Sri Basavannanavara Vachana Sangraha
(0)
₹
155
₹ 128.65 (17% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಹನ್ನೆರಡನೆಯ ಶತಮಾನದಲ್ಲಿ ನಡೆದ ಸಾಮಾಜಿಕ ಆಂದೋಲನ ಒಂದು ವಿಶಿಷ್ಟ ಬಗೆಯದ್ದೂ, ಅಪರೂಪದ್ದೂ ಆಗಿದೆ. ಆ ಕಾಲಘಟ್ಟದ ಧ್ರುವತಾರೆಯಂತೆ ಪ್ರಜ್ವಲಿಸಿದ ವ್ಯಕ್ತಿ ಶ್ರೀ ಬಸವೇಶ್ವರ. ಆಗಿನ ಭಾಷಾಪ್ರಯೋಗ ಮತ್ತು ಕಾವ್ಯಸಿದ್ದಿ ಕನ್ನಡ ಭಾಷೆಯ ಸುದೀರ್ಘ ಪ್ರವಾಹಕ್ಕೆ ಇದ್ದಕ್ಕಿದ್ದಂತೆ ಒಂದು ಮುಖ್ಯ ತಿರುವನ್ನು ಕೊಟ್ಟು ಕಾಲವನ್ನು ನುಂಗಿ ಇಪ್ಪತ್ತನೆಯ ಶತಮಾನದ ಕನ್ನಡ ಸೃಜನಶೀಲ ಭಾಷೆಯನ್ನೇ ಅಣಕಿಸುತ್ತಾ ಹೆಮ್ಮೆಯಿಂದ ಬೀಗುತ್ತಿದೆ. ಅದಕ್ಕೆ ಉದಾಹರಣೆ ಎಂಬಂತೆ ಈ ಕೃತಿಯಲ್ಲಿ ಸ. ಸ. ಮಾಳವಾಡ ಅವರು ಶ್ರೀ ಬಸವೇಶ್ವರರ ವಚನಗಳನ್ನು ಸಂಗ್ರಹಿಸಿ ಕೊಟ್ಟಿದ್ದಾರೆ.
Read moreAbout the Book
ಕರ್ನಾಟಕದಲ್ಲಿ ಹನ್ನೆರಡನೆಯ ಶತಮಾನದಲ್ಲಿ ನಡೆದ ಸಾಮಾಜಿಕ ಆಂದೋಲನ ಒಂದು ವಿಶಿಷ್ಟ ಬಗೆಯದ್ದೂ, ಅಪರೂಪದ್ದೂ ಆಗಿದೆ. ಆ ಕಾಲಘಟ್ಟದ ಧ್ರುವತಾರೆಯಂತೆ ಪ್ರಜ್ವಲಿಸಿದ ವ್ಯಕ್ತಿ ಶ್ರೀ ಬಸವೇಶ್ವರ. ಆಗಿನ ಭಾಷಾಪ್ರಯೋಗ ಮತ್ತು ಕಾವ್ಯಸಿದ್ದಿ ಕನ್ನಡ ಭಾಷೆಯ ಸುದೀರ್ಘ ಪ್ರವಾಹಕ್ಕೆ ಇದ್ದಕ್ಕಿದ್ದಂತೆ ಒಂದು ಮುಖ್ಯ ತಿರುವನ್ನು ಕೊಟ್ಟು ಕಾಲವನ್ನು ನುಂಗಿ ಇಪ್ಪತ್ತನೆಯ ಶತಮಾನದ ಕನ್ನಡ ಸೃಜನಶೀಲ ಭಾಷೆಯನ್ನೇ ಅಣಕಿಸುತ್ತಾ ಹೆಮ್ಮೆಯಿಂದ ಬೀಗುತ್ತಿದೆ. ಅದಕ್ಕೆ ಉದಾಹರಣೆ ಎಂಬಂತೆ ಈ ಕೃತಿಯಲ್ಲಿ ಸ. ಸ. ಮಾಳವಾಡ ಅವರು ಶ್ರೀ ಬಸವೇಶ್ವರರ ವಚನಗಳನ್ನು ಸಂಗ್ರಹಿಸಿ ಕೊಟ್ಟಿದ್ದಾರೆ.
Book Details
-
ISBN9788126013850
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age11-18 yrs
-
Country of OriginIN
Recommended For You
Ek Ped Chhatnar
- Author Name:
Dinesh Kumar Shukla
- Book Type:

- Description:
दिनेश कुमार शुक्ल की कविता में जीवन और जन के राग का उत्सव है जो आश्चर्य नहीं कि अक्सर छन्द में आता है, नहीं तो छन्द की परिधि पर कहीं दूर-पास मँडराता हुआ। उनकी कविता समय की समूची दुखान्तिकी से परिचित है, उस पूरे अवसाद से भी जिसे समय ने अपनी उपलब्धि के रूप में अर्जित किया है, लेकिन वह उम्मीद की अपनी ज़मीन नहीं छोड़ती। कारण शायद यह है कि जन-जीवन, लोक-अनुभव और भाषा के भीतर निबद्ध जनसामान्य के मन की ताक़त की एक बड़ी पूँजी उनके पास है।
वृहत् विश्व-मानव-समाज की नियति के किसी एक हाथ में सिमट जाने की स्थिति पर व्यंग्यपूर्वक वे अगर कहते हैं कि 'आपकी अनुमति से ही आएँगे/सुख के बौर/आपकी सहमति से ही उठेगी/आँधी दु:ख की', तो स्पष्ट हो जाता है कि अपने समय के सब ख़तरों से वे बख़ूबी वाक़िफ़ हैं, लेकिन वे यह भी देख पा रहे हैं कि 'सब कुछ बिखरा हुआ पड़ा है/ध्वस्त पड़ी है सारी निर्मिति/किन्तु बचा है एक कंगूरा/साबुत सीधा सधा हुआ जो/ ताक रहा है आसमान को'। यही वह एक कंगूरा है जो सम्भवत: एक नए आरम्भ का प्रस्थान बिन्दु होगा जहाँ 'मुकुति-का-खिलइ-सहस-दल-कँवल/हँसइ-जीवन-नित-नूतन-धवल/बहइ-सर-सर-सर-झंझा-प्रबल/कि धँसकँइ-बड़ेन-बड़ेन-के-महल'। इन पंक्तियों में न सिर्फ़ एक भिन्न भविष्य के स्वप्न-नृत्य का नाद सुनाई देता है, बल्कि एक नए निर्माण का इरादा भी दिखाई देता है।
दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ अपनी भाषा-सामर्थ्य के लिए भी विशेष जानी गई हैं। उन्होंने अपना एक अलग रंग रचा है, और छन्द परम्परा को नई कविता में भिन्न कौशल से बरता है जो लोक-स्मृति, जन-गण की पीड़ाओं और मनुष्य की जिजीविषा की विभिन्न मुद्राओं से सम्पन्न इस संग्रह की कविताओं में भी देखा जा सकता है।
Padchaap
- Author Name:
Vivek Gupta
- Book Type:

- Description:
ज्ञान, संवेदना, दृष्टि और
विचार जैसे तत्त्वों के बावजूद कविता तब तक सम्भव नहीं होती है जब तक कि भीतर का गहरा
आवेग और जीवन से संपृक्त सूत्र उसमें विद्यमान नहीं होते और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि एक
अपरिभाषित विकलता उसमें नहीं आ जाती। विवेक गुप्ता के पहले संग्रह की ये कविताएँ अपने समय
के दबावों के बीच जीवित मनुष्य की विकलता की कविताएँ हैं। ये कवि होने की इच्छा से नहीं,
मनुष्य हो सकने की आकांक्षाजन्य रचनात्मकता से अपना उत्स पाती हैं। यही कारण है कि कवि
अपने अवसाद के क्षणों में भी, सर्जनात्मकता को सम्भव कर पाता है।
‘मोक्ष प्रश्न’ एवं ‘बुद्ध’ शृंखला की कविताएँ कई प्रश्नों को नए तरह से रखने में समर्थ हुई हैं। दर्शन
और जीवन के बीच उपस्थित रूढ़ि, अन्धश्रद्धा और अन्धविश्वास की वे स्थूल रूप में नहीं, उनके
सूक्ष्म विध्वंसकारी रूप में पहचान करती हैं। कवि की दृष्टि अपनी सहजता में जीवन के सौन्दर्य
को, जीवन की अमरता को चुन लेती है और चीज़ों की रहस्यात्मकता को व्यर्थ कर देती है। वहाँ
‘निर्वाण की आभा की चमक’ में अन्तर्निहित उपहास, काव्य-शक्ति का उदाहरण हो जाता है। इन
कविताओं में शोरगुल को संयम से बताने का धीरज है, चीज़ों को बहुत क़रीब से देखने का उपक्रम
है और वह दृढ़ता भी है जो ‘झंडा उठाए अकेले आदमी’ की सहायता को एक अनन्त जिजीविषा में
बदल देती
है।
यह सब नारेबाजी अथवा सतही राजनीतिक शब्दावली से नहीं, कवि की जीवन में निष्ठा और
प्रतिबद्धता से सम्भव हुआ है, इस बात के सूत्र इस संग्रह की कविताओं में बार-बार मिलते हैं। ‘वह
एक घर था ऐसा’, ‘जुलूस’, ‘विस्थापन’, ‘इस तरह थे हम वहाँ’ जैसी कविताएँ हमारे परिवार और
समाज में लगातार बढ़ती जा रही यंत्रणा और अलगाव की ट्रेजडी की गहन पड़ताल ही नहीं करतीं,
बल्कि ‘ऐसा नहीं होना चाहिए’—इस उत्कट इच्छा का भी प्रकटीकरण करती हुई चलती हैं। एक युवा
कवि के पहले ही संग्रह में भाषा का संयम, शब्दों से नए अर्थ ले सकने की क्षमता, एक पंक्ति से
दूसरी पंक्ति के बीच लम्बी दिखनेवाली कठिन दूरी तय करने का सहज सामर्थ्य और इन सबके बीच
की जगहों में कविता का रचाव देखना सुखद प्रतीति है। अपने समय की पहचान करने का
विश्वसनीय प्रयास भी इन कविताओं में है। ‘न्याय को सबसे क्रूर और ख़तरनाक हथियार में बदल60
देने’ वाले इस समय में ‘मृत्यु के भय के बीच प्रेम की सम्भावना’ को टटोलते हुए यह भी समझना
कि ‘अब वैसा कुछ भी नहीं है, जो जैसा दिखाई देता है’ और ‘अकेले पड़ते जाने की नियति को’
सर्वाधिक उल्लेखनीय भयावहता की तरह रेखांकित करना, कवि की गहरी दृष्टि और क्षमता का ही
प्रमाण है। नयापन और नएपन की खोज भी इन कविताओं को विचारणीय बनाती है।
विडम्बनाजन्य व्यंग्य के सहारे ‘प्रेम के टूटने’ को उपलब्धि कह देना एक नए तरीक़े को इंगित करता
है। उनकी अनेक कविताओं में कहन की नई कला और दीप्ति है। अपने से पूर्व की कविता की सुदीर्घ
परम्परा के सूत्र उनकी कविता में हैं और साथ ही वह प्राणवान प्रखरता भी, जिससे वे अपने तरह के
काव्यलोक का निर्माण करते दिखते हैं।
कविता के उत्सुक पाठक के रूप में मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि ये कविताएँ, इस दौर
में लिखी जा रही ढेर सारी कविता के बीच ‘सच्ची कविता’ की पहचान के संकट को हल करने में
सहायक होनेवाली कविताएँ हैं। यह संग्रह सब दूर एक रचनात्मक दबाव पैदा करेगा, यह उम्मीद भी
इन्हीं कविताओं से पैदा होती है।
—कुमार अंबुज
Ek Kahani Beech Me Hai
- Author Name:
Krishn Bihari Noor
- Book Type:

- Description:
Book is Awaiting its Description from Publisher
Prem Ki Umr Ke Chaar Padaav
- Author Name:
Manisha Kulshreshtha
- Book Type:

- Description:
Book
Pandit Ramprasad 'Bismil' (Mahakavya)
- Author Name:
Acharya Devendra Dev
- Book Type:

- Description:
"महाकाव्य विषयक लगभग सभी शास्त्र-सम्मत मानकों पर खरी उतरनेवाली, सोलह सर्गों में निबद्ध इस महनीय महाकाव्य-कृति ‘पं. रामप्रसाद बिस्मिल’, में महाकवि देव ने बिस्मिलजी के अग्निधर्मा व्यक्तित्व और उनके जुझारू, किंतु अत्यधिक संवेदनशील कृतित्व का सजीव चित्रण, अपनी पूरी क्षमता और प्राणवत्ता के साथ किया है। —प्रो. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’ अंतरराष्ट्रीय कवि एवं साहित्यकार वस्तुतः देवजी प्रसिद्ध से पूर्व सिद्ध कवि और महाकाव्यकार हैं। ‘पं. रामप्रसाद बिस्मिल’ महाकाव्य उनकी आत्मा की अमंद राष्ट्र-ज्योति की अनर्घ प्रस्तुति है। —प्रो.भगवान शरण भारद्वाज प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद् क्रांति के अमर पुरोधा ‘पं. रामप्रसाद बिस्मिल’ का भौतिक स्मारक, मेरे लाख प्रयत्न करके भी सरकार तो नहीं बनवा सकी, किंतु प्रस्तुत महाकाव्य के रूप में उनका ‘साहित्यिक स्मारक’ आचार्य देवेंद्र देव ने मेरे जीवनकाल में ही रचकर मुझे दे दिया है। —डॉ. मदनलाल वर्मा ‘क्रांत’ कवि एवं साहित्यकार संपूर्ण महाकाव्य में भावों का अनुगमन करती भाषा, अलकनंदा की अजस्र जलधारा की भाँति मंथर गति से चित्त को बहाती चलती है। हिंदी-जगत् खड़े होकर इस महाकाव्य का करतल ध्वनि से स्वागत करेगा। —प्रो मंगला रानी विद्वान् शिक्षाविद्"
Yakshini
- Author Name:
Vinay Kumar
- Book Type:

- Description:
ऐसा कहते हैं हठयोगी और युंग भी कि आदमी का वजूद, उसकी स्मृतियाँ, खासकर जातीय स्मृतियाँ, एक परतदार शिला की तरह उसके अवचेतन के मुँह पर सदियों पड़ी रहती हैं। फिर अचानक कोई ऐसा क्षण आता है कि शिला दरकती है, हहाता हुआ कुछ उमड़ आता है बाहर और कूल-कछार तोड़ता हुआ सारा आगत-विगत बहा ले जाता है। शेष रहता है एक संदीप्त वर्तमान और उस पर पाँव और चित्त टिकाकर कोई खड़ा रह गया तो उसकी बूँद समुद्र हो जाती है यानी अगाध हो जाती है उसकी चेतना ।
ऐसा लगता है कि अपने डॉ. विनय सचमुच ही प्रत्यभिज्ञा के किसी विराट एहसास से गुजरे हैं। जिन बारह आर्किटाइपों की बात युग कहते हैं-योद्धा, प्रेमी, संन्यासी, सेवा-निपुण, अभियानी, जादूगर, विदूषक, नियोजक, द्रष्टा, भोला-भंडारी, विद्रोही वगैरह, उनमें इनका वाला आर्किटाइप प्रेमी-संन्यासी विद्रोही तीनों की मिट्टी मिलाकर बना होगा जैसा कि सर्जकों का अक्सर होता है।
एक क्षीण कथा-वृत्त के सहारे तीन मुख्य किरदार कौंधते हैं-रानी, उसकी अनुचरी यक्षी और वह शिल्पी जो आया तो था रानी का उद्यान तरह-तरह की मूर्तियों से सजाने पर यक्षी की छवि उसके भीतर के पानियों में उसके जाने-अनजाने, चाहे अनचाहे ऐसी उतरी कि सबसे बड़ी शिला पर उसी की मूर्ति उत्कीर्ण हो गई। ईर्ष्या-दग्ध रानी की तलवार उसका एक हाथ काट तो गई पर फिर सदियों बाद जब भग्न मूर्ति के आश्रय उसकी स्मृतियाँ जगीं तो उमड़ पड़ा पचासी बन्दों का सजग आत्म-निवेदन इसकी सान्द्रता, त्वरा और चित्रात्मकता डी.एच. लॉरेन्स के मैन-वुमन-कॉस्मॉस वाले उस अभंग गुरुत्वाकर्षण की याद दिला देती है जिसका आवेग हिन्दी की कुछ और लम्बी कविताओं में कल-कल छल-छल करके बहता दिखाई देता है (जैसे कि उर्वशी, कनुप्रिया, मगध, बाघ आदि में)।
Hajra Ka Burqa Dheela Hai
- Author Name:
Dr. Tabassum Jahan
- Book Type:

- Description:
हाजरा का बुर्का ढीला है', डॉ. तबस्सुम जहान की एक आकर्षक हिंदी साहित्यिक कृति है। इस सोच-समझकर तैयार की गई किताब में एक कलात्मक आवरण है, जो शरद ऋतु के रंगों की एक गर्म, अलौकिक पृष्ठभूमि के खिलाफ एक सुंदर सिल्हूट को दर्शाता है। सुंदर हिंदी टाइपोग्राफी और सौंदर्यपूर्ण डिजाइन तत्व कथा विषयों के साथ सहजता से मिश्रित होते हैं। साहित्य के प्रति उत्साही और कविता प्रेमियों के लिए बिल्कुल सही, यह पुस्तक आपके संग्रह में एक सार्थक वृद्धि का वादा करती है।
Dakchal Samay Par Rekh
- Author Name:
Krishnamohan Jha 'Mohan'
- Book Type:

- Description:
कृष्णमोहन झा 'मोहन' जीवनक जाहि मोड़ पर अपन बेस अनुभवी कनहा पर कविता केँ उठाक' मैथिली साहित्यक दुनिया मे प्रवेश कयलनि ओइ उमेर तक अबैत-अबैत सामान्य कवि हाँफ' लगैत अछि आ बेसी सँ बेसी अपना केँ दोहराब' लगैत अछि; मुदा मोहन जीक पहिल संग्रह 'ग्लोबल गाम सँ अबैत हकार' पढ़िक' बुझायल जे अपन युगक प्रश्न सँ गाँथल एवं राजनीतिक रूप सँ सचेत ओ एक टा एहेन प्रश्नाकुल कवि छथि जिनक चेतना ग्लोबल सँ ल'क' लोकल धरिक गूँज-अनुगूँज सुनबा लेल उत्सुक छनि।... ओइ दृष्टि सँ ई दोसर संग्रह हिनक पहिल संग्रहक विस्तार एवं पूरक प्रतीत होइत अछि। आइ कविता आ ओकर परिसर मे जे नाना प्रकारक विमर्शक हल्ला सुनाय पड़ैत अछि ओकर अइ संग्रह मे अनुपस्थिति एवं तकरा जगह पर भूमण्डलीकृत दुनिया मे गाम-घरक करुण नियति केँ अनुरेखित करब कृष्णमोहन जीक राजनीतिक समझ छियनि। एकैसम शताब्दीक तेसर दशकक आरंभ मे जीवन-स्थिति तँ एहेन विकट बनि गेल छै जे हिनका सदति 'सोहारीक त'र सँ बजार हुलकी' दैत देखार दै छनि। अइ विध्वंसक वास्तविकताक आगू हिनक कवि बेसी आशावादी बन' मे समर्थ नइँ छनि, मुदा किछु बरख पहिने हकार बनिक' जे दुख लोकक जीवन मे प्रवेश कयने छल ओकर चाँगुर सँ दकचल समय पर अपन रेख खिंचबाक प्रयत्न अइ संग्रहक कविता मे लक्षित कयल जा सकैत अछि। दूरसंचारक विस्फोटक कारणें आइ जीवनक सब क्षेत्र मे एक टा अरुचिकर एकरूपता व्याप्त अछि, जइ सँ कवितो बचल नहि अछि। बिनु अनुभवक एक टा रेडीमेड काव्यबोध प्राय: कविक रचना मे हेलैत देखार दैत अछि। खुशीक बात ई जे कृष्णमोहन झा 'मोहन' अनुभूत संसार सँ अपन अभिव्यक्ति केँ मार्मिक ओ प्रामाणिक बनबैत छथि एवं समकालीन मैथिली कविता केँ अपना तरहें समृद्ध करैत छथि। —कृष्णमोहन झा, सिलचर
Sukh Ko Bhi Dukh Hota Hai
- Author Name:
Shruti Kushwaha
- Book Type:

- Description:
श्रुति की कविता का मानवीकरण किया जाए तो वह दिखेगी कच्ची लकड़ी के धुएँ से घिरी उस स्त्री की तरह जो जीवन का बुझता चूल्हा पूरे प्राणपण से फूँके जा रही है। कभी इधर से उचकुन लगाती, कभी उधर से यानी कभी इस ध्रुवान्त से, कभी उस ध्रुवान्त से और अन्त में उसकी धौंकनी देखती है कि आग तो दोनों ध्रुवान्तों के बीच से निकलती ऊर्ध्वमुखी हुई जा रही है। न इस अतिरेक में, न उसमें बल्कि उस सम्यक् दृष्टि में जो बुद्ध और गांधी की है : ‘जिन्होंने दुख दिया/उनके लिए अतिरिक्त उदार’, ‘जब भी मिलूँ ख़ुद से, आँखें नीची न हों’, ‘छोड़ना सबसे आसान हो जब, तब रोक लेना उसे’, ‘कड़वी बात निगल जाएँ बुख़ार की गोली की तरह’—इस तरह के कई आप्त वाक्य मिलेंगे इस संग्रह में जो यह सिद्ध करते हैं कि वैयक्तिक नैतिकता में इनकी आस्था है और ये बख़ूबी समझती हैं कि स्वयं में आचरणगत परिवर्तन घटित किए बिना कोई स्थायी परिवेशगत परिवर्तन असम्भव है। इस महीन प्रज्ञा पारमिता के बिना जीवन का गम्भीर सत्य अदेखा ही छूट जाता है—‘माँ की कोख’ और ‘पेड़ की जड़ों’ की तरह। जो भी ‘बत्तीस दिसम्बर’ को घटना है, यानी कि कभी नहीं घटना, उस बदलाव में और जो ‘रेगुलेटर’ से मौसम सँवारता है, उस परिवर्तन में कवि की आस्था नहीं है। वह हैरान है यह देखकर कि दुनिया ने चकित होना छोड़ दिया है, जबकि उसके लिए तो प्रकृति से निःशब्द ध्वनियाँ सीखने का सिलसिला ख़त्म ही नहीं होता। तभी तो उसके लिए पूरी पृथ्वी ही प्रेमपत्र है। वाक् संयम और कुछ प्रसिद्ध कविताओं से अन्तःपाठीय संवाद इस संग्रह को एक अलग खनक देते हैं। —अनामिका
Is Samay Tak
- Author Name:
Dharmpal Mahendra Jain
- Book Type:

- Description:
Book
Ishwarashish
- Author Name:
Pushpita Awasthi
- Book Type:

- Description:
प्रकृति एक न्यायपूर्ण और समानता–आधारित समाज की स्थापना के लिए प्रेरणा और आधार प्रदान करती है। सभ्यता के तक़ाज़े जहाँ विभाजन और असमानता को बढ़ावा देते हैं, प्रकृति का मूल स्वर साहचर्य और जोड़ने का होता है। विश्व के जिन हिस्सों में प्रकृति अपने अक्षत रूप में आज भी हमें आश्वस्ति देती है, उनमें एक कैरेबियाई क्षेत्र भी है। हज़ारों किलोमीटर के क्षेत्र में फैली अनछुई, अक्षत प्रकृति समुद्र तट, पर्वत, झरने, नदियाँ, जंगली वृक्ष और पशु–पक्षी।
सूरीनाम में प्रवास के दौरान कवयित्री पुष्पिता की रची गई ये रचनाएँ इसी छवि का अन्वेषण करती हैं। साथ ही कैरेबियाई देशों का वह मानवी पक्ष भी इनमें ध्वनित होता है जिसके कारण इस क्षेत्र की
विश्व में अलग पहचान है। दुनिया के लगभग हर क्षेत्र के लोग यहाँ आकर बसे हैं एशियाई, अफ्रीकी, यूरोपीय और लैटिन अमेरिकी। विश्व की मानवशास्त्रीय विविधता का एक लघु संस्करण आप यहाँ पा सकते हैं।
कैरेबियाई देशों के लम्बे प्रवास के दौरान रची गई ये कविताएँ इस क्षेत्र के समूचे प्राकृतिक, सामाजिक और मानवीय वैशिष्ट्य के प्रति प्रेमोद्गार के रूप में प्रकट हुई हैं। कवयित्री ने इन पंक्तियों में उस वरदान की पुनर्रचना की है जो प्रकृति ने इस क्षेत्र को दिया है।
Har Mauqe Ke Liye Sher
- Author Name:
Sanjiv Saraf
- Book Type:

- Description:
"हर मौक़े के लिए शेर" उर्दू शाइरी की सदा-बहार खूबसूरती को इस तरह पेश करती है कि वो न सिर्फ़ आसानी से समझ में आए, बल्कि पढ़ने वाला अपनी ज़िंदगी के वाक़िआत को भी इन शेरों के आईने में देख सके। इस संग्रह में ऐसे यादगार शेर शामिल हैं जो इंसानी ज़िंदगी के पूरे दाइरे की तस्वीर पेश करते हैं - चाहे वो हमारे बदलते जज़्बात के विषय में, चाहे ज़िंदगी के ख़ुश-नुमा लम्हों की यादें हो। वो तमाम मौक़े जो हमारी ज़िंदगी को शक्ल देते हैं, इन अशआर में इज़्हार पाते हैं। चाहे मोहब्बत हो या जुदाई, खुशी हो या तड़प, जश्न हो या चिंता - हर एहसास और हर लम्हे के लिए इस संकलन में ऐसा कोई न कोई शेर मौजूद है, जो उलझी से उलझी परिस्थितियों में भी आपके दिल को अपनी बात कहने के लिए सुलझे हुए शब्द मुहय्या करता है। सोच-समझकर चुने और खूबसूरती से पेश किए गए ये शेर पढ़ने, याद कर के दोस्तों को सुनाने और पलट कर फिर से पढ़ने और विचार करने के लिए हैं। "हर मौक़े के लिए शेर" सिर्फ़ उद्धरणों की किताब नहीं बल्कि एक साथी है, जो ज़िंदगी के जज़्बात और लम्हों को को शाइरी की रोशनी से मुनव्वर करती है।
Sipi Aur Shankha
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

- Description:
– ‘सीपी और शंख' रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा अंग्रेज़ी से अनूदित विश्व की श्रेष्ठ कविताओं का संग्रह है। बावजूद इसके ये दिनकर जी के व्यक्तित्व के रूपों को उद्घाटित करती उनकी अपनी मौलिक रचनाएँ भी प्रतीत होती हैं, क्योंकि उन्होंने भावों से प्रेरणा लेते हुए अपनी तरफ़ से ऐसे-ऐसे चित्रों की सृष्टि कर डाली है जो मूल में कहीं नहीं। इसलिए इन कविताओं में दिनकर जी के अपने चिन्तन और भाषा का परस्पर अन्योन्य सम्बन्ध भी परिलक्षित होते हैं।
संग्रह में पुर्तगीज़ी, स्पेनिश, अंग्रेज़ी, जर्मन, फ़्रेंच, अमरीकी, चीनी, पोलिश और भारतीय भाषाओं में मलयालम की अछूती भावभूमि और नवीन भंगिमाओं वाली कविताएँ शामिल हैं। रूमानी, आत्मपीड़न के अतिरिक्त भक्तिभाव से पूर्ण इन कविताओं की मुख्य विशेषता रस-प्रवणता, लावण्ययुक्त बिम्ब और श्रम की प्रतिष्ठा है।
इस संग्रह की कौन सी कविता किस कवि की कविता का प्रतिबिम्ब है, यह सूचित करने को पुस्तक के अन्त में एक सूची भी दी गई है ताकि सहज ही सृजन के विभिन्न आयामों से जुड़ा जा सके। निस्सन्देह, कविता में नवीन रुचि रखनेवाले पाठकों को दिनकर जी की यह कृति पसन्द ही नहीं आएगी, बल्कि अविस्मरणीय भी साबित होगी।
Kuchh Rafoo Kuchh Thigare
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

- Description:
“यह तो अच्छा हुआ कि कविता मेरे साथ है/जो यह भरोसा दिलाती है कि/कोई भी पथ कभी समाप्त नहीं होता/और सब कुछ गँवा देने के बाद भी/कुछ बचा रहता है।”
अशोक वाजपेयी की अथक और अदम्य जिजीविषा इन कविताओं में उदास विवेक और आत्मस्वीकार के बीच गहरे संयम के साथ नाजुक ढंग से सन्तुलित है। कुल एक वर्ष की अवधि में लिखी गई ये कविताएँ कई बार उदासी से घिरी होने के बावजूद अपनी पारदर्शिता में उजली और निर्मल हैं। सारे ध्वंस और नाश के विरुद्ध कविता को अपने लिए एकमात्र बचाव माननेवाले इस कवि की भाषा, सयानापन और शिल्प पर सहज अधिकार एक बार फिर सत्यापित करते हैं कि हमारे समय में कविता मनुष्य की हालत, उसकी उलझनों और जीवट का सूक्ष्म बखान करती है और ऐसा करते हुए हमें सचाई में ऐन्द्रिय शिरकत का अवसर देती है।
अशोक वाजपेयी की आवाज़, हमेशा की तरह, निजी और समाजधर्मी एक साथ है और वे लगातार अपने को वेध्य और बेबाक बनाए हुए हैं। उनकी कविता के केन्द्र में साधारण जीवन की आभा और छवियाँ हैं जिन्हें उनकी भाषा अनूठे शब्दालोक और समयातीत आशयों से उद्दीप्त करती है।
Bharat-Bharati
- Author Name:
Maithlisharan Gupt
- Book Type:

- Description:
v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main"><p>‘भारत-भारती’ मैथिलीशरण गुप्त की सर्वाधिक प्रचलित कृति है। यह सर्वप्रथम संवत् 1969 में प्रकाशित हुई थी और अब तक इसके पचासों संस्करण निकल चुके हैं। एक समय था जब ‘भारत-भारती’ के पद्य प्रत्येक हिन्दी-भाषी के कंठ पर थे। गुप्त जी का प्रिय हरिगीतिका छन्द इस कृति में प्रयुक्त हुआ है। भारतीय राष्ट्रीय चेतना की जागृति में इस पुस्तक का हाथ रहा है। यह काव्य तीन खण्डों में विभक्त है : <br />(1) ‘अतीत’ खंड, (2) ‘वर्तमान’ खंड, (3) ‘भविष्यत्’ खंड। ‘अतीत’ खंड में भारतवर्ष के प्राचीन गौरव का बड़े मनोयोग से बखान किया गया है। भारतीयों की वीरता, आदर्श, विद्या-बुद्धि, कला-कौशल, सभ्यता-संस्कृति, साहित्य-दर्शन, स्त्री-पुरुषों आदि का गुणगान किया गया है। ‘वर्तमान’ खंड में भारत की वर्तमान अधोगति का चित्रण है। इस खंड में कवि ने साहित्य, संगीत, धर्म, दर्शन आदि के क्षेत्र में होनेवाली अवनति, रईसों और उनके सपूतों के कारनामें, तीर्थ और मन्दिरों की दुर्गति तथा स्त्रियों की दुर्दशा आदि का अंकन किया है। ‘भविष्यत्’ खंड में भारतीयों को उद्बोधित किया गया है तथा देश के मंगल की कामना की गई है।</p>
Hind Mahasagar Ka Sanskritik Itihas
- Author Name:
Gopal Kamal
- Book Type:

- Description:
आसियान के देशों तथा भारतवर्ष की मैत्री पुरानी है। कितनी पुरानी? काफ़ी पुरानी है, कम-अज-कम चार हज़ार वर्षों का इतिहास तो बता ही सकते हैं। संस्कृति के स्तर पर। कलाकृतियों एवं व्यापार में भँजाई हुई चीज़ों के स्तर पर। क्या इन देशों के पुराने इतिहास से नए सम्बन्ध गहरा करने में मदद मिलेगी? तो हिन्द महासागर की इस इकाई को केवल भौगोलिक एकरूपता के लिए जानेंगे। अन्तर्सम्बन्धों की जाँच-पड़ताल में अनेकानेक बिन्दु उभरते हैं।
इस पुस्तक में नई किताबों नए शोधों को आत्मसात् किया गया है। नेचर, साइंस एवं साइंटिफ़िक अमेरिकन में परिपक्व शोधों के आधार पर, भाषाओं के अन्तर्द्वन्द्व को ठोस वस्तुओं, लेखों-शिलालेखों एवं प्रशस्तियों को इतिहास के परिप्रेक्ष्य में रखा गया है। भारतीय इतिहास लेखन में भी स्वतंत्रता आन्दोलन के ‘भारतीयपन’ को पिछली सीट दी जाने लगी है। मार्क्सीय लेखन में वस्तुपरकता एवं चीज़ों के आधार पर सम्बन्धों की परख शुरू हुई है। नए इतिहासकार ‘लोकल’ तथा ‘सब आल्टर्न’ को समझते हैं। इन सबकी ब्योरेवार तो नहीं किन्तु पूरी नई समीक्षा की गई है।
हीगेल, वाल्तेयर ‘इतिहास के दर्शन’ को समझाते हैं तथा इसे धर्म तथा धार्मिक मान्यताओं से अलग भी करते हैं। वे दोनों ‘इतिहास का दर्शन’ एवं ‘दर्शन का इतिहास’ में दिलचस्पी रखते हैं तथा इतिहास को रीजन से संचालित मानते हैं। उसी परम्परा में एक वैज्ञानिक ईमानदार प्रयास।
—भूमिका से
Gangatat
- Author Name:
Gyanendrapati
- Book Type:

- Description:
आज के महत्त्वपूर्ण हिन्दी कवियों की पंक्ति में ज्ञानेन्द्रपति का होना कविता की कुछ विरल क़िस्में ईजाद करनेवाले एक ऐसे कवि का होना है जिसे दुनिया की हर वस्तु काव्य-सम्भावना से युक्त लगती है। ज्ञानेन्द्रपति की कविताओं में जनपदीय आभा है, स्थानीयता का गौरव है, आंचलिकता का उजास है तथा जीवन और जगत को मथने-भेदनेवाले समकालीन मुद्दों की अनिवार्य अनुगूँज है। वे अपने पसन्दीदा कवियों के यहाँ जिस जीवन-द्रव्य की मौज़ूदगी की बात करते हैं, उनकी कविताओं में उसकी भरपूर उपस्थिति महसूस की जा सकती है। वस्तुनिष्ठता की शर्तों पर कविता की एकरस रीतिबद्धता से अलग राह बनाते हुए ज्ञानेन्द्रपति ने अपने जीवनावलोकनों से बहुधा मनुष्य को केन्द्र में रखते हुए अनेक चरित्रों, पदार्थों, स्थितियों एवं मानवीय उपस्थितियों में परकाया-प्रवेश किया है।
एक दौर में जहाँ राजनीतिक तेवर वाली कविताएँ ही विशेषकर कवियों की पहचान के लिए रेखांकित की जाती थीं, ज्ञानेन्द्रपति ने कविता को निरे राजनीतिक प्रवाह में बहने न देकर उसे अपनी कवि-प्रतिभा से अपने समय की मानवीय कार्रवाई में बदलने का आह्वान किया। ज्ञानेन्द्रपति के लिए कविता कवि की कथनी नहीं, करनी है। इस सदी की कालांकित और कालजयी-सिद्ध होनेवाली कविता लिख रहे ज्ञानेन्द्रपति वस्तुत: निराला और मुक्तिबोध की सजग कवि-चेतना के प्रातिनिधिक कवि के रूप में उभरे हैं।
ज्ञानेन्द्रपति के कवि की विशिष्टता इस बात तक सीमित नहीं है कि उन्होंने वस्तुनिष्ठता के साथ अपने समय के अनुभवों को कविता में साधा-सिरजा और बहुवस्तुस्पर्शी बनाया है, बल्कि इसलिए भी है कि किसी अलौकिक या धार्मिक सत्ता पर आस्तिकता/आस्था का कंधा टिकाए बग़ैर भारतीय जीवन-संस्कृति के मूलाधारों को कवितालोकित कर उन्होंने हमारे इस विश्वास को ही पुख़्ता किया है कि भारतीयता से छिन्नमूल होकर एक भारतीय कवि का अपना रचनाधार जैसे-तैसे भले ही बन जाए, किन्तु उसका जनाधार व्यापक नहीं हो सकता। इस संक्रान्ति-वेला में अपने समय-समाज की चिन्हारी के लिए ही नहीं, बल्कि उद्वेलित करनेवाले उरा आनन्द के लिए भी, जो भाषिक सृजनात्मकता के बल पर कविता के ही दिए-किए सम्भव है, इस संकलन की कविताएँ हिन्दीभाषी जनता द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी पढ़ी जाएँगी।
Chijate Sukhon ke bich
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description:
रमेशराज की मुक्तछंद कविताएँ
Sahir Samagra
- Author Name:
Sahir Ludhianvi
- Book Type:

- Description:
साहिर लुधियानवी को जनसाधारण आम तौर पर फ़िल्मों के गीतकार के रूप में ही जानता-पहचानता है। लेकिन तथ्य यह है कि फ़िल्में उनके जीवन में बहुत बाद में आईं, उससे पहले वे एक प्रगतिशील शायर के तौर पर अपनी बड़ी पहचान बना चुके थे। फ़िल्मों ने बस उन्हें रोज़गार दिया जिसके जवाब में उन्होंने फ़िल्मों को कुछ ऐसे अमर उपहार दिए जिन्हें उन्होंने अपने ऊबड़-खाबड़ और गहरी उदासी में बीते जीवन में कमाया था।
एक ऐसे परिवार में पैदा होकर, जिसका शायरी और अदब से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था, और एक ऐसे पिता का पुत्र होकर जिसके साथ उनके सम्बन्ध कभी पिता-पुत्र जैसे नहीं रहे और एक ऐसे समाज में जीकर जिसका सस्तापन, नाइंसाफ़ी और संकीर्णताएँ उनकी उदास आँखों से बचकर निकल नहीं पाती थीं, उन्होंने वह कमाया जिसे भले ही उस वक़्त के आलोचकों ने बहुत मान नहीं दिया, लेकिन जो आम आदमी की यादों में हमेशा के लिए पैठ गया। फ़िल्मों में आने से पहले ही वे अपने समय के सबसे लोकप्रिय और चहेते शायरों में शुमार हो चुके थे।
साहिर की ऐसी कई नज़्में और ग़ज़लें हैं, और गीत भी, जिनमें उन्होंने समाज की आलोचना दो-टूक लहज़े में की है। प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़े साहिर की चिन्ताओं में गाँव में भूख और अकाल से जूझ रहे किसानों के दु:ख से लेकर शहरों में भूख के हाथों बिकतीं उन औरतों जिन्हें समाज वेश्या कहता है—तक का दर्द एक जैसी गहराई से आया है, जिसका मतलब यही है कि दु:ख को देखना, जीना और पकड़ना, शायर के रूप में यही उनका एकमात्र कौशल था, और इसी के विस्तार में उन्होंने हर माथे की हर सिलवट को पिरोकर तस्वीर बना दिया।
यह किताब उनकी रचनाओं का समग्र है, अभी तक उपलब्ध उनकी तमाम ग़ज़लों, नज़्मों और गीतों को इसमें इकट्ठा करने की कोशिश की गई है। उम्मीद है दर्द-पसन्द पाठकों को इसमें अपना वह खोया घर मिल जाएगा जो इधर की चमक-दमक में खो गया है।
Is Yatra Mein
- Author Name:
Leeladhar Jagudi
- Book Type:

- Description:
‘‘लीलाधर जगूड़ी ने अपने दूसरे संग्रह द्वारा हिन्दी कविता में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। यह एक बड़ी बात है। इन कविताओं में जीवन को उसकी समग्रता में पकड़ने की कोशिश है जो इधर के ख्यातिप्राप्त कवि भी नहीं कर पा रहे हैं। या तो वे अपनी भीतरी दुनिया में रमे रहते हैं या बाहरी दुनिया में भटकते रहते हैं। जगूड़ी ने दोनों छोरों को पकड़ा है, साधने की कोशिश की है, किसी एक का निषेध नहीं किया है। दोनों दुनियाओं को जोड़ने का प्रयास उनकी इस संग्रह की कविताओं में अक्सर दीखता है। इससे कवि इनसान की तरह आत्मीय बनता है, पैग़म्बर या क्रान्तिकारी की तरह आस्था और आतंक नहीं जगाता। इस तरह उनका रास्ता धूमिल से अधिक सही है। जगूड़ी की इस यात्रा में अन्तः और बाह्य यात्राओं का विलय है। सच्चे कवि के लिए ये दोनों यात्राएँ अलग नहीं होतीं, केवल उन पर आग्रह घटता-बढ़ता रहता है। अपने अनुभूतिलोक के कारण, प्रतिबद्धता के नाम पर ‘रूपवादी’ और ‘राजनीतिवादी’ उसे एक का होकर रखना चाहते हैं और प्रचारित करते हैं कि दूसरा संसार झूठा है। वास्तविक प्रतिबद्धता अनुभूति की ही प्रतिबद्धता है जिसे कवि निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में प्राप्त करता है और उससे बचता नहीं, रचता है।
जगूड़ी की दूसरी विशेषता इन दोनों दुनियाओं को जोड़ने का शिल्प है और तीसरा उनका बड़बोला न होना है। शिल्प के क्षेत्र में उनके बिम्ब फिसलते हुए प्रकृति से इनसान की ओर, इनसान से प्रकृति की ओर आते-जाते हैं। इस यात्रा में कहीं एक जगह रम नहीं जाते।
पेड़ के प्रतीक से जितना अधिक काम उन्होंने लिया है उतना बहुत कम नए कवियों ने लिया है। भाषा उनकी बोलचाल की, सहज है पर उसका प्रयोग वह एक असहज तेवर के साथ करते हैं, जिसकी ज़रूरत उनके जैसे कवियों को नहीं होनी चाहिए। भाषा का आप किसी आग्रह के साथ प्रयोग कर रहे हैं यह पाठक को बता देना कवि की अपनी ताक़त कम कर लेना है। कहीं-कहीं कविता के पूरे विन्यास में न खपने और चौंकाने वाले शब्दों का प्रयोग उन्होंने किया है जो अब उन्हें छोड़ देना चाहिए। कविता के सम्पूर्ण आकर्षण को किसी एक भड़कीले, असहनशील शब्द की ओर नहीं फेरना चाहिए।
लीलाधर जगूड़ी का यह संग्रह ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए।’’
—सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
(दिनमान, 13 मई, 1975)
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book