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शहरयार ने अपनी शायरी में जिस सादगी के साथ आज के इंसान की तकलीफ़ और दुःख-दर्द का बयान किया है वो अपने आप में एक मिसाल है। उन्होंने उर्दू शायरी के क्लासिकी रंग को बरक़रार रखते हुए जिस तरह आधुनिक वक़्त की समस्याओं का चित्रण अपनी शायरी में किया है वो क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। प्रस्तुत किताब में नुमाइन्दा शायर शहरयार की कुल्लियात से उनकी चुनिन्दा ग़ज़लों, नज़्मों और फ़िल्मी नग़मों को शामिल किया गया है। यह किताब देवनागरी लिपि में आ रही है और इसका संकलन फ़रीदून शहरयार ने किया है। नई नस्ल के पाठकों को ये किताब काफ़ी पसंद आने वाली है। "शहरयार उर्दू के अग्रणी आधुनिक शायरों में शामिल हैं और बतौर गीतकार , 'फ़िल्म उमराव जान', के गीतों के लिए मशहूर हैं। शहरयार अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिन्द) अलीगढ़ में लिटरेरी सहायक भी रहे और अंजुमन की पत्रिकाओं 'उर्दू दब' और 'हमारी ज़बान' के संपादक के तौर पर भी काम किया। उनकी किताब 'ख़्वाब के दर बंद हैं ' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड से भी नवाज़ा गया। शहरयार साहब फ़िराक़ गोरखपुरी, कुर्रतुलऐन हैदर, और अली सरदार जाफ़री के बाद चौथे ऐसे उर्दू साहित्यकार हैं जिन्हे ज्ञानपीठ सम्मान भी मिला। उर्दू शायरी में अहम भूमिका निभाने के लिए उन्हें और भी कई ख़िताब दिए गए हैं जिनमें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, फ़िराक़ सम्मान, और दिल्ली उर्दू पुरस्कार प्रमुख हैं। संग-ए-मील पब्लिकेशंस, पाकिस्तान से उनका कुल्लियात प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी शायरी के छ: संग्रह शामिल हैं । यही कुल्लियात 'सूरज को निकलता देखूँ' के नाम से भारत से भी प्रकाशित हो चुका है। उनके कलाम का अनुवाद फ्रेंच, जर्मन, रूसी, मराठी, बंगाली और तेलगू में हो चुका है। "
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शहरयार ने अपनी शायरी में जिस सादगी के साथ आज के इंसान की तकलीफ़ और दुःख-दर्द का बयान किया है वो अपने आप में एक मिसाल है। उन्होंने उर्दू शायरी के क्लासिकी रंग को बरक़रार रखते हुए जिस तरह आधुनिक वक़्त की समस्याओं का चित्रण अपनी शायरी में किया है वो क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। प्रस्तुत किताब में नुमाइन्दा शायर शहरयार की कुल्लियात से उनकी चुनिन्दा ग़ज़लों, नज़्मों और फ़िल्मी नग़मों को शामिल किया गया है। यह किताब देवनागरी लिपि में आ रही है और इसका संकलन फ़रीदून शहरयार ने किया है। नई नस्ल के पाठकों को ये किताब काफ़ी पसंद आने वाली है। "शहरयार उर्दू के अग्रणी आधुनिक शायरों में शामिल हैं और बतौर गीतकार , 'फ़िल्म उमराव जान', के गीतों के लिए मशहूर हैं। शहरयार अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिन्द) अलीगढ़ में लिटरेरी सहायक भी रहे और अंजुमन की पत्रिकाओं 'उर्दू दब' और 'हमारी ज़बान' के संपादक के तौर पर भी काम किया। उनकी किताब 'ख़्वाब के दर बंद हैं ' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड से भी नवाज़ा गया। शहरयार साहब फ़िराक़ गोरखपुरी, कुर्रतुलऐन हैदर, और अली सरदार जाफ़री के बाद चौथे ऐसे उर्दू साहित्यकार हैं जिन्हे ज्ञानपीठ सम्मान भी मिला। उर्दू शायरी में अहम भूमिका निभाने के लिए उन्हें और भी कई ख़िताब दिए गए हैं जिनमें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, फ़िराक़ सम्मान, और दिल्ली उर्दू पुरस्कार प्रमुख हैं। संग-ए-मील पब्लिकेशंस, पाकिस्तान से उनका कुल्लियात प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी शायरी के छ: संग्रह शामिल हैं । यही कुल्लियात 'सूरज को निकलता देखूँ' के नाम से भारत से भी प्रकाशित हो चुका है। उनके कलाम का अनुवाद फ्रेंच, जर्मन, रूसी, मराठी, बंगाली और तेलगू में हो चुका है। "
Book Details
-
ISBN9789394494213
-
Pages174
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हमारे दौर की कविता के बारे में कभी-कभी एक आलोचना यह भी सुन पड़ती है कि ज़्यादातर कवियों के पहले कविता-संग्रह ही उनके सबसे अच्छे संग्रह साबित होते हैं, दूसरे संग्रहों तक आते-आते उनका प्रकाश मन्द हो जाता है, यथार्थ की काली गहराइयों में जाकर उनकी लालटेनें बुझने लगती हैं। इस बात में अगर कोई सचाई है तो कुमार अंबुज को उसके अपवाद की तरह देखा जा सकता है। अंबुज का पहला कविता-संग्रह 1992 में प्रकाशित हुआ था और सिर्फ़ दस वर्ष के अन्तराल में उनके चौथे संग्रह का छपना सबसे पहले यह बतलाता है कि इस कवि के पास कहने के लिए बहुत कुछ है : निरवधि काल और विपुल पृथ्वी है, बल्कि एक पूरा सौरमंडल है, निर्वात और सघन पदार्थों में से गुज़रना उसका रोज़ का काम है। वायुमंडल की सैर करते-करते वह ग्रह-नक्षत्रों को खँगाल लेता है, मंगल ग्रह के लोहे को अपने शरीर और रक्त में महसूस करता है और अन्तत: अपनी पृथ्वी पर लौट आता है। इस अछोर कायनात को खोजने-जानने के लिए कुमार अंबुज के पास उतनी ही विस्तृत भाषा भी है जिस पर उन्हें इतना विश्वास है कि एक कविता में वे ‘भाषा से परे का यह दुर्गम पहाड़’ भी ‘भाषा की लाठी के सहारे ही’ पार करना चाहते हैं। इस संग्रह की पहली और बीज-कविता जैसी रचना में वे ख़ुद को एक ऐसे पुराने ताँबे के पात्र की तरह देखते हैं जिसे कोई ‘इतिहास की राख से माँजता है’ और ‘एक शब्द माँजता है मुझे/एक पंक्ति माँजती रहती है/अपने खुरदुरे तार से।’
जीवन और कविता की उदात्तता को कुमार अंबुज बार-बार रचते हैं, प्राय: उसका एक नया स्थापत्य बनाने की कोशिश करते हैं लेकिन इतना-भर इस कविता का अभीष्ट नहीं है, बल्कि एक महाविमर्श के छोटे-छोटे ब्योरों, उसके बारीक ताने-बाने में प्रवेश करते हुए उसके अर्थों को खोजना ही उसकी मूल प्रतिज्ञा है और इसीलिए अंबुज यह देख पाते हैं कि ‘एक तारा टूटने से भी वीरान होता है आकाश’ और ‘इस एक के लिए/इस एक के विश्वास से/लड़ता हूँ हज़ारों से/इस एक की परवाह करता हूँ।’ एक महाजीवन के इसी ‘एक’ को लेकर कुमार अंबुज के सरोकार इतने व्यापक हैं कि वे ‘अभी-अभी दर्ज हुई एक नई ऋतु’ को ‘एक कीड़े के अपूर्व राग में गाते हुए’ सुन पाते हैं और यह संकल्प भी व्यक्त कर सकते हैं कि ‘यह एक कमज़ोर इच्छा है जिसकी चहलक़दमी की आवाज़/एक तानाशाह की इच्छा की आवाज़ से टकराती है।’ दरअसल इस एक का हालचाल जानने की तड़प ही कुमार अंबुज को अनेकता के सौरमंडल तक ले जाती है। अनेक कविताओं में वे जीवन का एक रूपक खड़ा करते प्रतीत होते हैं लेकिन सहसा उस रूपक को भेदकर उसके दारुण यथार्थ में प्रवेश कर जाते हैं।
एक मूलभूत सरलता से संश्लिष्टता की ओर कुमार अंबुज की यह यात्रा एक उल्लेखनीय अनुभव है जिसका साक्ष्य उनकी इन कविताओं की संरचना, उनके ख़ास पैटर्न में भी मिलता है। वे शुरू में प्राय: एक शान्त-सुन्दर प्रवेश-द्वार की तरह दिखती हैं लेकिन उसके खुलते ही जैसे एक जटिल यथार्थ के आयाम प्रकट होने लगते हैं, जहाँ ‘ग़रीब की बुदबुदाहट का अनुवाद’ कुछ इस तरह होता है कि ‘लकड़ी का बुरादा भी जगा देता है मेरी भूख’ और ‘जीवन में एकदम ख़ाली’ एक दिन भी पूरे जीवन की गतिविधि में इतना स्पन्दित और स्मृति में इतना चिन्हित दिखता है कि उसे ‘न उम्र में से घटाया जा सकेगा/और जोड़कर देखने में होगा एक अपराध।’ यह एक लगभग सिनेमाई शिल्प है जिसमें एक सुन्दर शुरुआत एक विरूप विस्तार की ओर जा सकती है, एक प्रतीक, एक अमूर्तन हमें एक यथार्थपरक और ठोस संसार में ले जाता है, फिर सहसा अपने मूल बिम्ब में लौटता है और दूसरी वास्तविकता की ओर बढ़ने लगता है। इस संग्रह की एक कविता ‘रेखागणित’ अंबुज की इस काव्य-प्रविधि का उकृष्ट उदाहरण है जिसमें एक सीधी-सरल रेखा के गणित में एक पूरे जीवन को, उसके आश्चर्यों और रोमांचों, उसकी निश्छलता और ऐन्द्रियता को, उसके न्याय और अन्याय की परस्पर न मिलनेवाली समान्तर लकीरों को अन्तत: इस उम्मीद के साथ देखा गया है कि ‘वहीं कहीं छिपा हो सकता है/ज़िन्दगी को आसान कर सकनेवाला प्रमेय।’
किसी भी रचनाकार के लिए अपने शिल्प को लाँघना कठिन काम होता है, लेकिन अंबुज की संवेदना अपने कथ्य के अनुरूप शिल्प सहजता से उपलब्ध कर लेती है, क्योंकि एक समृद्ध काव्य-भाषा उनका सबसे कारगर औज़ार है। इसीलिए ‘रेखागणित’, ‘चुम्बक’, ‘जीवाश्म’, ‘मेढक’, ‘मुर्गी’, ‘हस्तलिपि’ जैसे नए अनुभवों की मार्मिक शक्लें निर्मित होती हैं और ‘एक कम है’, ‘अतिक्रमण’, ‘मानकीकरण’, ‘मैं एक आततायी को जानता हूँ’, ‘कवि व्याप्ति’, ‘कला का कोना’, ‘भाषा से परे’, ‘एक और शाम’ और ‘मध्यवर्गीय ओट’ जैसी किंचित् परिचित भावभूमि के अपरिचित आयाम खुलते हैं। करुणा और नैतिकता, जो कि कविता के स्थायी-अपरिवर्तनीय सुर हैं, जैसे अंबुज की कविताओं में ताने-बाने की तरह मौजूद हैं—इसीलिए ‘असाध्य रोग’ में सहज, गद्यात्मक लोकोक्ति जैसी बात को वे विचलित करनेवाले तरीक़े से लिख सकते हैं : ‘आँसुओं से कोई दवा तैयार हो सकती होती/तो कोई रोग असाध्य नहीं रह जाता।’ ‘पगडंडी’ कविता बताती है कि ‘जब सारी दुनिया चमकदार सड़कों से भर जाएगी, तब भी एक राह को दूसरी राह से जोड़ती पगडंडी बची रहेगी।’ कुमार अंबुज ख़ुद किसी राजमार्ग पर नहीं, बल्कि कविता की एक पगडंडी पर चलते उसी हाशिये, उसी किनारे से राजमार्गों के जाल को देखते आए हैं, क्योंकि न्याय और अन्याय की समान्तर रेखाएँ भले ही आपस में न मिलें, अन्याय का प्रतिरोध और न्याय की प्रतिष्ठा इसी राह से सम्भव है।
Swadhinata, Pyar : Sándor Petőfi Ki Kavitayein
- Author Name:
Sándor Petőfi
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हंगरी में बच्चे माँ-पिता, खाना-पीना आदि शब्दों के बाद जो शब्द सबसे पहले सीखते हैं, वह है पैतोफ़ी–कवि। उनकी भाषा में शान्दोर पैतोफ़ी, कवि एवं कवि-कर्म के पर्याय हैं। हंगरी के यह अमर कवि हंगरी को आस्ट्रियाई साम्राज्य से मुक्त कराने का आह्वान करते हुए स्वयं रणभूमि में कूद पड़े थे और मात्र 26 वर्ष की आयु में शहीद हो गए थे। वह 1848 का दौर था, जब लगभग सारे यूरोप में राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए क्रान्तियाँ हो रही थीं।
2022 में पैतोफ़ी के जन्म के 200 बरस पूरे हो रहे हैं। इतनी कम उम्र में और लगभग सात साल की अवधि में ही, पैतोफ़ी ने हंगारी साहित्य को कविता, लोकगीत, नाट्य रूपक, पत्र और अनेक महाकाव्यों की जो भेंट दी, उसने हंगारी भाषा और साहित्य में भी अनेक क्रान्तियों की नींव रख दी।
‘स्वाधीनता, प्यार’ में संकलित कविताएँ दर्शाती हैं कि इस आधुनिक कवि ने मूलत: लोकवाणी और लोकगीतों की शैली में निजी, सामाजिक, राजनीतिक, पारिवारिक और सौन्दर्य-प्रेम-मस्ती के कितने-कितने आयामों में प्रवेश किया था। पैतोफ़ी का रचना संसार नृत्य, संगीत, फ़िल्म, काव्य आदि की अजस्र धाराएँ आज भी प्रवाहित कर रहा है।
इन कविताओं में अनुभूति, कल्पना, विचार, आशा-निराशा आदि अनेक भावनाओं का समागम है। विनोद, कटाक्ष, खिलन्दड़ापन, दीवानगी-मस्ती के साथ-साथ, स्वाधीनता के अडिग सेनानी की दृष्टि सामाजिक विषमताओं को उघाड़ती चलती है–दुनिया को एक बेहतर, मानवीय दुनिया बनाने का आह्वान करते हुए।
Taki Vasant Mein Khil Saken Phool
- Author Name:
Kapilesh Bhoj
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collection of poems
Sukh Ko Bhi Dukh Hota Hai
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Shruti Kushwaha
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श्रुति की कविता का मानवीकरण किया जाए तो वह दिखेगी कच्ची लकड़ी के धुएँ से घिरी उस स्त्री की तरह जो जीवन का बुझता चूल्हा पूरे प्राणपण से फूँके जा रही है। कभी इधर से उचकुन लगाती, कभी उधर से यानी कभी इस ध्रुवान्त से, कभी उस ध्रुवान्त से और अन्त में उसकी धौंकनी देखती है कि आग तो दोनों ध्रुवान्तों के बीच से निकलती ऊर्ध्वमुखी हुई जा रही है। न इस अतिरेक में, न उसमें बल्कि उस सम्यक् दृष्टि में जो बुद्ध और गांधी की है : ‘जिन्होंने दुख दिया/उनके लिए अतिरिक्त उदार’, ‘जब भी मिलूँ ख़ुद से, आँखें नीची न हों’, ‘छोड़ना सबसे आसान हो जब, तब रोक लेना उसे’, ‘कड़वी बात निगल जाएँ बुख़ार की गोली की तरह’—इस तरह के कई आप्त वाक्य मिलेंगे इस संग्रह में जो यह सिद्ध करते हैं कि वैयक्तिक नैतिकता में इनकी आस्था है और ये बख़ूबी समझती हैं कि स्वयं में आचरणगत परिवर्तन घटित किए बिना कोई स्थायी परिवेशगत परिवर्तन असम्भव है। इस महीन प्रज्ञा पारमिता के बिना जीवन का गम्भीर सत्य अदेखा ही छूट जाता है—‘माँ की कोख’ और ‘पेड़ की जड़ों’ की तरह। जो भी ‘बत्तीस दिसम्बर’ को घटना है, यानी कि कभी नहीं घटना, उस बदलाव में और जो ‘रेगुलेटर’ से मौसम सँवारता है, उस परिवर्तन में कवि की आस्था नहीं है। वह हैरान है यह देखकर कि दुनिया ने चकित होना छोड़ दिया है, जबकि उसके लिए तो प्रकृति से निःशब्द ध्वनियाँ सीखने का सिलसिला ख़त्म ही नहीं होता। तभी तो उसके लिए पूरी पृथ्वी ही प्रेमपत्र है। वाक् संयम और कुछ प्रसिद्ध कविताओं से अन्तःपाठीय संवाद इस संग्रह को एक अलग खनक देते हैं। —अनामिका
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