Vishwa Patal Par Hindi
(0)
Author:
Dr. Surya Prasad DixitPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
795
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हिन्दी भारत की एक राष्ट्रीय भाषा है, संघ की राजभाषा है और एक विश्वभाषा भी है। समस्त संसार में वह आज करोड़ों लोगों द्वारा समझी जाती है। उसकी व्याप्ति लगभग डेढ़ सौ देशों में है। वह लगभग एक दर्जन देशों में जनभाषा के रूप में प्रचलित है। इन देशों को तीन कोटियों में विभाजित करना तर्कसंगत होगा—(1) भारत के पड़ोसी राष्ट्र, (2) भारतवंशी राष्ट्र, (3) आप्रवासी-बहुल राष्ट्र।</p> <p>‘विश्व पटल पर हिन्दी’ का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है, विश्वबोध। हिन्दी का सम्बन्ध संस्कृत, पालि और भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अरबी, फ़ारसी, पस्तो, तुर्की, अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, स्पेनिश, डच, पुर्तगाली, इटैलिक आदि कई भाषाओं से है। इस भाषा ने हज़ारों शब्दों का आदान-प्रदान किया है। हिन्दी-सेवियों ने सैकड़ों विश्वविख्यात ग्रन्थों के अनुवाद किए हैं। दर्जनों विश्व विभूतियों पर ग्रन्थ लिखे हैं। कई यात्रा-संस्मरण लिखे हैं तथा विश्व की घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं। हिन्दी ने अनेक विश्वस्तरीय विचारधाराओं को आत्मसात् किया है तथा देश-देशान्तर तक अपनी ‘भारत विद्या’ का निर्यात भी किया है। हिन्दी की रूप-रचना अर्थात् व्याकरण, शब्दकोश, पाठ्यक्रम, शोध, समीक्षा एवं सर्जनात्मक लेखन में सैकड़ों विदेशी विद्वानों की सहभागिता रही है।</p> <p>इधर हिन्दी फ़िल्मों, धारावाहिकों, पत्र-पत्रिकाओं और मीडिया कार्यक्रमों ने उसे विश्व के कोने-कोने में पहुँचाया है। कम्प्यूटर, इंटरनेट से उसका काफ़ी परिविस्तार हुआ है। लेखक ने दो दशक पूर्व इस ‘विश्व पटल पर हिन्दी’ की दिशा में पहल की थी। इसे अभी और व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। इस प्रयोजन पूर्ति में इस पुस्तक की अपनी एक विशिष्ट उपयोगिता है।
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हिन्दी भारत की एक राष्ट्रीय भाषा है, संघ की राजभाषा है और एक विश्वभाषा भी है। समस्त संसार में वह आज करोड़ों लोगों द्वारा समझी जाती है। उसकी व्याप्ति लगभग डेढ़ सौ देशों में है। वह लगभग एक दर्जन देशों में जनभाषा के रूप में प्रचलित है। इन देशों को तीन कोटियों में विभाजित करना तर्कसंगत होगा—(1) भारत के पड़ोसी राष्ट्र, (2) भारतवंशी राष्ट्र, (3) आप्रवासी-बहुल राष्ट्र।</p>
<p>‘विश्व पटल पर हिन्दी’ का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है, विश्वबोध। हिन्दी का सम्बन्ध संस्कृत, पालि और भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अरबी, फ़ारसी, पस्तो, तुर्की, अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, स्पेनिश, डच, पुर्तगाली, इटैलिक आदि कई भाषाओं से है। इस भाषा ने हज़ारों शब्दों का आदान-प्रदान किया है। हिन्दी-सेवियों ने सैकड़ों विश्वविख्यात ग्रन्थों के अनुवाद किए हैं। दर्जनों विश्व विभूतियों पर ग्रन्थ लिखे हैं। कई यात्रा-संस्मरण लिखे हैं तथा विश्व की घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं। हिन्दी ने अनेक विश्वस्तरीय विचारधाराओं को आत्मसात् किया है तथा देश-देशान्तर तक अपनी ‘भारत विद्या’ का निर्यात भी किया है। हिन्दी की रूप-रचना अर्थात् व्याकरण, शब्दकोश, पाठ्यक्रम, शोध, समीक्षा एवं सर्जनात्मक लेखन में सैकड़ों विदेशी विद्वानों की सहभागिता रही है।</p>
<p>इधर हिन्दी फ़िल्मों, धारावाहिकों, पत्र-पत्रिकाओं और मीडिया कार्यक्रमों ने उसे विश्व के कोने-कोने में पहुँचाया है। कम्प्यूटर, इंटरनेट से उसका काफ़ी परिविस्तार हुआ है। लेखक ने दो दशक पूर्व इस ‘विश्व पटल पर हिन्दी’ की दिशा में पहल की थी। इसे अभी और व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। इस प्रयोजन पूर्ति में इस पुस्तक की अपनी एक विशिष्ट उपयोगिता है।
Book Details
-
ISBN9788180318047
-
Pages216
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: जन्म से ही प्रत्येक मानव के कुछ अधिकार हैं। ‘सभी के लिए मानवाधिकार’ पुस्तक में मानवाधिकारों के विभिन्न पक्षों को सरल भाषा में समझाया गया है जिन्हें पढ़कर बच्चे और नवसाक्षर भी मानवाधिकारों को समझ सकते हैं। पुस्तक में पाठक को बच्चों के अधिकार, लैंगिक समानता, महिला समानता का अधिकार, महिलाओं के आर्थिक अधिकार, सामाजिक न्याय एवं मानवाधिकार और पुलिस जैसे विषयों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया गया है।
Lokayat
- Author Name:
Deviprasad Chattopadhyay
- Book Type:

- Description: यह पुस्तक प्राचीन भारतीय भौतिकवाद की मार्क्सवादी व्याख्या प्रस्तुत करती है। पाश्चात्य व्याख्याताओं ने भारतीय दर्शन के इस सशक्त पक्ष की प्रायः उपेक्षा की है। उनकी उपनिवेशवादी इतिहास-दृष्टि इस बात को बराबर रेखांकित करती रही है कि भारतीय दर्शन की मूल चेतना पारलौकिक और आध्यात्मिक है। उसमें जीवन तथा जगत के यथार्थ को महत्त्वहीन माना गया है अथवा उसकी उपेक्षा की गई है। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने प्राचीन ग्रन्थों, पुरातात्त्विक और नृतत्त्वशास्त्रीय प्रमाणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इस बात का खंडन किया है। उनका कहना है कि प्राचीन भारत में लौकिकवाद और अलौकिकवाद, दोनों ही मौजूद थे। राजसत्ता के उदय के बाद शासक वर्ग ने लौकिक चिन्तन को अपने स्वार्थ के लिए नेपथ्य में डाल दिया तथा पारलौकिक चिन्तन को बढ़ावा दिया और भारतीय चिन्तन की एकमात्र धारा के रूप में उसे प्रतिष्ठा दिलाई। इसलिए प्राचीन भारत के लौकिक चिन्तन को समझे बिना हमारी इतिहास-दृष्टि हमेशा धुँधली रहेगी। यह पुस्तक इतिहास, दर्शन, भारतीय साहित्य और संस्कृति में दिलचस्पी रखनेवाले जिज्ञासुओं के लिए समान रूप से उपयोगी है। इस पुस्तक का विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।
Rahbari Ke Sawal
- Author Name:
Chandrashekhar
- Book Type:

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Description:
‘रहबरी के सवाल’ में चन्द्रशेखर के ही शब्दों में उनके जीवन के कुछ प्रमुख पड़ावों और विचार-बिदुओं को नए सन्दर्भों में नए सिरे से प्रस्तुत किया गया है। चन्द्रशेखर का जीवन मूलत: एक भारतीय किसान का जीवन था जिसमें कोई दुराव-छिपाव नहीं। राजनीति के शिखर व्यक्तित्व होते हुए भी वे किसी भी विषय पर बिना लाग-लपेट के और दो टूक बोलते थे। यह भी भारतीय किसान का ही स्वभाव है। चन्द्रशेखर के व्यक्तित्व को समझने में यह अवधारणा बहुत मदद देती है। वे जिस विषय पर बोलते थे, उनके विचारों के केन्द्र में भारतीय समाज की परिस्थितियाँ और समाजवादी लोकतांत्रिक मूल्य प्रमुख रूप से दिखाई देते थे। अपनी वैचारिक दृढ़ता के कारण ही वे उथल-पुथल भरे राजनैतिक झंझावातों के बीच आज भी एक जलती मशाल की तरह दृष्टिगत होते हैं।
इस पुस्तक के छह खंडों के नाम हैं : ‘राजनीति के सोपान’, ‘चौदहवीं लोकसभा और संसदीय प्रणाली’, ‘यक्ष प्रश्न’, ‘नज़रिया’, ‘अन्तरंग’ तथा ‘अनुलग्नक’। इन अध्यायों में उन प्रसंगों पर विस्तृत बातचीत की गई है जो आज के सन्दर्भ में भी जीवन्त हैं। चन्द्रशेखर का जीवन एक कभी न रुकनेवाला यायावर का जीवन था। इसमें कहीं ठहराव नहीं। यही वजह है कि उनका व्यक्तित्व उनके किसी भी समकालीन राजनैतिक व्यक्तित्व की तुलना में अधिक गतिशील दिखता है। इस पुस्तक में सार्थक और जीवन्त प्रश्नों के सहारे चन्द्रशेखर के अद्यतन वैचारिक चिन्तन और निष्कर्षों को दर्ज करने का ऐतिहासिक प्रयास किया गया है। ये विचार हमें आत्ममंथन के लिए तो प्रेरित करते ही हैं, भूमंडलीकरण के शोर में अपनी खोती हुई अस्मिता को बचाने के लिए नई शक्ति से भरते भी हैं। यही वजह है कि यह पुस्तक निराशा के राष्ट्रव्यापी माहौल में नई व्यवस्था बनाने के लिए एक सार्थक हस्तक्षेप की तरह है।
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