Dhoop Mein Baithne Ke Din Aaye
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धूप में बैठने के दिन आए' सुनील आफ़ताब का पहला शेरी मज्मूआ है। इस किताब में सुनील आफ़ताब ने नाज़ुक और मद्धम लहजे और सादा ज़बान में अपने एहसासात को बयान किया है, जिसका क़ारी पर कुछ अलग ही असर दिखता है। सुनील आफ़ताब का शुमार नई पीढ़ी के नुमाइन्दा शायरों में होता है।वो पंजाब की मिट्टी से ताल्लुक़ रखते हैं। उनका जन्म 23 नवम्बर, 1976 को पंजाब के पठानकोट ज़िले के गाँव शाहपुर कण्डी में हुआ। उन्होंने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर से बी.एस.सी. तथा जम्मू यूनिवर्सिटी के रामिष्ट कॉलेज से बी.एड. किया। कुछ समय तक अध्यापन करने के बाद वो अपना व्यवसाय करने लगे।
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धूप में बैठने के दिन आए' सुनील आफ़ताब का पहला शेरी मज्मूआ है। इस किताब में सुनील आफ़ताब ने नाज़ुक और मद्धम लहजे और सादा ज़बान में अपने एहसासात को बयान किया है, जिसका क़ारी पर कुछ अलग ही असर दिखता है। सुनील आफ़ताब का शुमार नई पीढ़ी के नुमाइन्दा शायरों में होता है।वो पंजाब की मिट्टी से ताल्लुक़ रखते हैं। उनका जन्म 23 नवम्बर, 1976 को पंजाब के पठानकोट ज़िले के गाँव शाहपुर कण्डी में हुआ। उन्होंने गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर से बी.एस.सी. तथा जम्मू यूनिवर्सिटी के रामिष्ट कॉलेज से बी.एड. किया। कुछ समय तक अध्यापन करने के बाद वो अपना व्यवसाय करने लगे।
Book Details
-
ISBN9789394494794
-
Pages106
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कविता की एक संश्लेषी परम्परा रही है, जिसके भीतर राजेश जोशी की सक्रियता देखी जा सकती है। इसी बात ने उन्हें ख़ास पहचान दी और समकालीन कविता को भी। केदारनाथ सिंह का यह कथन बिलकुल दुरुस्त है कि ‘राजेश जोशी आज की कविता के उन थोड़े से महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षरों में हैं, जिनसे समकालीन कविता की पहचान बनी है।’
राजेश जोशी की ‘समझ’ से समकालीन कविता और उसकी नई पीढ़ी अभिन्न है।
कविता की एक संश्लेषी परम्परा, जो पीछे ही नहीं आगे भी जाती है। इसमें प्रतिरोध और प्रतिबद्धता है तो पर्याप्त लोच भी है।
Mukarrar Irshad
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Sargoshiyan
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मैं किसी रवायत की अनुयायी नहीं हूँ। तभी कहीं काफ़िया नहीं मिलता कभी मीटर से बाहर हो जाती हूँ...नहीं हूँ मैं व्यवस्थित क़िस्म की पोएट...जब ज़िन्दगी एकदम सन्तुलित ना हो तो आप उसे कविताओं, कहानियों में कैसे व्यवस्थित दिखा सकते हैं...फिर ये तो झूठा होगा...सिर्फ़ छपने के लिए उन शब्दों को उठा के एक लाइन से दूसरी में शिफ़्ट कर दूँ...क्या वाक़ई में ज़िन्दगी में जो रिश्ता हमें रास नहीं आया...अपनी मर्ज़ी से हम उसे इधर से उधर शिफ़्ट कर सकते हैं...? नहीं ना...तो आप मुझे मेरी टूटी-फूटी बेतरतीब कविताओं के साथ स्वीकार करें!
Ishq hai Surma-e-Deewanagi
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शाह नियाज़ अहमद साहब के फ़ारसी, उर्दू और हिन्दवी कलाम का संग्रह पहली बार हिंदी पाठकों के समक्ष आ रहा है, जिस में शाह नियाज़ अहमद बरेलवी द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध कलाम शामिल हैं. किताब का संपादन सुमन मिश्र ने किया है..
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