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साहित्य के हज़ारों साल लम्बे इतिहास में जिन चन्द काव्य-विभूतियों को विश्वव्यापी सम्मान प्राप्त है, ग़ालिब उन्हीं में से एक हैं। उर्दू के इस महान शायर ने अपनी युगीन पीड़ाओं को ज्ञान और बुद्धि के स्तर पर ले जाकर जिस ख़ूबसूरती से बयान किया, उससे समूची उर्दू शायरी ने एक नया अन्दाज़ पाया और वही लोगों के दिलो-दिमाग़ पर छा गया। उनकी शायरी में जीवन का हर पहलू और हर पल समाहित है, इसीलिए वह जीवन की बहुविध और बहुरंगी दशाओं में हमारा साथ देने की क्षमता रखती है।</p> <p>काव्यशास्त्र की दृष्टि से ग़ालिब ने स्वयं को ‘गुस्ताख़’ कहा है, लेकिन यही उनकी ख़ूबी बनी। उनकी शायरी में जो हलके विद्रोह का स्वर है, जिसका रिश्ता उनके आहत स्वाभिमान से ज़्यादा है, उसमें कहीं शंका, कहीं व्यंग्य और कहीं कल्पना की जैसी ऊँचाइयाँ हैं, वे उनकी उत्कृष्ट काव्य-कला से ही सम्भव हुई हैं। इसी से उनकी ग़ज़ल प्रेम-वर्णन से बढ़कर जीवन-वर्णन तक पहुँच पाई। अपने विशिष्ट सौन्दर्यबोध से पैदा अनुभवों को उन्होंने जिस कलात्मकता से शायरी में ढाला, उससे न सिर्फ़ वर्तमान के तमाम बन्धन टूटे, बल्कि वह अपने अतीत को समेटते हुए भविष्य के विस्तार में भी फैलती चली गई। निश्चय ही ग़ालिब का यह दीवान हमें उर्दू-शायरी की सर्वोपरि ऊँचाइयों तक ले जाता है।
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साहित्य के हज़ारों साल लम्बे इतिहास में जिन चन्द काव्य-विभूतियों को विश्वव्यापी सम्मान प्राप्त है, ग़ालिब उन्हीं में से एक हैं। उर्दू के इस महान शायर ने अपनी युगीन पीड़ाओं को ज्ञान और बुद्धि के स्तर पर ले जाकर जिस ख़ूबसूरती से बयान किया, उससे समूची उर्दू शायरी ने एक नया अन्दाज़ पाया और वही लोगों के दिलो-दिमाग़ पर छा गया। उनकी शायरी में जीवन का हर पहलू और हर पल समाहित है, इसीलिए वह जीवन की बहुविध और बहुरंगी दशाओं में हमारा साथ देने की क्षमता रखती है।</p>
<p>काव्यशास्त्र की दृष्टि से ग़ालिब ने स्वयं को ‘गुस्ताख़’ कहा है, लेकिन यही उनकी ख़ूबी बनी। उनकी शायरी में जो हलके विद्रोह का स्वर है, जिसका रिश्ता उनके आहत स्वाभिमान से ज़्यादा है, उसमें कहीं शंका, कहीं व्यंग्य और कहीं कल्पना की जैसी ऊँचाइयाँ हैं, वे उनकी उत्कृष्ट काव्य-कला से ही सम्भव हुई हैं। इसी से उनकी ग़ज़ल प्रेम-वर्णन से बढ़कर जीवन-वर्णन तक पहुँच पाई। अपने विशिष्ट सौन्दर्यबोध से पैदा अनुभवों को उन्होंने जिस कलात्मकता से शायरी में ढाला, उससे न सिर्फ़ वर्तमान के तमाम बन्धन टूटे, बल्कि वह अपने अतीत को समेटते हुए भविष्य के विस्तार में भी फैलती चली गई। निश्चय ही ग़ालिब का यह दीवान हमें उर्दू-शायरी की सर्वोपरि ऊँचाइयों तक ले जाता है।
Book Details
-
ISBN9788126705276
-
Pages432
-
Avg Reading Time14 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
‘गरुड़ किसने देखा है’ श्रीकान्त वर्मा का छठा काव्य-संग्रह है, जो उनके निधन के लगभग वर्ष-भर बाद प्रकाशित हो रहा है। उनका पिछला संग्रह ‘मगध’ कवि की संवेदना को जिस निर्णायक बिन्दु पर छोड़ गया था, प्रस्तुत संग्रह उसके बाद की रचनात्मक यात्रा का प्रामाणिक दस्तावेज़ है। यहाँ एक ही साथ एक कलात्मक परिणति तक पहुँचे हुए कवि की परिपक्वता भी मिलेगी और एक नए प्रस्थान की छटपटाहट भी। यहाँ तक आते-आते कवि का अनुभव-लोक नई भावभूमियों के संस्पर्श से और समृद्ध हुआ है और शायद इसी के चलते कवि की भाषा में एक नई सरलता आई है और एक पारदर्शी विनयशीलता भी, जो सिर्फ़ श्रेष्ठ कविता में पाई जाती है। इस संग्रह की कविताओं का एक छोर काशी को छूता है, दूसरा सुदूर पेरिस को और इस तरह बनता है कवि की रचनात्मक यात्रा का एक पूरा इतिहास और भूगोल—और दोनों अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही साथ।
प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ बीसवीं शताब्दी के अँधेरे से निकलने की कोशिश से पैदा होनेवाली कविताएँ हैं। इसीलिए यहाँ केवल अतीत की पीड़ा और वर्तमान की कड़वाहट ही नहीं, ‘भविष्य को न भुला पाने’ की एक रचनात्मक तड़प भी है। मृत्यु के विरुद्ध लड़ते हुए कवि की इन कविताओं में जीवन का एक गहरा स्वीकार है और उसके प्रति एक सच्ची, पीड़ाभरी मानवीय ललक भी। यही बात ‘गरुड़ किसने देखा है’ को विशिष्ट बनाती है और सार्थक भी। कवि के ही शब्दों में—
कितना लुभावना कितना सरल
निरर्थक होते हुए भी सार्थक है
यह संसार।
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