Meghdoot Ki Raah Ke Pathik
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Author:
Manisha KulshreshthaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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‘मेघदूत की राह के पथिक’ कालिदास की अमर कृति मेघदूत के साथ एक सघन रचनात्मक सम्वाद है—प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जैकब एल मोरेनो की उस स्थापना के संदर्भ में जो रचनात्मकता को शारीरिक-मानसिक सक्रियता और सामुदायिक पारस्परिकता के साथ जोड़ती है। यानी रचनात्मकता वह जो हर तरह की जड़ता का भंजन करे। इस दृष्टिकोण से देखें तो यह कृति बन्द कमरे का विशुद्ध मानसिक और किताबी सम्वाद नहीं, जीवन और प्रकृति के प्रकट और प्रच्छन्न के रमता योगी कालिदास के साथ एक जीवन्त यात्रात्मक जुगलबन्दी है। जिन मार्गों पर चलकर कालिदास ने मेघदूत का भौगोलिक आधार पाया होगा और कथा और जीवन के जिन धुँधलकों में बिखरे उच्छ्वासों को अन्तर्भूत कर ‘कविताया’ होगा, मनीषा रामगिरि और अलकापुरी के बीच उच्छ्वसित धुँधलके में बिखरे उन सारे सम्भावित मार्गों पर चलीं और आज के कण्ठ में अवशिष्ट धुनें और लोककथाएँ सुनते-चुनते लौटीं; तब कहीं जाकर इस सम्वाद को सम्भव किया। जब आप प्रकाशित पृष्ठों से गुज़रेंगे तो पाएँगे कि यहाँ भौगोलिक ही नहीं ज्ञानमार्ग की यात्रा से हासिल निधियाँ भी हैं। कालिदास की ही तरह यहाँ भी मिथक और यथार्थ के बीच विश्वसनीय आवाजाही की गई है और पार्थिव और प्राकृतिक पता वाला साहित्य और इतिहास का एक सुन्दर साझा लोक भी रचा गया है। भौगोलिक मेघ-मार्ग और सांस्कृतिक मेघदृष्टि को समझने के लिए यह एक पुस्तक एक रम्य और रोचक शाहकार है। —डॉ. विनय कुमार
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‘मेघदूत की राह के पथिक’ कालिदास की अमर कृति मेघदूत के साथ एक सघन रचनात्मक सम्वाद है—प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जैकब एल मोरेनो की उस स्थापना के संदर्भ में जो रचनात्मकता को शारीरिक-मानसिक सक्रियता और सामुदायिक पारस्परिकता के साथ जोड़ती है। यानी रचनात्मकता वह जो हर तरह की जड़ता का भंजन करे। इस दृष्टिकोण से देखें तो यह कृति बन्द कमरे का विशुद्ध मानसिक और किताबी सम्वाद नहीं, जीवन और प्रकृति के प्रकट और प्रच्छन्न के रमता योगी कालिदास के साथ एक जीवन्त यात्रात्मक जुगलबन्दी है। जिन मार्गों पर चलकर कालिदास ने मेघदूत का भौगोलिक आधार पाया होगा और कथा और जीवन के जिन धुँधलकों में बिखरे उच्छ्वासों को अन्तर्भूत कर ‘कविताया’ होगा, मनीषा रामगिरि और अलकापुरी के बीच उच्छ्वसित धुँधलके में बिखरे उन सारे सम्भावित मार्गों पर चलीं और आज के कण्ठ में अवशिष्ट धुनें और लोककथाएँ सुनते-चुनते लौटीं; तब कहीं जाकर इस सम्वाद को सम्भव किया। जब आप प्रकाशित पृष्ठों से गुज़रेंगे तो पाएँगे कि यहाँ भौगोलिक ही नहीं ज्ञानमार्ग की यात्रा से हासिल निधियाँ भी हैं। कालिदास की ही तरह यहाँ भी मिथक और यथार्थ के बीच विश्वसनीय आवाजाही की गई है और पार्थिव और प्राकृतिक पता वाला साहित्य और इतिहास का एक सुन्दर साझा लोक भी रचा गया है।
भौगोलिक मेघ-मार्ग और सांस्कृतिक मेघदृष्टि को समझने के लिए यह एक पुस्तक एक रम्य और रोचक शाहकार है।
—डॉ. विनय कुमार
Book Details
-
ISBN9789360860233
-
Pages264
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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