Ramanujan Prashnottari
(0)
Author:
Rajesh Kumar ThakurPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
350
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"रामानुजन एक ऐसा नाम है, जिन्होंने अपनी पीढ़ी के गणितज्ञों को प्रेरणा प्रदान की और 21वीं सदी में ऐसे बहुत से गणित-प्रेमी हैं, जो उनके गणित के शोध कार्यों का अभी भी अनुसरण कर रहे हैं। ऐसा कोई भी व्यक्ति, जिसे गणित से प्रेम है, उसके लिए रामानुजन के परिचय की आवश्यकता नहीं है। फ्रीमैन डायसन ने रामानुजन के लिए कहा था, ‘‘उन्होंने बहुत कुछ ढूँढ़ा है और अपने बगीचे में दूसरे लोगों के ढूँढ़ने के लिए और भी बहुत कुछ छोड़ दिया है। हर बार, जब मैं रामानुजन के बगीचे में आता हूँ, तब मैंने वहाँ कुछ नए खिले फूल देखे हैं।’’ इस पुस्तक की रोचकता बरकरार रखने के लिए इसे नौ अलग-अलग वर्गों में बाँट दिया गया है। रामानुजन के व्यक्तित्व एवं कृतित्व तथा गणित को उनके अवदान को प्रश्नोत्तर शैली में प्रस्तुत किया गया। इस रूप में विद्यार्थी-शिक्षार्थी एवं शोधार्थी गणित को बड़ी सहजता से हृदयंगम कर सकेंगे।
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"रामानुजन एक ऐसा नाम है, जिन्होंने अपनी पीढ़ी के गणितज्ञों को प्रेरणा प्रदान की और 21वीं सदी में ऐसे बहुत से गणित-प्रेमी हैं, जो उनके गणित के शोध कार्यों का अभी भी अनुसरण कर रहे हैं। ऐसा कोई भी व्यक्ति, जिसे गणित से प्रेम है, उसके लिए रामानुजन के परिचय की आवश्यकता नहीं है।
फ्रीमैन डायसन ने रामानुजन के लिए कहा था, ‘‘उन्होंने बहुत कुछ ढूँढ़ा है और अपने बगीचे में दूसरे लोगों के ढूँढ़ने के लिए और भी बहुत कुछ छोड़ दिया है। हर बार, जब मैं रामानुजन के बगीचे में आता हूँ, तब मैंने वहाँ कुछ नए खिले फूल देखे हैं।’’
इस पुस्तक की रोचकता बरकरार रखने के लिए इसे नौ अलग-अलग वर्गों में बाँट दिया गया है। रामानुजन के व्यक्तित्व एवं कृतित्व तथा गणित को उनके अवदान को प्रश्नोत्तर शैली में प्रस्तुत किया गया। इस रूप में विद्यार्थी-शिक्षार्थी एवं शोधार्थी गणित को बड़ी सहजता से हृदयंगम कर सकेंगे।
Book Details
-
ISBN9788177213638
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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दिल्ली से कृष्णा सोबती का रिश्ता बचपन से है। आज़ादी से पूर्व उनका वेतनभोगी परिवार साल के छह माह शिमला और छह माह दिल्ली में निवास करता था। अपने किशोर दिनों में वे दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हॉकी खेलती रही हैं। बँटवारे के बाद लाहौर से आकर वे स्थायी तौर पर दिल्ली की हो गईं। दिल्ली का नागरिक होने पर उन्हें गर्व भी है और इस शहर से प्रेम भी। यहाँ के इतिहास और भूगोल को वे बहुत गहरे से जानती रही हैं। दिल्ली के तीन सौ से ज़्यादा गाँवों को और उनके बदलने की प्रक्रिया को उन्होंने पारिवारिक भाव से देखा है। हर गाँव को उन्होंने पैदल घूमा है।
‘मार्फ़त दिल्ली’ में उन्होंने आज़ादी बाद के समय की कुछ सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक छवियों को अंकित किया है। यह वह समय था जब ब्रिटिश सरकार के पराए अनुशासन से निकलकर दिल्ली अपनी औपनिवेशिक आदतों और देसी जीवन-शैली के बीच कुछ नया गढ़ रही थी। सड़कों पर शरणार्थियों की चोट खाई टोलियाँ अपने लिए छत और रोज़ी-रोटी तलाशती घूमती थीं। और देश की नई-नई सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से दो-चार हो रही थी।
उस विराट परिदृश्य में साहित्य समाज भी नई आँखों से देश और दुनिया को देख रहा था। लेखकों-कवियों की एक नई पीढ़ी उभर रही थी। लोग मिलते थे। बैठते थे। बहस करते थे और अपने रचनात्मक दायित्वों को ताज़ा बनाए रखते थे। बैठने-बतियाने की जगहें, काफी हाउस और रेस्तराँ साथियों की-सी भूमिका निभाते थे। मंडी हाउस और कनाट प्लेस नए विचारों और विचारधाराओं की ऊष्मा का प्रसार करते थे।
कृष्णा जी ने उस पूरे समय को सघन नागरिक भाव से जिया। भारतीय इतिहास की कुछ निर्णायक घटनाओं को उन्होंने उनके बीच खड़े होकर देखा। आज़ादी के पहले उत्सव का उल्लास और उसमें तैरती विभाजन की सिसकियों को उन्होंने छूकर महसूस किया। बापू की अन्तिम यात्रा में लाखों आँखों की नमी से वे भीगीं। दिल्ली में हिन्दी को एक बड़ी भाषा के रूप में उभरते हुए भी देखा। इन पन्नों में उन्होंने उस दौर की कुछ यादों को ताज़ा किया है।
Bihar Ke Mere Pachchis Varsh
- Author Name:
Kalpana Sastri
- Book Type:

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Description:
जिस कालखंड में देश का पढ़ा-लिखा वर्ग बिहार जाने से डर रहा था और बिहार का पढ़ा-लिखा वर्ग राज्य से बाहर नहीं तो, गाँवों को छोड़ शहरों में अपनी जगह बनाने का जी-तोड़ प्रयास कर रहा था, उस वक़्त कल्पना महाराष्ट्र के सुव्यवस्थित माहौल को छोड़कर स्वेच्छा से बिहार आईं और वहाँ किसी शहर में नहीं बल्कि धुर गाँवों में काम कर रही हैं।
बिहार में काम करने के माध्यम के रूप में इन्होंने एक संस्था बनाई और गाँव की मुसहर तथा दुसाध दलित महिलाओं के बीच काम शुरू किया। गांधीवादी विचार को माननेवाले समूहों के साथ चर्चा करने के लिए एक संगठन द्वारा इन्हें जर्मनी बुलाया गया। एक प्रसिद्ध शान्तिवादी संगठन आई.एफ़.ओ.आर. के स्वीडन सम्मेलन में शामिल हुईं और फिलाडेल्फ़िया के क्वेकर समूह द्वारा आयोजित लम्बे प्रशिक्षण कोर्स का भी अनुभव लिया। इन अनुभवों के साथ-साथ बिहार के गाँवों को भी देखना, समझना और वह भी अन्दर घुसकर सामाजिक कार्यों के माध्यम से—ख़ुद लेखिका के लिए भी—बहुत शिक्षाप्रद और रोमांचक रहा है।
इस किताब में उन्होंने बिहार के गाँवों के झरोखों से जैसा देखा, वैसा लिखा है। अपने काम का ज़िक्र करते हुए वहाँ के समाज की आवश्यकताएँ बताई हैं, लोगों के स्वभाव बतलाए हैं और सम्बन्धों के पारिवारिक व सामाजिक ताने-बाने को खोलकर दिखाया है।
आशा है, विषय की गहराई में जानेवाले लोगों को यह किताब अच्छी लगेगी।
Aur Karvan Banta Gaya
- Author Name:
Shatrughna Prasad Singh
- Book Type:

- Description: यह पुस्तक बिहार शिक्षक-आन्दोलन के प्रखर नेता और पूर्व-सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह की आत्मकथा पुस्तक है जिसमें उन्होंने अपने निजी और सार्वजनिक जीवन के साथ-साथ अपने व्यापक अनुभवों के आधार पर बने विचारों को भी व्यक्त किया है। शिक्षक की अपनी मूल पहचान को अपने सार्वजनिक जीवन की धुरी मानते हुए उन्होंने जिस तरह लम्बे समय तक इस देश की सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक परिस्थितियों को समझा, यह पुस्तक उसका लेखा-जोखा है। इसलिए निजी यादों के विवरण से ज्यादा हम इसे एक वैचारिक दस्तावेज के रूप में भी पढ़ सकते हैं जिसमें शिक्षा-तंत्र और अध्यापकों के संघर्ष से लेकर देश के वर्तमान सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण भारत की वस्तुस्थिति, मजदूरों का पलायन, सत्ता और भ्रष्टाचार का गठजोड़, अपराध की राजनीतिक ताकत से लेकर इधर के ताजातरीन मुद्दों, मसलन रोहित वेमुला की आत्महत्या तथा जे.एन.यू.में कन्हैया की अलोकतांत्रिक गिरफ्तारी तक पर विचार किया गया है।
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