Kinchulka : shuddham sharnam gachchami
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सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।। अर्थात्: जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा। युद्ध एक विभीषिका है जो मानव ही नहीं बल्कि प्रकृति को भी आतंकित करती है, पर क्या किया जाये यदि उसके अतिरिक्त कोई भी विकल्प ही नहीं बचे। विज्ञान की ताक़तों से बनाया गया महामनव जब विज्ञान के लिए ही ख़तरा साबित होने लगे तब क्या करे विज्ञान, किसी अन्य सकती का उदय और अगर वह भी हावी होने लगे तब? विज्ञान को तुच्छ करने का सामर्थ्य केवल ईश्वर ही रखता है। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। महामनव शील और भारत के साधारण सिपाही वल्लभ के बीच के युद्ध की कहानी है, किंचुलका: शुद्धं शरणं गच्छामि
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सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।। अर्थात्: जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा।
युद्ध एक विभीषिका है जो मानव ही नहीं बल्कि प्रकृति को भी आतंकित करती है, पर क्या किया जाये यदि उसके अतिरिक्त कोई भी विकल्प ही नहीं बचे। विज्ञान की ताक़तों से बनाया गया महामनव जब विज्ञान के लिए ही ख़तरा साबित होने लगे तब क्या करे विज्ञान, किसी अन्य सकती का उदय और अगर वह भी हावी होने लगे तब? विज्ञान को तुच्छ करने का सामर्थ्य केवल ईश्वर ही रखता है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
महामनव शील और भारत के साधारण सिपाही वल्लभ के बीच के युद्ध की कहानी है, किंचुलका: शुद्धं शरणं गच्छामि
Book Details
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ISBN9789391439309
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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