Adhoora Koi Nahin
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यह 1998 का साल था, जब आर. अनुराधा को पता चला कि उन्हें स्तन कैंसर है। उन दिनों कैंसर आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा डरावना था। लेकिन अनुराधा ने बड़े हौसले के साथ इस बीमारी का सामना किया। हँसते हुए, घूमते हुए, दोस्तों से फ़ोन पर बतियाते हुए, पढ़ते हुए, लिखते हुए, इन सबके बीच कीमोथेरेपी के कई यंत्रणादायी दौर झेलते हुए, अपने बाल झड़ते देखते हुए, अपनी कमज़ोर पड़ती प्रतिरोधक क्षमता को महसूस करते हुए। सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के बाद अन्तत: वे इन सबसे उबरीं। लेकिन इस दौर में हासिल अनुभव पर उन्होंने एक किताब लिखी—‘इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे : एक कैंसर विजेता की डायरी’।</p> <p>2005 के शुरू में जामिया मिल्लिया के कुछ छात्रों ने अनुराधा पर एक फ़िल्म बनाई—‘भोर’। पूरी फ़िल्म में अनुराधा की आवाज़ के अलावा कोई वायस ओवर नहीं है। फ़िल्म में अनुराधा बताती हैं—कैंसर के ख़िलाफ़ जंग में शरीर एक मैदान होता है, लेकिन यह लड़ाई बहुत सारे लोगों की मदद से जीती जाती है। घर-परिवार, दोस्त-रिश्तेदार इस युद्ध में ज़रूरी रसद पहुँचाने का काम करते हैं। जब यह फ़िल्म बन ही रही थी कि अनुराधा को दुबारा कैंसर ने घेर लिया। फिर वही कीमोथेरेपी, सर्जरी, रेडियोथेरेपी वही सब कुछ और वही हिम्मत—अनुराधा ने इस दौरान भी फ़िल्म शूट करने की इजाज़त दी।</p> <p>जैसा कि दोस्तों को भरोसा था, अनुराधा यह जंग भी जीतकर निकलीं। इस दौरान उन्होंने कैंसर के डर के ख़िलाफ़ एक पूरी लड़ाई छेड़ी। कैंसर की जद में आई दूसरी महिलाओं से जुड़ीं, यह समझाती रहीं कि कैंसर से लड़ा जा सकता है और बताती रहीं कि कैसे लड़ा जा सकता है.</p> <p>साल 2012 में अनुराधा को फिर से कैंसर ने घेर लिया। इस बार उसने उनकी हड्डियों पर हमला किया है। हमेशा की तरह अनुराधा लड़ती रहीं. हमेशा की तरह. और इस बार उन्होंने बहुत सारी कविताएँ लिखीं।</p> <p>मैं क़तई नहीं चाहूँगा कि आप इन कविताओं को किसी सहानुभूति के साथ पढ़ें। अनुराधा को ऐसी सहानुभूति नहीं चाहिए। वह हममें से कई लोगों से ज़्यादा स्वस्थ और मज़बूत बनी रहीं। हाँ, इन कविताओं के आस्वाद के लिए ज़रूरी है कि इन्हें कलावादी आग्रहों के जंजाल से बाहर निकलकर संवेदनशीलता से पढ़ा जाए। वैसे भी ये सिर्फ़ निजी तकलीफ़ की कविताएँ नहीं हैं, ये दर्द और मृत्यु के विरुद्ध मनुष्य के साझा युद्ध की कविताएँ हैं।</p> <p>—प्रियदर्शन
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यह 1998 का साल था, जब आर. अनुराधा को पता चला कि उन्हें स्तन कैंसर है। उन दिनों कैंसर आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा डरावना था। लेकिन अनुराधा ने बड़े हौसले के साथ इस बीमारी का सामना किया। हँसते हुए, घूमते हुए, दोस्तों से फ़ोन पर बतियाते हुए, पढ़ते हुए, लिखते हुए, इन सबके बीच कीमोथेरेपी के कई यंत्रणादायी दौर झेलते हुए, अपने बाल झड़ते देखते हुए, अपनी कमज़ोर पड़ती प्रतिरोधक क्षमता को महसूस करते हुए। सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के बाद अन्तत: वे इन सबसे उबरीं। लेकिन इस दौर में हासिल अनुभव पर उन्होंने एक किताब लिखी—‘इन्द्रधनुष के पीछे-पीछे : एक कैंसर विजेता की डायरी’।</p>
<p>2005 के शुरू में जामिया मिल्लिया के कुछ छात्रों ने अनुराधा पर एक फ़िल्म बनाई—‘भोर’। पूरी फ़िल्म में अनुराधा की आवाज़ के अलावा कोई वायस ओवर नहीं है। फ़िल्म में अनुराधा बताती हैं—कैंसर के ख़िलाफ़ जंग में शरीर एक मैदान होता है, लेकिन यह लड़ाई बहुत सारे लोगों की मदद से जीती जाती है। घर-परिवार, दोस्त-रिश्तेदार इस युद्ध में ज़रूरी रसद पहुँचाने का काम करते हैं। जब यह फ़िल्म बन ही रही थी कि अनुराधा को दुबारा कैंसर ने घेर लिया। फिर वही कीमोथेरेपी, सर्जरी, रेडियोथेरेपी वही सब कुछ और वही हिम्मत—अनुराधा ने इस दौरान भी फ़िल्म शूट करने की इजाज़त दी।</p>
<p>जैसा कि दोस्तों को भरोसा था, अनुराधा यह जंग भी जीतकर निकलीं। इस दौरान उन्होंने कैंसर के डर के ख़िलाफ़ एक पूरी लड़ाई छेड़ी। कैंसर की जद में आई दूसरी महिलाओं से जुड़ीं, यह समझाती रहीं कि कैंसर से लड़ा जा सकता है और बताती रहीं कि कैसे लड़ा जा सकता है.</p>
<p>साल 2012 में अनुराधा को फिर से कैंसर ने घेर लिया। इस बार उसने उनकी हड्डियों पर हमला किया है। हमेशा की तरह अनुराधा लड़ती रहीं. हमेशा की तरह. और इस बार उन्होंने बहुत सारी कविताएँ लिखीं।</p>
<p>मैं क़तई नहीं चाहूँगा कि आप इन कविताओं को किसी सहानुभूति के साथ पढ़ें। अनुराधा को ऐसी सहानुभूति नहीं चाहिए। वह हममें से कई लोगों से ज़्यादा स्वस्थ और मज़बूत बनी रहीं। हाँ, इन कविताओं के आस्वाद के लिए ज़रूरी है कि इन्हें कलावादी आग्रहों के जंजाल से बाहर निकलकर संवेदनशीलता से पढ़ा जाए। वैसे भी ये सिर्फ़ निजी तकलीफ़ की कविताएँ नहीं हैं, ये दर्द और मृत्यु के विरुद्ध मनुष्य के साझा युद्ध की कविताएँ हैं।</p>
<p>—प्रियदर्शन
Book Details
-
ISBN9788183616560
-
Pages100
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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इस पुस्तक में नई किताबों नए शोधों को आत्मसात् किया गया है। नेचर, साइंस एवं साइंटिफ़िक अमेरिकन में परिपक्व शोधों के आधार पर, भाषाओं के अन्तर्द्वन्द्व को ठोस वस्तुओं, लेखों-शिलालेखों एवं प्रशस्तियों को इतिहास के परिप्रेक्ष्य में रखा गया है। भारतीय इतिहास लेखन में भी स्वतंत्रता आन्दोलन के ‘भारतीयपन’ को पिछली सीट दी जाने लगी है। मार्क्सीय लेखन में वस्तुपरकता एवं चीज़ों के आधार पर सम्बन्धों की परख शुरू हुई है। नए इतिहासकार ‘लोकल’ तथा ‘सब आल्टर्न’ को समझते हैं। इन सबकी ब्योरेवार तो नहीं किन्तु पूरी नई समीक्षा की गई है।
हीगेल, वाल्तेयर ‘इतिहास के दर्शन’ को समझाते हैं तथा इसे धर्म तथा धार्मिक मान्यताओं से अलग भी करते हैं। वे दोनों ‘इतिहास का दर्शन’ एवं ‘दर्शन का इतिहास’ में दिलचस्पी रखते हैं तथा इतिहास को रीजन से संचालित मानते हैं। उसी परम्परा में एक वैज्ञानिक ईमानदार प्रयास।
—भूमिका से
Kuchh Bhi Vaisa Nahin
- Author Name:
Uma Shankar Choudhary
- Book Type:

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हिन्दी कविता में अपनी अलग पहचान बना चुके उमा शंकर चौधरी का यह कविता-संग्रह हाल के वर्षों में सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर हुए उन तमाम बदलावों का साक्ष्य है जिन्होंने आम आदमी की मुश्किल जिन्दगी को और मुश्किल बना दिया है। संग्रह की कविताएँ समाज की गति और दिशा का बेबाक आकलन ही नहीं करती हैं, उनके निहितार्थों को भी उद्घाटित करती हैं।
कम ही कवि ऐसे हैं जिनके यहाँ राजनीतिक कविताएँ इतनी शिद्दत से अनवरत आती रही हैं जितनी उमा शंकर के यहाँ। उनका राजनीतिक पक्ष स्पष्ट है, इसलिए उनकी कविताएँ भी अपना पक्ष तय करती हुई आम आदमी के हक में जाकर खड़ी हो जाती हैं। समसामयिक राजनीति जिस नए सत्य को गढ़ने और समाज को उसे अपनाने के लिए बाध्य करने को प्रयासरत है, उसकी वास्तविकता को ये कविताएँ सूक्ष्मता से रेखांकित करती हैं। कविता को अपने समय से किस तरह सम्पृक्त होना चाहिए और किस तरह उसे अपने समय का एक अन्तर्पाठ तैयार करना चाहिए ये कविताएँ इसका उदाहरण हैं।
इन कविताओं में अपने समय के प्रति कवि का क्षोभ और क्रोध तो है लेकिन उनसे कहीं ज्यादा दुख है। यहाँ स्त्री का दुख है तो घरों में बन्द होने को मजबूर बच्चों का दुख भी। यहाँ हमारे भीतर की मरती जा रही संवेदनशीलता का दुख है तो सड़कों पर उतर चुकी भीड़ के उन्मादी हो जाने का दुख भी। यहाँ सत्ता की बढ़ती निरंकुशता के कारण दुख है तो उसके खिलाफ उठ रहे प्रतिरोध की आवाज को दबाए जाने का दुख भी। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने समय की भयावहता को दर्ज करते कवि में दुख एक स्थायीभाव की तरह स्थापित हो गया है। कहना न होगा कि इस दुखबोध में ही मनुष्यता का भविष्य निहित है।
दरअसल ये कविताएँ अपने समय-समाज का एक ऐसा दस्तावेज हैं जो मनुष्यता की पक्षधरता में हमेशा प्रासंगिक बनी रहेंगी।
Sab Itna Asamapt
- Author Name:
Kunwar Narain
- Book Type:

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‘सब इतना असमाप्त’ अपने शीर्षक से ही संग्रह की अन्तर्वस्तु का आभास देता है। इसकी अधिकांश कविताएँ वर्ष 2010 के बाद लिखी गई हैं। यहाँ कुछ अन्य काव्य-प्रयोग भी शामिल हैं जो कविता और उसकी एक बड़ी दुनिया में कवि की निरन्तर आवाजाही के प्रमाण हैं। कुँवर नारायण ने किसी भी क़ीमत पर कविता की भूमिका को सीमित करके नहीं देखा। उन्होंने अपनी एक कविता में प्रतीकात्मक लहजे़ में कहा है कि मैं कभी भी अपनी कविताओं का अन्त नहीं लाना चाहता। उस जीवन्त नाते को बनाए रखना चाहता हूँ जिसे अन्त समाप्त कर देता है। वे हमेशा अनन्तिम कविताएँ लिखना चाहते थे, इसलिए अन्तहीन भी। प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ अपने आप में उनकी इस चिन्ता को मूर्त करती हैं और इस तरह अन्त और आरम्भ की एक व्यापक और परस्पर अभिन्न परिकल्पना हमारे सामने रखती हैं।
संग्रह की कविताएँ बहुत अनोखे ढंग से बेचैन करती हैं और आश्वस्त भी। इनमें एक बड़े कवि के समस्त अनुभवों की काव्यात्मक फलश्रुति है और अक्सर एक भव्य उदासी का गूँजता हुआ स्वर। यहाँ कुछ भूली-बिसरी यादों का कोलाज है और अप्रत्याशित विडम्बनाओं की ओर लुढ़कते हुए समाज की चिन्ता भी। पूरे संग्रह में सागर के दो तटों की तरह जीवन और मृत्यु के विविध अनुभवों-आहटों की कविताएँ एक सायुज्य में हैं।
हिन्दी के शीर्षस्थ कवि कुँवर नारायण ने अपनी कृतियों के माध्यम से एक पूरा अलग 'पैराडाइम’ रचा है। इसी क्रम में प्रस्तुत संग्रह की कविताएँ एक नए रूप में उनकी उपस्थिति को सम्भव बनाती हैं। इसमें उनकी काव्य-यात्रा भौतिक-अभौतिक, नैतिक-अनैतिक, लौटना-जाना, अन्त और आरम्भ, जिजीविषा और मुमुक्षा की परस्पर यात्रा रही है। पूरे संग्रह में यह संवेदनशीलता क्रमश: बहुआयामी विस्तार पाती गई है और कुँवर नारायण का एक बेहद सघन और अनुभव-समृद्ध काव्य-संसार पाठकों के सामने खुलता चला जाता है।
Jindagi Ke Liye Hi
- Author Name:
Ripusudan Shrivastava
- Book Type:

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कविता मौलिक रूप से अनुभव का शाब्दिक विस्तार है। जीवन के तमाम अनुभव जब कल्पना और विचार का साहचर्य प्राप्त करते हैं तब अभिव्यक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। रिपुसूदन श्रीवास्तव का कविता-संग्रह ‘ज़िन्दगी के लिए ही’ एक लम्बे जीवनानुभव को विभिन्न छवियों में व्यक्त करता है।
आज अनेक कारणों से मनुष्य और समाज तथा मनुष्य और प्रकृति के बीच दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। व्यक्ति अपनी जड़ों से दूर होकर एक बनावटी ज़िन्दगी में बन्दी-सा हो गया है। एक उचाटी शाश्वत भाव-सी बन गई है। स्मृतियाँ हैं कि बार-बार वर्तमान पर दस्तक देती हैं। वे क्षण जो बरसों पहले समय की सदी में प्रवाहित हो गए, जाने कैसे आकुलता के जल में उभर आते हैं...इस संग्रह की कविताएँ ऐसे बहुत सारे तथ्यों को नेपथ्य में महसूस करते हुए रची गई हैं। इनकी सहजता-सरलता ही इनका अलंकरण है।
Veerta Par Vichlit
- Author Name:
R. Chetankranti
- Book Type:

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आर. चेतनक्रान्ति की कविताएँ औसत जीवन की महत्तर कविताएँ हैं।
उत्तर-पूँजीवाद ने पिछले दो दशकों में बेकारी, विस्थापन, ऊब और उदासी का अपरम्पार गाद जमा किया है। चेतनक्रान्ति इससे गुज़रकर इस महाजीवन की धकधक को पकड़नेवाले सबसे संवेदनशील कवि हैं। और उनकी कविताएँ औसत आदमी की अकुलाहट, हताशा, टूटन व बाज़ार द्वारा गढ़े मौज़-मज़ा-मस्ती की बर्बरता के बीच अन्तर्निहित सूत्रों को बहुत सहज ढंग से उद्घाटित करती हैं। ये कविताएँ हमारे स्वप्न, डर, उन्माद और उपभोग में निहित ताक़त और दमन के महीन सूत्रों को अनायास खोलती चलती हैं। यहाँ ‘ताक़त’ अलग-अलग व्यंजनाओं में सबसे केन्द्रीय पद है। हमारे तमाम भाव-अनुभाव ताक़त की इस अदृश्य संरचना का ही प्रभावोत्पाद हैं, इस बात को समझने के लिए यहाँ संकलित प्रेम कविताओं को धैर्य से पढ़ना चाहिए। प्रेम यहाँ हिन्दी के सामान्य तन्द्रिल संसार से भिन्न; दैनंदिन जीवन की कशमकश और औसत आदमी की बेचारगी के बीच एक सघन मानुष गन्ध की तरह है। प्रेम यहाँ औसतपने में जीवन की सार्थकता और अस्तित्व को थोड़ा गहरा संवेदनात्मक आधार देता है।
इन कविताओं में स्थिति और अवस्थितियों के कारणभूत तत्त्वों तक पहुँचने की तड़प के साथ संरचनात्मक अन्तर्विरोधों से पैदा हुआ बहुत जैविक तरह का प्रतिरोध है। इसे प्रचलित मुहावरों और लोकप्रिय मुद्राओं में घटाकर समझने का प्रयास व्यर्थ है। यह किसी विचार-व्यवस्था और क्रान्ति के शास्त्र से नहीं बल्कि पूँजी और पितृसत्ता के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा, खीझ और न्याय की आकांक्षा है जो कौरवी बोली के देशज ताप से ख़ास संवादधर्मी शिल्प में ढल जाता है।
—आशीष मिश्र
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