Karbala Dar Karbala
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GourinathPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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1980's blindings to 1989's massacre 'कर्बला दर कर्बला' अपने ढंग का एक अलग उपन्यास है। विमर्शों के इस दौर में यह अपना नया विमर्श चाहता है। गौरीनाथ का यह उपन्यास हमें एक भयावह दुनिया में ले जाता है। ऐसी दुनिया में जो अपराध जगत, पुलिस-प्रशासन और कट्टर धार्मिक संगठनों के गँठजोड़ से बनी है और जहाँ युवाओं के मधुर हो सकने वाले पल भी सहसा कटु हो उठते हैं। यह भागलपुर की दास्तान है। उसी भागलपुर की, जहाँ का अँखफोड़वा काण्ड और नब्बे के दशक में महीनों चले साम्प्रदायिक दंगों ने पूरे इतिहास को ही झकझोर दिया था। शिव और ज़रीना के सपनों की कहानी के बहाने लेखक ने ऐसी कथा बुनी है जो सत्ता और पूँजी के बल पर उत्पीड़ित और लांछित मानवता की कहानी बन गई है। 'कर्बला दर कर्बला' में कल्पना और यथार्थ से भी आगे बढ़कर तथ्यात्मकता को जिस तरह पिरोया गया है वह हिन्दी में उपन्यास-लेखन के क्षेत्र में एक साहसिक प्रयोग है। इस उपन्यास को पढऩा एक दु:स्वप्न से गुज़रना है। मगर उस दु:स्वप्न में कोई फ़ैंटेसी नहीं, बल्कि सच्चाइयों के बनते-बिगड़ते चित्र भरे पड़े हैं। रोंगटे खड़े कर देने वाले चित्र। —अब्दुल बिस्मिल्लाह ... और... भागलपुर से डॉ चन्द्रेश कहते हैं-- लेखक-पत्रकार गौरीनाथ ने बिहार के भागलपुर शहर को केन्द्र में रखकर लगभग दस साल के कालखण्ड में हुए उन चर्चित घटनाओं को समेटने की कोशिश की है, जिसने इस अत्यंत प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर के चेहरे को दाग़दार बनाया है, वह चाहे कुख्यात अंधाकरण काण्ड हो या 1989 का भयानक हिन्दू-मुस्लिम दंगा। लेखक ने यथासंभव तटस्थ भाव से इन घटनाओं का सूक्ष्म अन्वेषण कर इसके इर्द-गिर्द गल्प का ताना-बाना बुना गया है, जो उपन्यास के बहाने अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ भी है यानी दस्तावेज़ में उपन्यास की महक और उपन्यास में दस्तावेज़ की झलक।
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1980's blindings to 1989's massacre 'कर्बला दर कर्बला' अपने ढंग का एक अलग उपन्यास है। विमर्शों के इस दौर में यह अपना नया विमर्श चाहता है। गौरीनाथ का यह उपन्यास हमें एक भयावह दुनिया में ले जाता है। ऐसी दुनिया में जो अपराध जगत, पुलिस-प्रशासन और कट्टर धार्मिक संगठनों के गँठजोड़ से बनी है और जहाँ युवाओं के मधुर हो सकने वाले पल भी सहसा कटु हो उठते हैं। यह भागलपुर की दास्तान है। उसी भागलपुर की, जहाँ का अँखफोड़वा काण्ड और नब्बे के दशक में महीनों चले साम्प्रदायिक दंगों ने पूरे इतिहास को ही झकझोर दिया था। शिव और ज़रीना के सपनों की कहानी के बहाने लेखक ने ऐसी कथा बुनी है जो सत्ता और पूँजी के बल पर उत्पीड़ित और लांछित मानवता की कहानी बन गई है। 'कर्बला दर कर्बला' में कल्पना और यथार्थ से भी आगे बढ़कर तथ्यात्मकता को जिस तरह पिरोया गया है वह हिन्दी में उपन्यास-लेखन के क्षेत्र में एक साहसिक प्रयोग है। इस उपन्यास को पढऩा एक दु:स्वप्न से गुज़रना है। मगर उस दु:स्वप्न में कोई फ़ैंटेसी नहीं, बल्कि सच्चाइयों के बनते-बिगड़ते चित्र भरे पड़े हैं। रोंगटे खड़े कर देने वाले चित्र। —अब्दुल बिस्मिल्लाह ... और... भागलपुर से डॉ चन्द्रेश कहते हैं-- लेखक-पत्रकार गौरीनाथ ने बिहार के भागलपुर शहर को केन्द्र में रखकर लगभग दस साल के कालखण्ड में हुए उन चर्चित घटनाओं को समेटने की कोशिश की है, जिसने इस अत्यंत प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर के चेहरे को दाग़दार बनाया है, वह चाहे कुख्यात अंधाकरण काण्ड हो या 1989 का भयानक हिन्दू-मुस्लिम दंगा। लेखक ने यथासंभव तटस्थ भाव से इन घटनाओं का सूक्ष्म अन्वेषण कर इसके इर्द-गिर्द गल्प का ताना-बाना बुना गया है, जो उपन्यास के बहाने अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ भी है यानी दस्तावेज़ में उपन्यास की महक और उपन्यास में दस्तावेज़ की झलक।
Book Details
-
ISBN9789391925659
-
Pages256
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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