Sukhe Sawan
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इस किताब में चुनी गई कहानियाँ औरतों, जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखते लड़के-लड़कियों, दाम्पत्य में बँधे हुए दिखावे के रिश्तों और छोटी-छोटी लड़कियों का दौलत के सहारे शोषण करते हुए शैतानों का सच हमारे सामने लाती हैं। इन्हें पढ़कर इनका मज़ा लेने के बजाय आप इन पर बात करने पर मजबूर हो जाएँगे, क्यूँकि इन कहानियों का मक़सद हमारे ज़ेहनों पर लगे बरसों के जालों को साफ़ करना है। तसनीफ़ हैदर उर्दू के शायर और अदीब हैं। जन्म वसई गाँव महाराष्ट्र में हुआ। 2005 में सह-परिवार वो दिल्ली में आकर बस गए। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उर्दू में एम.ए. किया और तीन वर्षों तक रेख़्ता फ़ॉउंडेशन से भी जुड़े रहे। वो उर्दू के साथ-साथ हिन्दी में भी साहित्यिक लेख और कहानियाँ लिखते रहते हैं।
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इस किताब में चुनी गई कहानियाँ औरतों, जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखते लड़के-लड़कियों, दाम्पत्य में बँधे हुए दिखावे के रिश्तों और छोटी-छोटी लड़कियों का दौलत के सहारे शोषण करते हुए शैतानों का सच हमारे सामने लाती हैं। इन्हें पढ़कर इनका मज़ा लेने के बजाय आप इन पर बात करने पर मजबूर हो जाएँगे, क्यूँकि इन कहानियों का मक़सद हमारे ज़ेहनों पर लगे बरसों के जालों को साफ़ करना है। तसनीफ़ हैदर उर्दू के शायर और अदीब हैं। जन्म वसई गाँव महाराष्ट्र में हुआ। 2005 में सह-परिवार वो दिल्ली में आकर बस गए। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया से उर्दू में एम.ए. किया और तीन वर्षों तक रेख़्ता फ़ॉउंडेशन से भी जुड़े रहे। वो उर्दू के साथ-साथ हिन्दी में भी साहित्यिक लेख और कहानियाँ लिखते रहते हैं।
Book Details
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ISBN9788197855726
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Pages197
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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रणविजय ने अपने आपको प्रीलिम्स परीक्षा की तैयारी में पूरी तरह से झोंक दिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि प्रीलिम्स की परीक्षा में वह अव्वल रहा। इस नतीजे ने उसका मनोबल और बढ़ा दिया। वह और भी उत्साह के साथ मुख्य परीक्षा की तैयारी में जुट गया। अपनी पहली उपलब्धि जब उसने अपने पिता जागीर सिंह को बताई तो वे खुशी के मारे फूले नहीं समाए, और जब यही खबर जागीर सिंह ने रणविजय की माँ को बताई तो उनकी आँखें खुशी से छलछला आईं। तभी वह वार्ड बॉय हाथ में कुछ सामान लेकर हमारे पास आया। उसने रणविजय का नाम लिया तो मैंने हामी भर दी। जिसके बाद उसने वे चीजें हमारे बगल में रख दीं, जिसमें लकड़ी का एक डंडा था, जिसे रणविजय अपने आखिरी दिनों में सहारे के लिए इस्तेमाल करता था। एक पॉलिथिन में उसके कुछ कपड़े थे। एक डायरी थी, जिसमें शायद उसने कुछ नोट्स लिखे थे और एक पोटली जैसी कोई चीज थी, जिस पर रणविजय की माँ की निगाहें जाकर टिक गई थीं। उन्होंने उसी पल उस पोटली को उठा लिया और उसे सीने से लगाकर रोने लगीं। मैं समझ गया, शायद यह वही पोटली थी, जिसमें वे हर बार खाने के रूप में अपना प्यार बाँधकर अपने बेटे को देती थीं। बेटा खुद तो चला गया, मगर वह खाली पोटली माँ के लिए छोड़ गया, जिसे वे शायद दोबारा कभी नहीं भर पाएँगी। —इसी पुस्तक से अत्यंत भावपूर्ण उपन्यास, जिसके मुख्य पात्र के जीवन को लेखक ने खुद नए सिरे से जिया है। यह एक पुस्तक न होकर जीवन-दर्शन साबित होगी।
Delhi Ke Chatkhare
- Author Name:
Shahid Ahmed Dehalvi
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