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समाज की, प्रेम की, और देह की एक-दूसरे को काटती नैतिकताओं के द्वन्द्व में उलझा एक मन है जो फ़ौरी राहत के लिए अपने अतीत के सफ़र पर निकल पड़ता है। अतीत की नीम रौशन गलियों में जहाँ अपने-अपने वक़्तों को जीते पुरखे हैं, पुरखिनें हैं, उनके रिश्ते हैं, सुख-दुख हैं, उनका वैभव है, एक बड़ी दुनिया जो अब तुड़ी-मुड़ी पुरानी तस्वीरों और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आती स्मृतियों में जीवित है।</p> <p>अपने विवाहित जीवन में आई प्रेम की ताज़ा और जीवन्त हिलोर में बँधी हीरा सिर्फ़ प्रेम की सम्पूर्णता को जानती है, और उसे उसी निष्पाप भाव से जीना चाहती है; लेकिन जीवन की सुपरिभाषित सरणियों में न उसकी कामना अँट पाती है, न उसका प्रेम। नतीजा ख़ुद की और अपने सुकून की तलाश में भीतर और बाहर का सफ़र जो अपने साथ हमें भी एक दूसरी ही दुनिया में ले जाता है; जो परिवार अब दुनिया के अलग-अलग शहरों में फैला हुआ है, उसकी गहरी जड़ों को छूने की कोशिश ताकि कहीं से अपने आज के खंड-खंड सच को समझने का कोई सूत्र मिल जाए। वह सुकून मिल जाए जो किसी भी साँस लेती देह को चाहिए।</p> <p>प्रत्यक्षा का यह नया उपन्यास स्मृति और इच्छा की इसी बुनत में एक सघन पाठ की रचना करता है।
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समाज की, प्रेम की, और देह की एक-दूसरे को काटती नैतिकताओं के द्वन्द्व में उलझा एक मन है जो फ़ौरी राहत के लिए अपने अतीत के सफ़र पर निकल पड़ता है। अतीत की नीम रौशन गलियों में जहाँ अपने-अपने वक़्तों को जीते पुरखे हैं, पुरखिनें हैं, उनके रिश्ते हैं, सुख-दुख हैं, उनका वैभव है, एक बड़ी दुनिया जो अब तुड़ी-मुड़ी पुरानी तस्वीरों और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आती स्मृतियों में जीवित है।</p>
<p>अपने विवाहित जीवन में आई प्रेम की ताज़ा और जीवन्त हिलोर में बँधी हीरा सिर्फ़ प्रेम की सम्पूर्णता को जानती है, और उसे उसी निष्पाप भाव से जीना चाहती है; लेकिन जीवन की सुपरिभाषित सरणियों में न उसकी कामना अँट पाती है, न उसका प्रेम। नतीजा ख़ुद की और अपने सुकून की तलाश में भीतर और बाहर का सफ़र जो अपने साथ हमें भी एक दूसरी ही दुनिया में ले जाता है; जो परिवार अब दुनिया के अलग-अलग शहरों में फैला हुआ है, उसकी गहरी जड़ों को छूने की कोशिश ताकि कहीं से अपने आज के खंड-खंड सच को समझने का कोई सूत्र मिल जाए। वह सुकून मिल जाए जो किसी भी साँस लेती देह को चाहिए।</p>
<p>प्रत्यक्षा का यह नया उपन्यास स्मृति और इच्छा की इसी बुनत में एक सघन पाठ की रचना करता है।
Book Details
-
ISBN9789394902695
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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राजा भर्तृहरि, प्रेमी भर्तृहरि, कवि भर्तृहरि, वैयाकरण भर्तृहरि और योगी भर्तृहरि। उनके आयाम, समय और देश का अपार विस्तार। भर्तृहरि के जीवन में एक ओर प्रेम और कामिनियों के आकर्षण हैं तो दूसरी ओर वैराग्य का शान्ति-संघर्ष। वह संसार से बार-बार भागते हैं, बार-बार लौटते हैं। इसी के साथ उनके समय की सामाजिक, धार्मिक उथल-पुथल भी जुड़ी है। भर्तृहरि का द्वन्द्व सीधे गृहस्थ व वैराग्य का न होकर तिर्यक है। विशेष है। वह इसलिए कि वे कवि हैं, वैयाकरण भी। सुकवि अनेक होते हैं तथा विद्वान भी लेकिन भर्तृहरि जैसे सुकवि और विद्वान एक साथ बिरले ही होते हैं। सुपरिचित कथाकार महेश कटारे का यह उपन्यास इन्हीं भर्तृहरि के जीवन पर केन्द्रित है। इस व्यक्तित्व को, जिसके साथ असंख्य किंवदन्तियाँ भी जुड़ी हैं, उपन्यास में समेटना आसान काम नहीं था, लेकिन लेखक ने अपनी सामर्थ्य-भर इस कथा को प्रामाणिक और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया है। भर्तृहरि के निज के अलावा उन्होंने इसमें तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों का भी अन्वेषण किया है। उपन्यास के पाठ से गुज़रते हुए हम एक बार उसी समय में पहुँच जाते हैं। भर्तृहरि के साथ दो बातें और जुड़ी हुई हैं—जादू और तंत्र-साधना। लेखक के शब्दों में, ‘मेरा चित्त अस्थिर था, कथा के प्रति आकर्षण बढ़ता और भय भी, कि ये तंत्र-मंत्र, जादू-टोने कैसे समेटे जाएँगे? भाषा भी बहुत बड़ी समस्या थी कि वह ऐसी हो जिसमें उस समय की ध्वनि हो।’ इतनी सजगता के साथ रचा गया यह उपन्यास पाठकों को कथा के आनन्द के साथ इतिहास का सन्तोष भी देगा।
Ateet Ke Chalchitra
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Mahadevi Verma
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‘अतीत के चलचित्र’ हिन्दी गद्य की एक अप्रतिम रचना है। इतने दिनों बाद आज भी संवेदना के वे धरातल अछूते और अपूर्व हैं जिनकी सृष्टि इन रेखाचित्रों द्वारा हुई थी। मानवीय सहानुभूति और संवेगों की गहनता के लिए इन्हें चिरकाल तक हिन्दी साहित्य का शीर्षस्थ पद प्राप्त रहेगा।
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