Hajoor Aaman
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हजूर आमा भादी समाज के अफ़राद की सूरत-ए-हाल को पेश करता है। इस नॉवेल में सियासी, समाजी, तारीख़ी और तहज़ीबी हवालों से भी वाक़ियात क़लमबन्द किए गए हैं, जिसमें देबलीना की दास्तान-ए-इश्क़, भादी समाज की तवह्हुम-परस्ती, शुमाली बंगाल में गोरखा लैंड तहरीक के हालात को बुनियाद बनाया गया है। नॉवेल का उस्लूब-ए-बयान रवाँ है जिसमें myth और इज्तिमाई लाशऊर कारफ़रमा हैं। अपनी ज़बान-ओ-बयान के ऐतबार से नॉवेल में readability की सिफ़त मौजूद है।
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हजूर आमा भादी समाज के अफ़राद की सूरत-ए-हाल को पेश करता है। इस नॉवेल में सियासी, समाजी, तारीख़ी और तहज़ीबी हवालों से भी वाक़ियात क़लमबन्द किए गए हैं, जिसमें देबलीना की दास्तान-ए-इश्क़, भादी समाज की तवह्हुम-परस्ती, शुमाली बंगाल में गोरखा लैंड तहरीक के हालात को बुनियाद बनाया गया है। नॉवेल का उस्लूब-ए-बयान रवाँ है जिसमें myth और इज्तिमाई लाशऊर कारफ़रमा हैं। अपनी ज़बान-ओ-बयान के ऐतबार से नॉवेल में readability की सिफ़त मौजूद है।
Book Details
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ISBN9789394494909
-
Pages496
-
Avg Reading Time17 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘चार कन्या’ में यमुना, शीला, झूमुर और हीरा की कथा है। यमुना एक मामूली लड़की है, उसके भीतर बूँद–बूँद कर जन्म लेती है—अपने अधिकारबोध के प्रति तीव्र जागरूकता। ऐसी सुलझी हुई जागरूक लड़कियों को काफ़ी कुछ भुगतना पड़ता है। समाज के उलटे–सीधे नियम उन्हें बहुत सताते हैं, यमुना को भी ख़ूब सताया। शीला ठगी जाती है अपने प्रेमी द्वारा। ऐसी सैकड़ों शीलाएँ राह में चल–फिर रही हैं पर सभी तो अपनी ज़ुबान पर वे बातें नहीं ला सकतीं, क्योंकि इससे ठगनेवालों पर प्रहार के बजाय शीलाओं पर ही उलटी मार
पड़ती है—समाज उन्हीं पर पत्थर फेंकता है, उनके ही मुँह पर थूकता है।
‘लज्जा’ जैसी चर्चित कृति की लेखिका तसलीमा नसरीन का यह उपन्यास स्त्री–विमर्श की कई खिड़कियाँ खोलता है, जिससे आती बयार से पाठक अछूता नहीं रह सकता।
Vishwas Bhara Ehasas
- Author Name:
Priti Jain
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निराकार वीणा पर भावों के परदे रखकर, कल्पना की तार कस ख्यालों को भरकर उँगली से दबाकर जिस कंपन को उजागर करती हूँ वहाँ जी उठता है सजीव रूप साकार, धवल, उज्ज्वल, अपने रूप और जुण में सिमटा कोमल रागनुमा सरल, सत्य साहित्य इसे अपनाकर, अपना बनाकर जी उठती है कल्पना की साकार प्रतिमा जो अलंकृत है विभिन्न रुपों में अपनाए जाने योग्य इस तेज को जो अपनाए, हो जाए वो भी भाव-विभोर मन गद्णद, निलांजना-सी अद्भ्रुत, मुखरित हो उठें हृदय पटल पर और पुकार उठें- धमनियों की गलियों से ये ही झंकार, झंकृत हो, झंकृत हो, झंकृत हो.
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- Author Name:
Giriraj Kishore
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‘लोग’ सुप्रसिद्ध कथाकार गिरिराज किशोर का चर्चित उपन्यास है। इसमें एक संक्रमणशील समय का अत्यन्त प्रभावी व रोचक चित्रण है। लेखक के शब्दों में, “देश का स्वतंत्र होना लगभग निश्चित हो गया था। नई सामाजिक प्रवृत्तियाँ और शक्तियाँ अपना स्थान बना रही थीं। उस समय का अभिजात वर्ग अपने-आपको डूबता हुआ महसूस करने लगा, आर्थिक स्तर पर ही नहीं, सामाजिक एवं मान्यताओं के स्तर पर भी। उस वर्ग से सम्बद्ध हर एक वर्ग के ‘लोग’ अपने-आपको ‘छूट-गया’ हुआ-सा महसूस कर रहे थे। उन लोगों के मन में इस नए परिवर्तन के प्रति अरक्षा, मूल्यहीनता, संस्कार-हीनता, उच्छृंखलता, विघटन आदि सब प्रकार की आशंकाएँ थीं। अंग्रेज़ों का जाना उस ‘पूरे' वर्ग के व्यक्तिहीन हो जाने की सूचना थी। उनमें से कुछ बदलते हुए सन्दर्भों के अनुरूप अपने को ढाल पाने में असमर्थ रहे। वे ही ‘लोग’ यहाँ
हैं।”यह उपन्यास वस्तुत: आत्ममूल्यांकन और सामाजिक विश्लेषण की समेकित प्रक्रिया को रेखांकित करता है। कथारस और पठनीयता के गुणों से ओत-प्रोत एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास।
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PT. RAJENDRA ARUN : RAM KAAJ KARIBE KO AATUR
- Author Name:
Dr. Vinod Bala Arun
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"मॉरीशस के हिंदू समाज के मन में श्री राजेंद्र अरुण के प्रति अत्यंत स्नेह, सम्मान और आत्मीय भाव है। सन् 1974 में वे प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम के साप्ताहिक पत्र ‘जनता’ के प्रबंध संपादक बने। सन् 1982 में उनके जीवन में एक नया मोड़ आया। एम.बी.सी. रेडियो पर उन्होंने रामायण की व्याख्या पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम ‘मंथन’ आरंभ किया। लोगों ने इसे खूब सराहा। यह कार्यक्रम अब तक ‘मानस मंथन’ नाम से जारी है। उनके रेडियो कार्यक्रम की लोकप्रियता से ‘रामकथा’ का आरंभ हुआ। सन् 2000 के लगभग से श्री अरुणजी के मन में यह विचार आने लगा कि एक संस्था बनाकर रामकथा का विश्व स्तर पर प्रचार-प्रसार करें। सन् 2001 में उनके इस विचार को ‘रामायण सेंटर’ की स्थापना के साथ ठोस आधार प्राप्त हुआ। जन-मन के हृदय में रामायण गुरु के रूप में प्रतिष्ठित पं. राजेंद्र अरुण के 70वें जन्मदिन पर उन्हें उपहार रूप में भेंट करने के लिए इस पुस्तक के प्रकाशन का विचार हमारे मन में आया। इस पुस्तक में आत्मीय जनों द्वारा अरुणजी पर लिखे गए लेख, अरुणजी द्वारा लिखी गई कविताएँ, उनके चित्र, पत्र-पत्रिकाएँ जिनमें उन पर या उनका कुछ प्रकाशित है, ‘जनता’ समाचार-पत्र की कुछ कतरनें और उनकी कुछ पुस्तकों के अंश तथा एक लंबा साक्षात्कार और अरुणजी को प्राप्त कुछ सम्मान और पुरस्कार आदि संकलित हैं। ‘मॉरीशस के तुलसी’ पं. राजेंद्र अरुण के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व के सम्यक् रूप का दिग्दर्शन करानेवाला संपूर्ण ग्रंथ। "
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