Ek Yahoodi Ladki Ki Talash
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Author:
Patrick Modiano, Yugank DhirPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
199
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डोरा ब्रूडर, उम्र पन्द्रह साल, यहूदी। स्कूल के रजिस्टर में उसके नाम के आगे ‘जाने की तारीख़ और कारण’ का सिर्फ़ यह विवरण मिलता है : ‘14 दिसम्बर, 1941; शिष्या भाग गई है।’ यह उपन्यास उसी की तलाश की कहानी है जिसे लेखक लगभग पाँच दशक बाद पेरिस पर जर्मन क़ब्ज़े के बचे-खुचे दस्तावेज़ों में करता है।</p> <p>कड़ी से कड़ी जुड़ती जाती है, और अन्त में पता चलता है कि स्कूल से निकलने के बाद वह जर्मनों की पकड़ में आ गई, और उसे आउशवित्ज़ के लिए रवाना कर दिया गया जहाँ एक पूरी क़ौम को ख़त्म करने के लिए नाज़ियों ने तमाम अमानवीय इन्तज़ाम कर रखे थे।</p> <p>डोरा ब्रूडर इस उपन्यास की मुख्य पात्र है, लेकिन असल नायक वह माहौल है जो पेरिस पर जर्मन क़ब्ज़े के बाद वहाँ पैदा हुआ, और जिसे लेखक ने अत्यन्त कौशल के साथ यहाँ पुन:सृजित किया है। एक ऐसा दौर जब अनेक मनुष्यों के लिए न सूरज के पास रोशनी बची थी, न आकाश के पास हवा, न घर उन्हें छिपा पाते थे, न सड़कें कहीं पहुँचा पाती थीं। उन्हें कभी भी कहीं भी पकड़ा जा सकता था, उनके लिए नियम बन गए थे, जो उन्हें उनके ही जैसे मनुष्यों के बीच कम-मनुष्य बनाते थे। उन्हें निर्धारित समय पर निकलना था, निर्धारित इलाक़ों में रहना था, निर्धारित बसों में चलना था, और हर समय अपनी पहचान को ज़ाहिर रखना था।</p> <p>दिसम्बर की बर्फ़ीली रात में निकली डोरा के साथ कब क्या हुआ, कब वह कहाँ रही, यह खोजते हुए जैसे-जैसे लेखक आगे बढ़ता है इस माहौल की भयावहता हमारे सामने साकार होती जाती है, हम भीतर से ठंडे और सुन्न पड़ते जाते हैं और सहसा चौंककर अपने आज के वातावरण को देखने लगते हैं...
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डोरा ब्रूडर, उम्र पन्द्रह साल, यहूदी। स्कूल के रजिस्टर में उसके नाम के आगे ‘जाने की तारीख़ और कारण’ का सिर्फ़ यह विवरण मिलता है : ‘14 दिसम्बर, 1941; शिष्या भाग गई है।’ यह उपन्यास उसी की तलाश की कहानी है जिसे लेखक लगभग पाँच दशक बाद पेरिस पर जर्मन क़ब्ज़े के बचे-खुचे दस्तावेज़ों में करता है।</p>
<p>कड़ी से कड़ी जुड़ती जाती है, और अन्त में पता चलता है कि स्कूल से निकलने के बाद वह जर्मनों की पकड़ में आ गई, और उसे आउशवित्ज़ के लिए रवाना कर दिया गया जहाँ एक पूरी क़ौम को ख़त्म करने के लिए नाज़ियों ने तमाम अमानवीय इन्तज़ाम कर रखे थे।</p>
<p>डोरा ब्रूडर इस उपन्यास की मुख्य पात्र है, लेकिन असल नायक वह माहौल है जो पेरिस पर जर्मन क़ब्ज़े के बाद वहाँ पैदा हुआ, और जिसे लेखक ने अत्यन्त कौशल के साथ यहाँ पुन:सृजित किया है। एक ऐसा दौर जब अनेक मनुष्यों के लिए न सूरज के पास रोशनी बची थी, न आकाश के पास हवा, न घर उन्हें छिपा पाते थे, न सड़कें कहीं पहुँचा पाती थीं। उन्हें कभी भी कहीं भी पकड़ा जा सकता था, उनके लिए नियम बन गए थे, जो उन्हें उनके ही जैसे मनुष्यों के बीच कम-मनुष्य बनाते थे। उन्हें निर्धारित समय पर निकलना था, निर्धारित इलाक़ों में रहना था, निर्धारित बसों में चलना था, और हर समय अपनी पहचान को ज़ाहिर रखना था।</p>
<p>दिसम्बर की बर्फ़ीली रात में निकली डोरा के साथ कब क्या हुआ, कब वह कहाँ रही, यह खोजते हुए जैसे-जैसे लेखक आगे बढ़ता है इस माहौल की भयावहता हमारे सामने साकार होती जाती है, हम भीतर से ठंडे और सुन्न पड़ते जाते हैं और सहसा चौंककर अपने आज के वातावरण को देखने लगते हैं...
Book Details
-
ISBN9788119159888
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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किसुन साह ने जब बिना किसी सिर-फुड़ौव्वल के बेटों के बीच बाँट-बखरा कर दिया तो लोगों ने उन्हें इस बात पर खुश होने को कहा कि अब उनके बुढ़ापे के दिन मौज-मस्ती में कटते रहेंगे। किसुन साह ने भी निर्णय ले लिया कि मौज-मस्ती में दिन काटने के लिए उन्हें अब बूढ़ा भी हो ही जाना चाहिए। लेकिन...। परिवार नामक सुख के टापू की यह कहानी यहीं से शुरू होती है। लोक और ग्रामीण जीवन के मर्मज्ञ कथाकार चन्द्रकिशोर जायसवाल का उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ अपनी बहुस्तरीय भाषा-सामर्थ्य के लिए खासतौर पर जाना जाता है। पात्रों की कहानी कहने के साथ ही कथाकार इसमें भारतीय ग्राम्य समाज और उसकी संरचना पर भी टिप्पणियाँ करते चलते हैं जिससे एक तरफ सूक्ष्म पर्यवेक्षण की उनकी क्षमता रेखांकित होती है, तो दूसरी तरफ़ गाँव की गझिन सामाजिक-मानसिक बनावट को समझने में भी मदद मिलती है। उपन्यास की कथा के केन्द्र में किसुन साह हैं—एक स्वाभिमानी और समझदार बुजुर्ग। घर की सम्पत्ति इत्यादि का बँटवारा अपने परिवार में शान्तिपूर्वक करने के बाद वे सबसे छोटे बेटे के साथ रहने का फैसला करते हैं। कुछ दिन वहाँ रहने के बाद जब उन्हें लगता है कि बेटा-बहू का व्यवहार उनके प्रति ठीक नहीं है तो वे घर छोड़कर बाकी जीवन एक मन्दिर में बिताने का फैसला करते हैं, लेकिन परिवार से मोह के चलते यह भी नहीं कर पाते। पारिवारिक सम्बन्धों की महीन अक्कासी के अलावा यह उपन्यास पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी और सम्बन्धों की ऊष्मा के छीजते जाने की मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी करता है। समर्थ शिल्प, जीवन्त भाषा और बेधक कथ्य वाला अत्यन्त पठनीय उपन्यास !
Umrao Jaan Ada
- Author Name:
Mirza Hadi Ruswa
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उन्नीसवीं सदी की मशहूर तवायफ़ उमराव जान ‘अदा’ लखनऊ और आस-पास के इलाक़ों की ख़ास महफ़िलों की रौनक़ हुआ करती थी। उसकी ख़ूबसूरती, शोख़ अदाओं, नाच-गाने और शायरी के मद्दाहों में उस ज़माने के ख़ानदानी रईस, जोशीले नवाबज़ादे और नामी ग़ुण्डे तक शामिल थे। लेकिन फ़ैज़ाबाद के एक जमादार की बेटी अमीरन के मशहूर तवायफ़ उमराव जान बनने की कहानी काफ़ी अफ़सोसनाक है और पढ़ने वाले इसे पढ़ते हुए जज़्बाती हो उठते हैं। इस कहानी को मिर्ज़ा हादी रुस्वा ने इस तरह से बयान किया है कि उमराव जान की ज़िन्दगी के सफ़र का हर मंज़र हमारी आँखों के सामने ज़िन्दा हो उठता है। इस किताब को पहली बार 1899 में छापा गया था और उसके बाद से इस कहानी को कई बार किताबों और फ़िल्मों की शक्ल में सामने लाया जा चुका है मगर लोगों में इसकी दिलचस्पी आज भी बरक़रार है।
Suhag Ke Nupur
- Author Name:
Amritlal Nagar
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ईसा की प्रथम शताब्दी में महाकवि इलंगोवन रचित तमिल महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम्’ भारतीय साहित्य की एक अनमोल रचना है। प्रस्तुत उपन्यास उक्त महाकाव्य की कथावस्तु पर आधारित पहली हिन्दी कृति है, जिसमें दक्षिण भारत के ऐतिहासिक जीवन का विस्तृत और विश्वसनीय चित्रण हुआ है। तत्कालीन पृष्ठभूमि को सँजोने में लेखक ने इतिहास-ग्रन्थों का अवगाहन करके अपने चित्रणों को यथासम्भव प्रामाणिक बनाने की चेष्टा की है और इस प्रकार उक्त महाकाव्य पर आधारित होते हुए भी यह प्रायः एक स्वतंत्र रचना बन गई है। स्वयं लेखक के शब्दों में : ‘‘घिसी-पिटी थीम होने पर भी पापुलर उपन्यास के लिए मुझे वह अच्छी लगी; मैं अपने दृष्टिकोण से उसमें नवीनता देख रहा था।’’ मिली-जुली सरल भाषा में लिखे गए इस उपन्यास का यह छठा संस्करण पाठकों के सामने है, जो इसकी लोकप्रियता का अकाट्य प्रमाण है।
Dhoday Charitmanas
- Author Name:
Satinath Bhaduri
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आधुनिक भारतीय कथा - साहित्य में कहानी कहना बंगाल की कला है । प्रस्तुत रचना इस मान्यता का एक अच्छा उदाहरण है । धीरोदात्त नायक यहाँ नहीं है । है तो ढोड़ाय , जैसा मामूली नाम तैसा चरित , ततमा लोगों के पूरे सामाजिक संदर्भ में , जहाँ ' पक्की ' ( यानी पक्की सड़क ) आधुनिक जीवन और बाहरी तत्त्व को प्रतिकित करती है । यह ' पक्की ' ही पूरे उपन्यास को आदि से अंत तक जोड़े हुए है । जिस समाज में महज पक्की सड़क नयी रोशनी का प्रतीक हो , उसे आधुनिक संदर्भों में जोड़ना रचनात्मक और वैचारिक दोनों स्तरों पर ' कितना कठिन है , यह आसानी से समझा जा सकता है । पर प्रख्यात बंगला कथा - शिल्पी सतीनाथ भादुड़ी ने कलात्मक धीरज के साथ इस जोड़ को साधा है । यों एक बड़े कालगत अंतराल को कथाकार ने अपनी संवेदना से पूरा किया है । प्रसिद्ध बंगला उपन्यास ' ढोड़ाय चरितमानस ' हिंन्दी में प्रकाशित होने के पूर्व ही यहाँ विस्तृत चर्चा का विषय बना रहा है । तब हिंदी पाठक के मन में उसको लेकर अतिरिक्त उत्सुकता का होना स्वाभाविक है । ' मैला आँचल ' हिंदी के समकालीन क्लैसिकों में है । उसका मूल नक्शा यहाँ देखा जा सकता है , जिसे हिंदी के उपन्यासकार ने अपने ढंग से समृद्धतर किया है । यों हिंदी की आंचलिक कथा - धारा का एक स्रोत है । ' ढोड़ाय चरितमानस ' । इस दृष्टि से सामान्य से सामान्य पाठक और विशिष्ट से विशिष्ट शोधकर्ता के लिए यह कथा - कृति रोचक और उपयोगी सिद्ध होगी ।
Bhavbhuti Katha
- Author Name:
Mahesh Katare
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भवभूति आठवीं सदी में हुए थे। नाटककार थे, कवि थे। संस्कृत में लिखे उनके नाटकों को कालिदास की रचनाओं के बराबर माना जाता है।
यह उपन्यास उनके जीवन पर आधारित है, जिसकी मुख्य कथाधारा ब्राह्मण होने के बावजूद नाट्य-कर्म में उनकी प्रवृत्ति और उसके चलते अपने समाज में उनके संघर्ष के साथ-साथ चलती है।
महेश कटारे इससे पूर्व भर्तृहरि पर केन्द्रित एक अत्यन्त लोकप्रिय उपन्यास की रचना कर चुके हैं। भारत के सांस्कृतिक इतिहास के उल्लेखनीय पड़ावों को औपन्यासिक कलेवर में प्रस्तुत करते हुए वे तत्कालीन तथ्यों और आज के प्रश्नों को बराबर ध्यान में रखते हैं। देश, काल और पात्रानुकूल भाषा तथा जीवन-व्यवहार के विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हुए वे एक तरफ जहाँ अतीत को मूर्तिमान कर देते हैं, वहीं मानव-समाज और व्यवस्था के लिए हमेशा प्रासंगिक रहने वाले मुद्दों को भी अनदेखा नहीं करते।
भवभूति के बहुवर्णी चरित्र पर केन्द्रित यह उपन्यास भी उसका अपवाद नहीं है।
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