Sikkim Ki Lokkathayen
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पूर्वोत्तर भारत स्थित सिक्किम में कई समुदाय निवास करते हैं, जिनकी अपनी भाषा व संस्कृति के साथ ही उनका अपना विकसित लोक है। फिर भी विकास का जो दौर वर्तमान समय को समेटे हुए है, उससे इस बात का भय व्याप्त होता है, जैसे दुनिया में मुख्यधारा की संस्कृति और उससे जुड़ी चीजें बची रहेंगी या भीड़ की शिकार हो जाएँगी! अतः समय रहते अल्पसंख्यक समुदायों के लोक-विश्वासों को जीवित रखने की अनिवार्यता स्पष्ट होती है। इस संग्रह में लोककथाओं का संचयन इसी आवश्यकता की पूर्ति हेतु एक विनम्र प्रयास है। ‘सिक्किम की लोककथाएँ’ पुस्तक में जिन कथाओं का संकलन किया है, वे किसी एक जाति या विशेष समुदाय से संबद्ध नहीं हैं, बल्कि वहाँ निवास करनेवाले समुदायों में, जिनकी लोककथाएँ उपलब्ध हो पाईं, उनको समाविष्ट करने का यत्न किया गया है। सिक्किम के बहुविध लोकजीवन की विविध छटाएँ बिखेरती ये लोककथाएँ पाठकों को आनंदित करेंगी तथा वहाँ की संस्कृति-परंपराओं से भी परिचित करवाएँगी।
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पूर्वोत्तर भारत स्थित सिक्किम में कई समुदाय निवास करते हैं, जिनकी अपनी भाषा व संस्कृति के साथ ही उनका अपना विकसित लोक है। फिर भी विकास का जो दौर वर्तमान समय को समेटे हुए है, उससे इस बात का भय व्याप्त होता है, जैसे दुनिया में मुख्यधारा की संस्कृति और उससे जुड़ी चीजें बची रहेंगी या भीड़ की शिकार हो जाएँगी! अतः समय रहते अल्पसंख्यक समुदायों के लोक-विश्वासों को जीवित रखने की अनिवार्यता स्पष्ट होती है। इस संग्रह में लोककथाओं का संचयन इसी आवश्यकता की पूर्ति हेतु एक विनम्र प्रयास है।
‘सिक्किम की लोककथाएँ’ पुस्तक में जिन कथाओं का संकलन किया है, वे किसी एक जाति या विशेष समुदाय से संबद्ध नहीं हैं, बल्कि वहाँ निवास करनेवाले समुदायों में, जिनकी लोककथाएँ उपलब्ध हो पाईं, उनको समाविष्ट करने का यत्न किया गया है।
सिक्किम के बहुविध लोकजीवन की विविध छटाएँ बिखेरती ये लोककथाएँ पाठकों को आनंदित करेंगी तथा वहाँ की संस्कृति-परंपराओं से भी परिचित करवाएँगी।
Book Details
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ISBN9789355210531
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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विमल चन्द्र पाण्डेय का जन्म 20 अक्टूबर, 1981 को बनारस, उत्तर प्रदेश में हुआ। मूल रूप से गाँव कड़सर, जिला बलिया के निवासी। शुरुआती पढ़ाई बनारस में ही। फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई और पाँच साल तक पत्रकारिता करने के बाद इस्तीफा। वर्तमान में फ्रीलांसिंग, लेखन और फिल्म-निर्देशन। उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं- ‘डर’, ‘मस्तूलों के इर्द-गिर्द’, ‘उत्तर प्रदेश की खिड़की’, 'मेरी प्रिय कहानियाँ' और ‘मारण मंत्र’ (कहानी-संग्रह); ‘भले दिनों की बात थी’ (उपन्यास); ‘ई इलहाब्बाद है भइया’ (संस्मरण)। उनकी कहानियों और कविताओं के अनुवाद कन्नड़, मराठी, मलयालम, तमिल, गुजराती, रूसी और अंग्रेज़ी भाषाओं में हुए हैं। उनकी पहली फ़िल्म है ‘द होली फिश’ जिसके निर्देशन के अलावा लेखन और निर्माण भी उन्होंने स्वयं ही किया। दूसरी फ़िल्म ‘धतूरा’ रिलीज के लिए तैयार है। उन्हें ‘भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार’ और ‘मीरा स्मृति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है।
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