Shailendra
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शैलेन्द्र (1923-1966): जिस तरह कहानी लिखते-लिखते प्रेमचंद कहानी का पर्याय बन गए, उसी तरह शैलेन्द्र गीत रचते-रचते गीतों के प्रेमचंद बन गए (हालाँकि प्रेमचंद ने कभी गीत नहीं लिखे) । वर्ड्सवर्थ और पंत को प्रकृति का कवि कहा जाता है, एलियट और मुक्तिबोध को विचारों का कवि माना जाता है, शैलेन्द्र को इश्क़, इंकलाब और इंसानियत के कवि के रूप में जाना जाता है। नामवर सिंह के अनुसार- "शैलेन्द्र की कविताएँ सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। वे सही और सच्चे अर्थों में जनकवि थे।" शैलेन्द्र का पहला कविता-संग्रह न्यौता और चुनौती 1955 में प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी 33 कविताएँ शामिल हैं। शैलेंद्र ने लगभग 800 गीत लिखे । शैलेन्द्र की कविताओं में संवेदना और सृजन का राग है, प्रतिरोध और प्रतिबद्धता की आग है और समानता, स्वतंत्रता और इंसानियत से परिपूर्ण समाज का हसीं ख़्वाब है। उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए फ़िल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। रेणुजी की अमर प्रेम कहानी तीसरी क़सम उर्फ़ मारे गए गुलफाम पर शैलेन्द्र ने तीसरी क़सम फ़िल्म का निर्माण किया। शैलेन्द्र के निधन के बाद तीसरी क़सम को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाज़ा गया। लोकप्रियता और कलात्मकता का अद्भुत मणिकांचन संयोग ही शैलेन्द्र के गीतों को कालजयी बनाता है।
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शैलेन्द्र (1923-1966): जिस तरह कहानी लिखते-लिखते प्रेमचंद कहानी का पर्याय बन गए, उसी तरह शैलेन्द्र गीत रचते-रचते गीतों के प्रेमचंद बन गए (हालाँकि प्रेमचंद ने कभी गीत नहीं लिखे) । वर्ड्सवर्थ और पंत को प्रकृति का कवि कहा जाता है, एलियट और मुक्तिबोध को विचारों का कवि माना जाता है, शैलेन्द्र को इश्क़, इंकलाब और इंसानियत के कवि के रूप में जाना जाता है। नामवर सिंह के अनुसार- "शैलेन्द्र की कविताएँ सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। वे सही और सच्चे अर्थों में जनकवि थे।" शैलेन्द्र का पहला कविता-संग्रह न्यौता और चुनौती 1955 में प्रकाशित हुआ जिसमें उनकी 33 कविताएँ शामिल हैं। शैलेंद्र ने लगभग 800 गीत लिखे । शैलेन्द्र की कविताओं में संवेदना और सृजन का राग है, प्रतिरोध और प्रतिबद्धता की आग है और समानता, स्वतंत्रता और इंसानियत से परिपूर्ण समाज का हसीं ख़्वाब है। उन्हें तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए फ़िल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। रेणुजी की अमर प्रेम कहानी तीसरी क़सम उर्फ़ मारे गए गुलफाम पर शैलेन्द्र ने तीसरी क़सम फ़िल्म का निर्माण किया। शैलेन्द्र के निधन के बाद तीसरी क़सम को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाज़ा गया। लोकप्रियता और कलात्मकता का अद्भुत मणिकांचन संयोग ही शैलेन्द्र के गीतों को कालजयी बनाता है।
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Shailendra (1923–1966) did not simply write songs—he became the Premchand of song, a writer whose verses merged with the emotional vocabulary of an entire generation. Where Wordsworth celebrated nature and Eliot turned to modernist fragmentation, Shailendra built his poetic universe around ishq (love), inqilab (revolution), and insaniyat (humanity). Literary critic Namwar Singh recognized him as a janakavi—a people's poet whose work carried social conscience beyond the page and into the lived experience of ordinary Indians. This Sahitya Akademi biography traces the arc of a lyricist who turned film songs into vessels of political longing and romantic idealism, whose poetry collection arrived at a moment when Hindi cinema and progressive literature still spoke the same language.
यह किताब पढ़ते समय पाठक को किस तरह का अनुभव मिलेगा?
यह किताब एक ऐसे कवि के भीतर उतरने का अनुभव देती है जिसकी पंक्तियाँ आज भी सामूहिक स्मृति में गूँजती हैं। यह कोई रोमानी जीवन-कथा नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मन का दस्तावेज़ है जो इश्क़ और इंकलाब को एक साथ देख सकता था। पाठक को शैलेन्द्र की रचनात्मक यात्रा के साथ-साथ उस युग की साहित्यिक और सिनेमाई दुनिया के भीतर चलने का मौका मिलता है, जहाँ गीत सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की आवाज़ थे।
यह पुस्तक किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए किस पृष्ठभूमि की ज़रूरत है?
- हिंदी फ़िल्म संगीत और प्रगतिशील साहित्य के बीच के संबंध को समझना चाहने वाले पाठक
- जो नामवर सिंह, प्रेमचंद और जनकवि परंपरा से परिचित हैं और शैलेन्द्र को उस संदर्भ में रखना चाहते हैं
- साहित्य अकादमी की जीवनियों की गंभीर शैली को सराहने वाले, जो तथ्यों और विश्लेषण की अपेक्षा रखते हैं
- हिंदी में पढ़ने में सहज, क्योंकि यह एक साहित्यिक जीवनी है, लोकप्रिय हल्की किताब नहीं
इस किताब का विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
शैलेन्द्र उस दौर के प्रतिनिधि हैं जब हिंदी सिनेमा सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ था और गीतकार सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि विचार भी देते थे। आज जब फ़िल्म गीत अक्सर व्यावसायिक सूत्रों तक सिमट गए हैं, शैलेन्द्र की विरासत यह याद दिलाती है कि लोकप्रिय कला भी गहरी मानवीय और राजनीतिक चेतना ले जा सकती है। उनका जीवन और काम भारतीय आधुनिकता के उस क्षण को रोशन करता है जब इंसानियत और इंकलाब एक साथ गाए जा सकते थे।
शैलेन्द्र का इस विषय के प्रति नज़रिया अन्य लेखकों या गीतकारों से किस तरह अलग है?
शैलेन्द्र ने गीत को कविता की तरह गढ़ा, न कि सिर्फ़ धुन के लिए शब्द भरे। जहाँ अन्य गीतकार रोमांस या भक्ति में रहते थे, शैलेन्द्र ने इश्क़ और इंकलाब को एक ही सिक्के के दो पहलू माना। नामवर सिंह ने उन्हें इसीलिए जनकवि कहा—उनकी रचनाएँ व्यक्तिगत और सामाजिक को अलग नहीं करतीं। उनकी भाषा सरल थी, लेकिन उसमें गहरी वैचारिक प्रतिबद्धता थी, जो उन्हें प्रेमचंद की परंपरा से जोड़ती है।
यह किताब पाठक के साथ भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से क्या छोड़ जाती है जो पढ़ने के बाद भी बना रहता है?
यह किताब पाठक को एक ऐसे रचनाकार की याद के साथ छोड़ जाती है जिसने अपनी कला को जनता की आवाज़ बनाया। भावनात्मक रूप से, यह उस युग की कोमलता और आक्रोश को फिर से जीवित करती है। बौद्धिक रूप से, यह दिखाती है कि लोकप्रिय माध्यम भी साहित्यिक गहराई रख सकते हैं। सांस्कृतिक रूप से, यह एक ऐसे कवि की विरासत की रक्षा करती है जिसके बिना हिंदी सिनेमा की प्रगतिशील परंपरा अधूरी है।

