Kali Barf
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मैं एक दिन आत्मीयता और मानवीय सरोकारों से पूरमपूर कहानी ‘पोशनूल की वापसी’ लिखती हूँ और दूसरे दिन आतंक, हत्या, अविश्वास और दरिंदगी से अँटी ‘काली बर्फ’। जीवन की विविधवर्णी सच्चाइयों में वहाँ कहीं आतंक के दौर में फँसे निर्दोष जनों की पीड़ा के कारण छिपे होते हैं, जो शरणदाता होते हुए पुरखों के प्यार पगे आँगनों से निष्कासित होकर शरणागत की मजबूरियाँ ढोते हैं। जहाँ हिकारत, अभाव और छोटे-छोटे स्वार्थ उसे मानवीय गरिमा से वंचित कर देते हैं, वहीं ‘शरणागत दीनार्त’ जैसी कथा जन्म लेती है। अनुभव के वृत्त कभी उपभोक्तावादी संस्कृति में वस्तु बनने की नियति से जूझती ‘पायथन’ जैसी कथाएँ पैदा करते हैं, कभी संवेदनहीन होते समाज में असहाय होते वृद्धों की नियति ‘वनवास’ कथा लिखने का कारण बन जाती है। समाज के छद्म, दोहरे मानदंड और पुरुष-वर्चस्व की धौंसियाती स्थितियाँ ‘शेष दिन’, ‘विदागीत’, ‘गलत गणित’, ‘नदी का काम बहना है’, ‘रानी भाभी’, ‘पृष्ठभूमि’ आदि कहानियों में विश्लेषित होती हैं, जहाँ स्त्रियाँ यथास्थिति के विरोध में खड़ी जीवन को अपनी शर्तों पर जीने की हिम्मत जुटा लेती हैं। राजनीतिक मूल्यहीनता, आतंकवाद, सामाजिक-आर्थिक वैषम्य से उत्पन्न मानवीय यंत्रणा के बहुविध कारणों की पड़ताल करती ये कहानियाँ बेहतर जीवन के लिए सार्थक बदलाव एवं आत्मसमीक्षा के लिए प्रेरित करती हैं और मूल्यों के पुनर्परीक्षण के लिए भी।
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मैं एक दिन आत्मीयता और मानवीय सरोकारों से पूरमपूर कहानी ‘पोशनूल की वापसी’ लिखती हूँ और दूसरे दिन आतंक, हत्या, अविश्वास और दरिंदगी से अँटी ‘काली बर्फ’। जीवन की विविधवर्णी सच्चाइयों में वहाँ कहीं आतंक के दौर में फँसे निर्दोष जनों की पीड़ा के कारण छिपे होते हैं, जो शरणदाता होते हुए पुरखों के प्यार पगे आँगनों से निष्कासित होकर शरणागत की मजबूरियाँ ढोते हैं। जहाँ हिकारत, अभाव और छोटे-छोटे स्वार्थ उसे मानवीय गरिमा से वंचित कर देते हैं, वहीं ‘शरणागत दीनार्त’ जैसी कथा जन्म लेती है।
अनुभव के वृत्त कभी उपभोक्तावादी संस्कृति में वस्तु बनने की नियति से जूझती ‘पायथन’ जैसी कथाएँ पैदा करते हैं, कभी संवेदनहीन होते समाज में असहाय होते वृद्धों की नियति ‘वनवास’ कथा लिखने का कारण बन जाती है। समाज के छद्म, दोहरे मानदंड और पुरुष-वर्चस्व की धौंसियाती स्थितियाँ ‘शेष दिन’, ‘विदागीत’, ‘गलत गणित’, ‘नदी का काम बहना है’, ‘रानी भाभी’, ‘पृष्ठभूमि’ आदि कहानियों में विश्लेषित होती हैं, जहाँ स्त्रियाँ यथास्थिति के विरोध में खड़ी जीवन को अपनी शर्तों पर जीने की हिम्मत जुटा लेती हैं।
राजनीतिक मूल्यहीनता, आतंकवाद, सामाजिक-आर्थिक वैषम्य से उत्पन्न मानवीय यंत्रणा के बहुविध कारणों की पड़ताल करती ये कहानियाँ बेहतर जीवन के लिए सार्थक बदलाव एवं आत्मसमीक्षा के लिए प्रेरित करती हैं और मूल्यों के पुनर्परीक्षण के लिए भी।
Book Details
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ISBN9789383110216
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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मूलतः एक संवेदनशील कवि के रूप में अपनी पहचान बनाने वाली प्रतिभा कटियार का यह पहला उपन्यास अपनी पठनीयता और अपने सरोकार दोनों वजहों से लगभग चकित करता है। उपन्यास एक कोचिंग सेंटर से शुरू होता है जहाँ अलग-अलग वर्गों के छात्र एक-सी महत्वाकांक्षा के साथ पहुँचते हैं। मगर वहाँ भी छात्रों की पसन्द-नापसन्द, उनकी मैत्री और उनके सम्बन्धों में एक स्पष्ट भेदभाव चला आता है। उपन्यास में ऐसे किरदार हैं जो इस भेदभाव को तोड़कर आगे बढ़ते हैं और बताते हैं कि दुनिया इन खानों से बड़ी है। जाहिर है, यह प्रेम और आपसी समझ के रसायन से बनी मनुष्यता है जो सामाजिक चाल-चलन पर भारी पड़ रही है। उपन्यास की नायिका दलित समाज से आती है और बचपन से ही देखती है कि उसकी प्रतिभा दूसरों की आँख का काँटा बनी हुई है। उसकी सफलता भी उसका अभिशाप है। जब उसे कोचिंग सेंटर में ऐसा दोस्त मिलता है जो बराबरी पर भरोसा करता है और उससे प्रेम करने लगता है तब वह कुछ बदलती दिखती है। उपन्यास अगर इसी दिशा में बढ़कर एक सुखान्त पर खत्म हो जाता तो तो शायद वह बराबरी की कामना का एक रूमानी बयान होकर रह जाता। यहाँ लेखिका साबित करती हैं कि उनके लहजे में चाहे जितनी रूमानियत हो, यथार्थ की उनकी समझ बहुत खरी है। वे घर-परिवार और समाज के सारे पूर्वग्रह और पाखंड जैसे तार-तार कर देने पर तुली हैं। वे एक पल के लिए भी इस बात को ओझल नहीं होने देतीं कि यह समाज बहुधा कुछ लोगों के प्रति बहुत अमानुषिक व्यवहार करता है और अगर यह भी न हो तो अपनी उदारता के चरम लम्हों में भी वह उनके अवसर छीनने में कोई कोताही नहीं करता, कोई हिचक नहीं दिखाता। इसमें सन्देह नहीं कि यह उपन्यास एक साँस में पढ़ा जा सकता है, लेकिन उसके बाद जिस गहरी और लम्बी साँस की ज़रूरत पड़ती है, वह कहीं हलक में अटकी रह जाती है। कई किरदारों और स्थितियों के बीच रचा गया यह उपन्यास हमारे समय की एक बड़ी विडम्बना पर उँगली रखता है और अपने छोटे कलेवर के बावजूद एक बड़ा वृत्तान्त रचता है। —प्रियदर्शन
Ajanta Ki Rajkumari
- Author Name:
Sourabh Sharma
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अजंता की गुफाओं ने भारत के क्लासिकल समाज को ज्यों का त्यों अपने भीतर सहेज लिया है। अजंता अपने भीतर आश्चर्य लोक है। अपने सुंदर समय की स्मृतियों को सहेजने का विचार जब राजपुरुषों के मन में आया होगा तो इस अद्भुत गैलरी का निर्माण हुआ होगा। इसका निर्माण भी उतना ही रहस्यमयी और रोचक होगा जितनी ये गुफाएं हैं। संभवतः राजा ने इसके निर्माण के लिए एक्सप्रेशन आफ इंटरेस्ट बुलवाया होगा। चित्रकारों का चुनाव किया होगा और चित्रों का भी। इतने गहरे भावों को सृजित कराने वाले आश्रयदाताओं की भावभूमि भी गहन होगी। इनकी कहानियों पर एक कथा रचने का प्रयास है अजंता की राजकुमारी।
Aveni
- Author Name:
Sneh Mohnish
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ददा से भेंट करे बर गए रहै का, दाई?” “हाहो।” “भेंट होए रहिसे?” “ना, टाइम नहीं रहिसे, कल आए बर बोले हे।” “दाई, शिवराम कका आए रहै।” “अच्छा, क्या कहता रहा?” “कहता रहा, कोर्ट से जमानत कराना हो तो जमानतदार लाना होगा, वकील करना होगा।” “हाँ, ये तो है।” लक्षन ने एक आह भरी थी, “घर मा मनखे जात के रहे ले घर के मरजादा तोपाय रहिथय, मनखे बिगर सबके डौकी जात के कोनों पूछ नई होवय।” दिन भर थाने, जेल, सुनार सबके पास से दुरदुराए जाने की पीड़ा लक्षन के स्वर में उभर आई थी। “दाई, का राँधवो?” मनबोधनी उसके सिरहाने चिंतित खड़ी थी। “कुछ कानी राँध ले।” लक्षन दिन भर के परिश्रम व थकान के कारण नीम बेहोश-सी हो चली थी। ताप की कमजोरी तो थी ही देह में। “हाहो।” —इसी उपन्यास से हमारे देश में सभ्य और संभ्रांत समाज से इतर एक ऐसा समाज भी है, जो झोंपड़-पट्टी में रहकर दुनिया के तमाम दु:ख भोगता है। इसे उसकी नियति कहें या विडंबना अथवा क्या? प्रस्तुत उपन्यास में ऐसे ही समाज के रहन-सहन, आचार-विचार, रीति-रिवाज, शादी-विवाह आदि का बड़ी खोजपरक दृष्टि से विशद वर्णन पाठकों के सामने प्रस्तुत किया गया है। यह उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ पाठकों को बहुत कुछ सोचने के लिए भी विवश करता है।
Ameeri Rekha Ki Khoj Mein
- Author Name:
Vijay Kumar
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काफी सिर खपाने के बाद पिछले दिनों मुझे इस बारे में अंतिम सत्य पता लग ही गया। वह यह है कि अमीरी की रेखा मकान, गाड़ी, घड़ी, कपड़े या कलम से नहीं, शौचालय से तय होती है। हमारे देश के महान् ‘योजना आयोग’ के कार्यालय में दो शौचालयों की मरम्मत में 35 लाख रुपए खर्च कर दिए गए। जरा सोचिए, मरम्मत में इतने खर्च हुए, तो नए बनने में कितने होते होंगे? जब कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति की, तो योजना आयोग के मुखिया श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इसे बिल्कुल ठीक बताया। मैं उनकी बात से सौ प्रतिशत सहमत हूँ। बहुत से विचारकों का अनुभव है कि यही एकमात्र ऐसी जगह है, जहाँ व्यक्ति बिल्कुल एकांत में कुछ देर बैठकर, शांत भाव से मौलिक चिंतन कर सकता है। कई लेखकों को कालजयी उपन्यासों के विचार यहीं बैठकर आए हैं। श्री अहलूवालिया और उनके परम मित्र मनमोहन सिंह की जिन योजनाओं से रुपया रसातल में जा रहा है, उसके बारे में चिंतन और मनन इतने आलीशान शौचालय में ही हो सकता है। —इसी संग्रह से ——1—— समाज की विषमताओं और विद्रूपताओं पर मारक प्रहार करके अंतरावलोकन करने का भाव जागृत करने वाले व्यंग्य। ये न केवल आपको हँसाएँगे-गुदगुदाएँगे, बल्कि आपके अंतर्मन को उद्वेलित कर मानवीय संवेदना को उभारेंगे।
Aadha Gaon
- Author Name:
Rahi Masoom Raza
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आधा गाँव, यानी गंगौली। ज़िला ग़ाज़ीपुर (उत्तर प्रदेश)। काल-परिप्रेक्ष्य–1947, स्वाधीनता के समय होनेवाला देश-विभाजन। गंगौली मुस्लिम-बहुल गाँव है और यह उपन्यास है–इस गाँव के मुसलमानों का बेपर्द जीवन-यथार्थ। पूरी तरह सच, बेबाक और धारदार। पाकिस्तान बनते समय मुसलमानों की विविध मन:स्थितियों, हिन्दुओं के साथ उनके सहज आत्मीय संबंधों तथा द्वंद्वमूलक अनुभवों का अविस्मरणीय शब्दांकन। सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ एक ऐसा सृजनात्मक प्रहार, जो दुनिया में कहीं भी राष्ट्रीयता ही के हक़ में जाता है। लेखकीय चिंता सार्वजनीन है कि गंगौली में अगर गंगौलीवाले कम तथा सुन्नी और शिया और हिन्दू ज़्यादा दिखाई देने लगें, तो गंगौली का क्या होगा?...दूसरे शब्दों में, गंगौली को यदि भारत मान लिया जाए तो भारत का क्या होगा? भारतीय कौन होंगे?...अपनी वस्तुगत चिंताओं, गतिशील रचनाशिल्प, आंचलिक भाषा-सौंदर्य और सांस्कृतिक परिवेश के चित्रण की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण उपन्यास–हिन्दी कथा-साहित्य की बहुचर्चित और निर्विवाद उपलब्धि। इस कृति की सबसे बड़ी ख़ासियत है–संयमहीनता। इसके सभी पात्र बिना लगाम के हैं और उनकी अभिव्यक्ति सहज, सटीक और दो टूक है, गालियों की हद तक।
Jhuthiyapa
- Author Name:
Sachin Tyagi
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झूठ बोल कर बर्बाद होना आसान है, सच बोल कर कामयाब होना मुश्किल है। ये बात मयूर को तब समझ आयी जब उसके घरवालों ने , गर्लफ्रेंड ने , दोस्तों ने यहाँ तक सबने उसका साथ छोड़ दिया। क्योंकि झूठ का साथ हर कोई नहीं देता, सब साथ देते है सच का। जैसे मुजरिम का वकील भी पहले उससे सारी सच्चाई पूछता है तब साथ देता है। आज से दस साल पहले जहां मयूर के पास चलने के लिये तीन रास्ते थे। पच्चीस का होते ही वह तीन रास्ते भी बंद हो गये। जहाँ पहला रास्ता था जहां उसके घरवाले चलाना चाहते थे। दूजा वह जहां उसके दोस्त चल रहे थे। तीज़ा वह जहां वो खुद चलना चाहता था।
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