Chaand Mein Bhi Daag Hai
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Author:
Dilip Kumar Chauhan 'Baaghi'Publisher:
Author'S Ink PublicationsLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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The title "Chaand Mein Bhi Daag Hai" is written by Dilip Kumar Chauhan "Baaghi" which is a Hindi Poetry Book
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The title "Chaand Mein Bhi Daag Hai" is written by Dilip Kumar Chauhan "Baaghi" which is a Hindi Poetry Book
Book Details
-
ISBN9788194924449
-
Pages100
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: सातवें दशक में ‘नाटक जारी है’ के प्रकाशन से लीलाधर जगूड़ी की कविता अपने विभिन्न पेचीदा मोड़ों और पड़ावों से होती हुई बीसवीं सदी के अन्तिम दशक में ‘अनुभव के आकाश में चाँद’ नामक इस नए संग्रह के साथ एक नई जगह पर आ पहुँची है। इन 74 कविताओं में जगूड़ी अपने समय के बाहर और भीतर को; पास और दूर को; उसके अन्तःस्रोतों और अन्तर्विरोधों को एक साथ देख लेते हैं। निरन्तर होते जा रहे इस संसार के ताप से पके हुए आत्मस्थ सौन्दर्य की ये कविताएँ स्मृति, उपस्थिति और सम्भाव्यता के बीच सहज आवाजाही करती हैं। इन कविताओं में अनुभव का आकाश एक साथ ऊँचा और गहरा; विस्तृत और सघन हुआ है। जगूड़ी की पहचान सबसे पहले अपने समय और परिवेश को पैनी निगाह से देखनेवाले कवि के रूप में रही है लेकिन इस संग्रह में वे मूलभूमि छोड़े बिना और अधिक अनुभव सम्पन्न होकर बाहर आते दिखते हैं। यह बाहर आना समकालीनता का इतिहास लिखने जैसा एक महत्त्वपूर्ण उपक्रम जान पड़ता है। ‘अनुभव के आकाश में चाँद’ की कविताएँ हमें हिन्दी कविता का एक नया व्यक्तित्व दिखाती हैं। इसकी वजह कथ्य के अलावा इनके उस शिल्प की विविधता में भी है जो अत्यन्त संवेदनशील भाषा और जोख़िम उठाती प्रयोगशीलता से भरी हुई है। दरअसल यह संग्रह कवि के इस विश्वास का भी उदाहरण है कि जीवन के हरेक अनुभव को भाषा का अनुभव बनना चाहिए। जीवन के बाज़ार में आत्मा की तरह विस्मृत और विकल ये कविताएँ इस सच को रेखांकित करती चलती हैं कि सिक्के का दूसरा पहलू कहीं ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। दृश्य के अदृश्य को दिखाने में जगूड़ी की इन कविताओं की तात्तिवक मुखरता और इनका आत्मनिष्ठ एकान्त अपने साथ हमें संलग्न ही नहीं करते, बल्कि अपने में अन्तर्निहित भी करते हैं।
Bina Munder Ki Chaat
- Author Name:
Prem Ranjan Animesh
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Description:
प्रेम रंजन अनिमेष भारतीय लोक की जड़ों में जीवित जिजीविषा के गायक हैं। उनकी कविताएँ हमारे आसपास फैली उन चीज़ों तक पहुँचती हैं जिन्हें हमने अब लगभग देखना बन्द कर दिया है लेकिन इसके बावजूद वे दुनिया को चलाए रखने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। ये कविताएँ न किसी बड़े परिवर्तन का आह्वान करती हैं और न ऊँची हाँक लगाकर हमें कुछ ऐसा करने को कहती हैं जो हमें हमारे अतीत से काटकर किसी नए अनोखे संसार में स्थापित कर दे। भले ही वह कितना भी सुन्दर, कितना भी अद्भुत, कितना भी पूरा क्यों न हो। ये कविताएँ हमें अपने इसी अधूरे संसार में रच-बसकर जीने के सूत्र थमाती हैं। इसके दुखों की सुन्दरता, इसके अभावों का मोहक आकर्षण, इसकी विसंगतियों के भीतर छिपी आन्तरिक लय, और हर हाल में मौजूद उम्मीद, वे चीज़ें हैं जिन पर, लगता है कवि को आज के दावों-वादों की बड़बोली दुनिया में सबसे ज़्यादा यक़ीन है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यही यक़ीन इस देश का सबसे बड़ा सम्बल आज भी है जब हर तरफ़ क़िस्म-क़िस्म के उद्धारकर्ता अपने-अपने ढंग से अपना-अपना उद्धार कर रहे हैं। ‘किसी बच्चे के कुछ सवाल लिए चला आया हूँ/एक सहपाठी के इम्तिहान कैसे गए जानना चाहता हूँ.../’ (पहली गली); ‘भरी हुई गाड़ी में/कैसे कहाँ रखूँ/टपटप चूता अपना छाता/जो बचाकर यहाँ तक लाया?’ (मनुष्यता); ‘इस विकसित तंत्र में/है नहीं ऐसा जरिया/जो पहुँचा पाए/रास्ते में पड़े एक पाँव के जूते को/उसके संगी तक...मैं ईश्वर को देखना चाहता हूँ इस नन्ही दुनिया में/अपने बड़े पाँव में एक नन्हा जूता पहने/दूसरे की तलाश में...’ (एक पाँव का जूता)।
धीमी आँच पर सिंकती-सेंकती ऐसी अनेक कविता-पंक्तियाँ, अनेक कविताएँ हैं जिन्हें आप उपलब्धियों की तरह हमेशा साथ रखना चाहेंगे। लोकभाव को बहुत गहरे में जीने और पुनर्रचित करनेवाले प्रेम रंजन अनिमेष इस संग्रह में पुन: साबित करते हैं कि लोक-बिम्ब काव्य-प्रविधि मात्र नहीं हैं, वे वैकल्पिक जीवन-दृष्टि के संवाहक हैं।
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