Wo Satrah Din
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राजनीति में जो होता है वो दिखता नहीं और जो दिखता है वो होता नहीं इसलिये पर्दे के पीछे की कहानी बताना एक पत्रकार के लिये बहुत चुनौती भरा काम होता है। इस किताब के जरिये आप ये समझ पायेंगे कि कांग्रेस और बीजेपी की राजनीति में ऐसा क्या हुआ कि ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने पिता की विरासत वाली पार्टी छोड़कर बीजेपी में चले गये और कमलनाथ की सरकार भरभराकर गिर गयी। अभिज्ञान प्रकाश, जाने माने टीवी पत्रकार तेज़ी से घटने वाली राजनीतिक घटनाओं पर नज़र रखना और उनका विश्लेषण दर्शकों तक पहुँचाना हम टीवी पत्रकारों के लिए बेहद चुनौती का काम होता है मगर उन घटनाओं को क़लमबद्ध कर उसे किताब की शक्ल देना उससे भी मुश्किल काम होता है जो ब्रजेश राजपूत ने किया है। रोचक अंदाज़ में लिखी इस किताब को पढ़कर आप कुछ जगहों पर चौंक जाएँगे और कहेंगे ये तो हमें मालूम ही नहीं था। मध्यप्रदेश की पल-पल बदलती राजनीति और रंग बदलते नेताओं पर लिखी गयी एक बेहतर किताब है "वो सत्रह दिन"। -सुमित अवस्थी, एबीपी न्यूज़ "कहते हैं कि ब्रजेश राजपूत का है अंदाज़-ए-बयाँ और..." जी हाँ, राजनीतिक रिपोर्टिंग की आँखों देखी, कानों सुनी, दिलचस्प दास्ताँ ब्रजेश के कलम से कुछ अलग ही रंग रूप रखती है। "वह सत्रह दिन" उसका एक बेहतरीन नमूना है । सत्ता के उतार चढ़ाव में लालसा, प्रतिस्पर्धा, तिरस्कार का भाव, रणनीति, साधन व कुटिलता.... कुछ भी ब्रजेश की नजर व कलम से बच नहीं सकता -रशीद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
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राजनीति में जो होता है वो दिखता नहीं और जो दिखता है वो होता नहीं इसलिये पर्दे के पीछे की कहानी बताना एक पत्रकार के लिये बहुत चुनौती भरा काम होता है। इस किताब के जरिये आप ये समझ पायेंगे कि कांग्रेस और बीजेपी की राजनीति में ऐसा क्या हुआ कि ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने पिता की विरासत वाली पार्टी छोड़कर बीजेपी में चले गये और कमलनाथ की सरकार भरभराकर गिर गयी। अभिज्ञान प्रकाश, जाने माने टीवी पत्रकार तेज़ी से घटने वाली राजनीतिक घटनाओं पर नज़र रखना और उनका विश्लेषण दर्शकों तक पहुँचाना हम टीवी पत्रकारों के लिए बेहद चुनौती का काम होता है मगर उन घटनाओं को क़लमबद्ध कर उसे किताब की शक्ल देना उससे भी मुश्किल काम होता है जो ब्रजेश राजपूत ने किया है। रोचक अंदाज़ में लिखी इस किताब को पढ़कर आप कुछ जगहों पर चौंक जाएँगे और कहेंगे ये तो हमें मालूम ही नहीं था। मध्यप्रदेश की पल-पल बदलती राजनीति और रंग बदलते नेताओं पर लिखी गयी एक बेहतर किताब है "वो सत्रह दिन"। -सुमित अवस्थी, एबीपी न्यूज़ "कहते हैं कि ब्रजेश राजपूत का है अंदाज़-ए-बयाँ और..." जी हाँ, राजनीतिक रिपोर्टिंग की आँखों देखी, कानों सुनी, दिलचस्प दास्ताँ ब्रजेश के कलम से कुछ अलग ही रंग रूप रखती है। "वह सत्रह दिन" उसका एक बेहतरीन नमूना है । सत्ता के उतार चढ़ाव में लालसा, प्रतिस्पर्धा, तिरस्कार का भाव, रणनीति, साधन व कुटिलता.... कुछ भी ब्रजेश की नजर व कलम से बच नहीं सकता -रशीद किदवई, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
Book Details
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ISBN9788194426677
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Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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