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ददा से भेंट करे बर गए रहै का, दाई?” “हाहो।” “भेंट होए रहिसे?” “ना, टाइम नहीं रहिसे, कल आए बर बोले हे।” “दाई, शिवराम कका आए रहै।” “अच्छा, क्या कहता रहा?” “कहता रहा, कोर्ट से जमानत कराना हो तो जमानतदार लाना होगा, वकील करना होगा।” “हाँ, ये तो है।” लक्षन ने एक आह भरी थी, “घर मा मनखे जात के रहे ले घर के मरजादा तोपाय रहिथय, मनखे बिगर सबके डौकी जात के कोनों पूछ नई होवय।” दिन भर थाने, जेल, सुनार सबके पास से दुरदुराए जाने की पीड़ा लक्षन के स्वर में उभर आई थी। “दाई, का राँधवो?” मनबोधनी उसके सिरहाने चिंतित खड़ी थी। “कुछ कानी राँध ले।” लक्षन दिन भर के परिश्रम व थकान के कारण नीम बेहोश-सी हो चली थी। ताप की कमजोरी तो थी ही देह में। “हाहो।” —इसी उपन्यास से हमारे देश में सभ्य और संभ्रांत समाज से इतर एक ऐसा समाज भी है, जो झोंपड़-पट्टी में रहकर दुनिया के तमाम दु:ख भोगता है। इसे उसकी नियति कहें या विडंबना अथवा क्या? प्रस्तुत उपन्यास में ऐसे ही समाज के रहन-सहन, आचार-विचार, रीति-रिवाज, शादी-विवाह आदि का बड़ी खोजपरक दृष्टि से विशद वर्णन पाठकों के सामने प्रस्तुत किया गया है। यह उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ पाठकों को बहुत कुछ सोचने के लिए भी विवश करता है।
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ददा से भेंट करे बर गए रहै का, दाई?”
“हाहो।”
“भेंट होए रहिसे?”
“ना, टाइम नहीं रहिसे, कल आए बर बोले हे।”
“दाई, शिवराम कका आए रहै।”
“अच्छा, क्या कहता रहा?”
“कहता रहा, कोर्ट से जमानत कराना हो तो जमानतदार लाना होगा, वकील करना होगा।”
“हाँ, ये तो है।” लक्षन ने एक आह भरी थी, “घर मा मनखे जात के रहे ले घर के मरजादा तोपाय रहिथय, मनखे बिगर सबके डौकी जात के कोनों पूछ नई होवय।”
दिन भर थाने, जेल, सुनार सबके पास से दुरदुराए जाने की पीड़ा लक्षन के स्वर में उभर आई थी।
“दाई, का राँधवो?” मनबोधनी उसके सिरहाने चिंतित खड़ी थी।
“कुछ कानी राँध ले।” लक्षन दिन भर के परिश्रम व थकान के कारण नीम बेहोश-सी हो चली थी। ताप की कमजोरी तो थी ही देह में।
“हाहो।”
—इसी उपन्यास से
हमारे देश में सभ्य और संभ्रांत समाज से इतर एक ऐसा समाज भी है, जो झोंपड़-पट्टी में रहकर दुनिया के तमाम दु:ख भोगता है। इसे उसकी नियति कहें या विडंबना अथवा क्या? प्रस्तुत उपन्यास में ऐसे ही समाज के रहन-सहन, आचार-विचार, रीति-रिवाज, शादी-विवाह आदि का बड़ी खोजपरक दृष्टि से विशद वर्णन पाठकों के सामने प्रस्तुत किया गया है। यह उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ पाठकों को बहुत कुछ सोचने के लिए भी विवश करता है।
Book Details
-
ISBN9788188267354
-
Pages180
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ‘जापान’ का नाम सुनते ही आज आधुनिकता, समृद्धि और चकाचौंध का विचार कौंधता है। लेकिन सौ बरस पहले का जापान क़तई अलग था। इस संकलन में शामिल मोरी ओगाई (1862-1922) की तीन कहानियाँ तत्कालीन जापान की एक दूसरी तस्वीर पेश करती हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रची गई ये कहानियाँ—‘सूर्योदय के देश’ के सामन्ती युग के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराती हैं। सानशोदायु, अँधेरे में एक नाव चलती थी और आख़िरी पंक्ति आपराधिक कथानकों के ज़रिए तत्कालीन राज और समाज की विद्रूपताओं को एक-एक कर सामने लाती हैं। लेकिन, ये कहानियाँ आपराधिक दृष्टान्त मात्र नहीं हैं। सानशोदायु और आख़िरी पंक्ति में आप पाएँगे कि किस तरह बाल चरित्र सामाजिक विसंगतियों से मुक़ाबले के लिए ऐसे वक़्त में उठ खड़े होते हैं, जब उनके अग्रज व्यवस्था के सामने हथियार डाल देते हैं। नन्हे चरित्र तत्क्षण महाकार ले लेते हैं। वे जापानी समाज को ‘आत्मबलिदान’ जैसी सर्वथा नई अवधारणाएँ सिखाते हैं। ‘अँधेरे में’ कहानी जापानी जनमानस पर बौद्ध मत के प्रभाव को ख़ासकर उकेरती है। इसलिए यह भारतीय पाठक को ख़ासकर अपील करेगी। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अवतरित इन कहानियों के ज़रिए जापान के सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जीवन-दर्शन को जानने का अवसर प्राप्त होगा। कहानियों के साथ प्रविष्ट टिप्पणियाँ पाठकों की जिज्ञासा के अनुरूप दी गई हैं।
Aher
- Author Name:
Sanjeev
- Book Type:

- Description: वरिष्ठ कथाकार संजीव का यह उपन्यास सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश की एक ऐसी गुत्थी हमारे सामने खोलता है, जो जितनी हैरतअंगेज़ है उतनी ही भयावह भी। मनुष्य ने लाखों साल पहले पेट की भूख शान्त करने के लिए शिकार अर्थात् अहेर करना शुरू किया था। लेकिन सभ्यता-संस्कृति के विकास के साथ-साथ उसने न सिर्फ़ तरह-तरह के साधन और कौशल अर्जित किए, बल्कि तमाम तरह की भूख भी इकट्ठा की—कुछ इस क़दर कि उनकी पूर्ति के लिए आज मनुष्य-समाज स्वयं अहेर और अहेरी—शिकार और शिकारी—में बँट चुका है। यह उपन्यास दिखलाता है कि अहेरी बने लोग अपने हिंस्र चेहरे पर संस्कृति, परम्परा, आस्था, विरासत और मर्यादा के मुखौटे चढ़ाए फिर रहे हैं। उनकी असल चिन्ता अपने वर्चस्व को बनाए रखने और अपने हितों को सुरक्षित रखने की है। इस गहन बनैले वक़्त में क्या कोई बदलाव सम्भव है? इसका जवाब उपन्यास के उन किरदारों से मिलता है जो अहेर के थोथे अभियान से अपने गाँव को मुक्त कराने की पहल करते हैं और जल्द ही अकेले पड़ जाते हैं। उन्हें जान देनी पड़ती है। लेकिन उनकी असफलता उनके परिवर्तनकामी स्वप्न का अन्त नहीं है। एक बेहतर मानवीय समाज के निर्माण को अपने लेखन का उद्देश्य माननेवाले संजीव, इस उपन्यास में उस त्रासदी को भी बख़ूबी रेखांकित करते हैं, जिसमें अहेरी बने घूम रहे लोग ख़ुद भी अहेर बन रहे हैं—अपनी ही व्यर्थ हो चुकी मान्यताओं का, वक़्त से बाहर की जा चुकी परम्पराओं का। विरल ग्रामीण परिवेश में विन्यस्त एक असाधारण कथा को समेटे इस उपन्यास की अत्यधिक पठनीयता को रेखांकित करने के लिए किसी ‘जादुई’ अलंकार की आवश्यकता नहीं है।
Dwandw Kahan Tak Pala Jaye
- Author Name:
Aditya Shrivastava
- Book Type:

- Description: This book has no description
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