Marxwad Aur Bhasha Ka Darshan
(0)
Author:
V. N. VoloshinovPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
250
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मार्क्सवाद और समकालीन भाषा-विज्ञान के सम्बन्धों के मद्देनज़र, यह सवाल किया जा सकता है कि क्या ‘मार्क्सवादी भाषा-विज्ञान’ जैसी कोई चीज़ मौजूद है? और इसका उत्तर देने में कोई हिचक या कठिनाई नहीं महसूस होती क्योंकि मार्क्सवाद मानव-सभ्यता के भौतिक-आत्मिक विकास का इतिहास प्रस्तुत करते हुए मानव-भाषाओं की व्याख्या के प्रति एक सुनिश्चित ‘अप्रोच’ प्रस्तुत करता है और एक सुनिश्चित पद्धति लागू करते हुए कुछ सुनिश्चित स्थापनाएँ प्रस्तुत करता है।</p> <p>एक सामाजिक एवं विचारधारात्मक परिघटना के रूप में, भाषा की प्रकृति और प्रकार्यों पर मार्क्सवादी चिन्तन को 1920 और 1930 के दशक में सोवियत भाषा-वैज्ञानिकों ने बहुपक्षीय रूप में आगे बढ़ाया। 1929 में प्रकाशित वी.एन. वोलोशिनोव की पुस्तक मार्क्सवाद और भाषा का दर्शन पहली ऐसी पुस्तक थी जिसमें भाषा-विज्ञान के कुछ प्रमुख आधारभूत प्रश्नों पर मार्क्सवादी विश्व-दृष्टिकोण और पद्धति से विचार करने का प्रयास दिखाई देता है। वोलोशिनोव ने विचारधारा और भाषा के प्रति सॉस्युर के संरचनावाद और विटगेंस्टाइन के भाषायी दर्शन से सम्बद्ध परम्पराओं से सर्वथा अलग ‘अप्रोच’ अपनाया तथा संकेत-विज्ञान और विमर्श-सिद्धान्त की ऐसी प्रणालियाँ प्रस्तावित कीं जो मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना को कई धरातलों पर समृद्ध बनाने की सम्भावना से युक्त थीं। मार्क्सवाद और भाषा का दर्शन पहला संस्करण 1929 में और दूसरा संस्करण 1930 में प्रकाशित हुआ। इसमें वोलोशिनोव ने भाषा और विचारधारा के बीच के सम्बन्धों का जो विश्लेषण प्रस्तुत किया, वह अपने कई विवादास्पद उपप्रमेयों और उपांगों के बावजूद, भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में मार्क्सवाद को लागू करने का अभूतपूर्व उदाहरण था। न केवल दशकों बाद तक, मार्क्सवादी भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में मार्क्सवादी भाषा-विज्ञान इसे एक सन्दर्भ-बिन्दु के रूप में देखता रहा और इसके द्वारा प्रस्तुत प्रस्थापनाओं तथा उठाए गए अनसुलझे प्रश्नों से जूझता रहा, बल्कि आज भी यह प्रक्रिया जारी है।
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मार्क्सवाद और समकालीन भाषा-विज्ञान के सम्बन्धों के मद्देनज़र, यह सवाल किया जा सकता है कि क्या ‘मार्क्सवादी भाषा-विज्ञान’ जैसी कोई चीज़ मौजूद है? और इसका उत्तर देने में कोई हिचक या कठिनाई नहीं महसूस होती क्योंकि मार्क्सवाद मानव-सभ्यता के भौतिक-आत्मिक विकास का इतिहास प्रस्तुत करते हुए मानव-भाषाओं की व्याख्या के प्रति एक सुनिश्चित ‘अप्रोच’ प्रस्तुत करता है और एक सुनिश्चित पद्धति लागू करते हुए कुछ सुनिश्चित स्थापनाएँ प्रस्तुत करता है।</p>
<p>एक सामाजिक एवं विचारधारात्मक परिघटना के रूप में, भाषा की प्रकृति और प्रकार्यों पर मार्क्सवादी चिन्तन को 1920 और 1930 के दशक में सोवियत भाषा-वैज्ञानिकों ने बहुपक्षीय रूप में आगे बढ़ाया। 1929 में प्रकाशित वी.एन. वोलोशिनोव की पुस्तक मार्क्सवाद और भाषा का दर्शन पहली ऐसी पुस्तक थी जिसमें भाषा-विज्ञान के कुछ प्रमुख आधारभूत प्रश्नों पर मार्क्सवादी विश्व-दृष्टिकोण और पद्धति से विचार करने का प्रयास दिखाई देता है। वोलोशिनोव ने विचारधारा और भाषा के प्रति सॉस्युर के संरचनावाद और विटगेंस्टाइन के भाषायी दर्शन से सम्बद्ध परम्पराओं से सर्वथा अलग ‘अप्रोच’ अपनाया तथा संकेत-विज्ञान और विमर्श-सिद्धान्त की ऐसी प्रणालियाँ प्रस्तावित कीं जो मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना को कई धरातलों पर समृद्ध बनाने की सम्भावना से युक्त थीं। मार्क्सवाद और भाषा का दर्शन पहला संस्करण 1929 में और दूसरा संस्करण 1930 में प्रकाशित हुआ। इसमें वोलोशिनोव ने भाषा और विचारधारा के बीच के सम्बन्धों का जो विश्लेषण प्रस्तुत किया, वह अपने कई विवादास्पद उपप्रमेयों और उपांगों के बावजूद, भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में मार्क्सवाद को लागू करने का अभूतपूर्व उदाहरण था। न केवल दशकों बाद तक, मार्क्सवादी भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में मार्क्सवादी भाषा-विज्ञान इसे एक सन्दर्भ-बिन्दु के रूप में देखता रहा और इसके द्वारा प्रस्तुत प्रस्थापनाओं तथा उठाए गए अनसुलझे प्रश्नों से जूझता रहा, बल्कि आज भी यह प्रक्रिया जारी है।
Book Details
-
ISBN9788126704194
-
Pages220
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी द्वैत भी हैं, अद्वैत भी हैं। शैव भी हैं, शाक्त भी हैं। करुणा भी हैं और क्रांति भी हैं। ज्ञान भी हैं और कर्म भी हैं। साधना भी हैं और संघर्ष भी हैं। सपने भी हैं और सत्य भी हैं। श्रीगुरुजी धर्म और अध्यात्म की सामासिक अभिव्यक्ति हैं। परंपरा और प्रगति के प्रेरणापुंज हैं। उनका धर्म-कर्म, पूजा-पाठ केवल पौरोहित-प्रकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्र-यज्ञ में जीवन को समिधा बना देने की संकल्प-साधना है। उनकी साधना इतिहास का एक सुंदरकांड है। संघ-कार्य की नींव संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार ने डाली, संघ को गढ़ा श्रीगुरुजी ने; डॉ. हेडगेवार ने संघ को सांगठनिक सूत्र दिया, शाखा-पद्धति दी, श्रीगुरुजी ने संघ को सिद्धांत और विस्तार दिया। आज संघ एक विराट् संगठन बन गया है; भारत का एक नियामक तत्त्व बन गया है। इसे नकारकर देश और समाज-जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकती है—संघ के इस स्थिति में पहुँचने में श्रीगुरुजी की दूरदृष्टि और आध्यात्मिकता की विशेष भूमिका है। श्रीगुरुजी भाव के वो सागर हैं, जहाँ भाव की हर नदी आकर विलीन हो जाती है; सारी भावनाएँ जहाँ अभिव्यक्त हो जाना चाहती हैं, जहाँ सारे संपर्क, संबंध और संबोधन आकर मिल जाते हैं। यह पुस्तक ऐसे आध्यात्मिक शिखरपुरुष, समाजधर्मी और पथ-प्रदर्शक श्रीगुरुजी के प्रेरणाप्रद जीवन की एक झलक मात्र है।
Bihar Ke Vyanjan – Sanskriti Aur Itihas
- Author Name:
Ravishankar Upadhyay
- Book Type:

- Description: बिहारी खानपान का बेहद समृद्ध इतिहास रहा है. मगध साम्राज्य में जब बिहार लंबे समय तक सत्ता का केंद्र रहा तो यहां से शासन करनेवाले महान सम्राटों ने यहां के व्यंजनों को राज्याश्रय प्रदान किया. इसी कारण प्राचीन राजगृह के इर्दगिर्द आज भी व्यंजनों पर निर्भर कस्बे मौजूद हैं, चाहे वह खाजा के बेमिसाल स्वाद वाला सिलाव हो या पेड़ा बनाने वाला निश्चलगंज. गया में चावल और तिल के साथ प्रयोग कर तिलवा-तिलकुट से लेकर अनरसा जैसा प्रयोगधर्मी स्वाद बनाया गया. प्राचीन पाटलिपुत्र यानी आज का पटना देख लीजिए. यहां पर पुराने शहर में खुरचन, थोड़ी दूर पर बाढ़-बख्तियारपुर और धनरूआ में लाई, तो मनेरशरीफ में नुक्ती वाले लड्डू हैं. बड़हिया में रसगुल्ले हैं. भोजपुर इलाके के उदवंतनगर में खुरमा, ब्रह्मपुर में गुड़ई लड्डू, गुड़ की ही जलेबी तो बक्सर में सोनपापड़ी है. थावे, गोपालगंज चले जाइए तो वहां पर आपको पेडुकिया मिलेगा. मिथिला के दही- चूड़ा से लेकर अरिकंचन और बेसन के गट्टे की सब्जी के क्या कहने! ये उदाहरण तो बस बानगी हैं, आप राज्य के जिस किसी हिस्से में चले जाइए वहां पर आपको कोई न कोई बेमिसाल स्वाद मिल जाएगा. इस किताब में आपको बिहार की स्वाद परंपरा का लिखित इतिहास और सांस्कृतिक प्रयोग के अनुभव पढ़ने को मिलेंगे जो चौथी शताब्दी से शुरू होकर आजतक जारी है.
Naksaliyon Ke Beech Mere Beete Dinon Ki Romanchak Gatha
- Author Name:
Alpa Shah
- Book Type:

- Description: 2010 में जब भारत सरकार देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सल विरोधी अभियानों में तेजी ला रही थी, तो उस समय अल्पा शाह गुरिल्ला प्लाटून केसाथ उन्हीं इलाकों की 250 किलोमीटर लंबे सात रातों के सफर पर निकलीं। एक मानव विज्ञानी केरूप में वह समझना चाहती थीं कि एक नए भारत के उदय की पृष्ठभूम में, क्यों देश के गरीबों ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र से मुँह मोड़कर क्रांतिकारी विचारधारा के साथ एकजुटता दिखाई? गहरे हरे रंग की छापामारा वर्दी पहने, पुरुष के वेश में अल्पा प्लाटून में एकमात्र महिला और एकमात्र ऐसी इनसान थीं जिसके पास बंदूक नहीं थी। कष्टों से भरी उनकी इस यात्रा ने यह खुलासा किया कि क्यों विभिन्न पृष्ठभूमियों केलोग, दुनिया को बदलने के लिए हथियार उठाकर एक साथ इकट्ठा हो गए थे; और साथ ही किन वजहों से फिर उनमें बिखराव हुआ? अल्पा शाह सालों के शोध के साथ ही नक्सलियों के गढ़ में आदिवासी समुदायों के साथ, उनके रोजमर्रा के जीवन में इतना घुलमिल गई थीं कि उनकी पुस्तक ‘नक्सलियों के बीच मेरे बीते दिनों की रोमांचक गाथा’ में वह गइराई और घनिष्ठता साफ नजर आती है और पुस्तक एक थ्रिलर की तरह हमारी आँखों के सामने से गुजरती है। इसी गहन अध्ययन और शोध से पुस्तक में आदिवासी जीवन और उसका संघर्ष जीवंत हो उठता है। यह कृति समकालीन भारत के बीचोबीच आर्थिक वृद्धि, बढ़ती असमानता, विस्थापन और संघर्ष का प्रतिबिंम्ब प्रस्तुत करती है।
21vin Sadi Ke Sankat
- Author Name:
Ramsharan Joshi
- Book Type:

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Description:
'आदमी, बैल और सपने' की ज़मीनी संघर्ष-कथाओं से चलकर सामाजिक बदलावों के चौकन्ने दर्शक रामशरण जोशी आज हिन्दी के उन विरल पत्रकारों में हैं जो 'विकसित' होकर 'एक्टिविस्ट-समाजशास्त्री' के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं। उनकी 'समाज-समीक्षा' किताबी अध्ययन और कमराबन्द शास्त्रीय चिन्तन से नहीं, परिवर्तनकामी सामाजिक हलचलों के बीच परवान चढ़ी है। इसीलिए एक ओर वे 'आदिवासी समाज और शिक्षा' पर बात करते हैं तो दूसरी ओर आधुनिक 'मीडिया विमर्श' व 'मीडिया और बाज़ारवाद' के जंगलों में रास्ते तलाश करते हैं। उन्हें न देश की राजनीति को बनाने-बिगाड़ने वाले दिग्गज नेताओं को कठघरे में खड़ा करने में हिचकिचाहट होती है और न चुनावी उठा-पटक के बीच अगला प्रधानमंत्री खोज निकालने में। पिछले कार्यक्षेत्र की तरह उनका समाज-विश्लेषण भी जितना हॉरिजेंटल है, उतना ही वर्टिकल भी—वे समस्या के विस्तार में ही नहीं जाते, गहराई में भी उतरते हैं। उनके सरोकार और सम्बद्धता हर जगह वर्तमान और भविष्य से है-अतीत को उन्होंने 'सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों के लिए छोड़ दिया है, इसलिए हर समस्या और उपलब्धि को वेदों के खाते में डाल देने की आसान और उतावली विद्वत्ता से बचे रहे हैं।
'इक्कीसवीं सदी के संकट राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सामान्य जन के संघर्षों और भारत जैसे विकासशील देश पर मँडराते ख़तरों का निर्भीक विश्लेषण है। वे चाहे आधुनिकता के अर्धसत्यों के बहाने, अमेरिकी माफ़िया षड्यंत्रों की बात करें या बाज़ारवाद के साम्राज्यवादी मनसूबों की, निशाने पर चाहे सांस्कृतिक उत्पीड़न और देशी-विदेशी आतंकवाद हो या मानव, मशीन और राज्य की द्वन्द्वात्मकता—हर कहीं उनकी चिन्ता का केन्द्र अपना समाज और अपने देश की स्थितियाँ हैं। इसीलिए वे समझते हैं कि 'भारत में समाज, राष्ट्र और टेक्नोलॉजी के बीच अपेक्षित तालमेल नहीं रहा।' नतीजे में 'लोकतंत्र का लोकतांत्रीकरण नहीं हो पाया।'
विराट अनुभवों, विशाल अध्ययन और बौद्धिक भूलभुलैयों (लिबरिंथ) के बीच रामशरण जोशी की शक्ति है तार्किक दृष्टि, वैज्ञानिक विश्लेषण, विवेकवादी विमर्श और जनपक्षधर राजनीति। यहाँ उनकी मार्क्सवादी पृष्ठभूमि उनका सबसे विश्वस्त कुतुबनुमा है। इधर उनकी संवेदनाएँ रचनात्मक अभिव्यक्तियों के लिए कसमसाने लगी हैं और वे अपने अनुभवों को कथा-कहानी या आत्म-स्वीकृतियों का रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। पता नहीं क्यों, मुझे लगता है कि लम्बी बीहड़ भौतिक और बौद्धिक यात्राओं के बाद वे उस मोड़ पर आ गए हैं जिसे नरेश मेहता ने 'अश्व की वल्गा लो अब थाम, दिख रहा मानसरोवर तीर' कहकर पहचाना था। डिकेन्स से लेकर हैमिंग्वे, शाह ग्रीन, ज्याफ़्री आर्चर, भारत में अरुण साधु या भवानी सेन गुप्ता (चाणक्य सेन) और हिन्दी में मनोहर श्याम जोशी जैसे उपन्यासकार पहले सक्रिय पत्रकार ही तो थे। आख़िर रामशरण ने भी अपनी शुरुआत 'आदमी, बैल और सपने' जैसी कथा-पत्रकारिता से ही तो की थी।
—राजेन्द्र यादव, सम्पादक—'हंस'
Buddha Aani Tyancha Dhamm
- Author Name:
DR. B.R. Ambedkar
- Book Type:

- Description: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांचे रामायण-महाभारत हे ग्रंथ वाचून समाधान झाले नाही तेव्हा ते बुद्धांकडे वळले. बौद्ध धर्म हा एकमेव असा धर्म आहे की, विज्ञानाने जागृत झालेला समाज तो सहर्ष स्वीकारील. मानवासाठी कल्याणकारी असणाऱ्या या धर्मात उच्च-नीच, श्रेष्ठ-कनिष्ठ, स्त्री-पुरुष, स्पृश्य-अस्पृश्य असा कोणताही भेद नाही. समानता हेच तत्त्व या धम्मात व्यापून आहे. ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' हे या धम्माचं मध्यवर्ती सूत्र आहे. हे तत्त्वज्ञान त्यांनी ‘बुद्ध आणि त्यांचा धम्म' या ग्रंथातून विस्तृतपणे मांडलेले आहे. गौतम बुद्धांच्या जीवन आणि तत्त्वज्ञानावर, समाजातील मौलिक प्रश्नांवर विवेचन करणारा हा एकमेवाद्वितीय ग्रंथ होय. सबंध मानवास समृद्ध जीवन जगण्याचा मार्ग दाखवणारा हा एक प्रमाण ग्रंथ म्हणता येईल.डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांनी लिहिलेला हा अखेरचा ग्रंथ असून त्यांच्या सर्व ग्रंथांत या ग्रंथाला सर्वाधिक महत्त्व आहे. त्यांची भूमिका धर्मचिकित्सकाची होती. तर्काला पटेल ते स्वीकारायचं आणि न पटेल ते नाकारण्याचं धम्मात दिलेलं स्वातंत्र्य घेऊनच ‘बुद्ध आणि त्यांचा धम्म' हा ग्रंथ त्यांनी लिहिला.मूळ इंग्रजीत असणारा हा ग्रंथ मराठी, हिंदी, गुजराती, तेलुगू, तमिळ, कन्नड, पंजाबी आदी भाषांत अनुवादित झालेला आहे. या ग्रंथावर ‘अ जर्नी ऑफ सम्यक बुद्ध' हा चित्रपटसुद्धा प्रदर्शित झालेला आहे.गौतम बुद्ध आणि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांवर ज्यांची प्रगाढ निष्ठा आहे त्यांच्यासाठी आणि विद्यार्थी, ज्ञानसाधक, अभ्यासक आदींना प्रस्तुत ग्रंथ नक्कीच अत्यंत उपयुक्त ठरेल. Buddha Aani Tyancha Dhamm | Bharatratna Dr. Babasaheb Ambedkar बुद्ध आणि त्यांचा धम्म | भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर
Lokayat
- Author Name:
Deviprasad Chattopadhyay
- Book Type:

- Description: यह पुस्तक प्राचीन भारतीय भौतिकवाद की मार्क्सवादी व्याख्या प्रस्तुत करती है। पाश्चात्य व्याख्याताओं ने भारतीय दर्शन के इस सशक्त पक्ष की प्रायः उपेक्षा की है। उनकी उपनिवेशवादी इतिहास-दृष्टि इस बात को बराबर रेखांकित करती रही है कि भारतीय दर्शन की मूल चेतना पारलौकिक और आध्यात्मिक है। उसमें जीवन तथा जगत के यथार्थ को महत्त्वहीन माना गया है अथवा उसकी उपेक्षा की गई है। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय ने प्राचीन ग्रन्थों, पुरातात्त्विक और नृतत्त्वशास्त्रीय प्रमाणों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इस बात का खंडन किया है। उनका कहना है कि प्राचीन भारत में लौकिकवाद और अलौकिकवाद, दोनों ही मौजूद थे। राजसत्ता के उदय के बाद शासक वर्ग ने लौकिक चिन्तन को अपने स्वार्थ के लिए नेपथ्य में डाल दिया तथा पारलौकिक चिन्तन को बढ़ावा दिया और भारतीय चिन्तन की एकमात्र धारा के रूप में उसे प्रतिष्ठा दिलाई। इसलिए प्राचीन भारत के लौकिक चिन्तन को समझे बिना हमारी इतिहास-दृष्टि हमेशा धुँधली रहेगी। यह पुस्तक इतिहास, दर्शन, भारतीय साहित्य और संस्कृति में दिलचस्पी रखनेवाले जिज्ञासुओं के लिए समान रूप से उपयोगी है। इस पुस्तक का विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।
Soordas
- Author Name:
Nandkishore Naval
- Book Type:

- Description: तुलसीदास पर पुस्तक लिखने के बाद हिन्दी के जाने-पहचाने ही नहीं, माने हुए आलोचक डॉ. नवल ने अन्तःप्रेरणा से सूरदास के पदों पर यह आस्वादनपरक पुस्तक लिखी है, जिसमें आवश्यक स्थानों पर अत्यन्त संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी हैं। उन्होंने कृष्ण और राधा की संकल्पना तथा वैष्णव भक्ति के उद्भव और विकास पर भी काफ़ी शोध किया, लेकिन पुस्तक की पठनीयता बरकरार रखने के लिए उससे प्राप्त तथ्यों का संकेत भूमिका में ही करके आगे बढ़ गए हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा सम्पादित ‘भ्रमरगीत सार’ की भूमिका उनकी आलोचना का उत्तमांश है, जिसमें उनकी शास्त्रज्ञता और रसज्ञता दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण हुआ है। लेकिन यह भी सही है कि उनकी लोकमंगल और कर्म-सौन्दर्य की कसौटी, जो उन्होंने ‘रामचरितमानस’ से प्राप्त की थी, सूर के लिए अपर्याप्त है। कारण यह कि उक्त दोनों ही शब्द बहुत व्यापक हैं, जिनका अभिलषित अर्थ ही आचार्य ने लिया है। तुलसी मूलतः प्रबन्धात्मक कवि थे और क्लासिकी, जबकि सूर आद्यन्त गीतात्मक और स्वच्छन्द, इसलिए पहले महाकवि के निकष पर दूसरे महाकवि को चढ़ाकर दूसरे के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। डॉ. नवल प्रगीतात्मकता के सम्बन्ध में एडोर्नो की इस उक्ति के क़ायल हैं कि ‘प्रगीत-काव्य इतिहास की ‘दार्शनिक धूपघड़ी’ है।’ इस कारण उसकी छाया को उस तरह नहीं पकड़ा जा सकता, जिस तरह इतिवृत्तात्मक शैली में लिखनेवाले किसी कवि की कविता में हम यथार्थ को ठोस रूप में पकड़ लेते हैं। दूसरी बात यह कि उन्होंने सूर की कविता से सीधा साक्षात्कार किया है।
Ishwar, Swatantrata Aur Amaratva
- Author Name:
Neelima Mishra +1
- Book Type:

- Description: ‘ज्ञान दर्शन’ व ‘तर्कशास्त्र : एक आधुनिक परिचय’ के बाद लेखकद्वय की यह तीसरी पुस्तक है। इसकी विषय-वस्तु तत्त्वदर्शन या तत्त्वमीमांसा की कुछ पारम्परिक समस्याएँ हैं, जिनकी विशद विवेचना दर्शन के विद्यार्थियों तथा साधारण जन, दोनों के लिए रुचिकर हो सकती है। लेखकद्वय की यह चेष्टा रही है कि दुरूह व गूढ़ दार्शनिक चिन्तन को सहज-सरल ढंग से प्रस्तुत किया जाए। इसीलिए उन्होंने अपनी सभी पुस्तकों का लेखन ऐसी हिन्दी भाषा में किया है। आशा है, यह पुस्तक तत्त्वदार्शनिक विचारों की सूचना देने के साथ ही मौलिक विचारों को भी प्रोत्साहित करेगी। इस पुस्तक की विषय-सामग्री दर्शन के विद्यार्थी के साथ-साथ आमजन के लिए भी रोचक हो सकती है और इसके अध्ययन से सम्भवत: उनको अपनी कुछ समस्याओं के प्रति एक अन्तर्दृष्टि प्राप्त हो सकेगी।
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