Ethiopia ki Lok Kathayen-2 (Folk Tales of Ethiopia)
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Author:
Sushama GuptaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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लोककथाएँ किसी भी समाज की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा होती हैं। आज से करीब सौ साल पहले ये लोककथाएँ केवल जबानी ही कही जाती थीं और कह-सुनकर ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंप दी जाती थीं, इसलिए किसी भी लोककथा का मूल रूप क्या रहा होगा, यह कहना मुश्किल है। यह पुस्तक ऐसी ही कुछ अंग्रेजी की और कुछ दूसरी भाषा बोलनेवाले देशों की लोककथाएँ हिंदी भाषा बोलनेवाले समाज तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है। इनमें से बहुत सारी लोककथाएँ अंग्रेजी की पुस्तकों से, कुछ विश्वविद्यालयों में दिए गए शोध-प्रबंधों से, कुछ पत्रिकाओं से संकलित की हैं एवं कुछ कहानियाँ लोगों से सुनकर भी लिखी हैं। अब तक एक हजार से अधिक लोककथाएँ संकलित की जा चुकी हैं। इनमें से चार सौ से भी अधिक लोककथाएँ तो अकेले अफ्रीका की ही हैं। ये सभी लोककथाएँ ‘देश-विदेश की लोककथाएँ’ शीर्षक श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित हो रही हैं। आशा है, ये लोककथाएँ पाठकों का मनोरंजन तो करेंगी ही, साथ में दूसरे देशों के समाज-रीति-नीति-संस्कृति व परंपराओं के बारे में भी जानकारी देंगी।
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लोककथाएँ किसी भी समाज की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा होती हैं। आज से करीब सौ साल पहले ये लोककथाएँ केवल जबानी ही कही जाती थीं और कह-सुनकर ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंप दी जाती थीं, इसलिए किसी भी लोककथा का मूल रूप क्या रहा होगा, यह कहना मुश्किल है।
यह पुस्तक ऐसी ही कुछ अंग्रेजी की और कुछ दूसरी भाषा बोलनेवाले देशों की लोककथाएँ हिंदी भाषा बोलनेवाले समाज तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास है। इनमें से बहुत सारी लोककथाएँ अंग्रेजी की पुस्तकों से, कुछ विश्वविद्यालयों में दिए गए शोध-प्रबंधों से, कुछ पत्रिकाओं से संकलित की हैं एवं कुछ कहानियाँ लोगों से सुनकर भी लिखी हैं। अब तक एक हजार से अधिक लोककथाएँ संकलित की जा चुकी हैं। इनमें से चार सौ से भी अधिक लोककथाएँ तो अकेले अफ्रीका की ही हैं।
ये सभी लोककथाएँ ‘देश-विदेश की लोककथाएँ’ शीर्षक श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित हो रही हैं। आशा है, ये लोककथाएँ पाठकों का मनोरंजन तो करेंगी ही, साथ में दूसरे देशों के समाज-रीति-नीति-संस्कृति व परंपराओं के बारे में भी जानकारी देंगी।
Book Details
-
ISBN9789386300676
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हिन्दी पट्टी के टोन और टेंपरामेंट, अंडरटोंस एवं अंडरकरेंट्स को न तो दूर रहकर 'आह-वाह' के भाववादी नज़रिए से जाना जा सकता है, न ही नज़दीक रहकर आग्रही नज़र से। वर्ग, वर्ण, लिंग, जाति-उपजाति, परम्परा और परिवेश एवं धर्म और राजनीति के मकड़जाल में उलझे आदमी के मर्म तक पहुँचना आज के सही रचनाकार का दायित्व है। मनुष्य की प्रकृति-नियति, उसकी कमज़ोरियाँ और उसकी ताक़त, उसके ज़हर और उसके अमृत से जूझते-सीझते हेमन्त के कथाकार ने कितनी वयस्कता अर्जित कर ली है, इसका साक्ष्य हैं ‘क्रिमिनल रेस’ की कहानियाँ। यहाँ हेमन्त न सिर्फ़ अपने कई समकालीनों को अतिक्रमित करते हैं, बल्कि ख़ुद अपने ‘पिछले हेमन्त’ को भी...। विज्ञान का बीज शब्द है—‘क्यों?’ ‘ऐसा क्यों?’ ‘ऐसा ही क्यों?’ हेमन्त का बीज शब्द है’—फंशय।' इतने चिकने-चुपड़े चेहरे, संवाद और आचरण—‘आख़िर मंशा क्या है?’, ‘हासिल क्या होगा?’ यह संशय कभी सम्पूर्ण कथा में प्रच्छन्न भाव से व्याप्त है (क्रिमिनल रेस), कभी अन्दर से बाहर फैलता हुआ (धक्का)! कभी देश की आदिम शौर्य परम्परा बनकर ग़ुलाम बनानेवाली गलीज औपनिवेशिक शक्तियों से लेकर आज के मल्टीनेशनल्स के ऐटीट्यूड्स को सूँघता-झपटता है (ओवरकोट) तो कभी औरतों के तन-मन के साथ धन पर भी क़ाबिज़ होने की पुरुष-चाल पर सवाल उठाता है (लाश-तलाश) तो कभी सभ्यता के उषा-काल और मिथकीय कुहासों से लेकर वर्तमान के तपते द्विप्रहर तक को खँगालते हुए प्रश्नवाचक बन बैठता है कि जीवन के महाभारत में औरत के प्रति यदि कौरवों और पांडवों का रवैया एक-सा है तो ऐसा युद्ध से क्या बदल जाएगा और अगर युद्ध होता ही है तो स्त्रियाँ युद्ध में शामिल क्यों नहीं होंगी। अन्तत: ‘क्रिमिनल रेस’ के केन्द्र दिल्ली की आपराधिकी की भूल-भुलैया में भटककर मासूम देशवासी को रास्तों और गंतव्य तक पर संशय होने लगता है—मैं कहाँ हूँ? (सुबह का भूला)।
संघर्ष और जन आन्दोलनों की आग में जीकर रची हुई अपनी नफ़ीस भाषा-शैली की हेमन्त की कहानियाँ अपने पाठकों को किसी आनन्द वन या नक़ली उसाँसों के मरुस्थल में नहीं ले जातीं बल्कि धसकते धरातलों, गिरते आसमानों और हरहराते तूफ़ानों की क्राइसिस के सम्मुख ला खड़ा करती हैं—तुम यहाँ हो और तुम्हारी मंज़िल यहाँ।
—संजीव
Chhat Par Dastak
- Author Name:
Mridula Garg
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नई कहानी के दौर के बाद जिन कथाकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई, उनमें मृदुला गर्ग एक अग्रणी नाम है। पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से मृदुला जी की कहानियाँ चर्चा में रही हैं। इसकी वजहें कई हैं, मसलन, शिल्प का चमत्कार, कथ्य में नयापन, किस्सागोई का जादू, विचारों की आँच आदि...
मृदुला जी के यहाँ सम्बन्धहीनता सम्बन्ध में, मृत्यु जीवन में और जीवन परम्परा में पर्यवसित होकर सातत्य और अमरत्व प्राप्त करता है। नारी-विमर्श में ‘विश्व भगिनीवाद’ की खुशबू बिखेरती मृदुला जी की अपनी ही पहचान है जो कल भी विशिष्ट थी, आज भी विशिष्ट हैं।
DastanELucknow
- Author Name:
Maulana Baqar Shams
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For the people of Lucknow and those who admire its culture, if there is any place they long to see, besides the holy sites, it is 'Lucknow.' The same Lucknow where simply strolling through markets and promenades is enough to instill the values of culture and inclusivity. The same Lucknow that was the standard of eloquence and oratory. The same Lucknow that was a beacon for language and colloquialism. The same Lucknow that was home to civilization and sophistication. As one of its admirers said : “go milii jannat bhi rehne ko bajaay Lucknow chaunk uthtaa hoon main hardam keh ke haay Lucknow.” Even when I get heaven to live in instead of Lucknow, I get startled every moment, exclaiming, 'Ah, Lucknow!') If you would like to learn about Lucknowi culture, history, social life, language, and rituals, or if you are curious about the lives of its famous rulers and nobles, then the book "Dastaan-e-Lucknow," written by the distinguished scholar and intellectual Syed Mohammad Baqar Shams, is a must-read! About the Author Maulana Baqar Shams’s is from the lineage of Khandan-e-Ijtihad, Lucknow. He was born in Jaunpur, India, on the 10th of August 1909 and passed away in Karachi, Pakistan, on the 6th of January 2007. He earned a Dabeer-e-Kamil (Masters-in-Writing) from Lucknow University and studied medicine at Munmba-e-Tib College Lucknow. Maulana was proficient in Urdu, Persian, and Arabic and was also familiar with Hebrew and English. Shams Sahib Qibla started poetry in 1923 at the age of 14 and literary articles and essays in 1926 at the age of 17. For a prolonged period in India and then in Pakistan, he was engaged in research, criticism, creation, composition, compilation, and reforms in the fields of education, literature, poetry, and oration. Additionally, he also had a passion for medicine and hunting. Amongst his published literary works: History of Lucknow; Youth of Lucknow; Language of Lucknow; Poetry of Lucknow; Civilization of Lucknow; Philosophy of Khayyam; Wisdom of Poetry; History of urduLanguage; Five Methods; Writings of Color; Critical Discussions; Failure of Mirror; Versified Pearl; Selections of Diwan-e-Javed; and Signs of Sun received several accolades. His book "Philosophy of Khayyam," which was published in 1937 by Sarfaraz Press Lucknow, was included in the syllabus of the Bachelor of Arts and Dabir-e-Kamil (Masters-in-Writing) of Lucknow University for an extended period. Maulana Baqar Shams was the companion and associate of many illustrious scholars of literature, among whom Mirza Muhammad Hadi Ruswa, Mirza Muhammad Hadi Aziz, Josh Malihabadi, Professor Masood Hasan Adeeb, Mirza Jafar Ali Khan Assar, Maulana Ali Naqi (Naqan Sahib Qibla), Dr. Ahsan Farooqui, Niaz Fatehpuri, Hazrat Safi Lakhnavi, Hazrat Aziz Lakhnavi, Nadim Sitapuri, Mushfiq Khawaja, Dr. Shaukat Sabzwari, Arzoo Lakhnavi, Mirza Kazim Hussain Mehshar, Sahir Lakhnavi, and Hussain Anjum are included.
Aate Rahna
- Author Name:
Dinesh Karnatak
- Book Type:

- Description:
Hindi Short Story by Dinesh Karnatak
Rocking Chair
- Author Name:
Aruna Sabbarwal
- Book Type:

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Book
Bhatakti Raakh
- Author Name:
Bhisham Sahni
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हिन्दी कथा-साहित्य में भीष्म साहनी का नाम प्रतिमान के रूप में स्थापित हो चुका है। प्रतिमान बन जाने तक की उनकी कथा-यात्रा अनेक पड़ावों व संघर्षों से होकर गुज़री है। उनके कथा-साहित्य में रुचि रखनेवाले पाठक अच्छी तरह परिचित हैं कि उनके पास एक विशिष्ट जीवन-दृष्टि है। अपनी इसी जीवन-दृष्टि के माध्यम से वे सामाजिक यथार्थ के जटिल स्तरों को बहुत ही कलात्मक ढंग से खोलते हैं। उनकी कला गहरे अर्थों में मानवीय सम्बन्धों की त्रासदी और उनके भविष्य से अभिन्न रूप से जुड़ी है।
‘भटकती राख’ भीष्म जी का बहुचर्चित कहानी-संग्रह है। इस संग्रह की कहानियों में उन्होंने वर्तमान जगत की समस्याओं को अतीत के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने की कोशिश की है, इसीलिए ये कहानियाँ काल के किसी द्वीप पर ठहरती नहीं, वरन् निरन्तर प्रवाहित इतिहास-धारा का जीवन्त हिस्सा बन जाती हैं। मनुष्य के इतिहास में उनकी यह रुचि किसी आनन्द-लोक की सृष्टि नहीं करती, बल्कि अभावों व शोषण के अन्धकार में भटकते लोगों से हमारा आत्मीय साक्षात्कार कराती है। ‘यादें’ और ‘गीता सहस्सर नाम’ में बूढ़ी महिलाओं की दयनीय हालत को बहुत ही मार्मिकता के साथ अंकित किया है, तो ‘अपने-अपने बच्चे’ में सामाजिक विषमता से उत्पन्न मानवीय संकट का यथार्थपरक अंकन हुआ है। ‘भटकती राख’ की बुढ़िया मानवीय संघर्षों की जीती-जागती दास्तान है, जिसकी स्मृतियों के गर्भ में हमारा भविष्य रूपायित हो उठा है। लगातार अमानवीय होती जा रही सामाजिक परिस्थितियों के ख़िलाफ़ केवल क्षोभ और ग़ुस्सा प्रकट करने तक सीमित न रहकर ये कहानियाँ नये समाज का स्वप्न भी सँजोती हैं।
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