Nayee Disha
(0)
Author:
Dhirendra VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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बीसवीं सदी के आठवें दशक में प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है ‘नई दिशा’। इसमें बदलते युग की वह गाथा है, जो सामाजिक परिस्थितियों के बीच युवा-मानस की बेचैनियों से निर्मित हुई थी। जीवन की उथल-पुथल को इस उपन्यास में बड़े ही कलात्मक ढंग से चित्रित किया गया है।</p> <p>‘नई दिशा’ में एक ऐसे आदर्शवादी युवक प्रशान्त की कहानी है जो निश्छल ग्रामीण वातावरण में पलता है, लेकिन ऊँची शिक्षा पाने के लिए जब वह शहर जाता है तो वहाँ के जीवन में व्याप्त विकृतियाँ-विसंगतियाँ उसे स्तम्भित कर देती हैं। वह देखता है कि पाश्चात्य प्रभाव के चलते यहाँ पर व्यवहार ही नहीं, चिन्ता और चिन्तन के स्तर पर भी सर्वत्र अराजकता और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। यथार्थ के जिस रूप से प्रशान्त का साक्षात्कार होता है, उससे उसे लगता है कि राजनीतिक प्रवंचना के इस युग में पूरी की पूरी पीढ़ी ही जैसे भटक गई है तथा जिस दिशा की ओर बढ़ी जा रही है, वह सही नहीं है। यह उपन्यास उसी सही दिशा की तलाश की गाथा है जिसमें बदलाव की आकांक्षा और भटकाव को दूर करने की जद्दोजहद प्रबलता से मुखर हुई है।</p> <p>इसमें मूल और मूल्यों का संवेदनात्मक पक्ष अपने प्रभाव में अद्भुत और अविस्मरणीय है। अपने समय की एक दस्तावेज़ है ‘नई दिशा’।
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बीसवीं सदी के आठवें दशक में प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास है ‘नई दिशा’। इसमें बदलते युग की वह गाथा है, जो सामाजिक परिस्थितियों के बीच युवा-मानस की बेचैनियों से निर्मित हुई थी। जीवन की उथल-पुथल को इस उपन्यास में बड़े ही कलात्मक ढंग से चित्रित किया गया है।</p>
<p>‘नई दिशा’ में एक ऐसे आदर्शवादी युवक प्रशान्त की कहानी है जो निश्छल ग्रामीण वातावरण में पलता है, लेकिन ऊँची शिक्षा पाने के लिए जब वह शहर जाता है तो वहाँ के जीवन में व्याप्त विकृतियाँ-विसंगतियाँ उसे स्तम्भित कर देती हैं। वह देखता है कि पाश्चात्य प्रभाव के चलते यहाँ पर व्यवहार ही नहीं, चिन्ता और चिन्तन के स्तर पर भी सर्वत्र अराजकता और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। यथार्थ के जिस रूप से प्रशान्त का साक्षात्कार होता है, उससे उसे लगता है कि राजनीतिक प्रवंचना के इस युग में पूरी की पूरी पीढ़ी ही जैसे भटक गई है तथा जिस दिशा की ओर बढ़ी जा रही है, वह सही नहीं है। यह उपन्यास उसी सही दिशा की तलाश की गाथा है जिसमें बदलाव की आकांक्षा और भटकाव को दूर करने की जद्दोजहद प्रबलता से मुखर हुई है।</p>
<p>इसमें मूल और मूल्यों का संवेदनात्मक पक्ष अपने प्रभाव में अद्भुत और अविस्मरणीय है। अपने समय की एक दस्तावेज़ है ‘नई दिशा’।
Book Details
-
ISBN9789389598391
-
Pages88
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हमारी ही चेतना में संचित है हमारा काल-आयाम। हम हैं, क्योंकि धरती है, हवा है, धूप है, जल है और यह आकाश। इसीलिए हम जीवित हैं।
भीतर और बाहर—सब कहीं—सब कुछ को अपने में सँजोए। विलीन हो जाने को पल-पल अनन्त में...।
पुरानी और नई सदी के दो-दो छोरों को समेटता ‘समय सरगम’ जिए हुए अनुभव की तटस्थता और सामाजिक परिवर्तन से उभरा, उपजा एक अनूठा उपन्यास है; और फिर भारत की बुज़ुर्ग पीढ़ियों का एक ही साथ नया-पुराना आख्यान और प्रत्याख्यान। संयुक्त परिवारों के भीतर और बाहर वरिष्ठ नागरिकों के प्रति उपेक्षा और उदासीनता ‘समय सरगम’ की बन्दिश में अन्तर्निहित है। आज के बदलते भारतीय परिदृश्य में यह उपन्यास व्यक्ति की विश्वव्यापी स्वाधीनता, उसके वैचारिक विस्तार और कुछ नए संस्कार-सन्दर्भों को प्रतिध्वनित करता है। दूसरे शब्दों में, इससे उत्तर-आधुनिक काल की सम्भावनाओं को भी चीन्हा जा सकता है; और उन मूल्यों को भी जो मानवीय विकास को सार्थकता प्रदान करते हैं। ईशान और आरण्या जैसे बुज़ुर्ग परस्परविरोधी विश्वास और निजी आस्थाओं के बावजूद साथ होने के लिए जिस पर्यावरण की रचना करते हैं, वहाँ न पारिवारिक या सामाजिक उदासीनता है और न किसी प्रकार का मानसिक उत्पीड़न।
कृष्णा सोबती की प्रख्यात क़लम ने इस कथाकृति में अपने समय और समाज को जिस आन्तरिकता से रचा है, वह वर्तमान सामाजिक यथार्थ को तात्त्विक ऊँचाइयों तक ले जाता है, और ऐसा करते हुए वे जिस भविष्य की परिकल्पना या उसका संकेत करती हैं, उसी में निहित है एक उद्भास्वर आलोक-पुंज।
Take 2
- Author Name:
Ruchi Singh
- Book Type:

- Description: Priya's idyllic world turns upside down when she realizes her husband considers her dead weight after stripping her off her inheritance for his ambitions and lavish lifestyle. Instantly attracted to Priya, Abhimanyu knows getting involved with a married woman is inviting trouble. But despite common sense, cautions and hesitations, he is drawn to help her. Happily ever after has become a myth for Priya and trying to keep the relationship platonic is becoming more and more difficult for Abhimanyu. In the tussle between ethics, fears and desires... will Priya embrace a second chance at happiness?
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