Abalaaon Ka Insaf
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नवजागरण अपने राष्ट्रीय जागरण व सुधारवादी आन्दोलन के दौरान अनेक सार्थक प्रयासों और अपनी सफलताओं के लिए जाना जाता है। यह वही दौर था जब साम्राज्य विरोधी चेतना एक विराट राष्ट्रीय आन्दोलन का रूप ले चुकी थी, और राष्ट्रवाद अपने पूरे उफान पर था। मगर बावजूद इसके यह दौर अनेक विडम्बनाओं और विरोधाभासों के साथ-साथ कई विवादों का जन्मदाता भी रहा है। सबसे बड़ी विडम्बना इसकी यह रही कि दलित-प्रश्न और स्त्री-लेखन इसके परिदृश्य से पूरी तरह ग़ायब रहे। विशेषकर स्त्री-मुक्ति की छटपटाहट और चिन्ता इसके चिन्तन के केन्द्र में जैसे रहे ही नहीं। स्त्री-शिक्षा के अभाव और पितृसत्तात्मक व्यवस्था की गहरी पैठ के चलते, यह छटपटाहट हिन्दी साहित्य के इस दौर के इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से वंचित रह गई। बाद में इस काल के साहित्यिक परिदृश्य और विशेषताओं को हिन्दी के अनेक महानायकों ने रेखांकित और विश्लेषित किया, लेकिन उनकी नज़रों से भी यह छटपटाहट अलक्षित और ओझल ही रही। इन महानायकों के सामने पुरुषों द्वारा रचित वही लेखन रहा, जिसके कारण हिन्दी नवजागरण को अतिशयोक्ति में कभी-कभी ‘हिन्दू नवजागरण’ भी कहा जाता है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हिन्दी नवजागरण के शुरुआत से लेकर आधुनिक काल (द्विवेदी युग) का पूरा कालखंड स्त्री-लेखन (स्त्रियों द्वारा किया गया लेखन) रहित रहा है? आख़िर ऐसे कौन से कारण थे जिनके चलते स्त्री-लेखन के रूप में, जो भी लेखन प्रकाश में आया, वह पुरुषों द्वारा ही किया गया लेखन था? ये ऐसे प्रश्न हैं जो हिन्दी साहित्य में बड़ी बहस की माँग करते हैं। बड़ी इसलिए कि यह मात्र एक धारणा या भ्रामक प्रचार है कि हिन्दी नवजागरण और उसके बाद के कुछ दशकों के दौरान स्त्री-लेखन नहीं हुआ। ‘अबलाओं का इन्साफ़’ (1927) को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। यह आत्मकथा गम्भीर स्त्री-प्रश्नों के साथ-साथ उस पुरुषवादी मानसिकता और सोच को पूरी निर्ममता के साथ बेपर्दा और उनके ऊपर जमी गर्द को पोंछती है, जिसे या तो जानबूझकर पोंछा नहीं गया या किसी कारणवश छोड़ दिया गया।
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नवजागरण अपने राष्ट्रीय जागरण व सुधारवादी आन्दोलन के दौरान अनेक सार्थक प्रयासों और अपनी सफलताओं के लिए जाना जाता है। यह वही दौर था जब साम्राज्य विरोधी चेतना एक विराट राष्ट्रीय आन्दोलन का रूप ले चुकी थी, और राष्ट्रवाद अपने पूरे उफान पर था। मगर बावजूद इसके यह दौर अनेक विडम्बनाओं और विरोधाभासों के साथ-साथ कई विवादों का जन्मदाता भी रहा है। सबसे बड़ी विडम्बना इसकी यह रही कि दलित-प्रश्न और स्त्री-लेखन इसके परिदृश्य से पूरी तरह ग़ायब रहे। विशेषकर स्त्री-मुक्ति की छटपटाहट और चिन्ता इसके चिन्तन के केन्द्र में जैसे रहे ही नहीं। स्त्री-शिक्षा के अभाव और पितृसत्तात्मक व्यवस्था की गहरी पैठ के चलते, यह छटपटाहट हिन्दी साहित्य के इस दौर के इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से वंचित रह गई।
बाद में इस काल के साहित्यिक परिदृश्य और विशेषताओं को हिन्दी के अनेक महानायकों ने रेखांकित और विश्लेषित किया, लेकिन उनकी नज़रों से भी यह छटपटाहट अलक्षित और ओझल ही रही। इन महानायकों के सामने पुरुषों द्वारा रचित वही लेखन रहा, जिसके कारण हिन्दी नवजागरण को अतिशयोक्ति में कभी-कभी ‘हिन्दू नवजागरण’ भी कहा जाता है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हिन्दी नवजागरण के शुरुआत से लेकर आधुनिक काल (द्विवेदी युग) का पूरा कालखंड स्त्री-लेखन (स्त्रियों द्वारा किया गया लेखन) रहित रहा है? आख़िर ऐसे कौन से कारण थे जिनके चलते स्त्री-लेखन के रूप में, जो भी लेखन प्रकाश में आया, वह पुरुषों द्वारा ही किया गया लेखन था? ये ऐसे प्रश्न हैं जो हिन्दी साहित्य में बड़ी बहस की माँग करते हैं। बड़ी इसलिए कि यह मात्र एक धारणा या भ्रामक प्रचार है कि हिन्दी नवजागरण और उसके बाद के कुछ दशकों के दौरान स्त्री-लेखन नहीं हुआ। ‘अबलाओं का इन्साफ़’ (1927) को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। यह आत्मकथा गम्भीर स्त्री-प्रश्नों के साथ-साथ उस पुरुषवादी मानसिकता और सोच को पूरी निर्ममता के साथ बेपर्दा और उनके ऊपर जमी गर्द को पोंछती है, जिसे या तो जानबूझकर पोंछा नहीं गया या किसी कारणवश छोड़ दिया गया।
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