(0)
Author:
Patrick Modiano, Yugank DhirPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
495
396 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
डोरा ब्रूडर, उम्र पन्द्रह साल, यहूदी। स्कूल के रजिस्टर में उसके नाम के आगे ‘जाने की तारीख़ और कारण’ का सिर्फ़ यह विवरण मिलता है : ‘14 दिसम्बर, 1941; शिष्या भाग गई है।’ यह उपन्यास उसी की तलाश की कहानी है जिसे लेखक लगभग पाँच दशक बाद पेरिस पर जर्मन क़ब्ज़े के बचे-खुचे दस्तावेज़ों में करता है। कड़ी से कड़ी जुड़ती जाती है, और अन्त में पता चलता है कि स्कूल से निकलने के बाद वह जर्मनों की पकड़ में आ गई, और उसे आउशवित्ज़ के लिए रवाना कर दिया गया जहाँ एक पूरी क़ौम को ख़त्म करने के लिए नाज़ियों ने तमाम अमानवीय इन्तज़ाम कर रखे थे। डोरा ब्रूडर इस उपन्यास की मुख्य पात्र है, लेकिन असल नायक वह माहौल है जो पेरिस पर जर्मन क़ब्ज़े के बाद वहाँ पैदा हुआ, और जिसे लेखक ने अत्यन्त कौशल के साथ यहाँ पुन:सृजित किया है। एक ऐसा दौर जब अनेक मनुष्यों के लिए न सूरज के पास रोशनी बची थी, न आकाश के पास हवा, न घर उन्हें छिपा पाते थे, न सड़कें कहीं पहुँचा पाती थीं। उन्हें कभी भी कहीं भी पकड़ा जा सकता था, उनके लिए नियम बन गए थे, जो उन्हें उनके ही जैसे मनुष्यों के बीच कम-मनुष्य बनाते थे। उन्हें निर्धारित समय पर निकलना था, निर्धारित इलाक़ों में रहना था, निर्धारित बसों में चलना था, और हर समय अपनी पहचान को ज़ाहिर रखना था। दिसम्बर की बर्फ़ीली रात में निकली डोरा के साथ कब क्या हुआ, कब वह कहाँ रही, यह खोजते हुए जैसे-जैसे लेखक आगे बढ़ता है इस माहौल की भयावहता हमारे सामने साकार होती जाती है, हम भीतर से ठंडे और सुन्न पड़ते जाते हैं और सहसा चौंककर अपने आज के वातावरण को देखने लगते हैं...
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
डोरा ब्रूडर, उम्र पन्द्रह साल, यहूदी। स्कूल के रजिस्टर में उसके नाम के आगे ‘जाने की तारीख़ और कारण’ का सिर्फ़ यह विवरण मिलता है : ‘14 दिसम्बर, 1941; शिष्या भाग गई है।’ यह उपन्यास उसी की तलाश की कहानी है जिसे लेखक लगभग पाँच दशक बाद पेरिस पर जर्मन क़ब्ज़े के बचे-खुचे दस्तावेज़ों में करता है।
कड़ी से कड़ी जुड़ती जाती है, और अन्त में पता चलता है कि स्कूल से निकलने के बाद वह जर्मनों की पकड़ में आ गई, और उसे आउशवित्ज़ के लिए रवाना कर दिया गया जहाँ एक पूरी क़ौम को ख़त्म करने के लिए नाज़ियों ने तमाम अमानवीय इन्तज़ाम कर रखे थे।
डोरा ब्रूडर इस उपन्यास की मुख्य पात्र है, लेकिन असल नायक वह माहौल है जो पेरिस पर जर्मन क़ब्ज़े के बाद वहाँ पैदा हुआ, और जिसे लेखक ने अत्यन्त कौशल के साथ यहाँ पुन:सृजित किया है। एक ऐसा दौर जब अनेक मनुष्यों के लिए न सूरज के पास रोशनी बची थी, न आकाश के पास हवा, न घर उन्हें छिपा पाते थे, न सड़कें कहीं पहुँचा पाती थीं। उन्हें कभी भी कहीं भी पकड़ा जा सकता था, उनके लिए नियम बन गए थे, जो उन्हें उनके ही जैसे मनुष्यों के बीच कम-मनुष्य बनाते थे। उन्हें निर्धारित समय पर निकलना था, निर्धारित इलाक़ों में रहना था, निर्धारित बसों में चलना था, और हर समय अपनी पहचान को ज़ाहिर रखना था।
दिसम्बर की बर्फ़ीली रात में निकली डोरा के साथ कब क्या हुआ, कब वह कहाँ रही, यह खोजते हुए जैसे-जैसे लेखक आगे बढ़ता है इस माहौल की भयावहता हमारे सामने साकार होती जाती है, हम भीतर से ठंडे और सुन्न पड़ते जाते हैं और सहसा चौंककर अपने आज के वातावरण को देखने लगते हैं...
Book Details
-
ISBN9788119159888
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Dalit Veerangnayen Evam Mukti Ki Chah
- Author Name:
Badri Narayan +1
- Book Type:

- Description:
भारत में सांस्कृतिक अभ्युदय की गवेषणा करनेवाली यह पुस्तक उत्तर भारत में दलित-राजनीति के प्रस्फुटन का अवलोकन करती है और बताती है कि 1857 की विद्रोही दलित वीरांगनाएँ, उत्तर प्रदेश में दलित-स्वाभिमान की प्रतीक कैसे बनीं और उनका उपयोग बहुजन समाजवादी पार्टी की नेत्री मायावती की छवि निखारने के लिए कैसे किया गया। यह पुस्तक रेखांकित करती है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में दलितों की भूमिका से सम्बन्धित मिथकों और स्मृतियों का उपयोग इधर राजनीतिक गोलबन्दी के लिए किस तरह किया जा रहा है। इसमें वे कहानियाँ भी निहित हैं जो दलितों के बीच तृणमूल स्तर पर राजनीतिक जागरूकता फैलाने के लिए कही जा रही हैं। व्यपार-शोध और अन्वेषण पर आधारित इस पुस्तक में इस बात का भी उल्लेख है कि किस तरह लोगों के बीच प्रचलित क़िस्सों को अपने मनमुताबिक़ मौखिक रूप से या पम्फ़लेट के रूप में फिर से रखा जा रहा है और किस प्रकार अपने राजनीतिक हित-साधन के लिए प्रत्येक जाति के देवताओं, वीरों एवं अन्य सांस्कृतिक उपादानों को दिखाकर प्रतिमाओं, कैलेंडरों, पोस्टरों और स्मारकों के रूप में तब्दील कर दिया गया है। इस पुस्तक में यह भी दर्शाया गया है कि कैसे बी.एस.पी. अपना जनाधार बढ़ाने के लिए ऐतिहासिक सामग्रियों का निर्माण एवं पुनर्निर्माण करती है। यह पुस्तक ज़मीनी सच्चाइयों एवं परोक्ष जानकारियों पर आधारित है, जिसमें लेखक राजनीतिक गोलबन्दी के लिए ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों के इस्तेमाल का विरोध करता है।
Sarfaroshi Ki Tamanna
- Author Name:
Kuldeep Nayar +2
- Book Type:

- Description:
भगत सिंह (1907-1931) का समय वही समय था जब भारत का स्वतंत्रता-संग्राम अपने उरूज की तरफ़ बढ़ रहा था और जिस समय आंशिक आज़ादी के लिए महात्मा गांधी के अहिंसात्मक, निष्क्रिय प्रतिरोध ने लोगों के धैर्य की परीक्षा लेना शुरू कर दिया था। भारत का युवा वर्ग भगत सिंह के सशस्त्र विरोध के आह्वान और हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के आर्मी विंग की अवज्ञापूर्ण साहसिकता से प्रेरणा ग्रहण कर रहा था, जिससे भगत सिंह और उनके साथी सुखदेव और राजगुरु जुड़े थे। ‘इंकिलाब ज़िन्दाबाद’ का उनका नारा स्वतंत्रता-संघर्ष का उद्घोष बन गया था। लाहौर षड्यंत्र मामले में एक दिखावटी मुक़दमा चलाकर ब्रिटिश सरकार द्वारा भगत सिंह को मात्र 23 साल की आयु में फाँसी पर चढ़ा दिए जाने के बाद भारतवासियों ने उन्हें, उनके युवकोचित साहस, नायकत्व और मौत के प्रति निडरता को देखते हुए शहीद का दर्जा दे दिया। जेल में लिखी हुई उनकी चीज़ें तो अनेक वर्ष उपरान्त, आज़ादी के बाद सामने आईं। आज इसी सामग्री के आधार पर उन्हें देश की आज़ादी के लिए जान देनेवाले अन्य शहीदों से अलग माना जाता है। उनका यह लेखन उन्हें सिर्फ़ एक भावप्रवण स्वतंत्रता सेनानी से कहीं ज़्यादा एक ऐसे अध्यवसायी बुद्धिजीवी के रूप में सामने लाता है जिसकी प्रेरणा के स्रोत, अन्य विचारकों के साथ, मार्क्स, लेनिन, बर्ट्रेंड रसेल और विक्टर ह्यूगो थे और जिसका क्रान्ति-स्वप्न अंग्रेज़ों को देश से निकाल देने-भर तक सीमित नहीं था, बल्कि वह उससे कहीं आगे एक धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी भारत का सपना सँजो रहा था। इसी असाधारण युवक की सौवीं जन्मशती के अवसर पर कुलदीप नैयर इस पुस्तक में उस शहीद के पीछे छिपे आदमी, उसके विश्वासों, उसके बौद्धिक रुझानों और निराशाओं पर प्रकाश डाल रहे हैं। यह पुस्तक पहली बार स्पष्ट करती है कि हंसराज वोहरा ने भगत सिंह के साथ धोखा क्यों किया, साथ ही इसमें सुखदेव के ऊपर भी नई रोशनी में विचार किया गया है जिनकी वफ़ादारी पर कुछ इतिहासकारों ने सवाल उठाए हैं। लेकिन इसके केन्द्र में भगत सिंह का हिंसा का प्रयोग ही है जिसकी गांधी जी समेत अन्य अनेक लोगों ने इतनी कड़ी आलोचना की है। भगत सिंह की मंशा अधिक से अधिक लोगों की हत्या करके या अपने हमलों की भयावहता से अंग्रेज़ों के दिल में आतंक पैदा करना नहीं था, न उनकी निर्भयता का उत्स सिर्फ़ बन्दूक़ों और जवानी के साहस में था। यह उनके अध्ययन से उपजी बौद्धिकता और उनके विश्वासों की दृढ़ता का मिला-जुला परिणाम था।
Vimukt Janjatiyon Ki Vikas-Yatra : Niti Evam Vyavhar
- Author Name:
Malli Gandhi +1
- Book Type:

- Description:
सिद्धपुरम और स्टुअर्टपुरम की बस्तियों के अध्ययन पर आधारित यह पुस्तक आन्ध्र प्रदेश की पूर्व-अपराधी और विमुक्त जनजातियों से सम्बद्ध साहित्य में एक स्वागत योग्य इजाफा है। भारतीय जनजातियों को लेकर प्रामाणिक अध्ययन बहुत कम हुए हैं, आन्ध्र प्रदेश की विमुक्त जनजातियों पर और भी कम। पूर्व-अपराधी जनजातियों पर तो कोई अच्छा काम मिलता ही नहीं है। इन जनजातियों की कुल पाँच बस्तियाँ है जिनमें से दो की देखरेख साल्वेशन आर्मी करती है। उन्हीं में से एक का नाम स्टुअर्टपुरम है जो आन्ध्र प्रदेश के वर्तमान जिले गुंटूर के तहत आती है और जिसका नाम मद्रास सरकार के तत्कालीन सचिव मि. स्टुअर्ट के नाम पर पड़ा है। इस बस्ती से कई नामी-गिरामी डकैतों के आने के चलते कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का ध्यान इसकी तरफ गया और उन्होंने बहुत लगन और समर्पण के भाव से अपना समय और ऊर्जा इस बस्ती के आपराधिक माहौल को बदलने के लिए खर्च किये। इनमें एथीस्ट सेंटर, विजयवाड़ा के लवानम और हेमलता लवानम के नाम प्रमुख हैं। इनके और सरकार के सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप आज यहाँ रहनेवालों के जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। मल्ली गांधी ने राष्ट्रीय तथा तमिलनाडु व आन्ध्र प्रदेश के अभिलेखागारों से कुछ दुर्लभ दस्तावेजों के साथ इस पुस्तक के लिए द्वितीयक स्रोतों के सर्वेक्षणों का भी उपयोग किया है। इसके अलावा जो चीज इस पुस्तक को और महत्त्वपूर्ण बनाती है, वह हैं वे मौखिक साक्ष्य जिन्हें जुटाने में लेखक ने कड़ा परिश्रम किया और जिनके कारण इस पुस्तक को और भी प्रामाणिक रूप मिला।
Ek Jindagi Kafi Nahi
- Author Name:
Kuldeep Nayar +2
- Book Type:

- Description:
यह किताब उस दिन से शुरू होती है जब 1940 में ‘पाकिस्तान प्रस्ताव' पास किया गया था। तब मैं स्कूल का एक छात्र मात्र था, लेकिन लाहौर के उस अधिवेशन में मौजूद था जहाँ यह ऐतिहासिक घटना घटी थी। यह किताब इस तरह की बहुत-सी घटनाओं की अन्दरूनी जानकारी दे सकती है, जो किसी और तरीक़े से सामने नहीं आ सकती—बँटवारे से लेकर मनमोहन सिंह की सरकार तक। अगर मुझे अपनी जिंदगी का कोई अहम मोड़ चुनना हो तो मैं इमरजेंसी के दौरान अपनी हिरासत को ऐसे ही एक मोड़ के रूप में देखना चाहूँगा, जब मेरी निर्दोषिता को हमले का शिकार होना पड़ा था। यही यह समय था जब मुझे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के हनन का अहसास होना शुरू हुआ। साथ ही, व्यवस्था में मेरी आस्था को भी गहरा झटका लगा था। पाकिस्तान और बांग्लादेश में बहुत-से लोगों के साथ मेरे व्यक्तिगत सम्बन्ध हैं और मुझे इन सम्बन्धों पर गर्व है। मेरा विश्वास है कि किसी दिन दक्षिण एशिया के सभी देश यूरोपीय संघ की तरह अपना एक साझा संघ बनाएँगे। इससे उनकी अलग-अलग पहचान पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मैं पूरी ईमानदारी से कह सकता हूँ कि नाकामयाबियाँ मुझे उस रास्ते पर चलने से रोक नहीं पाई हैं जिसे मैं सही मानता रहा हूँ और लड़ने लायक मानता रहा हूँ। जिंदगी एक लगातार बहती अन्तहीन नदी की तरह है, बाधाओं का सामना करती हुई, उन्हें परे धकेलती हुई, और कभी-कभी ऐसा न कर पाते हुए भी। यह बता पाना बस से बाहर है कि पिछले आठ दशकों से कौन सी चीज़ मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रही है—नियति या संकल्प? या ये दोनों ही? आख़िर तमाशा जारी रहना चाहिए। मैं इस मामले में महान उर्दू शायर ग़ालिब से पूरी तरह सहमत हूँ—शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक। —भूमिका से
Hindutva Ka Mohini Mantra
- Author Name:
Badri Narayan +1
- Book Type:

- Description:
भारत के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में दलित एक बड़ी चुनावी ताक़त के रूप में उभरकर आए हैं और लगभग सभी राजनीतिक दलों के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वे उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश करें। ‘हिन्दुत्व का मोहिनी मंत्र’ पुस्तक हिन्दुत्ववादी शक्तियों द्वारा दलितों को अपनी तरफ़ खींचने की मोहक रणनीतियों का विखंडन दिखाती है कि कैसे ये ताक़तें दलित जातियों के लोकप्रिय मिथकों, स्मृतियों और किंवदन्तियों को खोजकर उनकी हिन्दुत्ववादी व्याख्या करती हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में किए गए मौलिक शोध पर आधारित इस पुस्तक में बताया गया है कि दलित नायकों को मुस्लिम आक्रान्ताओं के विरुद्ध लडऩेवाले योद्धाओं के रूप में प्रस्तुत करते हुए हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ उन्हें हिन्दू धर्म और संस्कृति के रक्षकों के रूप में पुनर्व्याख्यायित करती हैं, या फिर उन्हें राम का अवतार बताकर दलित मिथकों को एक बड़े और एकीकृत हिन्दू महावृत्तान्त से जोड़ने का प्रयास करती हैं। लेखक ने पुस्तक में उत्तर भारत के ग्रामीण समाज में ‘पॉपुलर’ की संरचना और उसमें पिरोए गए साम्प्रदायिक तत्त्वों को भी समझने की कोशिश की है। सबसे दिलचस्प तथ्य पुस्तक में यह निकलकर आता है कि दलितों के अतीत की हिन्दुत्ववादी पुनर्व्याख्या को दलित समुदाय एक शक्तिशाली पूँजी के रूप में लेते हैं जिसे वे एक तरफ़ ऊपरी जातियों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और दूसरी तरफ़ सवर्ण प्रभुत्व को क्षीण करने के लिए साथ-साथ इस्तेमाल करते हैं। इतिहास, राजनीति, नृतत्त्वशास्त्र और दलित अध्ययन में रुचि रखनेवाले छात्रों, शोधार्थियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए समान रूप से उपयोगी पुस्तक।
Mahan Hastiyon Ke Antim Pal
- Author Name:
Sukhendu Kumar +1
- Book Type:

- Description:
दर्शन के चिर प्रश्नों में मृत्यु के सवाल ने हर दौर के दार्शनिकों और विचारकों को व्याकुल किया है। लगभग सभी ने इसे समझने, इसकी व्याख्या करने और फिर जीवन-चक्र में इसकी भूमिका को जानने का प्रयास किया। लेकिन अन्तत: मृत्यु के रास्ते पर जाना पड़ा सबको ही। उन्हें भी जिन्होंने दिग-दिगन्त से अपनी ताक़त का लोहा मनवाया, और उन्हें भी जिन्होंने अपनी विनम्रता तथा आत्मबल से संसार को रहने लायक़, जीने लायक़ बनाया। जीवन अपने उरूज पर पहुँचकर जब ढलना शुरू होता है, हर किसी को मृत्यु की वास्तविकता लगातार ज़्यादा मूर्त दिखाई देने लगती है, चाहे वह कोई भी हो। इस पुस्तक में मूल प्रश्न तो मृत्यु का ही है लेकिन उसका अवलोकन उन लोगों के सन्दर्भ में किया गया है जिन्हें हम 'अमर' कहते हैं, ऐसे लोग जो मरकर भी नहीं मरते। लेकिन पुस्तक का उद्देश्य यह दिखाना नहीं है कि मृत्यु ही अन्तिम सत्य है और जीवन का अन्तत: कोई अर्थ नहीं। इसका उद्देश्य मात्र इस साधारण जिज्ञासा को शान्त करना है कि जिन लोगों ने हमें जीवन के बड़े अर्थ दिए, उनके अन्तिम पल कैसे गुज़रे। अपने उपलब्धिपूर्ण जीवन को अन्तिम विदा कहते हुए उन्होंने जीवन और जगत को कैसे देखा और कैसे उन्होंने अपने जीने की व्याख्या की। अनेक पाठकों ने हो सकता है कि अलग-अलग लोगों के जीवन-वृत्त को पढ़ते हुए इनमें से कुछ प्रसंग पढ़े हों, लेकिन यहाँ एक स्थान पर उन्हें पढ़ना हमें कुछ भिन्न निष्कर्षों तक ले जाएगा।
Andha Ullu
- Author Name:
Sadegh Hedayat +1
- Book Type:

- Description:
ईरान के ही नहीं, विश्व के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिने जाने वाले उपन्यास ‘अन्धा उल्लू’ का लेखन इसके लेखक ने बम्बई में अपने भारत प्रवास के दौरान किया था। एक हताश व्यक्ति के भीतरी अँधेरे और उसे चारों तरफ़ से भींचकर रखे रहने वाली दुनिया के प्रति उसका क्षोभ इस उपन्यास के शब्द-शब्द में बिंधा है जिसे सुपरिचित कथाकार नासिरा शर्मा ने बड़े मनोयोग से मूल फ़ारसी से हिन्दी में प्रस्तुत किया है। अपने असंगत अतियथार्थ में यह उपन्यास जहाँ हमें ख़ुद से दूर की कोई चीज़ लगता है, वहीं अपने उन्हीं विवरणों और प्रतिक्रियाओं में अपने बहुत क़रीब भी लगता है। संवेदनहीन ज्यामितिक आकृतियों से घिरे हमारे आधुनिक मनोजगत का वह स्याह विस्तार इसमें अंकित हुआ है, जहाँ पाँव रखने का साहस हम अक्सर नहीं कर पाते। अथाह निराशा, भयावह दुःस्वप्नों, घोर अकेलेपन और मृत्युबोध के हौलनाक चित्रण के चलते ईरान में इस उपन्यास पर प्रतिबन्ध भी लगा जिसका एक कारण यह भी बताया जाता है कि इसे पढ़ने के बाद कुछ पाठकों ने अपना जीवन समाप्त करने के प्रयास भी किए। लेकिन इस उपन्यास में अभिव्यक्त सचाई को नकार पाना कभी सम्भव नहीं हुआ और समय के साथ ‘अन्धा उल्लू’ हरेक सजग संवेदनशील व्यक्ति के लिए एक अपरिहार्य पाठ के तौर पर अधिक से अधिक मान्य होता गया।
Yeh Kothewaliya
- Author Name:
Amritlal Nagar
- Book Type:

- Description:
आज के भारतीय समाज में वेश्याओं के जीवन का हिन्दी या किसी भी अन्य भारतीय भाषा में, यह पहला विश्लेषणात्मक अध्ययन है। श्री अमृतलाल नागर ने बहुत समीप से और बहुत ही सहानुभूति से इस जीवन को देखा है, जिसे आम तौर पर रंगीन और ऐयाशी से पूर्ण समझा जाता है, लेकिन जो संघर्ष और निराशाओं से वैसे ही भरा है, जैसे कि अन्य सामान्य जीवन। इस अध्ययन में किसी उपन्यास से भी अधिक रोचकता है और सत्य पर आधारित होने के करण इसकी प्रमाणिकता अद्धितीय है। भारतीय समाज के अध्येताओं के लिए एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक।
Hamara Shahar Us Baras
- Author Name:
Geetanjali Shree
- Book Type:

- Description:
आसान दीखनेवाली मुश्किल कृति ‘हमारा शहर उस बरस’ में साक्षात्कार होता है एक कठिन समय की बहुआयामी और उलझाव पैदा करनेवाली डरावनी सच्चाइयों से। बात ‘उस बरस’ की है, जब ‘हमारा शहर’ आए दिन साम्प्रदायिक दंगों से ग्रस्त हो जाता था। आगजनी, मारकाट और तद्जनित दहशत रोज़मर्रा का जीवन बनकर एक भयावह सहजता पाते जा रहे थे। कृत्रिम जीवन-शैली का यों सहज होना शहरवासियों की मानसिकता, व्यक्तित्व, बल्कि पूरे वजूद पर चोट कर रहा था। बात दरअसल उस बरस भर की नहीं है। उस बरस को हम आज में भी घसीट लाए हैं। न ही बात है सिर्फ़ हमारे शहर की। ‘और शहरों जैसा ही है हमारा शहर’—सुलगता, खदकता—‘स्रोत और प्रतिबिम्ब दोनों ही’ मौजूदा स्थिति का। एक आततायी आपातस्थिति, जिसका हल फ़ौरन ढूँढ़ना है; पर स्थिति समझ में आए, तब न निकले हल। पुरानी धारणाएँ फिट बैठती नहीं, नई सूझती नहीं, वक़्त है नहीं कि जब सूझें, तब उन्हें लागू करके जूझें स्थिति से। न जाने क्या से क्या हो जाए तब तक। वे संगीनें जो दूर हैं उधर, उन पर मुड़ीं, वे हम पर भी न मुड़ जाएँ, वह धूल-धुआँ जो उधर भरा है, इधर भी न मुड़ आए। अभी भी जो समझ रहे हैं कि दंगे उधर हैं—दूर, उस पार, उन लोगों में—पाते हैं कि ‘उधर’ ‘इधर’ बढ़ आया है, ‘वे’ लोग ‘हम’ लोग भी हैं, और इधर-उधर वे-हम करके ख़ुद को झूठी तसल्ली नहीं दी जा सकती। दंगे जहाँ हो रहे हैं, वहाँ ख़ून बह रहा है। सो, यहाँ भी बह रहा है, हमारी खाल के नीचे। अपनी ही खाल के नीचे छिड़े दंगे से दरपेश होने की कोशिश ही इस गाथा का मूल। ख़ुद को चीरफाड़ के लिए वैज्ञानिक की मेज़ पर धर देने जैसा। अपने को नंगा करने का प्रयास ही अपने शहर को समझने, उसके प्रवाहों को मोड़ देने की एकमात्र शुरुआत हो सकती है। यही शुरुआत एक ज़बरदस्त प्रयोग द्वारा गीतांजलि श्री ने ‘हमारा शहर उस बरस’ में की है। जान न पाने की बढ़ती बेबसी के बीच जानने की तरफ़ ले जाते हुए।
Boudam
- Author Name:
Fyodor Dostoyevsky +1
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Muhar
- Author Name:
Chandan Pandey
- Book Type:

- Description:
रोली घमंडी है, रोली अकडू है, रोली ज़िद्दी है... ऐसी तमाम तोहमतों के बीच रोली है कि नौकरी पाने, नौकरी की जगह तक पहुँच पाने और वहाँ से घर लौटने की जद्दोजेहद से रोज़ गुज़र रही है। यक़ीन कीजिए कि ये साधारण सी दिखने वाली बातें एक वर्किंग वूमन के लिये रोज़ लड़ी जाने वाली लड़ाइयाँ हैं। जेंडर, आयु और शहरी/ग्रामीण पृष्ठभूमि को केंद्र में रखकर किये जाने वाले कई सूक्ष्म और स्थूल भेदभाव हैं जिनका सामना रोली और उस जैसी तमाम कामकाजी स्त्रियों को रोज़ करना होता है। परिवार, समाज और रोज़गार के मुश्किल कुरुक्षेत्र में जूझती रोली को केंद्र में रखकर लिखी गई ये कहानियाँ हर कामकाजी स्त्री के जीवन, स्वप्न और संघर्ष का सूक्ष्म और मार्मिक दस्तावेज़ बन पड़ी हैं।
Punarutthan
- Author Name:
Leo Tolstoy +1
- Book Type:

- Description:
आधुनिक इतिहास में यदि किसी विचारक-लेखक की ख्याति उसकी ज़िन्दगी में ही पूरी दुनिया में फैल चुकी थी और जीते-जी ही वह एक मिथक बन गया था, तो वे लेव तोल्स्तोय ही थे। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर जिस तरह बाल्ज़ाक छाए हुए थे, उसी तरह उत्तरार्द्ध के साहित्यिक परिदृश्य पर तोल्स्तोय का प्रभाव-साम्राज्य फैला हुआ था। ‘पुनरुत्थान’ एक नए प्रकार का उपन्यास था जिसमें पात्रों के गहन आत्मसंघर्ष और रूपान्तरण के साथ ही, सेंट पीटर्सबर्ग के दरबार के लोगों और ग्रामीण कुलीनों से लेकर किसानों, क़ैदियों और साइबेरिया-निर्वासन पर जा रहे क़ैदियों के चरित्रों के माध्यम से तत्कालीन रूस के समूचे वैविध्यपूर्ण सामाजिक परिदृश्य को एक इतिहासकार-सदृश वस्तुपरकता और अधिकार के साथ उपस्थित कर दिया गया है। कात्यूशा का मुक़दमा और उसमें जूरी सदस्य के रूप में नेख्लूदोव की उपस्थिति सामाजिक अन्याय पर आधारित जीवन की निरर्थकता और न्यायतंत्र की कुरूपता को एकदम नंगा कर देती है। ‘पुनरुत्थान’ में तोल्स्तोय सरकार, न्यायालय, चर्च, कुलीन भूस्वामियों के विशेषाधिकारियों, भूमि के निजी स्वामित्व, मुद्रा, जेलों और वेश्यावृत्ति की मर्मभेदी आलोचना करते हैं। घनी और शक्तिशाली लोगों द्वारा उत्पीड़ित निम्न वर्गों के प्रति सहानुभूति-प्रदर्शन पर उपन्यास तीखा व्यंग्य करता है। किसानों, क्रान्तिकारियों और निर्वासित अपराधियों सहित सामान्य जनसमुदाय का चित्रण करते हुए तोल्स्तोय का ज़ोर इस बात पर है कि उत्पीड़न और अधिकारहीनता ने आमजन की आत्मिक शक्तियों को पंगु बना डाला है।
Banbhatt Ki Aatmakatha
- Author Name:
Hazariprasad Dwivedi
- Book Type:

- Description:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की विपुल रचना-सामर्थ्य का रहस्य उनके विशद शास्त्रीय ज्ञान में नहीं, बल्कि उस पारदर्शी जीवन-दृष्टि में निहित है, जो युग का नहीं युग-युग का सत्य देखती है। उनकी प्रतिभा ने इतिहास का उपयोग ‘तीसरी आँख’ के रूप में किया है और अतीत-कालीन चेतना-प्रवाह को वर्तमान जीवनधारा से जोड़ पाने में वह आश्चर्यजनक रूप से सफल हुई है। 'बाणभट्ट की आत्मकथा' अपनी समस्त औपन्यासिक संरचना और भंगिमा में कथा-कृति होते हुए भी महाकाव्यत्व की गरिमा से पूर्ण है। इसमें द्विवेदी जी ने प्राचीन कवि बाण के बिखरे जीवन-सूत्रों को बड़ी कलात्मकता से गूँथकर एक ऐसी कथाभूमि निर्मित की है जो जीवन-सत्यों से रसमय साक्षात्कार कराती है। बाणभट्ट की आत्मकथा का कथानायक कोरा भावुक कवि नहीं वरन कर्मनिरत और संघर्षशील जीवन-योद्धा है। उसके लिए ‘शरीर केवल भार नहीं, मिट्टी का ढेला नहीं’, बल्कि ‘उससे बड़ा’ है और उसके मन में आर्यावर्त्त के उद्धार का निमित्त बनने की तीव्र बेचैनी है। ‘अपने को निःशेष भाव से दे देने’ में जीवन की सार्थकता देखने वाली निउनिया और ‘सबकुछ भूल जाने की साधना’ में लीन महादेवी भट्टिनी के प्रति उसका प्रेम जब उच्चता का वरण कर लेता है तो यही गूँज अंत में रह जाती हैद-‘‘वैराग्य क्या इतनी बड़ी चीज है कि प्रेम देवता को उसकी नयनाग्नि में भस्म कराके ही कवि गौरव का अनुभव करे?’’
Ajnabi
- Author Name:
Albert Camus +1
- Book Type:

- Description:
फ्रांस के अमर लेखक, नोबेल पुरस्कार-विजेता अल्बैर कामू मानव-अन्तर्मन के संवेगों और कुंठाओं को अनावृत करने में पटु हैं। नियति में उनका विश्वास है और कृत्य की स्वतंत्रता एक निर्दिष्ट परिधि में ही वह मानते हैं। आरम्भ से अन्त तक पाठक की रुचि को साधे रखनेवाले इस उपन्यास में नायक के समस्त क्रिया-कलाप और उसके साथ घटी घटनाओं में उनका यही जीवन-दर्शन व्यक्त हुआ है। विश्व के विशिष्ट उपन्यास-साहित्य में स्थान पानेवाले उपन्यास ‘अजनबी’ की कथा-वस्तु न केवल हमारे मर्म को मथ देने में सफल होती है, वरन् हमें जीवन और कर्म, और इन दोनों के उद्देश्यों के सम्बन्ध में भी सोचने पर विवश करती है। सन् 1942 में प्रकाशित इस उपन्यास को द्वितीय विश्वयुद्ध से उत्पन्न हताशा और विसंगतियों को अभिव्यक्त करनेवाली कृति माना जाता है। उपन्यास के नायक से कामू यहाँ जीवन की निरुद्देश्यता और मृत्यु की अनिवार्यता को रेखांकित करते हैं; नायक की समाज से विरक्ति और उदासीनता का जैसा मार्मिक चित्रण कामू ने इस उपन्यास में किया है, वह आज भी स्तब्ध कर देता है।
Chittakobara
- Author Name:
Mridula Garg
- Book Type:

- Description:
जो लिखा है, उसे उपन्यास कहते मुझे संकोच हो रहा है। जिस तरह यह लिखा गया, याद करके हँसी आती है। एक कहानी थी जो मेरे अन्तर्मन में फैलती-सिकुड़ती रहती थी। फिर एक दिन उस कहानी के अन्तराल का एक-एक क्षण अपनी कड़ी से टूटकर बिखर गया। मैंने आँखें फैलाकर देखा तो दीखा, हर क्षण अलग से फैल रहा है और पूरी एक कहानी का आभास दे रहा है। यह सच है कि मैंने उन अलग-अलग क्षणों को लिखने की प्रक्रिया में अलग-अलग जिया है...आखिर मैं थक गई। लिखे हुए पन्नों को एक जगह इकट्ठा किया और यह बात मेरे लिए सुखद आश्चर्य का विषय है कि पूरी पुस्तक में एक अन्तर्धारा बहती हुई दीखती है और एकसूत्रता भी आसानी से पकड़ में आती है। इस उपन्यास में परिच्छेद नहीं हैं। मैं जानती हूँ, जीवन की इतनी प्रवहमान धारा को टुकड़ों में नहीं काटा जा सकता। अन्दर के दबाव के कारण ही शायद यह हो सका है कि क्षणों में जी और लिखी गई इस कहानी के टुकड़ों का क्रम भी बाद में तय हुआ। दरअसल, बहती नदी से किसी किनारे खड़े होकर पानी पियो - क्या फर्क पड़ता है! क्रम-निर्धारण का पूर्वग्रह तो कहानी गढ़ने में होता है; जो कहानी है, वह तो...कोई कहीं से भी साथ हो ले... - इसी पुस्तक से
Naqqashidar Cabinet
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
- Book Type:


- Description:
सुधा ओम ढींगरा का उपन्यास नक़्क़ाशीदार केबिनेट वर्ष 2016 का अत्यंत सफल उपन्यास है। यह उपन्यास पेपरबैक और ऑडियोबुक में भी उपलब्ध है।
Gawah Gairhazir
- Author Name:
Chandrakishore Jaiswal
- Book Type:

- Description:
किसुन साह ने जब बिना किसी सिर-फुड़ौव्वल के बेटों के बीच बाँट-बखरा कर दिया तो लोगों ने उन्हें इस बात पर खुश होने को कहा कि अब उनके बुढ़ापे के दिन मौज-मस्ती में कटते रहेंगे। किसुन साह ने भी निर्णय ले लिया कि मौज-मस्ती में दिन काटने के लिए उन्हें अब बूढ़ा भी हो ही जाना चाहिए। लेकिन...। परिवार नामक सुख के टापू की यह कहानी यहीं से शुरू होती है। लोक और ग्रामीण जीवन के मर्मज्ञ कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल का उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ अपनी बहुस्तरीय भाषा-सामर्थ्य के लिए खासतौर पर जाना जाता है। पात्रों की कहानी कहने के साथ ही कथाकार इसमें भारतीय ग्राम्य समाज और उसकी संरचना पर भी टिप्पणियाँ करते चलते हैं जिससे एक तरफ सूक्ष्म पर्यवेक्षण की उनकी क्षमता रेखांकित होती है, तो दूसरी तरफ़ गाँव की गझिन सामाजिक-मानसिक बनावट को समझने में भी मदद मिलती है। उपन्यास की कथा के केन्द्र में किसुन साह हैं—एक स्वाभिमानी और समझदार बुजुर्ग। घर की सम्पत्ति इत्यादि का बँटवारा अपने परिवार में शान्तिपूर्वक करने के बाद वे सबसे छोटे बेटे के साथ रहने का फैसला करते हैं। कुछ दिन वहाँ रहने के बाद जब उन्हें लगता है कि बेटा-बहू का व्यवहार उनके प्रति ठीक नहीं है तो वे घर छोड़कर बाकी जीवन एक मन्दिर में बिताने का फैसला करते हैं, लेकिन परिवार से मोह के चलते यह भी नहीं कर पाते। पारिवारिक सम्बन्धों की महीन अक्कासी के अलावा यह उपन्यास पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी और सम्बन्धों की ऊष्मा के छीजते जाने की मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी करता है। समर्थ शिल्प, जीवन्त भाषा और बेधक कथ्य वाला अत्यन्त पठनीय उपन्यास !
Naukar Ki Kameez
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla
- Book Type:

- Description:
‘नौकर की कमीज़’ भारतीय जीवन के यथार्थ और आदमी की कशमकश को प्रस्तुत करनेवाला उपन्यास है। इस उपन्यास की सबसे बड़े ख़ासियत यह है कि इसके पात्र मायावी नहीं बल्कि दुनियावी हैं, जिनमें कल्पना और यथार्थ के स्वर एक साथ पिरोए हुए हैं। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि किसी पात्र को अनावश्यक रूप से महत्त्व दिया गया हो। हर पैरे और हर पात्र की अपनी महत्ता है। केन्द्रीय पात्र संतू बाबू एक ऐसा दुनियावी पात्र है जो घटनाओं को रचता नहीं, बल्कि उनसे जूझने के लिए विवश, है और साथ ही इस सोसाइटी के हाथों इस्तेमाल होने के लिए भी। आज की ‘ब्यूरोक्रेसी’ और अहसानफ़रामोश लोगों पर यह उपन्यास सीधा प्रहार ही नहीं करता, बल्कि छोटे-छोटे वाक्यों के सहारे व्यंग्यात्मक शैली में एक माहौल भी तैयार करता चलता है। विनोद कुमार शुक्ल की सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का ही कमाल है कि पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद ज़िन्दगी के अनगिनत मार्मिक तथ्य दिमाग़ में तारीख़वार दर्ज होते चले जाते हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में अनुभव और यथार्थ का पैनापन है, जिसकी मारक शक्ति केवल मिलमिलाहट ही पैदा नहीं करती बल्कि बहुत अन्दर तक भेदती चली जाती है।
Umrao Jaan Ada
- Author Name:
Mirza Hadi Ruswa
- Book Type:

- Description:
उन्नीसवीं सदी की मशहूर तवायफ़ उमराव जान ‘अदा’ लखनऊ और आस-पास के इलाक़ों की ख़ास महफ़िलों की रौनक़ हुआ करती थी। उसकी ख़ूबसूरती, शोख़ अदाओं, नाच-गाने और शायरी के मद्दाहों में उस ज़माने के ख़ानदानी रईस, जोशीले नवाबज़ादे और नामी ग़ुण्डे तक शामिल थे। लेकिन फ़ैज़ाबाद के एक जमादार की बेटी अमीरन के मशहूर तवायफ़ उमराव जान बनने की कहानी काफ़ी अफ़सोसनाक है और पढ़ने वाले इसे पढ़ते हुए जज़्बाती हो उठते हैं। इस कहानी को मिर्ज़ा हादी रुस्वा ने इस तरह से बयान किया है कि उमराव जान की ज़िन्दगी के सफ़र का हर मंज़र हमारी आँखों के सामने ज़िन्दा हो उठता है। इस किताब को पहली बार 1899 में छापा गया था और उसके बाद से इस कहानी को कई बार किताबों और फ़िल्मों की शक्ल में सामने लाया जा चुका है मगर लोगों में इसकी दिलचस्पी आज भी बरक़रार है।
Suhag Ke Nupur
- Author Name:
Amritlal Nagar
- Book Type:

- Description:
ईसा की प्रथम शताब्दी में महाकवि इलंगोवन रचित तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम्’ भारतीय साहित्य की एक अनमोल रचना है। प्रस्तुत उपन्यास उक्त महाकाव्य की कथावस्तु पर आधारित पहली हिन्दी कृति है, जिसमें दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जीवन का विस्तृत और विश्वसनीय चित्रण हुआ है। तत्कालीन पृष्ठभूमि को सँजोने में लेखक ने इतिहास-ग्रन्थों का अवगाहन करके अपने चित्रणों को यथासम्भव प्रामाणिक बनाने की चेष्टा की है और इस प्रकार उक्त महाकाव्य पर आधारित होते हुए भी यह प्रायः एक स्वतंत्र रचना बन गई है। स्वयं लेखक के शब्दों में : ‘‘घिसी-पिटी थीम होने पर भी पापुलर उपन्यास के लिए मुझे वह अच्छी लगी; मैं अपने दृष्टिकोण से उसमें नवीनता देख रहा था।’’ मिली-जुली सरल भाषा में लिखे गए इस उपन्यास का यह छठा संस्करण पाठकों के सामने है, जो इसकी लोकप्रियता का अकाट्य प्रमाण है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book