Andhkar Bela
(0)
Author:
Suchitra BhattacharyaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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कहते हैं, सारा-का-सारा ऑपरेशन प्लान माफिक किया गया। कल दिन भर, रात भर चूँकि धरना पर बैठे लोगों को हिला नहीं पाए, इसलिए भोर-रात बेधड़क लाठियाँ चलाई गईं, बिलकुल अचानक! लोगों को कुत्ते-बिल्ली की तरह दौड़ाते रहने के बाद भी बाबू लोगों का गुस्सा कम नहीं हुआ। जमीन देने को अनिच्छुक लोग अपनी रीढ़ सीधी करके खड़े न हो पाएँ, इसके लिए उन लोगों ने चड़कडाँगा गाँव चुन लिया। पुलिस और गुंडों का गिरोह...हाँ, पुलिस के जत्थे में बाहर के गुंडे भी शामिल थे। उन लोगों ने अचानक ही गाँव पर हमला बोल दिया। घर-द्वार तहस-नहस कर दिया, बच्चे-बूढ़े-जवानों को निर्ममता से पीटा, बहू-बेटियों की इज्जत लूटी। कुछ भी नहीं छोड़ा।’जया ने पूछा, ‘हाँ जी, एक बहुरिया को घसीटते-घसीटते यूँ लात चला रहे थे कि...’ —इसी उपन्यास से जीवन के विविध रंगों—हर्ष, विषाद, उल्लास में रँगा—सामाजिकता की नींव पर मजबूती से खड़ा सशक्त उपन्यास।
Read moreAbout the Book
कहते हैं, सारा-का-सारा ऑपरेशन प्लान माफिक किया गया। कल दिन भर, रात भर चूँकि धरना पर बैठे लोगों को हिला नहीं पाए, इसलिए भोर-रात बेधड़क लाठियाँ चलाई गईं, बिलकुल अचानक! लोगों को कुत्ते-बिल्ली की तरह दौड़ाते रहने के बाद भी बाबू लोगों का गुस्सा कम नहीं हुआ। जमीन देने को अनिच्छुक लोग अपनी रीढ़ सीधी करके खड़े न हो पाएँ, इसके लिए उन लोगों ने चड़कडाँगा गाँव चुन लिया। पुलिस और गुंडों का गिरोह...हाँ, पुलिस के जत्थे में बाहर के गुंडे भी शामिल थे। उन लोगों ने अचानक ही गाँव पर हमला बोल दिया। घर-द्वार तहस-नहस कर दिया, बच्चे-बूढ़े-जवानों को निर्ममता से पीटा, बहू-बेटियों की इज्जत लूटी। कुछ भी नहीं छोड़ा।’जया ने पूछा, ‘हाँ जी, एक बहुरिया को घसीटते-घसीटते यूँ लात चला रहे थे कि...’
—इसी उपन्यास से
जीवन के विविध रंगों—हर्ष, विषाद, उल्लास में रँगा—सामाजिकता की नींव पर मजबूती से खड़ा सशक्त उपन्यास।
Book Details
-
ISBN9789381063095
-
Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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रचना अच्छी, कहीं-कहीं बहुत अच्छी, अच्छी के अतिरिक्त सशक्त लगी। न यह स्थानाबद्ध है और न समयाबद्ध...यह रचना की विशेषता है। जिन पात्रों और घटनाओं को लेखक ने लिया है, पात्रों के जो कार्यकलाप हैं, उसके पीछे की मार्मिक कारण-जगत की खोज लेखक को निरंतर रही है। अपने को औरों में खोजने की वृत्ति...जो ‘लाल पीली जमीन’ की औपन्यासिक दृष्टि है...वह मुझे विश्वसनीय प्रतीत होती है।
–जैनेन्द्र कुमार
पढ़ने में रुचिकर और सिर्फ पाठक की दृष्टि से कहूँ तो यह एक सफल, सशक्त और एक स्थायी प्रभाव छोड़नेवाला उपन्यास है। इसके कई चरित्र और घटनाएँ मुझे याद हैं और उनकी याद रहेगी। आंचलिकता केवल भाषिक परिवेश तक सीमित है। उपन्यास की भाषा ने मुझे बहुत आकृष्ट किया। इस उपन्यास ने
बहुत-से ऐसे शब्द हिन्दी को दिए हैं जो ज्यादा आसानी से आज की साधु हिन्दी ग्रहण कर सकती है। भाषा की दृष्टि से इस उपन्यास की यह महत्त्वपूर्ण देन रही।
–अज्ञेय
बुंदेलखंड का जन्म से मरण तक कोई ऐसा पहलू नहीं है जो इस उपन्यास में न आया हो और सो भी ‘फर्स्ट हैंड’। इस उपन्यास के कई गुण हैं मगर सबसे बड़ा गुण है, गोविन्द मिश्र के बयान का अन्दाज जो बातों को शुरू से अन्त तक कहानी बनाए रखता है। यह पुस्तक हमारे उपन्यास साहित्य में एक नक्षत्र की तरह चमकती रहेगी।
–भवानी प्रसाद मिश्र
उपन्यास की घटनाएँ बहुत सजीव हैं। कोई पात्र ‘स्टॉक’ नहीं जान पड़ता, बराबर एक साफ, सुडौल, विशिष्ट, महीन से महीन रेखाओं से उकेरा हुआ व्यक्ति सामने आता है।
–निर्मल वर्मा
Vaijyanti : Vol. 1-2
- Author Name:
Chitra Chaturvedi 'Kartika'
- Book Type:

- Description:
‘वैजयंती’ श्रीकृष्ण के जीवन, कर्म, आदर्शों, विचारों और अलौकिक प्रेम की रसभीगी अनुपम गाथा है। ग्रामीण परिवेश में पले कृष्ण का विकास विविध दिशाओं में होता है और वह शीघ्र ही एक अपूर्व रंग-बिरंगे बहुआयामी व्यक्तित्व से सम्पन्न हो जाता है। ‘वैजयंती’ में ब्रज की सोंधी सुवास और छाछ है, वेणुवादन, आनन्द और महारास है। किन्तु रह-रहकर श्रीकृष्ण के अन्तर में एक अजानी-सी पुकार उठती है, आह्वान करती है, चल पड़ने को। कुछ विशिष्ट करने को। और श्रीकृष्ण जननायक बन चल पड़ते हैं क्रान्ति का शंखनाद करके कंस के अधिनायक तंत्र का मूलोच्छेदन करने। राधा नहीं रोकती। वह बाधा नहीं, राधा है।
प्रथम खंड में स्वप्नलोकीय कोमलता और माधुरी है, गीत, प्रीति और लालित्य के मध्य शस्त्रों की झनझनाहट है। वहीं द्वितीय खंड में क्रूर यथार्थ है और टंकारों तथा हुंकारों के मध्य प्रेम की मृदुल फुहारें और प्रीति-विह्वल मन की गुहारें हैं।
चारों ओर फैली अराजकता, अनैतिकता और स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध कर्मयोगी का संघर्ष चलता है और उनकी वैजयंती पताका सदा फहराती रहती है। वैजयंती में पाठक पाएँगे राधा, गोप-गोपी, रुक्मिणी, सत्यभामा, जांबवती तथा सुभद्रा को एक अनूठे ही रंग में। पाठक यह भी पाएँगे अर्जुन, विदुर, भीष्म, कर्ण, संजय और उद्धव को अनूठे स्वरूप में। भीष्म और विदुर को कैसे ज्ञात हुआ था कि कर्ण कुन्ती का पुत्र है? अपने पौत्रवत् श्रीकृष्ण को देखते ही भीष्म का मुखमंडल खिल क्यों पड़ता है? अर्जुन में ऐसा क्या है जो श्रीकृष्ण उस पर मुग्ध हैं? उद्धव में क्या विशेषता है जो उन्हें ही कृष्ण अपनी थाती सौंपते हैं? संजय और धनंजय ही गीता सुनने के अधिकारी क्यों हुए?
और फिर....राधा का क्या हुआ?
‘वैजयंती’ में कुछ नवीन न हो तो भी कुछ अपने आप अलग और विशिष्ट अवश्य है।
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