Imroz
Author:
Kunal HridayPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Plays0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
इमरोज़ साहित्यिक जगत के एक अत्यन्त चर्चित और लगभग मिथकीय गरिमा हासिल कर चुके प्रेम-सम्बन्ध को नए और प्रासंगिक ढंग से प्रस्तुत करता नाटक है। अमृता प्रीतम और इमरोज़ के सम्बन्धों की कहानी न तो अनजानी है, न ही अस्पष्ट। इस कहानी के सिरे साहिर लुधियानवी और प्रीतम सिंह से भी जुड़ते हैं। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इस कहानी के नायक इमरोज़ हैं और नायिका अमृता। मुश्किल यह है कि साहित्य-जगत में अमृता का मुक़ाम इतना ऊँचा और उनका असर इतना व्यापक है कि उसकी विशाल छाया में समर्पित-हृदय इमरोज़ का व्यक्तित्व प्राय: ओझल-अदेखा रह गया है। युवा नाटककार कुनाल हृदय ने इसी अदेखे पक्ष को अपने इस नाटक में अत्यन्त प्रभावी ढंग से पेश किया है जिसमें इमरोज़ एक उदात्त प्रेमी के रूप में सामने आते हैं।</p>
<p>इमरोज़ में रिश्तों की एक बारीक गुत्थी खुलती है जो इनसानी स्वभाव के बेहद नाज़ुक लेकिन ज़रूरी पक्ष पर रोशनी डालती है इसमें उम्मीद और असलियत का टकराव तो है, पर प्रेम के लिए हाथ बढ़ा चुका इमरोज़ अहंकार को बीच में एकदम नहीं आने देता। इस नाटक में हम एक ‘नए’ प्रेमी का दर्शन करते हैं जिसे प्रेमी, प्रेमिका और रक़ीब के पारम्परिक त्रिकोण से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता।
ISBN: 9788196763169
Pages: 136
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: दुर्योधन ने अगर श्रीकृष्ण को युद्ध के मैदान में सारथी के रूप में माँगा होता तो क्या आज जो गीता बनी है, वह वैसी ही रहती? नहीं, गीता बदल जाती है। वह गीता श्रीकृष्ण और दुर्योधन के बीच हुए वार्त्तालाप पर आधारित होती। यदि दुर्योधन की गीता बन जाती, उसके अठारह अध्याय बन जाते तो आज कितने लोगों को लाभ हो रहा होता, यह आप खुद सोच सकते हैं। आज विश्व में कौन से लोग ज्यादा हैं—कौरव या पांडव? दुर्योधन या अर्जुन? किसकी गीता बनना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है? अर्जुन यानी वह इनसान, जो सत्य सुनने के लिए तैयार है और दुर्योधन यानी वह, जो सत्य सुनना ही नहीं चाहता। युद्ध के मैदान में यदि आप होते तो आपके सवाल क्या होते? आपकी गीता कैसी होती है? आपकी गीता अर्जुन से अलग होती, आपके सवाल भी अलग होते, इसलिए कहा जाता है कि हर एक की गीता अलग है, आपकी गीता अलग है। अपनी गीता ढूँढ़ने का कर्म करें, अपने कृष्ण आप बनें, यही सच्चा कर्मयोग है।
Ant Ka Ujala
- Author Name:
Krishna Baldev Vaid
- Book Type:

- Description: यह वाक्य प्रायः सुनने को मिलता है कि हिन्दी में मौलिक नाट्यालेखों का अभाव है। इस अभाव को कृष्ण बलदेव वैद सरीखे वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित रचनाकार काफ़ी हद तक दूर करते हैं। ‘भूख आग है’, ‘हमारी बुढ़िया’, ‘सवाल और स्वप्न’ एवं ‘परिवार अखाड़ा’ जैसे उनके उल्लेखनीय नाटकों ने हिन्दी रंगकर्म को पर्याप्त समृद्ध किया। इसी क्रम में कृष्ण बलदेव वैद का नया नाटक ‘अन्त का उजाला’ कुछ नए रचनात्मक प्रयोगों के साथ उपस्थित है। यह विदित है कि वैद भाषा में निहित अर्थों व ध्वनियों के साथ मानीख़ेज़ खिलवाड़ करते हैं। कथ्य और शिल्प में नए प्रयोग करते हुए वे किसी बड़े जीवन सत्य को रेखांकित करते हैं। ‘अन्त का उजाला’ जीवन की वृद्धावस्था में ठहरे पति-पत्नी की मनोदशा को एक 'अनौपचारिक भाषिक उपक्रम' में व्यक्त करता है। सावधानी से पढ़ें, अनुभव करें तो पूरा नाटक प्रतीकों से भरा है। लेखक एक स्थान पर कहता है, ‘एक आदर्श प्रतीक की तरह उसे याद भर किया है। खाने और पीने को भी एक प्रतीक ही समझो।’ नाटक बड़े सलीके से जीवनान्त के उजाले को संवादों में शामिल करता है। दो पात्रों के सुदीर्घ साहचर्य से उत्पन्न जीवन रस पाठकों को अभिभूत करता है। प्रयोगात्मकता और प्रतीकधर्मिता के कारण ‘अन्त का उजाला’ नाटक महत्त्पूर्ण हो उठता है।
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