Gulshan

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Language:

Hindi

Category:

Poetry

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प्रस्तुत किताब में प्रसिद्ध उर्दू शाइर मुज़्तर ख़ैराबादी का चुनिन्दा कलाम संकलित है। यह किताब देवनागरी और उर्दू लिपि में प्रकाशित हुई है और पाठकों के बीच ख़ूब पसंद की गई है| सय्यद इफ़्तिख़ार हुसैन मुज़्तर ख़ैराबादी 1869 में, ज़िला सीतापूर (उत्तर प्रदेश) के मश्हूर क़स्बे ख़ैराबाद के, विद्वानों के घराने में पैदा हुए। शिक्षा-दीक्षा उनकी माँ ने की, जो अरबी, फ़ारसी और उर्दू की विद्वान और शाइ’रा थीं। ‘मुज़्तर’ अपनी शुरू’ की शाइ’री अपनी माँ ही को दिखाते थे, मगर बा’द में ‘अमीर’ मीनाई को उस्ताद बनाया, हालाँकि ये उस्तादी सिर्फ़ एक ग़ज़ल तक सीमित थी। ‘मुज़्तर’ ने टोंक, ग्वालियर, रामपूर, भोपाल और इंदौर के रजवाड़ों और रियासतों में नौकरियाँ कीं। मश्हूर शाइ’र और फ़िल्म-गीतकार जाँ-निसार अख़्तर उनके बेटे थे और फिल्म-कथाकार, गीतकार और शाइ’र जावेद अख़्तर उनके पोते हैं।

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ISBN
9788193960936
Pages
310
Avg Reading Time
10 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

प्रस्तुत किताब में प्रसिद्ध उर्दू शाइर मुज़्तर ख़ैराबादी का चुनिन्दा कलाम संकलित है। यह किताब देवनागरी और उर्दू लिपि में प्रकाशित हुई है और पाठकों के बीच ख़ूब पसंद की गई है|

सय्यद इफ़्तिख़ार हुसैन मुज़्तर ख़ैराबादी 1869 में, ज़िला सीतापूर (उत्तर प्रदेश) के मश्हूर क़स्बे ख़ैराबाद के, विद्वानों के घराने में पैदा हुए। शिक्षा-दीक्षा उनकी माँ ने की, जो अरबी, फ़ारसी और उर्दू की विद्वान और शाइ’रा थीं। ‘मुज़्तर’ अपनी शुरू’ की शाइ’री अपनी माँ ही को दिखाते थे, मगर बा’द में ‘अमीर’ मीनाई को उस्ताद बनाया, हालाँकि ये उस्तादी सिर्फ़ एक ग़ज़ल तक सीमित थी। ‘मुज़्तर’ ने टोंक, ग्वालियर, रामपूर, भोपाल और इंदौर के रजवाड़ों और रियासतों में नौकरियाँ कीं। मश्हूर शाइ’र और फ़िल्म-गीतकार जाँ-निसार अख़्तर उनके बेटे थे और फिल्म-कथाकार, गीतकार और शाइ’र जावेद अख़्तर उनके पोते हैं।

Book Details

  • ISBN
    9788193960936
  • Pages
    310
  • Avg Reading Time
    10 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Gulshan brings the refined Urdu poetry of Muztar Khairabadi (1865–) to readers who approach classical verse through the Devanagari script. Born Iftikhar Hussain in Khairabad, Muztar was the grandson of freedom fighter and scholar Fazl e Haq Khairabadi, and the father of lyricist Jaan Nisar Akhtar — making him the grandfather of Javed Akhtar. This edition transcribes his ghazals into Devanagari and attaches meanings to difficult words, lowering the threshold for Hindi readers who might otherwise find classical Urdu vocabulary impenetrable. The result is a bridge between two scripts and two reading communities, preserving the poet's delicate imagery and emotional cadence while expanding his audience. For readers curious about the poetic lineage behind modern Hindi cinema's most celebrated lyrics, Gulshan offers a rare glimpse into the aesthetic roots of that tradition.

गुलशन पढ़ने से मुझे किस तरह का काव्यानुभव मिलेगा?

यह संग्रह आपको शास्त्रीय उर्दू ग़ज़ल की कोमल भावनाओं और सूक्ष्म बिम्बों से परिचित कराएगा। मुज़्तर ख़ैराबादी की शायरी धीमी गति से खुलती है और हर शेर में एक अलग मनोभाव छुपा है। देवनागरी लिपि और शब्दार्थों की मदद से आप बिना रुके उनकी भाषा की बारीकियों का आनंद ले सकेंगे।

यह किताब किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?

  • जो पाठक शास्त्रीय उर्दू शायरी में रुचि रखते हैं पर उर्दू लिपि नहीं पढ़ सकते
  • जो हिंदी सिनेमा के गीतों की जड़ों को समझना चाहते हैं
  • जो ख़ैराबादी परिवार की साहित्यिक विरासत से परिचित होना चाहते हैं
  • जो शुरुआती पाठक हैं और शब्दार्थों के साथ ग़ज़ल पढ़ना सीखना चाहते हैं

यह संग्रह आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?

यह किताब उस साहित्यिक परंपरा को जीवित रखती है जो उत्तर प्रदेश के ख़ैराबाद जैसे केंद्रों से निकली और आज के फ़िल्मी गीतों तक पहुंची। मुज़्तर ख़ैराबादी की शायरी उस युग की याद दिलाती है जब उर्दू और हिंदी एक साझा काव्य-संस्कृति का हिस्सा थे। देवनागरी में यह उपलब्धता दोनों भाषाओं के बीच सेतु बनाती है।

मुज़्तर ख़ैराबादी का काव्य-स्वर किस तरह विशिष्ट है?

मुज़्तर की शायरी में शब्दों का चयन सरल और भावनाओं का प्रवाह सहज है। वे अपनी पारिवारिक विद्वता को भारी भरकम भाषा में नहीं बल्कि सुगम अभिव्यक्ति में ढालते हैं। उनके शेरों में प्रेम, विरह और आध्यात्मिकता का संतुलन है जो पाठक को बिना थकाए गहराई में ले जाता है।

यह किताब पाठक के मन में क्या छोड़ जाती है?

यह संग्रह आपको एक ऐसे काव्य-परिवार की झलक देता है जिसने भारतीय फ़िल्मी गीतों को आकार दिया। किताब ख़त्म होने के बाद भी आप मुज़्तर की कोमल भाषा और उनके शेरों की गूंज महसूस करेंगे। यह आपको उर्दू शायरी की परंपरा के प्रति सम्मान और जिज्ञासा से भर देती है।

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