Vichar Ka Aina : Kala Sahitya Sanskriti : Muktibodh
Author:
Gajanan Madhav MuktibodhPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है। </p>
<p>मुक्तिबोध ऐसे प्रगतिशील कवि, विचारक हैं जिनके लिखे हुए की प्रासंगिकता दिन पर दिन बढ़ती ही गई है। उनके निबन्धों ने हिन्दी साहित्य और आलोचना पर गहरा असर छोड़ा है। उन्होंने अपने निबन्धों में मध्यवर्ग के सघन और रचनात्मक आत्मसंघर्षों को स्वर देते हुए कला-चिन्तन सम्बन्धी नया सौन्दर्यशास्त्र विकसित किया जिसका असर ऐसा व्यापक रहा कि उनके बाद आलोचना और साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र की शब्दावली हमेशा के लिए बदल गई। परवर्ती रचनाकारों के लिए वे सतत रोशनी देनेवाली एक मशाल की तरह रहे। हमें उम्मीद है कि उनके प्रतिनिधि निबन्धों की यह किताब हर उस भारतीय को अपनी अनिवार्य जरूरत की तरह लगेगी जो साहित्य, संस्कृति और कला से जुड़े हुए सवालों से टकराते हुए अपनी समृद्ध और सुदीर्घ परम्परा की तरफ देखता है।
ISBN: 9789392186301
Pages: 168
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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हिन्दी के तमाम पाठक यूरोप की कविता और कवियों को इक्का-दुक्का तथा अपर्याप्त अनुवादों से जानते हैं। इससे वहाँ के कवियों के बारे में उनकी जानकारी आधी-अधूरी ही रहती है। श्रीप्रकाश मिश्र ने करीब साठ कवियों पर अलग-अलग लगभग पूरी जानकारी इस पुस्तक में समाहित की है, जिससे इस कमी की काफ़ी पूर्ति हो सकेगी। उन्होंने एक भाषा के कवियों को उनके कालक्रम के अनुसार एक साथ रखा है और उस सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि की भी जानकारी दी है जिसमें उनकी कविताओं ने जन्म लिया है। यूरोप की आधुनिकतावादी कविताओं की सामान्य विशेषताओं और स्वयं आधुनिकतावाद पर स्वतंत्र अध्याय उस कविता सम्बन्धी जानकारी को और समृद्ध करते हैं। वे स्वयं कवि हैं और
कवि पर उनकी एक निजी दृष्टि है—इसका भी प्रमाण इस पुस्तक में मिलता है। उम्मीद है, यूरोप की कविता के तमाम पाठकों को यह पुस्तक बड़ी उपादेय होगी।
Premchand Aur Bhartiya Samaj
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

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Description:
प्रेमचन्द स्वाधीनता-संग्राम में साधारण भारतीय जनता की जीवंतता, प्रतिरोधी शक्ति और आकांक्षाओं-स्वप्नों के अमर गायक। उपन्यास और कहानी जैसी, हिन्द में प्रायः लड़खड़ाकर चलना सीखती, विधाओं को ‘स्वाधीनता’ के इस महास्वप्न से जोड़कर रचनात्मक ऊँचाइयों के चरम पर ले जानेवाले परिकल्पक। रचनाशीलता को जनता के ठोस नित-प्रति भौतिक जीवन और उसके अवचेतन में मौजूद उसकी साधारण और असाधारण इच्छाओं को संयुक्त कर एक पूर्ण जीवन का आख्यान बनानेवाले युगदर्शी कथाकार। ‘यथार्थ’ की ठोस पहचान और ‘यथास्थिति’ के पीछे कार्य कर रही कारक शक्तियों की प्रायः एक वैज्ञानिक की तरह पहचान करनेवाले भविष्यदर्शी विचारक और बुद्धिजीवी।
सम्भवतः इन्हीं कारणों से आधुनिक रचनाकारों में इकलौते प्रेमचन्द ही हैं जिनमें हिन्दी के शीर्ष स्थानीय मार्क्सवादी आलोचक प्रो. नामवर सिंह की दिलचस्पी निरन्तर बनी रही। प्रेमचन्द पर विभिन्न अवसरों पर दिए गए व्याख्यान एवं उन पर लिखे गए आलेख इस पुस्तक में एक साथ प्रस्तुत हैं।
यहाँ शामिल निबन्धों एवं व्याख्यानों में प्रेमचन्द के सभी पक्षों पर विस्तार से बातचीत की गई है। प्रेमचन्द की वैचारिकता, जीवन-विवेक और उनकी रचनाओं के सम्बन्ध में प्रगतिशील आलोचना का स्पष्ट नज़रिया यहाँ अभिव्यक्त हुआ है। विशिष्ट सामाजिक परिप्रेक्ष्य में प्रेमचन्द की कहानियों और उपन्यासों का विवेचन यहाँ है और भारतीय आख्यान परम्परा के सन्दर्भ में प्रेमचन्द के कथा-शिल्प की विशिष्टता और उसकी भारतीयता पर गम्भीर विचार भी। साम्प्रदायिकता, दलित प्रश्न जैसे विशिष्ट प्रसंगों के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचन्द की रचनात्मकता और उनके विचारों का मूल्यांकन हो या स्वाधीनता-संग्राम के सन्दर्भ में उनकी ‘पोजीशन’ का विवेचन—इन निबन्धों में नामवर जी अपनी निर्भ्रान्त वैचारिकता, आलोचकीय प्रतिभा और लोक-संवेदी तर्क-प्रवणता और स्पष्ट जनपक्षधरता से प्रेमचन्द को उनकी सम्पूर्णता में उपस्थित करते हैं।
Mahadevi Verma : Srijan Aur Sarokar
- Author Name:
Niranjan Sahay
- Book Type:

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Description:
आधुनिक काव्य-जगत में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कवयित्री के रूप में समादृत महादेवी वर्मा की लोकप्रियता जितनी व्यापक है, उनके रचना-संसार को देखने-परखने की प्रविधियाँ भी उसी तरह अनेक रही हैं। इस पुस्तक में उनकी रचनात्मकता को समझने की जितनी पद्धतियाँ अब तक सामने आई हैं, उन सभी को संयोजित करने का प्रयास किया गया है ताकि उनके अवदान को लेकर हमारी समकालीन समझ दुरुस्त हो सके।
महादेवी वर्मा का काव्य-संसार जितना अमूर्त और भावपरक है, उनका गद्य-संसार उतना ही मूर्त और मुखर। यद्यपि सजग और सुधी पाठक चाहे तो उनकी कविताओं में भी तृप्ति और अतृप्ति के दारुण मनोभावों और स्त्री की विकलता से उपजे भावनात्मक विद्रोह को समझ और परख सकता है। इसी तरह उनके गद्य में भी विचार की गहराई और विस्तार, स्मृति तथा परिवेश के सूक्ष्म प्रेक्षण से उपजी अनेक महीन अर्थछवियों को देखा जा सकता है। इस पुस्तक में उन सभी सिरों को पकड़ने का प्रयास किया गया है ताकि उनके रचना-कर्म का एक सम्पूर्ण ख़ाका बनाया जा सके।
पुस्तक के तीन खंड हैं। ‘धरोहर’ खंड में महादेवी के समकालीन पन्त और उनकी कविता के आरम्भिक भाष्यकारों की आलोचना को स्थान दिया गया है। आत्मकथन-खंड में स्वयं उन्हीं की अभिव्यक्तियों को शामिल किया गया है। साहित्य संसार में शिक्षा के सम्यक दृष्टिकोण को अकसर पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। इस खंड में शामिल महादेवी का लेख ‘शिक्षा का उद्देश्य’ उनकी चिन्तन परिधि की व्यापकता का अहसास कराता है। अन्तिम खंड का शीर्षक है ‘आस्वाद के नए धरातल’। इस खंड में बिलकुल नए ढंग से महादेवी वर्मा की विभिन्न रचनाओं के भाष्य की एक पीठिका निर्मित करने का प्रयास किया गया है।
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