Bhakti Ke Teen Swar : Miraan, Sur, Kabir
(0)
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Ashok Kumar, John Stratton HawleyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Academics-and-references₹
399
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प्रो. हौली पिछले कई दशकों से भक्ति और हिन्दू परम्परा के अन्य पहलुओं पर विचारोत्तेजक काम करते रहे हैं। केनेथ ब्रायंट के साथ मिलकर उन्होंने सूरदास के पदों की प्रामाणिकता और पाठ-निर्धारण पर काम किया है। प्रस्तुत पुस्तक मूल अंग्रेज़ी में 2005 में प्रकाशित हुई थी। इस बीच नई खोजें हुई हैं, भक्ति-विमर्श में नए प्रश्न, नई शब्दावलियाँ आई हैं। प्रो. हौली ने पुस्तक की सामग्री को नई खोजों की रोशनी में अद्यतन किया है, हालाँकि ऐसा करते समय भी वे अपने मूल तर्क, आग्रहों और पद्धति को बनाए रहे हैं। सूरदास रचित पदों की संख्या ठीक-ठीक लाख नहीं तो हजारों में माननेवालों के लिए यह बहुत चौंकानेवाली बात होगी कि प्रो. हौली इनमें से केवल चार सौ तैंतीस को इस अर्थ में प्रामाणिक मानते हैं कि वे सूरदास से सम्बन्धित प्राचीनतम पांडुलिपियों में प्राप्त होते हैं। हौली इस पुस्तक में सूरदास, मीराँ और कबीर से जुड़े विशिष्ट सवालों—समय, रचनाओं की प्रामाणिकता, संवेदना का स्वभाव, लोक-स्मृति में उनका स्थान—आदि पर तो विचार करते ही हैं, वे इनके बहाने भक्ति-संवेदना से जुड़े व्यापक प्रश्नों पर भी विचार करते हैं। वे उस विमर्श में भी हिस्सा लेते हैं, जो भक्ति-संवेदना के ऐतिहासिक और दार्शनिक रूप से अभूतपूर्व पहलुओं को समझने की कोशिश करता रहा है। निर्गुण ही नहीं, यह बात तुलसी, सूर, मीराँ जैसे सगुण कवियों के बारे में भी सच है कि उनकी कविता आचार्यों द्वारा कर दिए गए ब्रह्म-निरूपण का जन-सुलभ मुहावरे में प्रचार करने के लिए नहीं रची गई है। वह सचमुच स्वायत्त और नवाचार सम्पन्न 'निज ब्रह्म विचार' है। इस निज ब्रह्म विचार और इसकी काव्याभिव्यक्ति के तीन सर्वाधिक मनोहर स्वरों को सुनते हुए प्रो. जॉन स्ट्रैटन हौली बहुत ही विचारोत्तेजक निष्कर्षों तक पहुँचे हैं, जिनमें से कुछ इस पुस्तक के माध्यम से आपके सामने मौजूद हैं।
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प्रो. हौली पिछले कई दशकों से भक्ति और हिन्दू परम्परा के अन्य पहलुओं पर विचारोत्तेजक काम करते रहे हैं। केनेथ ब्रायंट के साथ मिलकर उन्होंने सूरदास के पदों की प्रामाणिकता और पाठ-निर्धारण पर काम किया है। प्रस्तुत पुस्तक मूल अंग्रेज़ी में 2005 में प्रकाशित हुई थी। इस बीच नई खोजें हुई हैं, भक्ति-विमर्श में नए प्रश्न, नई शब्दावलियाँ आई हैं। प्रो. हौली ने पुस्तक की सामग्री को नई खोजों की रोशनी में अद्यतन किया है, हालाँकि ऐसा करते समय भी वे अपने मूल तर्क, आग्रहों और पद्धति को बनाए रहे हैं।
सूरदास रचित पदों की संख्या ठीक-ठीक लाख नहीं तो हजारों में माननेवालों के लिए यह बहुत चौंकानेवाली बात होगी कि प्रो. हौली इनमें से केवल चार सौ तैंतीस को इस अर्थ में प्रामाणिक मानते हैं कि वे सूरदास से सम्बन्धित प्राचीनतम पांडुलिपियों में प्राप्त होते हैं। हौली इस पुस्तक में सूरदास, मीराँ और कबीर से जुड़े विशिष्ट सवालों—समय, रचनाओं की प्रामाणिकता, संवेदना का स्वभाव, लोक-स्मृति में उनका स्थान—आदि पर तो विचार करते ही हैं, वे इनके बहाने भक्ति-संवेदना से जुड़े व्यापक प्रश्नों पर भी विचार करते हैं। वे उस विमर्श में भी हिस्सा लेते हैं, जो भक्ति-संवेदना के ऐतिहासिक और दार्शनिक रूप से अभूतपूर्व पहलुओं को समझने की कोशिश करता रहा है।
निर्गुण ही नहीं, यह बात तुलसी, सूर, मीराँ जैसे सगुण कवियों के बारे में भी सच है कि उनकी कविता आचार्यों द्वारा कर दिए गए ब्रह्म-निरूपण का जन-सुलभ मुहावरे में प्रचार करने के लिए नहीं रची गई है। वह सचमुच स्वायत्त और नवाचार सम्पन्न 'निज ब्रह्म विचार' है। इस निज ब्रह्म विचार और इसकी काव्याभिव्यक्ति के तीन सर्वाधिक मनोहर स्वरों को सुनते हुए प्रो. जॉन स्ट्रैटन हौली बहुत ही विचारोत्तेजक निष्कर्षों तक पहुँचे हैं, जिनमें से कुछ इस पुस्तक के माध्यम से आपके सामने मौजूद हैं।
Book Details
-
ISBN9789388933100
-
Pages303
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पंडितों, मौलवियों, योगियों आदि से लोहा लेकर कबीर ने जनसाधारण के स्वानुभूतिजन्य विचारों और भावों की मूल्यवत्ता स्थापित की। कबीर की वाणी सन्त-कंठ से निसृत होकर साधकों, अनुयायियों एवं लोक-जीवन में स्थान एवं रुचि भेद के अनुसार विविध रूपों में परिणत हो गई। इसलिए कबीर की वाणी के प्रामाणिक पाठ निर्धारण की जटिल समस्या कड़ी हो गई।
कबीर पन्थ में बीजक की श्रेष्ठता मान्य है, विद्वानों ने ग्रन्थावलियों को महत्त्व दिया है। सामान्य जन के लिए लोक में व्याप्त कबीर वाणी ग्राह्य है। अतः तीनों परम्पराओं में से किसी को भी त्यागना उचित नहीं है। फलत: कबीर की रचनाओं का समग्र रूप तीनों के समाहार से ही सम्भव है। प्रस्तुत ग्रन्थावली का सम्पादन इसी दृष्टि से किया गया है। मूल पाठ के साथ कबीर की मूल साधना तथा मन्तव्य के अनुकूल भाष्य प्रस्तुत किया गया है। इसमें अपनी इच्छित दिशा में आवश्यकता से अधिक खींचकर पाठकीय सोच को कुंठित करने की चेष्टा नहीं की गई है। कबीर-वाणी के प्रामाणिक एवं समग्र पाठ की दृष्टि से तथा उसमें निहित विचारों, भावों एवं अनुभूतियों को उद्घाटित करने की दृष्टि से यह कृति निश्चित ही महत्त्वपूर्ण एवं संग्रहणीय है।
Akath Kahani Prem Ki : Kabir Ki Kavita Aur Unka Samay
- Author Name:
Purushottam Agarwal +1
- Book Type:

- Description:
कबीर के समय को, जबदी हुई मनोवृत्ति का ‘मध्य-काल’ नहीं, देशज आधुनिकता का समय बताती हुई यह चर्चित और बहु-प्रशंसित पुस्तक प्रामाणिक और विचारोत्तेजक ढंग से कबीर और उनके समय का नया आख्यान रचती है। कबीर की काव्य-संवेदना का मार्मिक विश्लेषण करते हुए पुरुषोत्तम अग्रवाल याद दिलाते हैं कि ‘नारी-निंदक’ कहे गए कबीर प्रेम के पलों में नारी का ही रूप धारण करते हैं। यह पाठक पर है कि वह सम्बन्ध नारी-निन्दा के संस्कार से बनाता है, या नारी रूप धारण करती कवि-संवेदना से। पुस्तक काव्योक्त और शास्त्रोक्त भक्ति की धारणाएँ प्रस्तुत कर भक्ति-संवेदना के इतिहास पर पुनर्विचार की दिशा भी देती है। पुरुषोत्तम जी ने व्यापारियों और दस्तकारों द्वारा रचे जा रहे भक्ति के लोकवृत्त की अभूतपूर्व अवधारणा प्रस्तुत की है, और दिखाया है कि कबीर और अन्य सन्तों को ‘हाशिए की आवाज़’ देशज आधुनिकता में रचे गए भक्ति के लोकवृत्त ने नहीं, औपनिवेशिक ज्ञानकांड ने बनाया है। देशभाषा स्रोतों से संवाद किए बिना भारतीय इतिहास को समझना असम्भव है। बीसवीं सदी में गढ़ी गई रामानन्द की संस्कृत निर्मिति के इतिहास को मौलिक शोध के आधार पर, जासूसी कहानी की सी रोमांचकता के साथ प्रस्तुत करते हुए पुरुषोत्तम जी बताते हैं कि ‘साजिश’ और ‘बुद्धूपन’ जैसे बीज-शब्दों के सहारे किसी परम्परा को नहीं समझा जा सकता। इस पुस्तक की स्थापना है कि औपनिवेशिक आधुनिकता ने ग़ैर-यूरोपिय समाजों में ‘मध्यकालीन जड़ता को तोड़नेवाली प्रगतिशील भूमिका’ नहीं, देशज आधुनिकता को अवरुद्ध करने की भूमिका निभाई है। इस अवरोध ने अब तक चला आ रहा जो सांस्कृतिक संवेदना-विच्छेद उत्पन्न किया है, उसे दूर किए बिना हम न तो अपने अतीत का प्रामाणिक आख्यान रच सकते हैं, और न भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हो सकते हैं। कबीर की कविता और भारतीय इतिहास के जिज्ञासुओं के लिए अनिवार्य पुस्तक।
Akath Kahani Prem Ki : Kabir Ki Kavita Aur Unka Samay
Purushottam Agarwal
20% off₹ 499
₹ 399.2
Available
Manikarnika : Drishti Aur Vimarsh
- Author Name:
Anand Das
- Book Type:

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समकालीन हिन्दी दलित साहित्य और आत्मकथा विधा के वैचारिक आधार को गहराई से समझने के लिए “मणिकर्णिका : दृष्टि और विमर्श” एक महत्वपूर्ण कृति है। लेखक आनंद दास ने इस पुस्तक के माध्यम से समाज में व्याप्त असमानता, शोषण और संघर्ष की वास्तविकताओं का सटीक एवं गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक न केवल साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने का भी कार्य करती है। शोधार्थियों और साहित्य-प्रेमियों के लिए एक अत्यंत उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक!
District Saharanpur (Environmental Challenges and Population Scenario)
- Author Name:
Dr. Narendar Kumar +1
- Book Type:

- Description:
जनपद सहारनपुर अपनी प्राचीन ऐतिहासिक विरासत, भौगोलिक स्थिति, विविधतापूर्ण सांस्कृतिक परम्पराओं तथा प्राकृतिक संसाधनों के कारण प्रदेश में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। उत्तर प्रदेश राज्य के इस प्रसिद्ध जनपद की जनसंख्या, संस्कृति एवं पर्यावरण जैसे ज्वलन्त विषयों पर आधारित यह पुस्तक लेखकों द्वारा अत्यन्त सराहनीय एवं समयानुकूल प्रयास है। वर्तमान समय में तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या, नगरीयकरण तथा औद्योगिक गतिविधियों के कारण जनपद में अनेक पर्यावणीय चुनौतियाँ सामने आ रही है। अतः वर्तमान परिस्थितियों में इस प्रकार का सार्थक प्रयास न केवल शैक्षणिक समाज की दृष्टि से अर्पित नीति निर्धारकों और सामाजिक विकास के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। लेखकों का यह प्रयास सहारनपुर जनपद की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरण सन्तुलन के प्रति जागरूकता लाने के दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करेगा। मैं लेखकों को इस अत्यन्त ही सार्थक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई और उज्जवल भविष्य के लिए हृदय की गहराइयों से अपनी ढेरों शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। - प्रो. बीरेन्द्र सिंह : पूर्व प्राचार्य, आर.एस.एम. (पी.जी.) कालेज धामपुर, बिजनौर (उ.प्र.)
Aalim Sir Ki English Class
- Author Name:
Aalim
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Mai urdu Hoon
- Author Name:
Dheerendra Singh Fayyaz
- Book Type:

- Description:
मैं उर्दू हूँ’ एक भाषा के सफ़र का संस्मरण है। ये किताब उर्दू के प्रारम्भिक युग से शुरू होती है और मीर-ओ-ग़लिब से लेकर आधुनिक युग के नामचीन साहित्यकारों की उँगली थामे उस जगह तक जा पहुँचती है, जहाँ प्राचीन भाषाओं और लिपियों का ज़िक्र स्वाभाविक हो जाता है। इस संस्मरण में धीरे-धीरे ये भेद भी खुलता है कि सभी भाषाओं में कुछ न कुछ साम्य है और प्रत्यक्ष रूप से असंबद्ध लगने वाली देवनागरी, फ़ारसी और अरबी लिपियाँ दर-अस्ल एक ही मूल से निकली हैं। ये किताब लेखक और उर्दू के बीच होने वाला एक रोचक वार्तालाप है जो भाषाओं की व्युत्पत्ति, विकास और प्रसार के विषयों पर रौशनी डालता है।
Sarjnatmak Shiksha
- Author Name:
Raghav Prakash +2
- Book Type:

- Description:
आज हर समझदार माता-पिता अपने बच्चे को सही शिक्षा दिलवाने के लिए बेचैन हैं, हर चैतन्य शिक्षक अपने विद्यार्थी को ऊँचाइयाँ देने के लिए आतुर है और हर प्रबुद्ध शिक्षा-प्रशासक अपने स्कूल-कॉलेज की शिक्षण-पद्धति को परवान चढ़ाकर उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए संकल्पित है। किन्तु, कुछ अपवादों को छोड़कर, दुनिया भर की शिक्षा सर के बल खड़ी है। असल में, व्यवस्था-केन्द्रित शिक्षा-पद्धति को विद्यार्थी-केन्द्रित होना चाहिए। शिक्षा की मूल्य-दृष्टि, उसका पाठ्यक्रम शिक्षण-पद्धति और मूल्यांकन-पद्धति सबकुछ विद्यार्थी की वृत्ति, रुचि, योग्यता और गति के अनुरूप होनी चाहिए; विद्यार्थी की चेतना में गहरे छिपी उसकी मूल्यवान सर्जनात्मक क्षमता का, अधिकतम विकास कैसे किया जा सकता है, उसकी तजबीज ‘सर्जनात्मक शिक्षा’ में प्रस्तुत की गई है। इसमें जीवन-दृष्टि और शिक्षा-दृष्टि के ठहराव को उजागर कर कल्याणकारी जीवन-दृष्टि और उसी के अनुरूप सर्जनात्मक पाठ्यक्रम, सर्जनात्मक शिक्षण-पद्धति, सर्जनात्मक मूल्यांकन पद्धति एवं रचनात्मक शिक्षा-प्रशासन-व्यवस्था को प्रस्तुत किया गया है। पूर्व और पश्चिम के लगभग सौ शिक्षाशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, धर्मशास्त्रियों, शिक्षा-वैज्ञानिकों आदि द्वारा लिखित शोधपूर्ण पुस्तकों का गहन मंथन करने के उपरांत जो शिक्षा-दृष्टि और शिक्षा-व्यवहार विकसित हुआ है; ‘सर्जनात्मक शिक्षा’ उसी का ऐसा ‘अमृत तत्त्व’ है जो उत्कृष्ट की तलाश में जुटे हुए प्रत्येक शिक्षाविद्, अभिभावक, शिक्षक, शिक्षा-प्रबन्धक और चैतन्य विद्यार्थी के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय है।
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