Smaran Sangeet
Author:
Sudha PatwardhanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Available
गायिका, गुरु, पदाधिष्ठितज्ञ आदि अनेक प्रकार से संगीत के क्षेत्र में लम्बे समय से कार्यरत रही डॉ. सुधा पटवर्धन ने अपनी पुस्तक 'स्मरण संगीत' में संगीत से सम्बन्धित अनेक विषयों पर अपने निरीक्षण एवं अभिप्राय पेश किए हैं। निजी स्मृतियाँ, संगीत की प्रथाओं-परम्पराओं पर भाष्य, कुछ मौलिक संगीत विषयों पर संक्षेप में विवेचन, इस प्रकार से पुस्तक का स्वरूप बहुआयामी है। अभिजात संगीत और मुख्य रूप में गायन संगीत तथा घरानों से लेकर संगीत के आर्थिक व्यवहार तक कई विषयों का परामर्श इस पुस्तक में लिया गया है। प्रतिपादन में खुलापन, गिने-चुने शब्दों में आशय व्यक्त करने की क्षमता जैसे गुणों का होना इस पुस्तक की विशेषता माननी होगी। लेखनी में पैनापन, संगीत के निर्दोष एवं स्वस्थ सफ़र के लिए दी गई सूचनाएँ तथा निर्देश अच्छा योगदान दे सकते हैं।</p>
<p>शैली सीधी सरल है। गुरु-माहात्म्य, गुरु-निष्ठा, गुरु सेवा, गुरुमुखी विद्या, रियासतें, पठनीय विचार पुस्तक में हैं। संगीत-प्रेमियों के लिए एक अनिवार्य पठनीय पुस्तक।</p>
<p>—अशोक श्री रानडे
ISBN: 9788180319693
Pages: 216
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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राजर्षि शाहू छत्रपति (1874-1922) कोल्हापुर रियासत के अधिपति थे। अपने अल्पकाल के राज्यशासन में प्रगतिशील सुधारों से आप ‘लोकराजा’ बने। मराठा इतिहास के विशेषज्ञ डॉ. रमेश जाधव ने अपने अनुसन्धान को आधार बनाकर इन्हीं लोकराजा का चरित्र लिखा।
‘लोकराजा शाहू छत्रपति’ ग्रन्थ राजर्षि शाहू छत्रपति के जीवन, कार्य एवं विचारों की जीवन्त व प्रामाणिक कथा अभिव्यक्त करता है। महाराष्ट्र में बीसवीं सदी के प्रारम्भ में अछूतोद्धार, नारी शिक्षा, निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा, अन्तरजातीय विवाह, कृषि सुधार, सहकारिता, छात्रावासों की निर्मिति से विभिन्न समुदायों के मध्य समन्वय, कला-क्रीड़ा-संस्कृति उपक्रमों को बढ़ावा इत्यादि प्रजाहितैषी कार्यों से राजर्षि शाहू छत्रपति भारतवर्ष के लिए अनुकरणीय बने। उत्तर प्रदेश में उनकी स्मृति में ज़िला एवं विश्वविद्यालय का निर्माण, संसद भवन में उनकी प्रतिमा की स्थापना उनके सामाजिक कार्यों की महत्ता को रेखांकित करते हैं।
सामाजिक न्याय को सर्वोच्च जीवनमूल्य माननेवाले ‘लोकराजा शाहू छत्रपति’ के इस जीवन चरित को जीवनी लेखन के क्षेत्र में पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। मराठी से हिन्दी में अनुवाद करते हुए प्रो. शरद कणबरकर ने संवेदना और भाषिक संरचना का विशेष ध्यान रखा है। इस जीवनी को पढ़ना व्यापक सामाजिकता में प्रवेश करना है।
Shailendra
- Author Name:
Indrajeet Singh
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- Book Type:

- Description: जिस तरह कहानी लिखते लिखते प्रेमचंद कहानी का प्रयाय बन गये, उसी तरह शैलेंद्र गीत रचते रचते गीतों के प्रेमचंद बन गए। शैलेंद्र को इश्क़, इंक़लाब, और इंसानियत के कवि के रूप में जाना जाता है। नामवर सिंह के अनुसार "शैलेंद्र की कविताएँ सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। वे सही और सच्चे अर्थों में जनकवि थे।
Kaafi Hain Ek Zindagi
- Author Name:
Anjani Kumar Singh
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Description:
‘हर व्यक्ति की एक कहानी होती है। उस कहानी में एक घर-गाँव होता है। मेरे गाँव का नाम है चमथा… बिहार के चार जिलों का संगम है मेरा गाँव।’
अंजनी कुमार सिंह के संस्मरण इन पंक्तियों के साथ शुरू होते हैं। इसके बाद के पन्नों में, हम एक उल्लेखनीय जीवन को प्रकट होते देखते हैं—एक ऐसा जीवन जो 'संगम' है परंपरा और आधुनिकता का, अनुभव के माध्यम से सीखने और बिहार की विविध दुनियाओं की खोज का, और सार्वजनिक सेवा और व्यक्तिगत जुनून का। शासन और विकास कार्य की चुनौतियों और संतुष्टि के बारे में असाधारण अंतर्दृष्टि के साथ, अंजनी कुमार सिंह ने भारत और विदेशों में यात्रा के और दुर्लभ पौधों के एक संग्रह के निर्माण के अपने अनुभव भी साझा किए हैं। और साझा किया है एक शानदार उपलब्धि का अनुभव—बिहार संग्रहालय की स्थापना, जो कि दक्षिण एशिया की शास्त्रीय और समकालीन कला का घर है, और जिसकी तुलना दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संग्रहालयों से की जा सकती है।
काफ़ी है एक ज़िंदगी को आप लोक सेवक और कला प्रेमी के सबसे रोचक और असामान्य संस्मरणों में से एक पाएंगे।
Agniparva : Shantiniketan
- Author Name:
Roza Hajnoczy Germanus
- Book Type:

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Description:
यह कृति हंगेरियन गृहवधू रोज़ा हजनोशी गेरमानूस की उनके शान्तिनिकेतन प्रवास-काल अप्रैल 1929 से जनवरी 1932 की एक अनोखी डायरी है। इसमें शान्तिनिकेतन जीवन-काल की सूक्ष्म दैनंदिनी, वहाँ के भवन, छात्रावास, बाग़-बगीचे, पेड़-पौधे, चारों ओर फैले मैदान, संताल गाँवों का परिवेश, छात्रों और अध्यापकों के साथ बस्ती के जीवित चित्र और चरित्र लेखिका की क़लम के जादू से आँखों के सामने जीते-जागते, चलते-फिरते नज़र आते हैं। पाठक एक बार फिर विश्वभारती शान्तिनिकेतन के गौरवपूर्ण दिनों में लौट जाएँगे, जब रवीन्द्रनाथ ठाकुर के महान व्यक्तित्व से प्रभावित कितने ही देशी और विदेशी विद्वान और प्रतिभासम्पन्न लोग वहाँ आते-जाते रहे।
रोज़ा के पति ज्यूला गेरमानूस इस्लामी धर्म और इतिहास के प्रोफ़ेसर के पद पर शान्तिनिकेतन में तीन वर्ष (1929-1931) के अनुबन्ध पर आए थे। तब हिन्दुस्तान में स्वतंत्रता आन्दोलन अपने चरम शिखर पर था। गांधी जी का ‘नमक सत्याग्रह’ उस समय की प्रमुख घटना थी। पुस्तक की विषय-वस्तु प्रथम पृष्ठ से अन्तिम पृष्ठ तक शान्तिनिकेतन की पृष्ठभूमि में स्वतंत्रता-संग्राम के अग्निपर्व का भारत की उपस्थिति है। इस पुस्तक की बदौलत रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गांधी और शान्तिनिकेतन हंगरी में सर्वमान्य परिचित नाम हैं।
एक वस्तुनिष्ठ रोज़नामचा के अलावा, पुस्तक रोचक यात्रा-विवरण, समकालीन राजनीतिक उथल-पुथल, इतिहास, धर्म-दर्शन, समाज और रूमानी कथाओं का बेजोड़ समन्वय है।
हमारे रीति-रिवाज़ों, अन्धविश्वासों और धार्मिक अनुष्ठानों को इस विदेशी महिला ने इतनी बारीकी से देखा कि हैरानी होती है उनकी समझ-बूझ और पैठ पर। प्रणय-गाथाओं के चलते भी यह डायरी एक धारावाहिक रूमानी उपन्यास-सा लगे तो आश्चर्य नहीं।
इस देश से विदा होने के समय वह इसी अलौकिक हिन्दुस्तान के लिए जहाज़ की रेलिंग पकड़कर फूट-फूटकर रो रही थी—‘‘मेरा मन मेरे हिन्दुस्तान के लिए तरसने लगा, हिन्दुस्तान जो चमत्कारों का देश है।’’
SHABDAPURUSH MANIKCHANDRA VAJPAYEE
- Author Name:
Prof. Sanjay Dwivedi +1
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- Description: राष्ट्रीय भावधारा के कुछ महत्त्वपूर्ण पत्रकारों का उल्लेख जब भी किया जाएगा, श्री माणिकचंद्र वाजपेयी का नाम उसमें अग्रणी है। उनका समूचा जीवन रचना, सृजन और संघर्ष का अभूतपूर्व उदाहरण है। वे अपनी वैचारिकता में बहुत स्पष्ट हैं और जीवन में उतने ही उदार व समावेशी। आजादी के बाद पत्रकारिता के अनेक नायक सामने आते हैं, जिनमें देश के सर्वांगीण विकास की तड़प दिखती है। इसी दौर में भारतबोध से जुड़ी पत्रकारिता का प्रारंभ भी होता है, जिसके नायक पं. दीनदयाल उपाध्याय हैं। ‘राष्ट्रधर्म’, ‘स्वदेश’ और ‘पाञ्चजन्य’ जैसे तीन प्रकाशनों के माध्यम से वे पत्रकारिता में भारतीयता की अलख जगाते हैं, जिससे राष्ट्रीय भावधारा के पत्रकारों की एक मालिका खड़ी हो जाती है। बाद में ‘युगधर्म’ और ‘तरुण भारत’ जैसे पत्रों और ‘हिंदुस्थान समाचार’ जैसी समाचार एजेंसी से यह भाव और प्रखरता से सामने आता है। यह आवश्यक है कि हम अपने ऐसे नायकों को याद करें और उनका पुण्य स्मरण भी करें। स्व. माणिकचंद्र वाजपेयी की जन्मशती के अवसर पर यह पुस्तक उनके बारे में महत्त्वपूर्ण संदर्भ देती है। उनके कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण लेख इस पुस्तक में हैं, जो उनकी वैचारिकी के बारे में बताते हैं। साथ ही उनकी स्मृति को समर्पित कुछ लेख उनके जीवन और कृतित्व की बानगी भी देते हैं। आज जबकि भारतीय पत्रकारिता पर तमाम प्रश्न खड़े हो रहे हैं, ऐसे समय में मामाजी की याद बहुत स्वाभाविक और मार्मिक हो उठती है। —प्रो. संजय द्विवेदी महानिदेशक, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली
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