Dheemi Aanch Ka Sitara
(0)
₹
199
₹ 159.2 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
जदीद उर्दू ग़ज़ल के नुमाइन्दा शायर ज़ेब ग़ौरी (ख़ान अहमद हुसैन ख़ाँ) 1930 में कानपुर में ख़ान अनवर हुसैन ख़ाँ के घर पैदा हुए। उन्होंने क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर से बी.ए. पास किया और उस्ताद साक़िब कानपुरी से शायरी की बारीकियाँ सीखीं। उन्होंने पहले कानपुर के ही विक्टोरिया मिल में अफ़सर के पद पर और उसके बाद सऊदी एयरलाइंस में प्रशासक के पद पर काम किया। ज़ेब ग़ौरी की शायरी में इस्तिआरे, अलामतें, फ़िक्र की पेचीदगी और अल्फ़ाज़ का तख़लीक़ी इस्तेमाल अपने पूरे रंग में नज़र आता है। उनकी शायरी के मुरीद हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में मौजूद हैं और उनके उस्लूब को सरहद के दोनों तरफ़ के शायरों और आलोचकों ने ख़ूब सराहा है। उनका पहला ग़ज़ल-संग्रह “ज़र्द ज़रखेज़” अक्टूबर 1976 में शब-ख़ून किताबघर, इलाहाबाद से शाए हुआ। 1 अगस्त, 1985 को उन्होंने कराची, पाकिस्तान में आख़िरी साँस ली। उनके इन्तिक़ाल के फ़ौरन बाद 1985 ही में उनकी दो और किताबें “चाक” कराची से और “ज़रताब” कानपुर, हिन्दुस्तान से शाए हुईं।
Read moreAbout the Book
जदीद उर्दू ग़ज़ल के नुमाइन्दा शायर ज़ेब ग़ौरी (ख़ान अहमद हुसैन ख़ाँ) 1930 में कानपुर में ख़ान अनवर हुसैन ख़ाँ के घर पैदा हुए। उन्होंने क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर से बी.ए. पास किया और उस्ताद साक़िब कानपुरी से शायरी की बारीकियाँ सीखीं। उन्होंने पहले कानपुर के ही विक्टोरिया मिल में अफ़सर के पद पर और उसके बाद सऊदी एयरलाइंस में प्रशासक के पद पर काम किया। ज़ेब ग़ौरी की शायरी में इस्तिआरे, अलामतें, फ़िक्र की पेचीदगी और अल्फ़ाज़ का तख़लीक़ी इस्तेमाल अपने पूरे रंग में नज़र आता है। उनकी शायरी के मुरीद हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में मौजूद हैं और उनके उस्लूब को सरहद के दोनों तरफ़ के शायरों और आलोचकों ने ख़ूब सराहा है। उनका पहला ग़ज़ल-संग्रह “ज़र्द ज़रखेज़” अक्टूबर 1976 में शब-ख़ून किताबघर, इलाहाबाद से शाए हुआ। 1 अगस्त, 1985 को उन्होंने कराची, पाकिस्तान में आख़िरी साँस ली। उनके इन्तिक़ाल के फ़ौरन बाद 1985 ही में उनकी दो और किताबें “चाक” कराची से और “ज़रताब” कानपुर, हिन्दुस्तान से शाए हुईं।
Book Details
-
ISBN9789394494381
-
Pages107
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Pakistani Urdu Shayari Vol. 1
- Author Name:
Narendra Nath
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Sarang - Jivan ke Rango ka Indradhanush
- Author Name:
Dr. Devesh Kumar Pandey
- Book Type:

- Description:
सारंग - जीवन के रंगों का इंद्रधनुष "उम्र के हर पड़ाव पर भावनाओं के वेग सेउभरे हुए शब्द मिलकर एक कविता हो गए।" इन्हीं शब्द पंक्तियों का इंद्रधनुष है यह कविता संग्रह। सारंग के अनेक पर्याय हैं • सावन का मोर, • देशभक्ति का जज्बा जगाने वाली भारतीय वायुसेना की हेलीकाप्टर डिस्प्ले टीम, • कोरियाई ड्रामा देखने वाले तो 'सारंग, सारंग हे, नादी सारंग' जानते ही हैं। और भी विभिन्न भावों का इंद्रधनुष है शब्द 'सारंग'। इस कविता संग्रह में कवि ने परिस्थितियों से उत्पन्न जवलन्त भावों को, शब्द रूप देकर, जीवन में ऊर्जात्मक और फलदाई संभावना को पिरोया है - राग सारंग-सा! सारंग - जीवन के रंगों का इंद्रधनुष "उम्र के हर पड़ाव पर भावनाओं के वेग सेउभरे हुए शब्द मिलकर एक कविता हो गए।" इन्हीं शब्द पंक्तियों का इंद्रधनुष है यह कविता संग्रह। सारंग के अनेक पर्याय हैं • सावन का मोर, • देशभक्ति का जज्बा जगाने वाली भारतीय वायुसेना की हेलीकाप्टर डिस्प्ले टीम, • कोरियाई ड्रामा देखने वाले तो 'सारंग, सारंग हे, नादी सारंग' जानते ही हैं। और भी विभिन्न भावों का इंद्रधनुष है शब्द 'सारंग'। इस कविता संग्रह में कवि ने परिस्थितियों से उत्पन्न जवलन्त भावों को, शब्द रूप देकर, जीवन में ऊर्जात्मक और फलदाई संभावना को पिरोया है - राग सारंग-सा!
Shahar Aur Shikayaten
- Author Name:
Prakriti Kargeti
- Book Type:

- Description:
प्रकृति की कविताएँ अपने समकालीनों से कई मायनों में अलग प्रतीत होती हैं। सबसे ज़्यादा ध्यान खींचती है उनकी भाषा की सहजता। वह एक ऐसी भाषा की रचना करती हैं जो अपने कथ्य के साथ-साथ अपनी सम्भावना को खोलती है। यह किसी और के द्वारा पहले सिद्ध कर ली गई भाषा नहीं है जिसे उन्होंने अपनी बात कहने के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। यह भाषा कविता के साथ-साथ बनती है।
कथ्य इन कविताओं को कहीं भी मिल जाता है, अनुभव के संसार का कोई भी ऐसा तिनका जो अपनी लय से उखड़ा नज़र आए, उनकी कविता का विषय हो जाता है। जो चीज़ अलग से दिखाई देती है, वह यह कि इन कविताओं में पढ़ी हुई कविताओं की छवियाँ दिखाई नहीं देतीं। अपनी भाषा की तरह ये कविताएँ ज़मीन भी अपनी ही चुनती हैं। वह स्वाभाविक गति से अपना रास्ता तय करती हैं, प्राकृतिक ढंग से अपने आसपास के प्रति अपनी प्रतिक्रियाओं को आने देती हैं। एकदम अनलोडेड।
इन कविताओं के पास अपनी बहुत स्वाभाविक शिकायतें हैं जिनके जवाब उन्हें अपने समय और अपने समाज से चाहिए। वह न ख़ुद कोई विमर्श गढ़ती हैं न चाहती लगती हैं कि उन्हें जो जवाब दिए जाएँ वे 'फासिलाइज्ड' विमर्शों के निष्कर्ष हों।
ये बेचैनियाँ, असहमतियाँ, और उनसे उपजी ये कविताएँ हमें शुरू से शुरू करने के लिए आमंत्रित करती हैं। जैसे कह रही हों कि चीज़ों के हल देखने में अगर बहुत सुगठित, सुन्दर और ललित नहीं हैं तो भी चलेगा, पर उनका जीवन की लय को बदलने में सक्षम होना ज़रूरी है।
Tum Ho Mujh Mein
- Author Name:
Pushpita Awasthi
- Book Type:

- Description:
‘तुम हो मुझमें’ संवेदनशील कवयित्री पुष्पिता का महत्त्वपूर्ण कविता–संग्रह है। महत्त्वपूर्ण इस अर्थ में कि इन कविताओं में आकुल आत्मीयता और राग–विराग के जो उदात्त आशय हैं वे पाठक के शब्दबोध में प्रीतिकर विस्मय उपजाते हैं। प्रेम समस्त कविताओं का बीज शब्द है। प्रेम के अगणित अर्थों का अनुभावन करते हुए पुष्पिता ने अनुभवों, भावों व संवादों का सान्द्र आस्वाद सिरजा है। संग्रह की एक कविता में वे कहती हैं—
‘प्रेम शब्दों से परे है
शब्दकोशों से बहिष्कृत
मन के अन्त:पुर का पाहुन है वह
केवल हृदय से—
हार्दिकता से काम्य।’
इन कविताओं का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है समकालीन चिन्तन व चेतना से सुगठित सम्पृक्ति। प्रचलित विमर्शों के सूत्र उनके आन्तरिक सत्यों के साथ सहेजे गए हैं। सतह पर तिरते मूल्यों व निष्कर्षों से कवयित्री की सहमति नहीं है। ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ’ को चरितार्थ करके शब्दार्थ के अगम को सुगम बनाया गया है।
यह कविता–संग्रह प्रेम, मैत्री, साहचर्य, प्रकृति, गोचर–अगोचर, शब्द–शब्दातीत को उनकी मौलिकता में आलोकित करता है। पुष्पिता के पास भाषा और शिल्प की समृद्धि है। ‘तुम्हें देखने के बाद/छूट जाता है तुम्हारा देखना, मुझमें’—के स्वर में कहें तो ये कविताएँ पढ़कर पाठकों के मन में इनका बहुत कुछ छूट जाएगा।
जीवन को समग्रता में सँजोती रचनाएँ ‘तुम हो मुझमें’ की उपलब्धि हैं।
Koi To Jagah Ho
- Author Name:
Arun Dev
- Book Type:

- Description:
अरुण देव अपने संयत स्वर और संवेदनशील वैचारिकता के नाते समकालीन हिन्दी कविता में अपनी जगह बना चुके हैं। यह संकलन उनकी काव्य-दक्षता और संवेदना के और प्रौढ़ तथा सघन होने का प्रमाण है। ये कविताएँ आशंका के बारे में हैं, उम्मीद के बारे में हैं। स्मरण-विस्मरण के बारे में, स्त्रियों के बारे में और प्रेम के बारे में हैं। स्त्रियों के बारे में अरुण देव की कविताएँ अपनी वैचारिक ऊर्जा और ईमानदार आत्मान्वेषण के कारण अलग से ध्यान खींचती हैं। उनकी कविताओं में, प्रेम आत्मान्वेषण करता दिखता है, ख़ुद के बारे में असुविधाजनक सवालों से कतराता नहीं।
अरुण देव की कविताओं में पूर्वज भी हैं, और किताबें भी, जो—‘नहीं चाहतीं कि उन्हें माना जाए अन्तिम सत्य’। ये कविताएँ उस सत्य के विभिन्न आख्यानों से गहरा संवाद करती कविताएँ हैं जो लाओत्जे और कन्फूशियस के संवाद में ‘झर रहा था/पतझर में जैसे पीले पत्ते बेआवाज’।
अरुण देव की कविताओं से गुज़र कर कहना ही होगा, ‘अब भी अगर शब्दों को सलीके से बरता जाए/उन पर विश्वास जमता है’।
—पुरुषोत्तम अग्रवाल
Vansha : Mahabharat Kavita
- Author Name:
Harprasad Das
- Book Type:

- Description:
हरप्रसाद दास अपनी आधुनिक दृष्टि, गहन परम्परा-बोध और अपने विशिष्ट ओड़िया स्वर के लिए पहचाने जाते हैं। ‘वंश’ में संकलित कविताएँ उनकी सुदीर्घ काव्य-साधना का एक अद्वितीय उदाहरण हैं।
वास्तव में यह ‘महाभारत’ के प्राय: सभी चरित्रों के गम्भीर अन्तर्मन्थन की एक सुघड़ काव्य-शृंखला है। सत्तर कविताओं के माध्यम से कवि ने ‘महाभारत’ की जो पुनर्रचना की है, उसका प्रयोजन कथा का तकनीकी आधुनिकीकरण भर नहीं है। ‘महाभारत’ की कथा-वस्तु या उसके चरित्रों की अन्त:प्रकृति में सतही बदलाव लाने की कोई चेष्टा यहाँ नहीं है। यह पुनर्पाठ आधुनिक और आत्मसजग कवि के द्वारा, ‘महाभारत’ के साथ सृजनात्मक अन्तर्पाठीयता का एक रिश्ता बनाने की कोशिश है। उस समय में इस समय को जोड़ देने के जोड़-तोड़ से क़तई अलग, यह साभ्यतिक संकट की त्रासदी के अनुभव और अवबोध की कविता है, जिसे वे कथा के प्राचीन रूपाकार में कुछ इस तरह रचते हैं कि हम पूरे ‘महाभारत’ को अपने सामयिक अनुभव की विडम्बनाओं और व्यर्थ हताशाओं की तरह घटता देखते हैं।
अपने लोक-जीवन के दैनिक समय में जीते-मरते लोगों के बीच, परिवेश की पास-पड़ोस की छवियों के रूबरू होते हुए, हम पाते हैं कि ‘महाभारत’ हमारे लिए महज़ किसी दूरस्थ क्लासिकी ऊँचाई या गहराई का प्रतीक या रूपक-भर नहीं है। लोक-जीवन की साधारण साम्प्रतिकता में, परिवार के संस्कारों में, क़िस्सों की तरह रचा-बसा ‘महाभारत’, हरप्रसाद की सर्जना के माध्यम से, हमारी आन्तरिकता का एक मार्मिक दस्तावेज़ बन जाता है। साथ ही यह भी महत्त्वपूर्ण है कि ‘वंश’ की रचना में क्लासिकी और लोक का ऐसा अनूठा समन्वय है जो मनुष्य के आस्तित्विक संकट को सहज लोक-वाणी में सम्प्रेषित करता है।
Yagyavalkya Se Bahas
- Author Name:
Suman Keshari
- Book Type:

- Description:
सुमन केशरी की कविताएँ मौजूदा काव्य-परिदृश्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाती हैं। इनमें समकालीन दौर की बेचैनियाँ भी हैं और परम्परा का परीक्षण और पुनर्परीक्षण भी। ये कविताएँ यह एहसास कराती हैं कि याज्ञवल्क्य और गार्गी के बीच सम्बन्ध का व्याकरण बदल गया है। गार्गी अब मनचाहे सवाल कर सकती है और उसे याज्ञवल्क्य के उत्तर की दरकार भी नहीं।
हिन्दी में समकालीन कवयित्रियों की जो पीढ़ी पिछले पन्द्रह-बीस वर्षों से सक्रिय है और अपनी जगह बना चुकी है, सुमन केशरी उन्हीं की समवयस्क हैं। इस हिसाब से उनका पहला काव्य-संकलन देर से आ रहा है, हालाँकि कविताएँ वे काफ़ी पहले से लिख रही हैं। इस देरी की क्या वजह हो सकती है? शायद यह कि अभी भी भारतीय समाज में आम औरत पर परिवार और बच्चों के पालने के इतने दबाव हैं कि उसकी सर्जनात्मकता के पूर्ण प्रस्फुटन में अन्तराल आते रहते हैं। सम्भवतः यही कारण है कि अपनी एक कविता में सुमन केशरी यह कहती हैं—सृजन के बीहड़ों में मैंने क़दम रखा। कई साल बाद। रो...रोकर...। यह काव्य-पंक्ति सिर्फ़ एक कवयित्री का वक्तव्य-भर नहीं है, बल्कि इसके गहरे सामाजिक आशय हैं। भारतीय समाज में औरत के लिए घर के बाहर की सृजनात्मक दुनिया अभी भी एक बीहड़ प्रदेश है।
इस संग्रह की एक अन्य विशेषता इसमें हिन्दी कविता की कई स्मृतियों का मौजूद होना है। इनको पढ़ते हुए कभी निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ की याद आती है तो कभी विजयदेव नारायण साही की कविताएँ। आधुनिक हिन्दी काव्य-परम्परा का एक मिज़ाज भारतीय मिथकों को नए प्रसंग में जाँचने-परखने का भी रहा है। इस संग्रह में भी ऐसी कई कविताएँ हैं। पर ऐसी कविताएँ भी यहाँ हैं जो हमारे समकालीन अनुभवों का हिस्सा हैं, जैसे ‘सिपाही’, जिसमें अनाम से दिखनेवाले वर्दीधारी की ज़िन्दगी की वे परतें खुलती हैं जिनके बारे में हम अक्सर सजग नहीं होते। जिन्हें हम रोज़ गली-मुहल्ले, सड़क, बाज़ार या सीमा पर देखते हैं, मगर सिर्फ़ उनकी उपस्थिति के बारे में जानते हैं, उनके एहसासों से वाक़िफ़ नहीं होते। इसी तरह ‘बा और बापू’ कविता गांधी और कस्तूरबा के निजी सम्बन्धों को एक नई व्याप्ति देती है जहाँ एक ऐतिहासिक लड़ाई में शामिल हो व्यक्ति एक ऐसी विडम्बना में उलझकर रह जाते हैं जहाँ निजी दुखान्त को प्राप्त होता है।
—रवीन्द्र त्रिपाठी
Padchaap
- Author Name:
Vivek Gupta
- Book Type:

- Description:
ज्ञान, संवेदना, दृष्टि और
विचार जैसे तत्त्वों के बावजूद कविता तब तक सम्भव नहीं होती है जब तक कि भीतर का गहरा
आवेग और जीवन से संपृक्त सूत्र उसमें विद्यमान नहीं होते और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि एक
अपरिभाषित विकलता उसमें नहीं आ जाती। विवेक गुप्ता के पहले संग्रह की ये कविताएँ अपने समय
के दबावों के बीच जीवित मनुष्य की विकलता की कविताएँ हैं। ये कवि होने की इच्छा से नहीं,
मनुष्य हो सकने की आकांक्षाजन्य रचनात्मकता से अपना उत्स पाती हैं। यही कारण है कि कवि
अपने अवसाद के क्षणों में भी, सर्जनात्मकता को सम्भव कर पाता है।
‘मोक्ष प्रश्न’ एवं ‘बुद्ध’ शृंखला की कविताएँ कई प्रश्नों को नए तरह से रखने में समर्थ हुई हैं। दर्शन
और जीवन के बीच उपस्थित रूढ़ि, अन्धश्रद्धा और अन्धविश्वास की वे स्थूल रूप में नहीं, उनके
सूक्ष्म विध्वंसकारी रूप में पहचान करती हैं। कवि की दृष्टि अपनी सहजता में जीवन के सौन्दर्य
को, जीवन की अमरता को चुन लेती है और चीज़ों की रहस्यात्मकता को व्यर्थ कर देती है। वहाँ
‘निर्वाण की आभा की चमक’ में अन्तर्निहित उपहास, काव्य-शक्ति का उदाहरण हो जाता है। इन
कविताओं में शोरगुल को संयम से बताने का धीरज है, चीज़ों को बहुत क़रीब से देखने का उपक्रम
है और वह दृढ़ता भी है जो ‘झंडा उठाए अकेले आदमी’ की सहायता को एक अनन्त जिजीविषा में
बदल देती
है।
यह सब नारेबाजी अथवा सतही राजनीतिक शब्दावली से नहीं, कवि की जीवन में निष्ठा और
प्रतिबद्धता से सम्भव हुआ है, इस बात के सूत्र इस संग्रह की कविताओं में बार-बार मिलते हैं। ‘वह
एक घर था ऐसा’, ‘जुलूस’, ‘विस्थापन’, ‘इस तरह थे हम वहाँ’ जैसी कविताएँ हमारे परिवार और
समाज में लगातार बढ़ती जा रही यंत्रणा और अलगाव की ट्रेजडी की गहन पड़ताल ही नहीं करतीं,
बल्कि ‘ऐसा नहीं होना चाहिए’—इस उत्कट इच्छा का भी प्रकटीकरण करती हुई चलती हैं। एक युवा
कवि के पहले ही संग्रह में भाषा का संयम, शब्दों से नए अर्थ ले सकने की क्षमता, एक पंक्ति से
दूसरी पंक्ति के बीच लम्बी दिखनेवाली कठिन दूरी तय करने का सहज सामर्थ्य और इन सबके बीच
की जगहों में कविता का रचाव देखना सुखद प्रतीति है। अपने समय की पहचान करने का
विश्वसनीय प्रयास भी इन कविताओं में है। ‘न्याय को सबसे क्रूर और ख़तरनाक हथियार में बदल60
देने’ वाले इस समय में ‘मृत्यु के भय के बीच प्रेम की सम्भावना’ को टटोलते हुए यह भी समझना
कि ‘अब वैसा कुछ भी नहीं है, जो जैसा दिखाई देता है’ और ‘अकेले पड़ते जाने की नियति को’
सर्वाधिक उल्लेखनीय भयावहता की तरह रेखांकित करना, कवि की गहरी दृष्टि और क्षमता का ही
प्रमाण है। नयापन और नएपन की खोज भी इन कविताओं को विचारणीय बनाती है।
विडम्बनाजन्य व्यंग्य के सहारे ‘प्रेम के टूटने’ को उपलब्धि कह देना एक नए तरीक़े को इंगित करता
है। उनकी अनेक कविताओं में कहन की नई कला और दीप्ति है। अपने से पूर्व की कविता की सुदीर्घ
परम्परा के सूत्र उनकी कविता में हैं और साथ ही वह प्राणवान प्रखरता भी, जिससे वे अपने तरह के
काव्यलोक का निर्माण करते दिखते हैं।
कविता के उत्सुक पाठक के रूप में मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि ये कविताएँ, इस दौर
में लिखी जा रही ढेर सारी कविता के बीच ‘सच्ची कविता’ की पहचान के संकट को हल करने में
सहायक होनेवाली कविताएँ हैं। यह संग्रह सब दूर एक रचनात्मक दबाव पैदा करेगा, यह उम्मीद भी
इन्हीं कविताओं से पैदा होती है।
—कुमार अंबुज
Gypsy Mind, Caged Soul
- Author Name:
Rajan Verma
- Book Type:

- Description:
Gypsy Mind, Caged Soul is a collection of selected poems by the author. As the title suggests the human mind loves to travel, explore and dream. It’s the soul that gets caged owing to worldly wrap of duties responsibilities & boundries created by us being in that space. But the soul transcends barriers of any kinds. The only escape, therefore, is to venture into the unknown through the world of poetry. A bouquet of emotions is presented in this book.
Udaan
- Author Name:
Pukhraj Maroo
- Book Type:

- Description:
ग़ज़ल हिन्दुस्तानी रिवायत की हसीन-तरीन विरासत है, इसको ज़बानों के संकीर्ण दायरों में क़ैद नहीं किया जा सकता। यह न उर्दू है, न हिन्दी—बस, ग़ज़ल तो ग़ज़ल होती है और उसको ग़ज़ल ही होना चाहिए, वरना सारी मेहनत और कोशिश व्यर्थ हो जाएगी। पुखराज मारू की ग़ज़लों का दीवान देखते हुए मेरे इस ख़याल को मज़ीद तक़वियत मिली। उसकी ग़ज़लें सर-सब्ज़ फलदार दरख़्तों की तरह हैं जिनमें ख़ुशज़ायका मुनफ़रिद और ख़ूबसूरत महकदार फल हैं। बाज पककर रस-भरे बन गए हैं, कुछ अधकच्चे हैं और कुछ इब्तिहाई मराहिल में। लेकिन किसी मज़मूए में बड़ी तादाद में अच्छे शे’र और ख़ूबसूरत मिसरे हों तो दाद तो देनी ही पड़ेगी।
पुखराज मारू ग़ज़ल की क्लासिकी रिवायत के रम्ज शनास हैं। उसकी बारीकियों से परिचित और शब्द पर भी उनकी पकड़ है। ख़याल भी नाज़ुक, ख़ूबसूरत और दिलनवाज़ हैं। नई-नई ज़मीनें भी तराशी हैं और ग़ज़ल के गुल-बूटे खिलाए हैं। वह इक्कीसवीं शताब्दी के बर्क़ रफ़्तार अहद में और बाज़ारवाद के युग में रहते हैं। किन्तु उनकी ग़ज़लों की दुनिया क़दीम है, इसमें शिद्दत नहीं है। समकालीन परिस्थितियों की झलक है भी तो बहुत कम-कम। यह शायर दुनिया का और मानवता का भला प्रेम के ढाई अक्षर में ही तलाश करना चाहता है। यद्यपि इश्क़ से बढ़कर और क्या है जो सारी कायनात में छाया हुआ है।
—बशीर बद्र
pratinidhi Kavitayein : Gyanendrapati
- Author Name:
Gyanendrapati
- Book Type:

- Description:
“ज्ञानेन्द्रपति ने यदि कोई सभ्यता-विमर्श सम्भव किया है तो उसे समकालीन सन्दर्भों में, वैश्वीकरण की चपेट में आ चुके समाज के जीवन का भाष्य जानकर समझा जा सकता है। प्रसाद-निराला-मुक्तिबोध हों या ज्ञानेन्द्रपति, भिन्न-भिन्न सन्दर्भों में ये सभी कवि अपने समाज में वर्चस्व की शक्तियों का चारित्रिक भाष्य ही रचते हैं। ज्ञानेन्द्रपति इतिहास, मिथक या फैंटेसी की जटिल पद्धतियों की तरफ जाने के बजाय ठेठ विवरण की यथार्थवादी पद्धति को अपनाते हैं। वे पर्यवेक्षण को ही सीधे, कविता में बदल देते हैं। उनकी कविता, देखे गए दृश्य की कविता है, यथार्थ का प्रत्यक्ष आख्यान है। ज्ञानेन्द्रपति के प्रेक्षण की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि वे किसी दृश्य को फोटोग्राफिक प्रेक्षण की तरह निर्विकार या प्रकृतिवादी तरीके से नहीं, बल्कि उसकी समूची आन्तरिक द्वंद्वात्मकता में पकड़ते हैं। इस प्रयत्न में दृश्य के परस्पर पूरक या विरुद्धार्थी आशयों को अगल-बगल रखकर उनके बीच उत्पन्न विसंगति को उभार देते हैं। यह विसंगति अपने आप में एक काव्यात्मक आशय बन जाती है। इस तरह वे विलोम प्रत्ययों के युग्म से कविता का कथ्य निर्मित करते हैं। ज्ञानेन्द्रपति के लिए विडम्बना का स्रोत भाषा नहीं, जीवन है जिसे वे प्रेक्षण के जरिये जीवन से उठाते हैं, सिर्फ शब्दों के कौतुक से उसे उत्पन्न नहीं करते। उनके यहाँ विडम्बना बिम्ब में प्रत्यक्ष होती है, वक्र कथन में नहीं। वह नई कविता के दौर में लक्षित किए गये ‘शरारतपूर्ण सह-संयोजन’ सरीखा भी नहीं, बल्कि सचेत समाज-प्रेक्षण है।”
—जयप्रकाश, सुपरिचित आलोचक
Nadi Ghar
- Author Name:
Krishna Kishore
- Book Type:

- Description:
यह जीवन के साथ एक सहयात्री की तरह चलती जीवन जैसी ही लम्बी कविता है। किसी बड़ी भीतरी या बाहरी घटना-दुर्घटना की प्रतिक्रिया से उपजी हुई नहीं, बल्कि जीवन के रोजमर्रा के साथ बतियाती हुई कविता।
लेकिन जीवन से आक्रांत कविता नहीं, न ही उसके हर ओर फैले विराट वैभव से भयभीत। एक धीमी बतकही की तरह यह अपनी आँख से अपने आसपास के संसार को, व्यक्ति को, उसके इर्द-गिर्द बुने गुए रिश्तों के संजाल को, भीड़ को, भीड़ के बीच भटकती व्यर्थता को देखती हुई, और इन सबके बारे में कुछ कहती-सुझाती-बताती हुई।
'प्रार्थनारत ज़िन्दगी मुझे क्रोधित नहीं करती। क्योंकि मैं जानता हूँ। ये मजबूर लोग जो कुछ माँग रहे हैं। बस वही इन्हें नहीं मिलना है।' कवि इस कविता में जैसे संसार के बीच अपने होने का ऋण चुकता करते हुए अनेक चीजों की तरफ इशारा करता है। प्रकृति में निहित आखिरी उम्मीद को भी हमारे ध्यान में लाता है और हमारे समाज के भीतर की नकारात्मकता को भी जिसके चलते कई बार हमारा पल-पल व्यथा का बिम्ब होकर रह जाता है।
कवि इस कविता के बारे में अपनी बात रखते हुए कहता है कि नदी घर एक ऐसी यात्रा पर निकलने का प्रयास है जो इस दुनिया को उन ताकतों से मुक्ति दे जिनके चलते घर कारागार हो गए हैं और हमारा अपना वजूद एक बोझ
Qashqa Khincha Dair Mein Baitha
- Author Name:
Farhat Ehsas
- Book Type:

- Description:
Qashqa Khincha Dair Mein Baitha COLLECTION OF urduPOETRY ISBN13 9788192664897 AUTHOR EDITOR-FARHAT EHSAAS YEAR 2017
Jangal Mein Jheel Jagati
- Author Name:
Haribhajan Singh
- Book Type:

- Description:
आधुनिक पंजाबी कविता में अपनी तरह के अकेले कवि हरिभजन सिंह की कविताओें के इस संकलन को उनकी प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन भी कहा जा सकता है। उनके पहले कविता-संग्रह ‘लासां’ (1956) से लेकर ‘मत्था दीवे वाला’ (1982) तक के सात संग्रहों से चुनी गईं ये कविताएँ उनके कवि-व्यक्तित्व को काफ़ी कुछ सामने ले आती हैं। साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत ‘ना धुप्पे ना छाँवे’ शीर्षक संग्रह की कविताएँ भी इस पुस्तक में संकलित हैं।
गहरे अर्थों में सामाजिक और स्वानुभूति के प्रति अत्यन्त सजग उनके कवि-व्यक्तित्व के बारे में इस चयन की सम्पादक गगन गिल ठीक ही कहती हैं कि उनकी अधिकांश कविता आत्मालाप होते हुए भी अकेले आदमी की कविता नहीं, उसमें कोई है, जो सदा उपस्थित है।
हरिभजन सिंह की कविता में व्यक्ति-मन से टकराते सामाजिक आलोड़न की प्रतिध्वनियाँ इतने प्रामाणिक रूप में सुनाई देती हैं कि स्वातंत्र्योत्तर भारत की आधी सदी का मोटा-मोटी एक ख़ाका हमारी चेतना में बन जाता है—ख़ाका उस यातना का जिसे इतिहास नहीं, कविता ही समझ और प्रकट कर सकती है। बांग्लादेश निर्माण के दौरान बहा ख़ून, आपातकाल, पंजाब का उग्रवाद, ऑपरेशन ब्लूस्टार और परमाणु हथियारों जैसी हर पल मौजूद विपदा को उन्होंने अपनी कविताओं में लगातार सम्बोधित किया है।
वे आवेग के कवि नहीं हैं, उनकी कविता रुककर अपने समय की पड़ताल करती है, और इस तरह उनका सघन और चिन्तनशील मनीषी काव्य-मन एक दीर्घकालीन प्रभाव के रूप में हम तक पहुँचता है।
Pedon Ki Chhaon Mein
- Author Name:
Daya Kishan Sharma ‘Nisheeth’
- Book Type:

- Description:
पुस्तक से- पता नहीं क्यों तू मुझे समझता रहा हर बार इनसान महामानव या कोई दैवीय फरिश्ता बाँध बैठा तू आशाए मुझसे हर रोज उसी के अनुरूप तभी तो मुझसे टूटा तेरा विश्वास हर बार जबकि में इस धरती के एक तुच्छ प्राणी से अधिक कुछ भी नहीं था
Gayatri-Madhubala
- Author Name:
Dr. A.N. Lal Shrivastav +1
- Book Type:

- Description:
Collection of Poems
Jag Me Noor Badha Kar Dekh
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description:
1974 से 1990 के बीच लिखी गयीं चतुष्पदियाँ
Jai Kanhaiyalal Ki
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description:
कवि ने प्रथम पृष्ठ पर ही शीर्षक के नीचे टिप्पणी दी है –“ कृष्ण-रूप में कंस जैसे हर शासक के प्रति “, जिससे मुख्य मन्तव्य स्पष्ट हो जाता है ‘ करारे व्यंग्य – देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर ‘ | रमेशराज के व्यंग्यों की ख़ास बात यह है कि स्तरहीनता नहीं, कहीं अशिष्टता नहीं, न कहीं मर्यादा का उल्लंघन, फिर भी करारे प्रहार | जीवन का भोगा हुआ यथार्थ जैसे साकार सामने खड़ा हो | कैसी सहज-सरल अभिव्यक्ति, लक्ष्य की ओर दनदनाते-सनसनाते तीर की तरह – जन को न रोटी-दाल, जै कन्हैयालाल की नेताजी को तर माल, जै कन्हैयालाल की! नीति है कमाल की !! व्यंग्य को अधिक धारदार और मारक बनाने के लिए कवि ने उद्धव-गोपी प्रसंग को बड़ी होशियारी के साथ जोड़ दिया है- ऊधौ देश पर आप कर्ज विश्वबैंक का लाद-लाद हो निहाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !! कथ्य की सशक्तता के साथ कवि का कौशल भी प्रभावित करता है | इसे मैं उक्ति-वैचित्र्य का कमाल मानता हूँ, साथ ही वर्ण-मैत्री भी निर्दोष एवं प्रभावी है | प्रकृति से जो प्रतीक लिए गए हैं वे कवि के मन्तव्य को भी स्पष्ट करते हैं तथा उनसे काव्य में कलात्मक विम्ब-सौन्दर्य भी प्रभावित करता है | देखिये एक उदाहरण – खुशियों का मानसून अँखियों से दूर है सूख गए सुख-ताल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !! कवि ने अपने कथ्य को अधिक ग्राह्य बनाने के लिए पौराणिक इंगित भी दिए हैं | कहीं विरोधाभास से अपना मन्तव्य स्पष्ट किया है तो कहीं आधुनिक योजनाओं की विडम्बनाओं की ओर इंगित है – केवल अंगूठे नहीं मांगें आज द्रोण जी भील को करें हलाल, जै कन्हैयालाल की ! नीति है कमाल की !!
Jharkhand Ki Samkaleen Kavita
- Author Name:
Ed. Shiromani Mahto +2
- Book Type:

- Description:
झारखंड के 24 कवियों का यह संकलन कई दृष्टि से महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। संकलन में शामिल लगभग सभी कवि बहुत पहले से ही अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करने के लिए जाने जाते रहे हैं। स्मृति-निर्मित प्रत्ययों के माध्यम से अनुभव को विस्तार देने के कारण अनिता वर्मा और ज्ञानात्मक संवेदन की गहराई के कारण अनिल अनलहातु की कविताएँ ध्यान खींचती रही हैं। इसी तरह, उसमें शामिल अन्य सभी चर्चित कवियों—अशोक सिंह, बलभद्र, सुशील कुमार, नीलोत्पल रमेश, अनिल किशोर सहाय, नरेश अग्रवाल, विनय सौरभ, अनिता रश्मि, सुषमा सिन्हा, नीरज नीर आदि की कविताओं में भी औरों से कुछ अलग कहने और दिखने की कोशिश दिखाई देती है। रश्मि शर्मा और अखिलेश्वर पांडेय भी अपने समय के यथार्थ को देखने के नए नज़रिए और संवेदना की बनावट के कारण आकर्षित करते हैं। हालाँकि, इनमें से कुछ कवि भले ही झारखंड के रहवासी हो गए हों, कविता में प्रवासी ही बने हुए हैं। उनकी काव्यभाषा में भी भोजपुरी, मगही, अंगिका आदि की सुगंध है; नगपुरिया, खोरठा, पंचपरगनिया और कुर्माली से उनका रिश्ता बन नहीं पाया है। इसलिए भी यह दुहराना पड़ रहा है कि इस संकलन की खास पहचान आदिवासी कवियों से ही बनती है। वैसे झारखंड की अपनी औद्योगिक संस्कृति भी है, लेकिन इस्पात की धमन-भट्ठियों और कोयला खदानों मेें कार्य करनेवाले मज़दूरों के कठिन संघर्ष पर कविताएँ आश्चर्यजनक रूप से इसमें नहीं हैं। इस छोटी-सी कमी के बाद भी, इसकी विविधता और व्यापकता सराहनीय है। इससे झाारखंड की रचनाशीलता को गति मिलेगी। संपादक त्रयी में एक शिरोमणि महतो तो कवि हैं, लेकिन उनके दो कविता-प्रेमी शिक्षक सहयोगी सुभाष कुमार यादव और राजेश कुमार विशेष बधाई के पात्र हैं। —मदन कश्यप
Numaainda Kahaaniyaan Intizar Hussain
- Author Name:
Intizar Hussain
- Book Type:

- Description:
Zere-e-Nazar This book is a compilation of 10 stories by Intezaar Hussain. Intizar Hussain has also written sixty-five years of Taveel Tasnifi Zindagi Mein novels and Afsane too but his inferred, identity and his head-highness are due to his Afsan. Not only his but also the head of urduAfsane. He wrote about one hundred and fifty stories. It was a very difficult task to choose ten stories out of them, even the stories such that wherever Zarra is there, Aftab is there. Nevertheless, it was our endeavor to bring you some of the best stories of Intezar Hussain.
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book