Lata Aur Vriksh
Author:
Smt. Kranti TrivediPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 76
₹
95
Available
लता और वृक्ष
“कहो न मिनी, इसका क्या अर्थ है?”
“मन तौ शुदम का अर्थ होता है—मैं तेरा हो गया।”
शब्द और अर्थ पर वार्त्तालाप होते देख इंदरानी खिसक ली, नहीं तो देखती अपार प्रेम भरा आलिंगन कैसे हुआ करता है।
सुखबीर ने बहुत ही कोमलता से पूछा, “इसके आगे भी कुछ होगा, मिनी? आज इसी क्षण सुनने का मन हो रहा है।”
संसार की सबसे सुखी नारी के स्वर में मिनी ने कहना आरंभ किया—“फारसी का यह पूरा छंद है—
मन तौ शुदम, तौ मन शुदी।
मन तम शुदी, तौ जाँ शुदी।
ता कथाम गीयंद वाद अजी।
मन दीगरम व तौ दीगरी।”
“अब अर्थ भी बता दो, यह तुमने कहाँ पढ़ा था?”
“मरियम अम्मा की नोट-बुक में था। मुझे अच्छा लगा तो रट लिया। इसका अर्थ है—
मैं तेरा हो गया, तू मेरा हो गया।
मैं शरीर बन गया, तू प्राण बन गया।
कभी कोई यह कह न सके मैं और तू
और तू और मैं हैं।
ISBN: 9788173159114
Pages: 290
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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DurgaPrashad Jhala
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- Description: वरिष्ठ कवि दुर्गाप्रसाद झाला की कविता कोई भावुक वायवीय कविता नहीं जैसे कि उम्र के इस दौर के कवियों की अक्सर हो जाया करती है। वह यथार्थ के एक ठोस धरातल पर खड़ी वास्तविक कविता है जो निराशा के तमाम बादलों के बीच उम्मीद के सूरज की तरह चमक रही है—'उम्मीद उदास नहीं है/ वह पेड़-पौधों में खिलखिला रही है।' इस संघर्ष में कवि की ही नहीं बल्कि मनुष्य मात्र की पक्षधरता उनके भीतर स्पष्ट है—'अब तय करना है/ तुम्हें क्या करना है।' यह स्पष्ट सोच किसी बूढ़े का विभ्रम न होकर एक अनुभवी कवि की मूल प्रतिज्ञा है। दुर्गाप्रसाद झाला एक जुझारू व्यक्ति के साथ ही एक स्वप्नजीवी कवि भी हैं। ज़ाहिर है जहाँ स्वप्न हैं वहाँ बदलाव और पुनर्रचना की संभावनाएँ होती ही हैं—'जब भी जाना हो यात्रा पर/ एक दिशा को छुओ/ अपने पैरों को छुओ।' (अपने सपनों को छुओ)। एक बुज़ुर्ग कवि का इससे अधिक दाय क्या हो सकता है कि वह इस उम्र में भी भाषा के हथियार के साथ युद्ध में डटा हुआ है? यह आश्वस्ति ही कवि की प्रसन्नता का सबब भी है—'अब बस इसी बात से प्रसन्न हूँ/ कि मैं चुपचाप नहीं बैठा रहा।' दरअसल यह कथित प्रसन्नता एक कवि का संतोष है। कई बार हम उन्हें काव्याभ्यास करते भी पाते हैं खासकर कुछ कविताओं के क्लाईमेक्स में, लेकिन उन कोशिशों की ईमानदारी पर सवाल नहीं किया जा सकता। कला की दुनिया में एक बुज़ुर्ग कवि की उपस्थिति न सिर्फ आश्वस्तिकारक, उसकी सक्रियता आगामी पीढ़ी के लिए उत्पे्ररक भी होती है। उम्मीद है कि एक जुझारू और जीवट कवि की ये कविताएँ वही काम करेंगी क्योंकि झाला जी की जिजीविषा उस फीनिक्स पक्षी की मानिंद है जो अपनी ही राख से नया जन्म लेता है। —निरंजन श्रोत्रिय
Ghanmala : Aacharya Kunwar Chandraprakash Singh Ke Geet
- Author Name:
Kunwar Chandraprakash Singh
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Description:
'घनमाला' महाकवि कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह की काव्य-साधना का अन्तिम गीत-संग्रह है। इस गीत-संग्रह का प्रकाशन भारत की स्वतन्त्रता के अमृत महोत्सव वर्ष में किया जा रहा है। इसमें कुल 150 गीत संकलित हैं। इन 150 गीतों में 75 गीत प्रायः सन् 1978 ई. के बाद रचे गए हैं। इन गीतों में छायावाद युग के गीतों के वही भाव मिलेंगे जो छायावाद के उत्कर्ष काल में रचे गए गीतों में मिलते हैं। इसीलिए कुँवर जी को छायावाद का अन्तिम कवि माना है और उनके शताब्दी न्यासी कवि व्यक्तित्व में जीवन के अन्तिम क्षणों तक छायावादी भाव-भूमि को सन्निहित देखकर उन्हें छायावाद के उन्नायक कवि की उपाधि से अलंकृत किया है।
इस गीत-संग्रह को दो खंडों में विभक्त किया गया है। पहले खंड में सन् 1978 ई. के बाद रचे गीत संकलित हैं और दूसरे खंड में छायावाद के उत्कर्ष काल में रचे गए गीत हैं। इस संकलन के दूसरे खंड में छायावाद के उत्कर्षकाल के गीत इसलिए संकलित किए गए हैं, जिससे पाठक पहले खंड तथा दूसरे खंड के गीतों को पढ़कर यह समझ सकें कि कुँवर जी की काव्य-साधना में छायावाद की अनुभूति तथा अभिव्यक्ति का सम्पूर्ण काव्य-वैभव आदि से अन्त तक समान रूप से विद्यमान है।
Bela
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
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Description:
‘बेला' और ‘नए पत्ते' के साथ निराला-काव्य का मध्यवर्ती चरण समाप्त होता है। 'बेला' उनका एक विशिष्ट संग्रह है, क्योंकि इसमें सर्वाधिक ताज़गी है। अफ़सोस कि निराला-काव्य के प्रेमियों ने भी इसे लक्ष्य नहीं किया, इसे उनकी एक गौण कृति मान लिया है। ‘नए पत्ते' में छायावादी सौन्दर्य-लोक का सायास किया गया ध्वंस तो है ही, यथार्थवाद की अत्यन्त स्पष्ट चेतना भी है। ‘बेला' की रचनाओं की अभिव्यक्तिगत विशेषता यह है कि वे समस्त पदावली में नहीं रची गईं, इसलिए ‘ठूँठ' होने से बच गई हैं।
इस संग्रह में बराबर-बराबर गीत और ग़ज़लें हैं। दोनों में भरपूर विषय-वैविध्य है, यथा—रहस्य, प्रेम, प्रकृति, दार्शनिकता, राष्ट्रीयता आदि। इसकी कुछ ही रचनाओं पर दृष्टिपात करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। ‘रूप की धारा के उस पार/कभी धँसने भी दोगे मुझे?', ‘बातें चलीं सारी रात तुम्हारी; आँखें नहीं खुलीं तुम्हारी।', ‘लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो/भरा दौंगरा उन्हीं पर गिरा।' बाहर मैं कर दिया गया हूँ। भीतर, पर, भर दिया गया हूँ।' आदि। राष्ट्रीयता ज़्यादातर उनकी ग़ज़लों में देखने को मिलती है।
निराला की ग़ज़लें एक प्रयोग के तहत लिखी गई हैं। उर्दू शायरी की एक चीज़ उन्हें बहुत आकर्षित करती थी। वह भी उसमें पूरे वाक्यों का प्रयोग। उन्होंने हिन्दी में भी ग़ज़लें लिखकर उसे हिन्दी कविता में लाने का प्रयास किया। लेकिन निराला-प्रेमियों ने उसे एक नक़ल-भर मान उन्हें असफल ग़ज़लकार घोषित कर दिया। सच्चाई यह कि आज हिन्दी में जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, उनके पुरस्कर्ता भी निराला ही हैं। ये ग़ज़लें मुसलसल ग़ज़लें हैं। मैं स्थानाभाव में उनकी एक ग़ज़ल का एक शे’र ही उद्धृत कर रहा हूँ :
तितलियाँ नाचती उड़ाती रंगों से मुग्ध कर-करके,
प्रसूनों पर लचककर बैठती हैं, मन लुभाया है।
Assi Ghat Ka Bansuri Wala
- Author Name:
Tajendra Singh Luthra
- Book Type:

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Description:
चाहता हूँ/अकेला हो जाऊँ/कोई
आसपास न रहे/ज्यादा देर तक/
आए और चला जाए/अपने आप।
तजेन्दर सिंह लूथरा की कविताओं में ‘अनायासता’ का यह स्वर कई स्तरों पर दिखाई पड़ता है। वे सायास कवि नहीं होना चाहते; न आई हुई कविता को अतिरिक्त प्रयास से गढ़ने-बनाने की कोशिश करते हैं; सामने से गुजरते हुए जीवन व संसार की जिस-जिस छवि को पकड़ते हैं, उसे हूबहू उसी रूप में पाठक के सामने रखने की उनकी इच्छा ही उनकी काव्य-कला है। इसके चलते कई बार अनुभूतियों के जो बिम्ब कुछ अनगढ़ रूप में दिखाई पड़ते हैं, वे दरअसल एक भीतरी तराश का ऊपरी आवरण हैं, जो पाठक को धीरे-धीरे अपने भीतर उतरने के लिए आमंत्रित करते हैं।
घर से लेकर महानगर तक के विस्तार में विचरण करती उनकी काव्य-संवेदना जीवन की हर उस विकलता का नोटिस लेती है, जिसका प्रभाव मनुष्य की नियति पर पड़ता है या पड़ सकता है। संग्रह में शामिल कविता ‘मुझे जीने दो’ की यह पंक्ति ‘मैं इतना सार्वजनिक हो गया/कि मुझे मेरे सिवा सब पहचानने लगे थे।’ सार्वजनिक स्पेस की आक्रामकता के बीच मौजूद व्यक्ति की पीड़ा का अचूक रेखांकन है।
यह कवि का पहला कविता-संग्रह है, लेकिन कविता-प्रेमियों के लिए उनका कवि-व्यक्तित्व और उनकी कविताएँ अपरिचित नहीं हैं। इस संग्रह में शामिल ‘अस्सी घाट का बाँसुरी वाला’, ‘जैसे माँ ठगी गई थी’ और ‘एक साधारण शवयात्रा’ जैसी कविताओं ने बराबर सुधी पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है; और अपनी नवीन दृष्टि और पर्यवेक्षण के चलते उनकी याददाश्त में स्थायी जगह बनाई है।
उम्मीद है, कविता का यह नया रंग पाठकों को ताजगी प्रदान करेगा।
Anima
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

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Description:
पंडित नन्ददुलारे वाजपयी ने लिखा है कि हिन्दी में सबसे कठिन विषय निराला का काव्य-विकास है। इसका कारण यह है कि उनकी संवेदना एक साथ अनेक स्तरों पर संचरण ही नहीं करती थी, प्रायः एक संवेदना दूसरी संवेदना से उलझी हुई भी होती थी। इसका सबसे बढ़िया उदहारण उनका 'अणिमा' नमक कविता-संग्रह है।
इसमें छायावादी सौन्दर्य-स्वप्न को औदात्य प्रदान करनेवाला गीत 'नुपुर के सुर मन्द रहे, जब न चरण स्वच्छन्द रहे' जैसे आध्यात्मिक गीत हैं, तो 'गहन है यह अन्धकरा' जैसे राष्ट्रीय गीत भी। इसी तरह इसमें 'स्नेह-निर्झर बह गया है' जैसे वस्तुपरक गीत भी। कुछ कविताओं में निराला ने छायावादी सौन्दर्य-स्वप्न को एकदम मिटाकर नए कठोर यथार्थ को हमारे सामने रखा है, उदाहरणार्थ—'यह है बाज़ार', 'सड़क के किनारे दूकान है', 'चूँकि यहाँ दाना है' आदि कविताएँ। 'जलाशय के किनारे कुहरी थी' प्रकृति का यथार्थ चित्रण करनेवाला एक ऐसा विलक्षण सानेट है, जो छन्द नहीं; लय के सहारे चलता है ।
उपर्युक्त गीतों और कविताओं से अलग 'अणिमा' में कई कविताएँ ऐसी हैं जो वर्णात्मक हैं, यथा—'उद्बोधन', 'स्फटिक-शिला' और 'स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज', ये कविताएँ वस्तुपरक भी हैं और आत्मपरक भी। लेकिन इनकी असली विशेषता यह है कि इनमें निराला ने मुक्त-छन्द का प्रयोग किया है जिसमें छन्द और गद्य दोनों का आनन्ददायक उत्कर्ष देखने को मिलता है।
आज का युग दलितोत्थान का युग है। निराला ने 1942 में ही 'अणिमा' के सानेट—'सन्त कवि रविदास जी के प्रति'—की अन्तिम पंक्तियों में कहा
था : 'छुआ परस भी नहीं तुमने, रहे/कर्म के अभ्यास में, अविरल बहे/ज्ञान-गंगा में, समुज्ज्वल चर्मकार, चरण छूकर कर रहा मैं नमस्कार’।
—नंदकिशोर नवल
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