाज बनाने का एक माध्यम है। आज आप ऐसी बातें करें तो लोग हँसने लगते हैं। फिर भी नरसिंह राव के कहने पर मनमोहन सिंह जब सन् इक्यानबे में नवउदार आर्थिक व्यवस्था लाए तब तक भारतीय पत्रकारिता में समाज परिवर्तन की वाहक बनने की इच्छा थी। आज जो प्रवृत्तियाँ आप देख रहे और दुखी हो रहे हैं, वे सब इसके बाद की हैं।
लेकिन यहाँ जो लेख संकलित हैं, वे आज की पत्रकारिता की आलोचना में नहीं हैं। ये पत्रकारिता करने या उसे कॉलेजों में पढ़ानेवालों के लिए भी नहीं हैं। मुझे हमेशा लगता रहा कि पत्रकारिता करने और करके दिखाने की चीज़ है, उपदेश देने या सिखाने की नहीं। यह अपने काम की आत्मालोचन है और जो कर न पाए, उसका अफ़सोस भी। लेकिन यह पत्रकारिता को जनसम्पर्क अभियान या प्रकाशन उद्योग बना देने के विरुद्ध तो है ही। मुझे अब कोई पचास साल हो जाएँगे लेकिन कभी मुझे नहीं लगा कि पत्रकारिता बेकार का काम है। ऐसा होता तो अपने अख़बार में मैं लगातार लिखता नहीं रह सकता था—न दैन्यम् न पलायनम्!”
Kahne Ko Bahut Kuchh Tha
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Prabhash Joshi +1
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प्रभाष जोशी की इस पुस्तक में उनके सम्पूर्ण लेखन से चुनकर प्रतिनिधि लेखों का संग्रह किया गया है। वे एक समाजधर्मी पत्रकार थे जिन्होंने अपने समय के बनते इतिहास का दो टूक विश्लेषण किया। उसके साथ ही अपने सक्रिय वैचारिक पहल से समकालीन इतिहास को बनाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज के समय में ऐसे पत्रकार और समाज चिन्तक की कमी एक गतिरोध और यथास्थिति का माहौल बना रही है। ऐसे में प्रभाष जोशी के ये लेख एक नई पहल के लिए प्रेरित करते हैं। पुस्तक में इन अध्यायों के अन्तर्गत लेख रखे गए हैं, उनके शीर्षक हैं : ‘पत्रकारिता है सदाचारिता’, ‘अपनी हिन्दी का हाल’, ‘शिखरों के आसपास’, ‘राजमंच का नेपथ्य’, ‘खेल का सौन्दर्यशास्त्र’ तथा ‘बार-बार लौटकर जाता हूँ नर्मदा’। ये शीर्षक ही पुस्तक में संकलित लेखों के कथ्य बयान कर देते हैं। एक बार फिर से प्रभाष जोशी को पढ़ना आपको इस मुश्किल समय से नए सिरे से परिचित कराएगा। सामाजिक बदलाव की पहल के लिए प्रेरित करेगा।
Dil Se Maine Duniya Dekhi
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Harivansh +1
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हिन्दी के ज़्यादातर पत्रकारों के यात्रा-वृत्तान्त आम तौर पर रपट होते हैं। उनके केन्द्र में सिर्फ़ तथ्य और विवरण होते हैं। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और सांसद हरिवंश के इन यात्रा-विवरणों में तथ्यों के साथ-साथ संवेदना और मानवीय प्रसंगों को भी बख़ूबी पिरोया गया है। इसी के चलते उनकी ये पत्रकारीय रपटें साहित्यिक आस्वाद से युक्त हो जाती हैं।
यात्रा के दौरान उनके मन में एक अन्तर्यात्रा भी समानान्तर चलती रहती है, विदेश उन्हें अपने देश को और सतर्क निगाह से देखने को प्रेरित करता है। वे सिर्फ़ पर्यटक की तरह नहीं एक प्रबुद्ध विचारक की तरह दुनिया को देखने लगते हैं। उनके इन यात्रा-संस्मरणों में सतत एक बेचैनी दिखाई देती है। साथ ही उनका पत्रकार भी अपनी वस्तुगतता के साथ लगातार उनके यात्री के साथ रहता है। उनका प्रयास होता है कि वे जहाँ भी जाएँ, वहाँ के यथार्थ को इस तरह प्रस्तुत करें, जिससे समय और समाज की समझ को विस्तार मिले—उनकी अपनी समझ भी खुले और पाठक की भी।
यही विशेषता इस पुस्तक को एक साहित्यिक कृति बनाती है। आप इन यात्रा-विवरणों को पढ़कर रोमांचित भी होंगे, उत्तेजित भी होंगे और देश तथा दुनिया के विषय में सोचने के लिए व्याकुल भी होंगे।
Jivan Jaisa Jiya
- Author Name:
Chandrashekhar +1
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पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की यह आत्मकथा सिर्फ़ उनकी निजी ज़िन्दगी की कहानी नहीं है। यह उनके समय का प्रामाणिक दस्तावेज़ भी है। वे आज़ादी के बाद की निर्णायक राजनैतिक घटनाओं से जुड़े रहे। उन घटनाओं को एक निश्चित दिशा देने में उन्होंने ऐतिहासिक भूमिका भी निभाई। इसलिए उनकी इस आत्मकथा में उनके दौर का अनुद्घाटित इतिहास सुरक्षित है। अपने समय के अनेक व्यक्तित्वों और घटनाओं के बारे में उन्होंने ऐसी जानकारियाँ भी दी हैं जिनसे समकालीन राजनैतिक-सामाजिक इतिहास को समझने के लिए नए तथ्य प्राप्त होते हैं।
बलिया के एक किसान परिवार में जनमे चन्द्रशेखर अपनी जीवन-यात्रा में अनेक पड़ावों से गुज़रे। स्वाधीनता-आन्दोलन में शिरकत की। आज़ादी के बाद समाजवाद के लिए चलाए जानेवाले संघर्ष को आगे बढ़ाया। कांग्रेस को प्रगतिशील बनाने के लिए नए कार्यक्रम रखे। आपातकाल की जेल-यात्रा के बाद जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष बने। जनता दल की सरकार के जाने के बाद देश के प्रधानमंत्री पद पर पहुँचे और समझौताविहीन व्यक्तित्व के कारण अन्तत: इस्तीफ़ा दिया। उदारीकरण और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नव-साम्राज्यवाद का वे विरोध करते रहे। उनकी इस आत्मकथा में बाहरी संसार के अलावा उनके व्यक्तित्व की गहरी संवेदनशीलता और मानवीय पक्ष का वृत्तान्त भी शामिल है। हिन्दी में आत्मकथा साहित्य की परम्परा में चन्द्रशेखर की यह आत्मकथा एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
Saptaparna
- Author Name:
Mahadevi Verma
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मनुष्य की स्थूल पार्थिव सत्ता उसकी रंग-रूपमयी आकृति में व्यक्त होती है। उसके बौद्धिक संगठन से जीवन और जगत सम्बन्धी अनेक जिज्ञासाओं, उनके तत्त्व के शोध और समाधान के प्रयास, चिन्तन की दिशा आदि संचालित और संयमित होते हैं! उसकी रागात्मक वृत्तियों का संघात उसके सौन्दर्य-संवेदन, जीवन और जगत के प्रति आकर्षण-विकर्षण, उन्हें अनुकूल और मधुर बनाने की इच्छा, उसे अन्य मानवों की इच्छा से सम्पृक्त कर अधिक विस्तार देने की कामना और उसकी कर्म-परिणति आदि का सर्जक है।
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है।
गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं।
—नन्दकिशोर आचार्य
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam +1
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अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है।
अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है।
—सुमित्रानन्दन पंत
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