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ये किताब हिन्दुस्तान की सूफ़ी परम्परा की प्रमुख आवाज़ों को सामने लाने की एक कोशिश है। इस किताब में मशहूर शाइर बेदम शाह वारसी की ग़ज़लों, फ़ारसी कलाम, मंक़बत, हम्द, नात, सलाम, मुनाजात, रुबाइयात, क़तआत और पूरबी कलाम का संग्रह है। इस किताब का संकलन एवं सम्पादन सुमन मिश्र ने किया है।
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ये किताब हिन्दुस्तान की सूफ़ी परम्परा की प्रमुख आवाज़ों को सामने लाने की एक कोशिश है। इस किताब में मशहूर शाइर बेदम शाह वारसी की ग़ज़लों, फ़ारसी कलाम, मंक़बत, हम्द, नात, सलाम, मुनाजात, रुबाइयात, क़तआत और पूरबी कलाम का संग्रह है। इस किताब का संकलन एवं सम्पादन सुमन मिश्र ने किया है।
Book Details
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ISBN9789394494145
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Pages156
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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केदारनाथ सिंह का यह नया संग्रह कवि के इस विश्वास का ताज़ा साक्ष्य है कि अपने समय में प्रवेश करने का रास्ता अपने स्थान से होकर जाता है। यहाँ स्थान का सबसे विश्वसनीय भूगोल थोड़ा और विस्तृत हुआ है, जो अनुभव के कई सीमान्तों को छूता है। इन कविताओं में कवि की भाषा और पारदर्शी हुई है—और संवादधर्मी भी। संग्रह की लम्बी कविता ‘मंच और मचान’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि यहाँ कटते हुए वृक्ष के विरुद्ध एक व्यक्ति (चीना बाबा) का प्रतिरोध ‘घर’ के लिए आदमी के बुनियादी संघर्ष का रूपक बन जाता है। यहाँ तुच्छ कीचड़ भी दुनिया बचाने के लिए सक्रिय दीखता है और घास की एक छोटी-सी पत्ती भी बैनर उठाए हुए मैदान में खड़ी है। पानी, कपास, लकड़ी और धूल जैसी छोटी-छोटी चीज़ों की बेचैनी से भरी ये कविताएँ कोई दावा नहीं करतीं। वे सिर्फ़ आपसे बोलना-बतियाना चाहती हैं—एक ऐसी भाषा में जो जितनी इनकी है उतनी ही आपकी भी।
Kamal Ki Auratein
- Author Name:
Shailja Pathak
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कमाल की औरतें हैं वो जो कितना कुछ सहकर बनी रहीं; कमाल की औरतें हैं वो जिन्होंने अपने मन की किसी हौंस के लिए सारे ज़माने को ठेंगे पर रख उड़ा दिया; कमाल की औरतें हैं वो जो अपनी हर ख़ूबी को छिपाकर पति को बड़ा बनने का मौक़ा देती रहीं; कमाल की औरतें हैं वो जो बच्चों के मज़ाक़ का विषय बनती, रहीं फिर भी उन्हें असीसती रहीं; और कमाल की औरतें हैं वो जो हमारी छोटी या बड़ी बहनें हैं, बुआ हैं, दादी फुआ हैं, जिनकी ज़िन्दगी का कितना समय इस इन्तज़ार में बीत गया कि नैहर से बुलावा आएगा कि उनके भाई-पिता-माँ-भाभियाँ, भतीजे-भतीजियाँ उन्हें गले से लगा सुनेंगे उनके दुख, पूछेंगे कि कैसी बीत रही है, कि कोई दुख तो नहीं है तुम्हें...
कमाल की औरतें संग्रह में सब तरह की औरतें मौजूद हैं—पीड़ित, अकेली, विद्रोही, दाम्पत्य को छिन्न-भिन्न करने को आतुर भी, और दाम्पत्य में खप जाने को तत्पर भी—जिन्हें शैलजा पाठक की भाव-प्रवण भाषा में अभिव्यक्ति मिली है—बिलकुल ऐसे जैसे दोपहर बाद के सुस्ताते समय की बतकहियों में।
इनमें से कई औरतें हैं जिन्हें प्रचलित स्त्री-विमर्श अच्छे से जानता है, लेकिन कुछ हैं जिनके दुख पर आधुनिक दृष्टि उस तरह नहीं पड़ी। यह अच्छी बात है कि उन्हें लेकर इस संग्रह में पर्याप्त कविताएँ हैं। समय से पहले बूढ़ी होती बहनें-बुआएँ—नैहर और ससुराल के बीच की धूल उड़ाती पगडंडियों पर जिनके असंख्य दुख अदेखे ग़ायब हो जाते हैं—इन कविताओं में उन्हें पढ़ना दुख के किसी टापू पर अचानक पहुँच जाने जैसा है...स्तब्धकारी!
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