GuldastaeQawwali (Hindustani Sufi Kalam Sangrah)
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This is a handpicked volume of Persian Sufi Qawwali’s by Suman Mishra. Sufi poetry has enormous impact throughout the subcontinent, and it has played a vital role in maintaining communal harmony in the turbulent times. Sufi poetry sends message of love, peace, understanding and fellowship, and it teaches us how to seek Love Divine. Qawwali’s are originally performed at Sufi shrines and dargahs throughout the subcontinent, and it would not be an exaggeration to say that they have played a vital role in propagation of Sufi poetry across the region. Suman Mishra has handpicked some of the best Persian Sufi Qawwalli’s and compiled them in this book in Devanagri script. This is a unique collection of Sufi Kalaam, which helps a reader to get close to ancient Sufi culture.
Read moreAbout the Book
This is a handpicked volume of Persian Sufi Qawwali’s by Suman Mishra. Sufi poetry has enormous impact throughout the subcontinent, and it has played a vital role in maintaining communal harmony in the turbulent times. Sufi poetry sends message of love, peace, understanding and fellowship, and it teaches us how to seek Love Divine. Qawwali’s are originally performed at Sufi shrines and dargahs throughout the subcontinent, and it would not be an exaggeration to say that they have played a vital role in propagation of Sufi poetry across the region. Suman Mishra has handpicked some of the best Persian Sufi Qawwalli’s and compiled them in this book in Devanagri script. This is a unique collection of Sufi Kalaam, which helps a reader to get close to ancient Sufi culture.
Book Details
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ISBN9788193968161
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Pages390
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Avg Reading Time13 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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जदीद उर्दू ग़ज़ल के नुमाइन्दा शायर ज़ेब ग़ौरी (ख़ान अहमद हुसैन ख़ाँ) 1930 में कानपुर में ख़ान अनवर हुसैन ख़ाँ के घर पैदा हुए। उन्होंने क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर से बी.ए. पास किया और उस्ताद साक़िब कानपुरी से शायरी की बारीकियाँ सीखीं। उन्होंने पहले कानपुर के ही विक्टोरिया मिल में अफ़सर के पद पर और उसके बाद सऊदी एयरलाइंस में प्रशासक के पद पर काम किया। ज़ेब ग़ौरी की शायरी में इस्तिआरे, अलामतें, फ़िक्र की पेचीदगी और अल्फ़ाज़ का तख़लीक़ी इस्तेमाल अपने पूरे रंग में नज़र आता है। उनकी शायरी के मुरीद हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में मौजूद हैं और उनके उस्लूब को सरहद के दोनों तरफ़ के शायरों और आलोचकों ने ख़ूब सराहा है। उनका पहला ग़ज़ल-संग्रह “ज़र्द ज़रखेज़” अक्टूबर 1976 में शब-ख़ून किताबघर, इलाहाबाद से शाए हुआ। 1 अगस्त, 1985 को उन्होंने कराची, पाकिस्तान में आख़िरी साँस ली। उनके इन्तिक़ाल के फ़ौरन बाद 1985 ही में उनकी दो और किताबें “चाक” कराची से और “ज़रताब” कानपुर, हिन्दुस्तान से शाए हुईं।
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