Teen Ekant
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तीन एकान्त निर्मल वर्मा की तीन कहानियों (‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘डेढ़ इंच ऊपर’ और ‘वीक-एंड’) का नाट्य-पाठ है जिसका मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रेपर्टरी कम्पनी ने 1975 में किया था। ‘कहानी का रंगमंच’ के प्रणेता देवेन्द्र राज अंकुर इस चर्चित प्रस्तुति के निर्देशक थे।</p> <p>इन कहानियों और उनके इस नाट्य-पाठ के सम्बन्ध में उल्लेखनीय यह है कि यह उन कहानियों का नाट्य-रूपान्तर नहीं है, कहानियों के मूल पाठ की तस-की-तस प्रस्तुति है जिसमें मंच पर कहानी की नाटकीयता को सामने लाने के लिए निर्देशकीय संकेत और मंच-विवरण जोड़ दिए गए हैं।</p> <p>तीनों ही कहानियाँ ‘मोनोलॉग’ हैं जो स्मृति में आकार ग्रहण करती हैं और एक व्यक्ति के एक लम्बे संवाद के रूप में खुलती हैं। निर्मल जी के शब्दों में ‘उनके बीच एकमात्र समानता यह थी कि वे मोनोलॉग स्वर में रची गई थीं, जब अकेलेपन के क्षणों में व्यक्ति अपने से ही बोलने लगता है। ...परम्परागत अर्थ में इसे नाटकीय संवाद नहीं कहा जा सकता। किन्तु जो शब्द अपने से कहे जाते हैं, वहाँ ‘स्व’ ही लड़ाई का मैदान बन जाता है...।’</p> <p>अपने समय के समर्थ अभिनेताओं ने इस आत्मसंघर्ष को जिस सम्पूर्णता में साकार किया था, वह इस पाठ में भी दिखाई देता है। अपने निर्देशकीय वक्तव्य में देवेन्द्र राज अंकुर इन्हें ‘अकेलेपन के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं से साक्षात्कार की कहानियाँ’ कहते हैं। इसी को रेखांकित करने के लिए प्रस्तुतियों को एक सम्मिलित नाम ‘थ्री टेक्स्ट्स इन सॉलिट्यूड’ दिया गया था।
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तीन एकान्त निर्मल वर्मा की तीन कहानियों (‘धूप का एक टुकड़ा’, ‘डेढ़ इंच ऊपर’ और ‘वीक-एंड’) का नाट्य-पाठ है जिसका मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रेपर्टरी कम्पनी ने 1975 में किया था। ‘कहानी का रंगमंच’ के प्रणेता देवेन्द्र राज अंकुर इस चर्चित प्रस्तुति के निर्देशक थे।</p>
<p>इन कहानियों और उनके इस नाट्य-पाठ के सम्बन्ध में उल्लेखनीय यह है कि यह उन कहानियों का नाट्य-रूपान्तर नहीं है, कहानियों के मूल पाठ की तस-की-तस प्रस्तुति है जिसमें मंच पर कहानी की नाटकीयता को सामने लाने के लिए निर्देशकीय संकेत और मंच-विवरण जोड़ दिए गए हैं।</p>
<p>तीनों ही कहानियाँ ‘मोनोलॉग’ हैं जो स्मृति में आकार ग्रहण करती हैं और एक व्यक्ति के एक लम्बे संवाद के रूप में खुलती हैं। निर्मल जी के शब्दों में ‘उनके बीच एकमात्र समानता यह थी कि वे मोनोलॉग स्वर में रची गई थीं, जब अकेलेपन के क्षणों में व्यक्ति अपने से ही बोलने लगता है। ...परम्परागत अर्थ में इसे नाटकीय संवाद नहीं कहा जा सकता। किन्तु जो शब्द अपने से कहे जाते हैं, वहाँ ‘स्व’ ही लड़ाई का मैदान बन जाता है...।’</p>
<p>अपने समय के समर्थ अभिनेताओं ने इस आत्मसंघर्ष को जिस सम्पूर्णता में साकार किया था, वह इस पाठ में भी दिखाई देता है। अपने निर्देशकीय वक्तव्य में देवेन्द्र राज अंकुर इन्हें ‘अकेलेपन के कुछ क्षणों में पात्रों के स्वयं से साक्षात्कार की कहानियाँ’ कहते हैं। इसी को रेखांकित करने के लिए प्रस्तुतियों को एक सम्मिलित नाम ‘थ्री टेक्स्ट्स इन सॉलिट्यूड’ दिया गया था।
Book Details
-
ISBN9789360861476
-
Pages88
-
Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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सागर सरहदी के इन एकांकी नाटकों की भीतरी तहों में यही क़द्रें बहती हैं और ज़िन्दगी की तमाम विपरीत परिस्थितियों में कुछ ज़्यादा रोशन होकर हमें अपनी मौजूदगी का अहसास कराती हैं। समाज के वास्तविक हालात को सागर साहब बिना किसी लाग-लपेट के देखते और अंकित करते हैं। ग़रीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी, अपने मन का काम न कर पाने की पीड़ा, पछतावा, अकेलापन, सब कुछ को लेकर गहरा व्यर्थता-बोध—यानी डरावने वक़्तों की कोई भी शक्ल उनकी निगाह से नहीं छूटती। वे पूरी शिद्दत और सचाई से उनके ख़ाके खींचते हैं, और उतनी ही शिद्दत से उनके लाचार, समाज के हाशिये पर पहुँच चुके, परेशानहाल किरदार उन चीज़ों से लोहा लेते हैं, उन्हें सीधे अपनी रूह पर झेलते हैं।
'एक शाम और गुज़र गई' के हताश, तंगहाल लेकिन ज़िन्दादिल, सपनों को सच की तरह जीने वाले अदाकार-कलाकार हों, 'एहसास की चुभन' में अधूरे प्यार की विडम्बना हो, महानगरों में घर की समस्या पर फ़लसफ़ियों की तरह बतियाता 'एक बँगला बने न्यारा' हो या अभाव, लाचारी और इनसे पैदा होने वाली चारित्रिक कमज़ोरी को बयान करनेवाला 'दायरा', सागर सरहदी हर एकांकी में सामाजिक-आर्थिक विडम्बनाओं को उनके क्रूरतम रूप में पकड़ते हैं।
इस संग्रह में शामिल सभी एकांकी न सिर्फ़ कंटेंट और शिल्प के लिहाज़ से, बल्कि मंच-तकनीक के लिहाज़ से भी जितने पठनीय हैं, उतना ही सहज इनको मंच पर उतारना भी है। कम पात्रों के साथ, चुस्त संवादों से जटिल और दिलचस्प जीवन-दृश्यों को साकार करने में सक्षम ये छोटे-छोटे नाटक आज़ादी बाद के कुछ दशकों के समाज-मनोविज्ञान का पता भी देते हैं, रूमान और बदलाव की कामना जिसका अभिन्न हिस्सा थे।
Prem Aur Patthar
- Author Name:
Varsha Das
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Description:
इस लघु-नाटक संकलन में वर्षा दास द्वारा किए गए चार कहानियों के नाट्य-रूपान्तरण हैं जिनमें उन्होंने कहानी के मूल मन्तव्य को बिना कोई हानि पहुँचाए उसे नाट्य-रूप दिया है। पहला नाटक डॉ. लोकनाथ भट्टाचार्य की बांग्ला कहानी ‘प्रेम ओ पाथर’ पर आधारित है। इसके केन्द्र में शिव की एक प्राचीन प्रस्तर-मूर्ति है जो कथा-नायक के लिए एक बड़े नैतिक निर्णय का आधार बनती है। वह उस मूर्ति की चोरी करनेवाले एक तथाकथित संस्कृति-प्रेमी द्वारा दी जानेवाली नौकरी को भी ठुकरा देता है और आगे हमेशा के लिए उससे सम्बन्ध समाप्त कर लेता है।
दूसरा नाटक लाभुबहन मेहता की गुजराती कहानी ‘बिन्दी’ पर आधारित है जिसमें एक युवती के आकस्मिक वैधव्य और फिर उसके जीवन के एक नए मोड़ की कहानी को रूपायित किया गया है। नाटक ‘मरा हुआ’ डॉ. लोकनाथ भट्टाचार्य की ही बांग्ला दिलचस्प नाटक है जिसमें एक कुत्ते की मौत और मनुष्यों से उसके सम्बन्ध को बहुत मनोरंजक ढंग से प्रकाश डाला गया है।
‘जेसल-तोरल’ एक गुजराती लोककथा पर आधारित नाटक है जिसमें एक किंवदन्ती के माध्यम से हमें एक नैतिक सबक मिलता है। कहानी एक लुटेरे की है जो अन्त में अपने किए पर पश्चात्ताप करता है और बदल जाता है।
Rajdarshan
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Manoj Mitra
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Description:
“कितने ही राजा तो पिशाच होते हैं। अब एक पिशाच ही राजा हो गया तो क्या बिगड़ जाएगा? सुनिए कुमार, सुनिए रानी माँ! देश के चारों ओर विद्रोह की आग धधक रही है। वृषल की ताक़त दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है। ऐसी हालत में यदि यह बात फैल गई कि हमारे राजा जाली राजा हैं तो वह आग भक् से दावानल बन जाएगी। नन्दवंशियों का सिंहासन विद्रोहियों के पेट में चला जाएगा। आप लोग सोचकर देखिए, क्या उससे अच्छा यह न होगा कि इस पिशाच को ही हम लोग और शक्तिशाली बनाएँ? पिशाच के कन्धों पर धनुष रखकर विद्रोहियों का नाश करें? सिंहासन का बड़ा शत्रु कौन है कुमार—पिशाच या वृषल?’’
—इसी पुस्तक से
Betiyaan Mannu Ki
- Author Name:
Priyadarshan
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Description:
‘बेटियाँ मन्नू की’—नाटक में वे पात्र और उनका वह जीवन है जिसे पहले मन्नू भंडारी अपनी कहानियों में और अपने उपन्यास में लाईं, वहाँ उन्हें नया जीवन दिया, नई सोच दी और अब उनमें से कुछ इस नाटक में हमारे आज के रू-ब-रू हो रहे हैं। यहाँ ये पात्र अपनी रचयिता से भी बात करते हैं, एक-दूसरे से भी और हमसे भी। ‘आपका बंटी’ उपन्यास के बंटी और शकुन के अलावा इसमें नौ और कहानियों के किरदार हैं और सब मिलकर उस समय को समझने की कोशिश कर रहे हैं, जब उन्हें रचा गया; जानने की कोशिश करते हैं कि उन्हें वही रूप क्यों दिया; उनकी नियति वही क्यों थी, कुछ और क्यों नहीं! और इस तरह कई नये सवाल और कई सवालों के जबाव हमारे सामने खुलते हैं।
अलग-अलग कहानियों के पात्रों का यह बोलता कोलाज न सिर्फ उन चरित्रों को एक नई रोशनी में हमारे सामने लाता है, बल्कि कथाकार मन्नू भंडारी को समझने में भी हमारी मदद करता है।
नाटक विधा में यह एक दुर्लभ किस्म का प्रयोग है; दिलचस्प प्रयोग!
Mansukhlal Majidiya
- Author Name:
Labhshankar Thakur
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- Description: Mansukhlal Majidiya
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