Rebels Against the Raj
Author:
Ramchandra Guha, Satish KamatPublisher:
Manovikas Prakashan LLPLanguage:
MarathiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 560
₹
700
Available
भारतीय स्वातंत्र्यासाठी झालेला संघर्ष आणि लढा यांचा असाधारण इतिहास म्हणजे ‘रिबेल्स अगेन्स्ट द राज' हे पुस्तक होय.
जो देश स्वत:चा नाही, त्याच्यासाठी लढणाऱ्या सात वीरांची ही बव्हंशी अपरिचित अशी कहाणी आहे. भारताच्या स्वातंत्र्यलढ्याला हातभार लावण्यासाठी एकोणिसाव्या शतकाच्या अखेरीपासून हे विदेशी वीर देशात दाखल होऊ लागले होते.
या सातांपैकी चार ब्रिटिश होते, दोन अमेरिकी होते, तर एक आयरिश होती. त्यांत चार पुरुष आणि तीन स्त्रिया होत्या. कारावास भोगण्याआधी वा हद्दपार केले जाण्याआधी त्यांनी अनेक क्षेत्रांत पायाभूत कार्य केले होते. त्यांत पत्रकारिता, सामाजिक सुधारणा, शिक्षण, सेंद्रीय शेती आणि पर्यावरण यांचा अंतर्भाव होता.
हे पुस्तक त्यांच्या कहाण्या सांगते. प्रत्येक बंडखोर आदर्शवाद आणि सच्च्या समर्पणवृत्तीने भारावलेला होता. प्रत्येक या ना त्या प्रकारे गांधींशी जोडला गेलेला होता. त्यांतील काही अनुयायी म्हणून तर काही त्यांच्या दृष्टिकोनाचे संतप्त विरोधक म्हणून. संघर्षाची परिणती तुरुंगवासात होऊ शकते, आणि त्यांचे उर्वरित आयुष्य भारतातच जाऊ शकते वा येथेच त्यांचा मृत्यूही होऊ शकतो, याची खूणगाठही प्रत्येकाने मनाशी बांधलेली होती. आपापल्या कार्यक्षेत्रात प्रत्येकाने आपला अमीट ठसा उमटवला होता आणि त्यांनी उभ्या केलेल्या संस्था तसेच त्यांनी घडविलेल्या पिढ्या व व्यक्ती यांच्या रूपाने त्यांचा वारसा आजही जिवंत आहे. आपसात गुंतलेल्या त्यांच्या जीवन प्रवासाच्या या गोष्टी, जगातील सर्वोत्तम इतिहासकारांमध्ये गणल्या जाणाऱ्या लेखकाने लक्षवेधकपणे मांडल्या आहेत. अर्थात या केवळ गोष्टी नाहीत, तर भारत आणि पाश्चात्त्य जग यांचे संबंध, ब्रिटिश वसाहतवादी सत्तेपलीकडील आपली ओळख तसेच नागरी स्वातंत्र्ये यांचा शोध घेणारे राष्ट्र म्हणून भारताची धडपड, यांविषयीची सखोल अंतर्दृष्टी देणाऱ्या अनोख्या कहाण्या आहेत.
Rebels Against The Raj | Ramachandra Guha Translated By : Satish Kamat
रिबेल्स अगेन्स्ट द राज | रामचंद्र गुहा अनुवाद : सतीश कामत
ISBN: 9789395977314
Pages: 532
Avg Reading Time: 18 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Dr. Ambedkar Aur Rashtravad
- Author Name:
Basant Kumar
- Book Type:

- Description: "भारत के संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर के विचारों को वामपंथियों एवं अल्पसंख्यक गठबंधन में शामिल लोगों ने सदैव तोड़-मरोड़कर पेश किया और देश में पाँच दशक से अधिक समय तक सत्ता में रही कांग्रेस ने निजी स्वार्थ के कारण बाबासाहब को सदैव दलितों एवं वंचितों के नेता के रूप में प्रस्तुत किया। मानो देश के विकास और उत्थान में उनका कोई योगदान ही न रहा हो। आज देश में दलित-मुसलिम गठजोड़ के बहाने ये अलगाववादी देश में अशांति फैलाना चाहते हैं। इन चीजों को भाँपते हुए डॉ. आंबेडकर ने सन् 1940 में देश के विभाजन की स्थिति में हिंदू एवं मुसलिम जनसंख्या के पूर्ण स्थानांतरण की बात की थी। उन्होंने देश को ऐसा संविधान दिया जो देश की अखंडता एवं एकता को आज भी सुरक्षित किए हुए है। उन्होंने संविधान में अनुच्छेद 370 का विरोध किया, पर नेहरू के मुसलिम-प्रेम के कारण इसे जोड़ा गया। नागरिकों के हितों की सुरक्षा हेतु संविधान में मूल आधारों की व्यवस्था की। अर्थशास्त्र के शोध छात्र के रूप में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया व वित्त आयोग का प्रारूप दिया। देश के कानून मंत्री के रूप में हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को संपत्ति में उत्तराधिकार और उनके सशक्तीकरण का पथ प्रशस्त किया। बाबासाहब आंबेडकर के राष्ट्रवादी विचारों को लोगों तक पहुँचाने और राष्ट्र के विकास में उनके योगदान पर उत्कृष्ट कृति। "
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